अध्याय 3यायावर साम्राज्य

शिक्षण नोट्स63 मिनट

NCERT — विश्व इतिहास के कुछ विषय, विषय 3 (Reprint 2026-27), पृ. 58–76

खंड: दो — साम्राज्य • विषय-वस्तु: मध्य-एशिया के मंगोल; चंगेज़ खान और पारमहाद्वीपीय साम्राज्य (13वीं–14वीं शताब्दी)

1. प्रस्तावना: ‘यायावर साम्राज्य’ — एक विरोधाभासी अवधारणा? (पृ. 58)

  • ‘यायावर साम्राज्य’ की अवधारणा विरोधाभासी प्रतीत हो सकती है। तर्क —
    • यायावर लोग मूलतः घुमक्कड़ होते हैं; वे सापेक्षिक तौर पर एक अविभेदित आर्थिक जीवन और प्रारंभिक राजनीतिक संगठन के साथ परिवारों के समूहों में संगठित होते हैं।
    • दूसरी ओर ‘साम्राज्य’ शब्द भौतिक अवस्थितियों को दर्शाता है — इसने जटिल सामाजिक और आर्थिक ढाँचे में स्थिरता प्रदान की और एक सुपरिष्कृत प्रशासनिक-व्यवस्था द्वारा व्यापक भूभागीय प्रदेश में सुचारु रूप से शासन प्रदान किया।
  • ! NCERT की पद्धति-चेतावनी: कई बार समाजशास्त्रियों की परिभाषाएँ बहुत संकीर्ण व गैर-ऐतिहासिक हो जाती हैं क्योंकि वे किसी बँधे-बँधाए साँचे में उन्हें ढालती हैं; ये परिभाषाएँ तब त्रुटिपूर्ण सिद्ध होती हैं जब हम यायावर समूहों द्वारा निर्मित साम्राज्य-संबंधी संगठनों का अध्ययन करते हैं।
  • तुलना: अध्याय 4 में इस्लामी इलाकों में राज्य-निर्माण का अध्ययन किया गया जो अरब-प्रायद्वीप की बद्दू यायावर-परंपरा पर आधारित था। इस अध्याय में एक भिन्न वर्ग के यायावरों का अध्ययन है — मध्य-एशिया के मंगोल, जिन्होंने तेरहवीं और चौदहवीं शताब्दी में चंगेज़ खान के नेतृत्व में पारमहाद्वीपीय साम्राज्य की स्थापना की। (शिक्षक-नोट: यहाँ ‘अध्याय 4’ का उल्लेख पुरानी अध्याय-क्रम-व्यवस्था का अवशेष है — देखें 09-Teacher-Mastery-Guide का errata खंड।)
  • साम्राज्य का विस्तार: यूरोप और एशिया महाद्वीप तक।
  • तुलनात्मक टिप्पणी (महत्त्वपूर्ण): कृषि पर आधारित चीन की सामाजिक निर्माण-व्यवस्था की तुलना में शायद मंगोलिया के यायावर लोग दीन-हीन, जटिल जीवन से दूर एक सामान्य सामाजिक और आर्थिक परिवेश में जीवन बिता रहे थे;
    • लेकिन मध्य-एशिया के ये यायावर एक ऐसे अलग-थलग ‘द्वीप’ के निवासी नहीं थे जिन पर ऐतिहासिक परिवर्तनों का प्रभाव न पड़े।
    • इन समाजों ने विशाल विश्व के अनेक देशों से संपर्क रखा, उनके ऊपर अपना प्रभाव छोड़ा और उनसे बहुत कुछ सीखा — जिनके वे एक महत्त्वपूर्ण अंग थे।
  • अध्याय का केंद्रीय कथ्य: मंगोलों ने चंगेज़ खान के नेतृत्व में अपने पारंपरिक सामाजिक और राजनीतिक रीति-रिवाजों को रूपांतरित कर एक भयानक सैनिक-तंत्र और शासन-संचालन की प्रभावी पद्धतियों का सूत्रपात किया।
  • मंगोलों के सामने चुनौती: वे केवल अपनी स्टेपी परंपराओं के ज़रिये हाल ही में विजित क्षेत्रों का शासन नहीं चला सकते थे — क्योंकि इस नए क्षेत्र में उन्हें तरह-तरह के लोगों, अर्थव्यवस्थाओं और धर्मों का सामना करना पड़ा।
  • अपना ‘यायावर साम्राज्य’ बनाने के लिए उन्हें नए कदम उठाने पड़े और समझौते भी करने पड़े; इस साम्राज्य का यूरेशिया के इतिहास पर गहरा प्रभाव पड़ा और इसने मंगोलों के समाज के चरित्र और संरचना को हमेशा के लिए बदल डाला।

2. स्रोत-सामग्री की समस्या (पृ. 58–60)★★★

2.1 मूल कठिनाई

  • स्टेपी निवासियों ने आमतौर पर अपना कोई साहित्य नहीं रचा। इसलिए इन यायावरी समाजों का ज्ञान मुख्यतः इतिवृत्तों, यात्रा-वृत्तांतों और नगरीय साहित्यकारों के दस्तावेज़ों से प्राप्त होता है।
  • इन लेखकों की यायावरों के जीवन-संबंधी सूचनाएँ अज्ञात और पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हैं।

2.2 विदेशी लेखकों की विविधता

  • मंगोलों की साम्राज्यिक सफलताओं ने अनेक विद्वानों को आकर्षित किया —
    • कुछ ने अपने अनुभवों के यात्रावृत्तांत लिखे;
    • अन्य मंगोल अधिपतियों के राज्याश्रय में रहे।
  • इन व्यक्तियों की पृष्ठभूमि अलग-अलग थी — वे बौद्ध, कन्फ़्यूशियसवादी, ईसाई, तुर्क और मुसलमान थे।
  • यद्यपि इन लोगों को मंगोल रीति-रिवाजों का ज्ञान नहीं था, इनमें से अनेक ने इनके विषय में सहानुभूतिपूर्ण विवरण और यहाँ तक कि उनकी प्रशस्तियाँ भी लिखीं।
  • ऐसे विवरणों ने यूरेशिया के शहरों से उपजे निंदापूर्ण लेखों को चुनौती दी, जिनमें मंगोलों को स्टेपी लुटेरा बताकर हाशिये पर डाल दिया जाता था।
  • परिणाम: मंगोलों की तस्वीर पहले से कहीं ज़्यादा जटिल हो गई। अतः मंगोलों का इतिहास हमें ऐसे रोचक तथ्य उपलब्ध कराता है जिससे — सामान्यतया अभ्रमणशील समाजों द्वारा जिस ढंग से यायावर समुदायों को आदिम-बर्बर के रूप में पेश किया गया है — उस पर प्रश्नचिह्न लग जाता है।

साइड-बॉक्स (पृ. 59): ‘बर्बर’ शब्द की व्युत्पत्ति और राजनीति★★

  • अंग्रेज़ी में बारबेरियन (Barbarian) शब्द यूनानी भाषा के बारबरोस (Barbaros) से उत्पन्न हुआ, जिसका तात्पर्य गैर-यूनानी लोगों से है — जिनकी भाषा यूनानियों को बेतरतीब कोलाहल “बर-बर” के समान लगती थी।
  • यूनानी ग्रंथों में बर्बरों को बच्चों की तरह दिखाया गया है — जो सुचारु रूप से बोलने या सोचने में असमर्थ, डरपोक, स्त्रैण, विलासप्रिय, निष्ठुर, आलसी, लालची और स्वशासन चलाने में असमर्थ थे।
  • यह रूढ़िगत, घिसी-पिटी धारणाएँ रोमवासियों के पास भी थीं; रोमवासियों ने बर्बर शब्द का प्रयोग जर्मन जनजातियों गॉल (Gauls) और हूण (Huns) जैसे लोगों के लिए किया।
  • चीनियों ने स्टेपी प्रदेश के बर्बरों के लिए दूसरे शब्दों का प्रयोग किया, पर उनमें से किसी भी शब्द के सकारात्मक अर्थ नहीं थे।

2.3 रूसी/सोवियत शोध और उसकी राजनीति (पृ. 59)

  • संभवतः मंगोलों पर सबसे बहुमूल्य शोध कार्य अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में रूसी विद्वानों ने उस काल में किया जब ज़ार शासक मध्य-एशियाई क्षेत्रों में अपनी शक्ति सुदृढ़ कर रहे थे।
  • ये कार्य औपनिवेशिक वातावरण में हुए, जो प्रायः हमें सर्वेक्षण-टिप्पणियों के रूप में मिलते हैं; इन्हें यात्रियों, सैनिकों, व्यापारियों और पुराविदों ने तैयार किया था।
  • प्रारंभिक बीसवीं शताब्दी में इस क्षेत्र में सोवियत-गणराज्य के विस्तार के उपरांत नवीन मार्क्सवादी इतिहास-लेखन में यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि प्रचलित उत्पादन-प्रणाली सामाजिक संबंधों की प्रकृति को निर्धारित करती है।
    • इसने चंगेज़ खान और उभरते मंगोल साम्राज्य को मानव विकास की उस संक्रमण व्यवस्था के दायरे में रखा जिसमें जनजातीय उत्पादन-प्रणाली से सामंती उत्पादन-प्रणाली की ओर परिवर्तन हो रहा था।
    • ये परिवर्तन सापेक्षिक रूप से एक वर्गविहीन सामाजिक व्यवस्था से उस सामाजिक व्यवस्था की ओर हुआ जिसमें कृषक, भूस्वामी और लॉर्ड के बीच एक विशाल अंतर पाया गया।
  • इस निर्धारित व्याख्या का अनुसरण करते हुए भी मंगोल भाषाओं, उनके समाज और संस्कृति पर अतिउत्तम शोध बोरिस याकोवलेविच व्लादिमीरस्तॉव (Boris Yakovlevich Vladimirtsov) जैसे विद्वानों ने किया।
  • वैसिली व्लैदिमिरोविच बारतोल्ड (Vasily Vladimirovich Bartold) ने सोवियत विचारधारा का समर्थन नहीं किया —
    • एक ऐसे समय जब स्टालिन के शासनकाल में आंचलिक राष्ट्रवाद के कारण घबराहट व्याप्त हो गई थी, तब बारतोल्ड का चंगेज़ खान और उसके वंशजों के अधीन मंगोलों के जीवन और उनकी उपलब्धियों का सकारात्मक और सहानुभूतिपरक विवरण ने उन्हें अभिवेचकों (Censors) के रोष का पात्र बना दिया।
    • उन्होंने बारतोल्ड की रचनाओं के प्रसार पर कठोरतापूर्वक पाबंदी लगा दी;
    • और केवल 1960 के दशक में उदारवादी ख्रुश्चेव युग के दौरान और उसके उपरांत ही उनकी रचनाओं को नौ खंडों में प्रकाशित किया गया।
  • शिक्षण-सूत्र: इतिहास-लेखन स्वयं राजनीतिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है।

2.4 बहुभाषी स्रोत और वाङ्ग्मीमांसक की भूमिका (पृ. 59–60)

  • पारमहाद्वीपीय मंगोल साम्राज्य के विस्तार का मतलब — शोध के स्रोत अनेक भाषाओं में रचे गए हैं।
  • सबसे निर्णायक स्रोत: चीनी, मंगोली, फ़ारसी और अरबी भाषा में; महत्त्वपूर्ण सामग्रियाँ इतालवी, लातिनी, फ्राँसीसी और रूसी भाषा में भी मिलती हैं।
  • समस्या: अक्सर एक ही मूलग्रंथ भिन्न आशय के साथ दो अलग-अलग भाषाओं में प्रस्तुत किए गए हैं। उदाहरण —
    • चंगेज़ खान के विषय में सबसे प्राचीन विवरण मंगकोल-उन-न्यूतोबिअन (Mongqol-un niuèa tobèa’an) — ‘मंगोलों का गोपनीय इतिहास’ जो मंगोल और चीनी भाषा में मिलते हैं, एक-दूसरे से अलग हैं।
    • इसी तरह मार्कोपोलो द्वारा मंगोल राजदरबार का यात्रावृत्तांत, जो इतालवी और लातिनी भाषा में उपलब्ध है, वे एक दूसरे से मेल नहीं खाते।
  • चूँकि मंगोलों ने अपने बारे में स्वयं बहुत कम साहित्य रचा और विदेशी सांस्कृतिक वातावरण में रहने वाले विद्वानों ने उनके बारे में ज़्यादातर लिखा — अतः इतिहासकारों को उन विदेशी मूल रचनाओं में जिन वाक्यांशों का प्रयोग हुआ, उसका मंगोल भाषा का करीबी अर्थ निकालने के लिए वाङ्ग्मीमांसक (Philologist) की भूमिका अदा करनी पड़ती है।
  • इगोर दे रखेविल्ट्स (Igor de Rachewiltz) — मंगोलों का गोपनीय इतिहास पर कार्य; गेरहार्ड डोरफर (Gerhard Doesrfer) — मंगोल और तुर्की शब्दावलियों पर कार्य (जो फ़ारसी में शामिल हो गईं)। → इन विद्वानों की रचनाएँ मध्य-एशिया के यायावरों के इतिहास को पढ़ने की कठिनाइयों को उजागर करती हैं।
  • NCERT का निष्कर्ष: चंगेज़ खान और मंगोलों के विश्वव्यापी साम्राज्य के बारे में अविश्वसनीय उपलब्धि के बावजूद उद्यमी विद्वान अनुसंधानकर्ताओं को अभी बहुत कुछ छानबीन करना बाकी है।

3. भूमिका: यूरो-एशियाई महाद्वीप पर मंगोल-भय (पृ. 60–61)

  • तेरहवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में यूरो-एशियाई महाद्वीप के महान साम्राज्यों ने मध्य-एशिया के स्टेपी-प्रदेश में एक नयी राजनैतिक शक्ति के अभ्युदय के बड़े खतरे का अनुभव किया।
  • चंगेज़ खान (मृत्यु 1227) ने मंगोलों को संगठित किया।
  • पर उसकी राजनीतिक दूरदर्शिता मध्य-एशिया के स्टेपी-प्रदेश, मंगोल जातियों का एक महासंघ मात्र बनाने से कहीं अधिक दूरगामी थी — उसे ईश्वर से विश्व पर शासन करने का आदेश प्राप्त था।
  • यद्यपि उसका अपना जीवन मंगोल जातियों पर कब्ज़ा जमाने में और साम्राज्य-संलग्न क्षेत्र — जैसे उत्तरी चीन, तुरान (ट्राँसऑक्सिआना), अफ़गानिस्तान, पूर्वी ईरान, रूसी स्टेपी प्रदेशों — के विरुद्ध युद्ध-अभियानों के नेतृत्व और प्रत्यक्ष संचालन में बीता; तथापि उसके वंशजों ने इस क्षेत्र से और आगे जाकर चंगेज़ खान के स्वप्न को सार्थक किया और दुनिया के सबसे विशाल साम्राज्य का निर्माण किया।

3.1 मोन्के का लुई नौवें को संदेश (पृ. 61) [स्रोत]★★

  • चंगेज़ खान के आदर्शों के मुताबिक उसके पोते मोन्के (1251–60) ने फ्रांस के शासक लुई नौवें (1226–70) को यह चेतावनी दी:

“स्वर्ग में केवल एक शाश्वत आकाश है और पृथ्वी का केवल एक अधिपति, चंगेज़ खान, स्वर्ग पुत्र… जब शाश्वत स्वर्ग की शक्ति से संपूर्ण विश्व, सूर्य के उदय से लेकर अस्त होने तक, आनंदित और शांति में रहेगा, तब यह स्पष्ट होगा कि हम क्या करने जा रहे हैं। यद्यपि आपने शाश्वत स्वर्ग की आज्ञप्ति को समझ लिया है फिर भी आप इस पर विश्वास न करते हुए ध्यान नहीं देना चाहते हैं और केवल यह कह देते हैं कि, ‘हमारा देश दूर है, हमारे पर्वत विराट हैं और हमारे समुद्र विशाल हैं।’ अगर इस विश्वास के साथ आप हमारे विरुद्ध सैन्य बल लेकर आएँगे तो हम भी जानते हैं कि हम क्या कर सकते हैं। ऐसा उस शाश्वत स्वर्ग को भी पता है जिसने कठिनाई को आसान बनाया और सुदूर को निकट ला दिया।”

  • ये केवल कोरी धमकियाँ नहीं थीं। चंगेज़ खान के एक दूसरे पोते बातू (Batu) ने अपने 1236–1241 के अभियानों में रूस की भूमि को मास्को तक रौंद डाला और पोलैंड, हंगरी पर विजय प्राप्त कर वियना के बाहर पड़ाव डाल दिया।
  • तेरहवीं शताब्दी तक यह लगने लगा कि शाश्वत आकाश मंगोलों के पक्ष में था। चीन के अधिकांश भाग, मध्यपूर्व एशिया और यूरोप यह मानने लगे कि चंगेज़ खान की आबाद दुनिया पर विजय ‘ईश्वर का गुस्सा’ है और यह क़यामत के दिन की शुरुआत है।

बॉक्स (पृ. 61): बुखारा पर कब्ज़ा — जुवैनी का वृत्तांत [स्रोत]★★★

  • परवर्ती तेरहवीं शताब्दी के ईरान के मंगोल शासकों के एक फ़ारसी इतिवृत्तकार जुवैनी (Juwaini) ने 1220 ई. में बुखारा की विजय का वृत्तांत दिया है।
  • जुवैनी के कथनानुसार नगर की विजय के बाद चंगेज़ खान उत्सव मैदान में गया जहाँ पर नगर के धनी व्यापारी एकत्रित थे। उसने उन्हें संबोधित कर कहा —

“अरे लोगों! तुम्हें यह ज्ञात होना चाहिए कि तुम लोगों ने अनेक पाप किए हैं और तुममें से जो अधिक सम्पन्न लोग हैं उन्होंने सबसे अधिक पाप किए हैं। अगर तुम मुझसे पूछो कि इसका मेरे पास क्या प्रमाण है तो इसके लिए मैं कहूँगा कि मैं ईश्वर का दंड हूँ। यदि तुमने पाप न किए होते तो ईश्वर ने मुझे दंड हेतु तुम्हारे पास न भेजा होता…”

  • “अब कोई व्यक्ति, बुखारा पर अधिकार होने के बाद खुरासान भाग गया था। उससे नगर के भाग्य के बारे में पूछने पर उसने उत्तर दिया — ‘वे (नगर) आए, दीवारों को ध्वस्त कर दिया, जला दिया, लोगों का वध किया, लूटा और चल दिए।’”
  • क्रियाकलाप 1: यदि यह मान लें कि जुवैनी का बुखारा पर कब्ज़े का वृत्तांत सही है, कल्पना करें कि आप बुखारा और खुरासान के निवासी हैं और ऐसा भाषण सुन रहे हैं — तो उस भाषण का आपके ऊपर क्या प्रभाव पड़ेगा?

3.2 अध्याय के मूल प्रश्न (पृ. 61–62)

  • मंगोलों ने किस प्रकार अपने साम्राज्य का निर्माण किया और दूसरे ‘विश्व-विजेता’ सिकंदर की उपलब्धियों को बौना बना दिया?
  • पूर्व-औद्योगिक काल में जब प्रौद्योगिकी संचार-व्यवस्था अपर्याप्त थी, तब मंगोलों ने अपने विशाल साम्राज्य के शासन और नियंत्रण के लिए किन कौशलों का प्रयोग किया?
  • ऐसे एक व्यक्ति — जिसे अपने नैतिक और शासन के दैवी-अधिकारों के प्रति इतना आत्मविश्वास था — चंगेज़ खान ने अपने अधिकार-क्षेत्र में बसे विविध सामाजिक तथा धार्मिक समुदायों के साथ किस तरह संबंध रखा होगा?
  • उसकी राजसत्ता (Imperium) के विकास में इस बहुविविधता (Plurality) का क्या हुआ?
  • इन्हें समझने के लिए साधारण प्रश्नों से शुरुआत: मंगोल कौन थे? वे कहाँ रहते थे? उनके संबंध किनके साथ थे? उनके समाज और राजनीति के बारे में हमें जानकारी कहाँ से मिलती है?

मानचित्र 1 (पृ. 60): मंगोल साम्राज्य

  • दर्शाए गए स्थान — यूरोप, मास्को, रूसी सामंत देश, मंगोलिया, काराकोरम; काला सागर, कैस्पियन सागर, बाइज़ेंटाइन साम्राज्य, भूमध्यसागर; बग़दाद, फ़ारस, निशापुर, मर्व, बुखारा, समरकंद, ताशकंद, बल्ख़, हिरात, ओरमुज़; तुर्फ़ान, तिब्बत, चीन, ल्यांगज़ाओ, गुआंगज़ाओ; दिल्ली, हिमालय पर्वत शृंखला, भारत, बर्मा, अरब, अरब सागर, बंगाल की खाड़ी, हिंद महासागर, फ़ारस की खाड़ी।

4. मंगोलों की सामाजिक और राजनैतिक पृष्ठभूमि (पृ. 62–63)★★★

4.1 जन-समुदाय और आजीविका

  • मंगोल विविध जनसमुदाय का एक निकाय था।
  • ये लोग पूर्व में तातार, खितान और मंचू लोगों से और पश्चिम में तुर्की कबीलों से भाषागत समानता होने के कारण परस्पर सम्बद्ध थे।
  • कुछ मंगोल पशुपालक थे और कुछ शिकारी संग्राहक।
  • पशुपालक: घोड़ों, भेड़ों और कुछ हद तक अन्य पशुओं जैसे बकरी और ऊँटों को भी पालते थे।
  • उनका यायावरीकरण मध्य-एशिया की चारण भूमि (स्टेपीज़) में हुआ, जो आज के आधुनिक मंगोलिया राज्य का भूभाग है।

4.2 भूगोल

  • इस क्षेत्र का परिदृश्य आज जैसा ही अत्यंत मनोरम था और क्षितिज अत्यंत विस्तृत और लहरिया मैदानों से घिरा था।
  • पश्चिमी भाग में अल्ताई पहाड़ों की बर्फ़ीली चोटियाँ।
  • दक्षिण भाग में शुष्क गोबी का मरुस्थल।
  • इसके उत्तर और पश्चिम क्षेत्र में ओनोन और सेलेंगा जैसी नदियों और बर्फ़ीली पहाड़ियों से निकले सैकड़ों झरनों के पानी से सिंचाई।
  • पशुचारण के लिए यहाँ अनेक हरी घास के मैदान और प्रचुर मात्रा में छोटे-मोटे शिकार अनुकूल ऋतुओं में उपलब्ध।
  • शिकारी-संग्राहक लोग पशुपालक कबीलों के आवास-क्षेत्र के उत्तर में साइबेरियाई वनों में रहते थे;
    • वे पशुपालक लोगों की तुलना में अधिक गरीब थे;
    • ग्रीष्म काल में पकड़े गए जानवरों की खाल के व्यापार से जीविकोपार्जन करते थे।

4.3 जलवायु और कृषि का अभाव★★

  • इस पूरे क्षेत्र के अधिकतम और न्यूनतम तापमान में बहुत अंतर पाया जाता था: कठोर और लंबे शीत के मौसम के बाद अल्पकालीन और शुष्क गर्मियों की अवधि आती थी।
  • चारण क्षेत्र में साल की सीमित अवधियों में ही कृषि करना संभव था — परंतु मंगोलों ने (अपने पश्चिम के तुर्कों के विपरीत) कृषि कार्य को नहीं अपनाया।
  • न ही पशुपालकों और न ही शिकारी संग्राहकों की अर्थव्यवस्था घने आबादी वाले क्षेत्रों का भरण-पोषण करने में समर्थ थी।
  • परिणामस्वरूप इन क्षेत्रों में कोई नगर नहीं उभर पाए। ★★★
  • मंगोल तंबुओं और जरों (Gers) में निवास करते थे और अपने पशुधन के साथ शीतकालीन निवास स्थल से ग्रीष्मकालीन चारण भूमि की ओर चले जाते थे।

4.4 सामाजिक संगठन: वंश, परिसंघ, संघर्ष★★★

  • नृजातीय और भाषायी संबंधों ने मंगोल लोगों को परस्पर जोड़ रखा था, पर उपलब्ध आर्थिक संसाधनों में कमी होने के कारण उनका समाज अनेक पितृपक्षीय वंशों में विभाजित था।
  • धनी-परिवार विशाल होते थे, उनके पास अधिक संख्या में पशु और चारण भूमि होती थी → इस कारण उनके अनेक अनुयायी होते थे और स्थानीय राजनीति में उनका अधिक दबदबा होता था।
  • संघर्ष के कारण: समय-समय पर आने वाली प्राकृतिक आपदाएँ जैसे भीषण शीत-ऋतु के दौरान एकत्रित की गई शिकार-सामग्रियों और भंडार का समाप्त हो जाना, अथवा वर्षा न होने पर घास के मैदानों के सूख जाने पर उन्हें चरागाहों की खोज में भटकना पड़ता था — इस दौरान उनमें संघर्ष होता था।
  • पशुधन प्राप्त करने के लिए वे लूटपाट भी करते थे।
  • परिसंघ (Confederacy) का निर्माण: प्राय: परिवारों के समूह आक्रमण करने और अपनी रक्षा करने हेतु अधिक शक्तिशाली और संपन्न कुलों से मित्रता कर लेते थे और परिसंघ बना लेते थे।
  • कुछ अपवादों को छोड़कर ऐसे परिसंघ प्राय: बहुत छोटे और अल्पकालिक होते थे। ★★
  • तुलना: मंगोल और तुर्की कबीलों को मिलाकर चंगेज़ खान द्वारा बनाया गया परिसंघ पाँचवीं शताब्दी के अट्टीला (मृत्यु 453 ई.) द्वारा बनाए गए परिसंघ के बराबर था।
  • मूल अंतर: अट्टीला के बनाए परिसंघ के विपरीत चंगेज़ खान की राजनीतिक व्यवस्था बहुत अधिक स्थायी रही और अपने संस्थापक की मृत्यु के बाद भी कायम रही। ★★★
    • यह व्यवस्था इतनी स्थायी थी कि चीन, ईरान और पूर्वी यूरोपीय देशों की उन्नत शस्त्रों से लैस विशाल सेनाओं का मुकाबला करने में सक्षम थी।
    • मंगोलों ने इन क्षेत्रों में नियंत्रण स्थापित करने के साथ ही जटिल कृषि-अर्थव्यवस्थाएँ एवं नगरीय आवासों — स्थानबद्ध समाजों (Sedentary societies) का बड़ी कुशलता से प्रशासन किया — जबकि मंगोलों के अपने सामाजिक अनुभव और रहने के तौर-तरीके इनसे बिलकुल ही भिन्न थे।

साइड-बॉक्स (पृ. 63): मध्य-एशियाई स्टेपी-क्षेत्र के महान परिसंघ★★

इन सारे परिसंघों ने एक ही क्षेत्र पर अधिकार नहीं जमाया, और न ही ये क्षेत्रफल में समान थे, और न ही इनका आंतरिक संगठन एक जैसा जटिल था। यद्यपि इनका यायावरी जन समुदाय के इतिहास पर विशेष प्रभाव पड़ा, परंतु चीन और समीपवर्ती क्षेत्रों पर इनका प्रभाव भिन्न-भिन्न था।

परिसंघकालनृजातीय पहचान
सिउंग-नु (Hsiung-nu)200 ई.पू.तुर्क
जुआन-जुआन (Juan-juan)400 ई.मंगोल
एफ़्थलैट हूण (Epthalite Huns)400 ई.मंगोल
तू-चे (T’u-chueh)550 ई.तुर्क
उइगुर (Uighurs)740 ई.तुर्क
खितान (Khitan)940 ई.मंगोल

4.5 यायावर-कृषक संबंध: व्यापार और संघर्ष (पृ. 63–64)★★★

  • यद्यपि यायावरी सामाजिक और राजनीतिक संगठन कृषि अर्थव्यवस्थाओं से बहुत भिन्न थे, पर ये दोनों समाज एक-दूसरे की व्यवस्था से अनभिज्ञ नहीं थे।
  • स्टेपी क्षेत्र में संसाधनों की कमी के कारण मंगोलों और मध्य-एशिया के यायावरों को व्यापार और वस्तु-विनिमय के लिए उनके पड़ोसी चीन के स्थायी निवासियों के पास जाना पड़ता था। यह व्यवस्था दोनों पक्षों के लिए लाभकारी थी।
  • विनिमय की वस्तुएँ: यायावर कबीले खेती से प्राप्त उत्पादों और लोहे के उपकरणों को चीन से लाते थे और घोड़े, फ़र और स्टेपी में पकड़े गए शिकार का विनिमय करते थे।
  • तनाव: उन्हें वाणिज्यिक क्रियाकलापों में काफी तनाव का सामना करना पड़ता था क्योंकि दोनों पक्ष अधिक लाभ प्राप्त करने की होड़ में बेधड़क सैनिक कार्यवाही भी कर बैठते थे।
    • जब मंगोल कबीलों के लोग साथ मिलकर व्यापार करते थे तो वे अपने चीनी पड़ोसियों को व्यापार में बेहतर शर्तें रखने के लिए मजबूर कर देते थे।
    • कभी-कभी ये लोग व्यापारिक संबंधों को नकार कर केवल लूटपाट करने लगते थे।
    • मंगोलों का जीवन अस्त-व्यस्त होने पर ही इन संबंधों में बदलाव आता था।
    • ऐसी स्थिति में चीनी लोग अपने प्रभाव का प्रयोग स्टेपी-क्षेत्र में बड़े आत्मविश्वास से करते थे।
  • परिणाम: इन सीमावर्ती झड़पों से स्थायी समाज कमजोर पड़ने लगे — उन्होंने कृषि को अव्यवस्थित कर दिया और नगरों को लूटा।
  • दूसरी ओर यायावर, लूटपाट कर संघर्ष क्षेत्र से दूर भाग जाते थे जिससे उन्हें बहुत कम हानि होती थी।
  • चीन की महान दीवार का प्रसंग: अपने संपूर्ण इतिहास में चीन को इन यायावरों से विभिन्न शासन-कालों में बहुत अधिक क्षति पहुँची। यहाँ तक कि आठवीं शताब्दी ई.पू. से ही चीनी शासकों ने अपनी प्रजा की रक्षा के लिए किलेबंदी करना प्रारंभ कर दिया था; तीसरी शताब्दी ई.पू. में इन किलेबंदियों का एकीकरण सामान्य रक्षात्मक ढाँचे के रूप में किया गया जिसे आज ‘चीन की महान दीवार’ के रूप में जाना जाता है। → यह उत्तरी चीन के कृषक समाजों पर यायावरों द्वारा लगातार हुए हमलों और उनसे पनपते अस्थिरता और भय का एक प्रभावशाली चाक्षुष साक्ष्य है। ★★★

5. चंगेज़ खान का जीवन-वृत्त (पृ. 64–66)★★★

5.1 प्रारंभिक जीवन और संघर्ष

  • चंगेज़ खान का जन्म 1162 ई. के आसपास आधुनिक मंगोलिया के उत्तरी भाग में ओनोन नदी के निकट हुआ था।
  • उसका प्रारंभिक नाम तेमुजिन था।
  • पिता: येसूगेई (Yesugei) — कियात कबीले का मुखिया; यह परिवारों का एक समूह था और बोरजिगिद (Borjigid) कुल से संबंधित था।
  • पिता की अल्पायु में ही हत्या कर दी गई थी और उसकी माता ओलुन-इके (Oelun-eke) ने तेमुजिन और उसके सगे तथा सौतेले भाइयों का लालन-पालन बड़ी कठिनाई से किया।
  • 1170 का दशक विपर्ययों से भरा था —
    • तेमुजिन का अपहरण कर उसे दास बना लिया गया;
    • उसकी पत्नी बोरटे (Borte) का भी विवाह के उपरांत अपहरण कर लिया गया और अपनी पत्नी को छुड़ाने के लिए उसे लड़ाई लड़नी पड़ी।
  • विपत्ति के इन वर्षों में भी वह अनेक मित्र बनाने में कामयाब रहा —
    • नवयुवक बोघूरचू (Boghurchu) उसका प्रथम-मित्र था और सदैव एक विश्वस्त साथी के रूप में उसके साथ रहा;
    • उसका सगा भाई (आंडा) जमूका भी उसका एक और विश्वसनीय मित्र था।
  • तेमुजिन ने कैराईट (Kereyite) लोगों के शासक व अपने पिता के वृद्ध सगे भाई तुगरिल उर्फ़ ओंग खान के साथ पुराने रिश्तों की पुनर्स्थापना की।

5.2 सत्ता की ओर उदय

  • यद्यपि जमूका उसका पुराना मित्र था, बाद में वह उसका शत्रु बन गया।
  • 1180 और 1190 के दशकों में तेमुजिन ओंग खान का मित्र रहा और उसने इस मित्रता का इस्तेमाल जमूका जैसे शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वियों को परास्त करने के लिए किया।
  • जमूका को पराजित करने के बाद तेमुजिन में काफी आत्म-विश्वास आ गया और अब वह अन्य कबीलों के विरुद्ध युद्ध के लिए निकल पड़ा —
    • इनमें उसके पिता के हत्यारे, शक्तिशाली तातार, कैराईट और खुद ओंग खान — जिसके विरुद्ध उसने 1203 में युद्ध छेड़ा।
  • 1206 में शक्तिशाली जमूका और नेमन लोगों को निर्णायक रूप से पराजित करने के बाद तेमुजिन स्टेपी-क्षेत्र की राजनीति में सबसे प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में उभरा।
  • उसकी इस प्रतिष्ठा को मंगोल कबीले के सरदारों की एक सभा (कुरिलताई / Quriltai) में मान्यता मिली और उसे चंगेज़ खान — ‘समुद्री खान’ या ‘सार्वभौम शासक’ की उपाधि के साथ मंगोलों का महानायक (क़ान/Qa’an — Great Khan) घोषित किया गया। ★★★

5.3 सैन्य पुनर्गठन और चीन-अभियान

  • 1206 ई. में कुरिलताई से मान्यता मिलने से पूर्व चंगेज़ खान ने मंगोल लोगों को एक सशक्त अनुशासित सैन्य-शक्ति के रूप में पुनर्गठित कर लिया था — जिससे उसके भविष्य में किए गए सैन्य अभियान की सफलता एक प्रकार से तय हो गई।
  • पहली मंशा — चीन पर विजय। उस समय चीन तीन राज्यों में विभक्त था —
    1. उत्तर-पश्चिमी प्रांतों के तिब्बती मूल के सी-सिआ (Hsi Hsia) लोग;
    2. जरचेन लोगों का चिन राजवंश — जो पेकिंग से उत्तरी चीन क्षेत्र का शासन चला रहे थे;
    3. शुंग राजवंश — जिनके आधिपत्य में दक्षिणी चीन था।
  • 1209 में सी-सिआ लोग परास्त हो गए।
  • 1213 ई. में चीन की महान दीवार का अतिक्रमण हो गया।
  • 1215 ई. में पेकिंग नगर लूटा गया।
  • चिन वंश के विरुद्ध 1234 तक लंबी लड़ाइयाँ चलीं; पर चंगेज़ खान अपने अभियानों की प्रगति से खूब संतुष्ट था और इसलिए उस क्षेत्र के सैनिक मामले अपने अधीनस्थों की देखरेख में छोड़कर 1216 में मंगोलिया स्थित अपनी मातृभूमि लौट आया।

5.4 पश्चिम की ओर — ख्वारज़म अभियान (1219–1221)★★★

  • 1218 ई. में करा खिता (Qara Khita) की पराजय के बाद — जो चीन के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित तियेन-शान की पहाड़ियों को नियंत्रित करती थी — मंगोलों का साम्राज्य अमू दरिया, तुरान और ख्वारज़म राज्यों तक विस्तृत हो गया।
  • ख्वारज़म का सुल्तान मोहम्मद चंगेज़ खान के प्रचंड कोप का भाजक बना जब उसने मंगोल दूतों का वध कर दिया।
  • 1219 और 1221 ई. तक के अभियानों में बड़े नगरों — ओट्रार, बुखारा, समरकंद, बल्ख़, गुरगंज, मर्व, निशापुर और हेरात — ने मंगोल सेनाओं के सम्मुख समर्पण कर दिया।
  • जिन नगरों ने प्रतिरोध किया उनका विध्वंस कर दिया गया।
  • निशापुर में घेरा डालने के दौरान जब एक मंगोल राजकुमार की हत्या कर दी गई तो चंगेज़ खान ने आदेश दिया —

“नगर को इस तरह विध्वंस किया जाए कि संपूर्ण नगर में हल चलाया जा सके; अपने प्रतिशोध (राजकुमार की हत्या के लिए) को उग्र रूप देने के लिए ऐसा संहार किया जाए कि नगर के समस्त बिल्ली और कुत्तों को भी जीवित न रहने दिया जाए।” ★★★

  • आगे का विस्तार: मंगोल सेनाएँ सुल्तान मोहम्मद का पीछा करते हुए अज़रबैजान तक चली आईं और क्रीमिया में रूसी सेनाओं को हराने के साथ-साथ उन्होंने कैस्पियन सागर को घेर लिया।
  • सेना की दूसरी टुकड़ी ने सुल्तान के पुत्र जलालुद्दीन का अफ़ग़ानिस्तान और सिंध प्रदेश तक पीछा किया।
  • सिंधु नदी के तट पर चंगेज़ खान ने उत्तरी भारत और असम मार्ग से मंगोलिया वापस लौटने का विचार किया — परंतु असह्य गर्मी, प्राकृतिक आवास की कठिनाइयों तथा उसके शमन द्वारा दिए गए अशुभ संकेतों के आभास ने उसे अपने विचारों को बदलने के लिए बाध्य किया। ★★(भारत-संदर्भ में यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण बिंदु है।)
  • अपने जीवन का अधिकांश भाग युद्धों में व्यतीत करने के बाद 1227 में चंगेज़ खान की मृत्यु हो गई।

बॉक्स (पृ. 65): मंगोलों द्वारा किए गए विनाश का आकलन [स्रोत]★★★

  • चंगेज़ खान के अभियानों के विषय में प्राप्त समस्त विवरण इस पर सहमत हैं कि जिन नगरों ने उनका प्रभुत्व स्वीकार नहीं किया उन पर अधिकार जमाने के बाद वहाँ रहने वाले बहुत से लोगों को उसने मौत के घाट उतार दिया। इनकी संख्या बहुत चौंका देने वाली है।
वर्षनगरमारे गए लोगों की संख्या
1220 ई.निशापुर17,47,000
1222 ई.हिरात16,00,000
1258बग़दाद8,00,000
—नासा70,000
—बैहाक ज़िले70,000
—कुहिस्तान प्रांत का तून नगर12,000
  • छोटे नगरों में सापेक्षिक रूप से कम नरसंहार हुआ।
  • मध्यकालीन इतिवृत्तकारों ने मृतकों की संख्या का अनुमान कैसे लगाया?
    • इलखानों के फ़ारसी इतिवृत्तकार जुवैनी ने बताया कि मर्व में 13,00,000 लोगों का वध किया गया।
    • उसने इस संख्या का अनुमान इस प्रकार लगाया कि तेरह दिन तक 1,00,000 शव प्रतिदिन गिने जाते थे।
  • (शिक्षक-नोट: यह बॉक्स आगे पृ. 73 की चर्चा से जोड़कर पढ़ाएँ — जहाँ NCERT स्वयं इन संख्याओं की अतिशयोक्ति उजागर करती है।)

5.5 चंगेज़ खान की सैन्य उपलब्धियों का रहस्य (पृ. 66)★★★

  • उसकी सैनिक उपलब्धियाँ विस्मित कर देने वाली थीं। यह बहुत हद तक स्टेपी-क्षेत्र की युद्ध शैली के बहुत से आयामों को आवश्यकतानुसार परिवर्तन और सुधार करके उसको प्रभावशाली रणनीति में बदल पाने का परिणाम था।
  1. घुड़सवारी कौशल: मंगोलों और तुर्कों के घुड़सवारी कौशल ने उसकी सेना को गति प्रदान की।
  2. घोड़े पर सवार तीरंदाज़ी: उनका कौशल अद्भुत था — जिसे उन्होंने अपने दैनिक जीवन में जंगलों में पशुओं का आखेट करते समय प्राप्त किया था। इस अनुभव ने उनकी सैनिक-गति को बहुत तेज़ कर दिया।
  3. भूगोल और मौसम का ज्ञान: स्टेपी-प्रदेश के घुड़सवार सदैव फुर्तीले और बड़ी तेज़ गति से यात्रा करते थे। अब उन्हें अपने आसपास के भूभागों और मौसम की जानकारी हो गई जिसने उन्हें अकल्पनीय कार्य करने की क्षमता प्रदान की।
  4. शीत-ऋतु में अभियान: उन्होंने घोर शीत-ऋतु में युद्ध-अभियान प्रारंभ किए तथा उनके नगरों और शिविरों में प्रवेश करने के लिए बर्फ़ से जमी हुई नदियों का राजमार्गों की तरह प्रयोग किया। ★★
  5. घेराबंदी-यंत्र और नेप्था बमबारी: यायावर लोग अपनी परंपराओं के अनुसार प्राचीरों के आरक्षित शिविरों में पैठ बनाने में सक्षम नहीं थे, पर चंगेज़ खान ने घेराबंदी-यंत्र (Siege-engine) और नेप्था बमबारी के महत्त्व को शीघ्र जाना।
  6. हल्के चल-उपस्कर: उसके इंजीनियरों ने शत्रुओं के विरुद्ध अभियानों में इस्तेमाल के लिए हल्के चल-उपस्कर (Light portable equipment) का निर्माण किया जिसके युद्ध में घातक प्रभाव होते थे।

6. कालरेखा — चंगेज़ खान और मंगोल साम्राज्य (पृ. 66–67)★★★

कालघटना
लगभग 1167तेमुजिन का जन्म
1160 और 70 के दशकदासता और संघर्ष के वर्ष
1180 और 90 के दशकसंधि संबंधों का काल
1203–27विस्तार और विजय
1206तेमुजिन को चंगेज़ खान, यानी मंगोलों का ‘सार्वभौम शासक’ घोषित किया गया
1227चंगेज़ खान की मृत्यु
1227–41चंगेज़ खान के पुत्र ओगोदेई का शासन-काल
1227–60तीन महान खानों का शासन और मंगोल-एकता की स्थापना
1236–42बातू के अधीन रूस, हंगरी, पोलैंड और आस्ट्रिया पर आक्रमण। बातू चंगेज़ खान के सबसे बड़े पुत्र जोची (Jochi) का पुत्र था
1246–49ओगोदेई के पुत्र गुयूक का काल
1251–60मोंके — चंगेज़ खान के पौत्र और तुलू (Tuluy) के पुत्र — का काल
1253–55मोंके के अधीन ईरान और चीन में पुन: आक्रमण
1257–67बातू के पुत्र बर्के का राज्यकाल। सुनहरा गिरोह (Golden Horde) का नेस्तोरियन ईसाई धर्म से इस्लाम धर्म की ओर पुन: प्रवृत्त होना। 1350 के दशक में उनका इस्लाम में निश्चयात्मक रूप से धर्मांतरण हुआ। इल-खान के विरुद्ध गोल्डन होर्ड और मिस्र देश की मैत्री का प्रारंभ
1258बग़दाद पर अधिकार और अब्बासी ख़िलाफ़त का अंत। मोंके के छोटे भाई हुलेगु के अधीन ईरान में इल-खानी राज्य की स्थापना। जोचिद और इल-खान के मध्य संघर्ष का प्रारंभ
1260पेकिंग में ‘महान खान’ के रूप में कुबलई खान (Qubilai Khan) का राज्यारोहण। चंगेज़ खान के उत्तराधिकारियों में संघर्ष। मुगल (मंगोल) राज्य अनेक स्वतंत्र भागों में अनेक वंशों में विभक्त — तोलुई (Toluy), चघताई (Chaghatai), और जोची (ओगोदेई का वंश पराजित हो गया और तोलूयिद में मिल गए)
• तोलूयिद: चीन का यूआन वंश और ईरान का इल-खानी राज्य
• चघताई: उत्तरी तूरान के स्टेपी-क्षेत्र और तुर्किस्तान में
• रूसी स्टेपी-क्षेत्र में जोचिद वंश — इन्हें पर्यवेक्षक ‘गोल्डन होर्ड’ के नाम से वर्णन करते थे
1295–1304ईरान में इल-खानी शासक गज़न खान का शासन-काल। उसके बौद्ध धर्म से इस्लाम में धर्मांतरण के बाद धीरे-धीरे अन्य इल-खानी सरदारों का भी धर्मांतरण होने लगा
1368चीन में यूआन राजवंश का अंत
1370–1405तैमूर का शासन। बरलास तुर्क होते हुए उसने चघताई वंश के आधार पर अपने को चंगेज़ खान का वंशज बताया। उसने स्टेपी-साम्राज्य की स्थापना की। तोलू राज्य, चघताई और जोची राज्यों के कुछ हिस्सों (चीन को छोड़कर) को सम्मिलित करते हुए उसने स्टेपी-क्षेत्र में एक साम्राज्य का गठन किया। उसने अपने को ‘गुरेगेन’ (Guregen) ‘शाही-दामाद’ की उपाधि से विभूषित किया और चंगेज़ खान के कुल की एक राजकुमारी से विवाह किया
1495–1530ज़हीरुद्दीन बाबर — जो तैमूर और चंगेज़ खान का वंशज था — फ़रगना और समरकंद के तैमूरी क्षेत्र का उत्तराधिकारी बना; वहाँ से खदेड़ा गया। काबुल पर कब्ज़ा किया और 1526 में दिल्ली और आगरा पर अधिकार जमाया; भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी ★★
1500जोची के कनिष्ठ पुत्र शिबान का वंशज शयबानी खान द्वारा तूरान पर आधिपत्य। तूरान में शयबानी सत्ता (शयबानियों को उज़्बेग भी कहा जाता था, जिनके नाम से ही वर्तमान उज़्बेकिस्तान का नाम पड़ा) को सुदृढ़ किया और इस क्षेत्र से बाबर और तैमूर के वंशजों को खदेड़ दिया
1759चीन के मंचुओं ने मंगोलिया पर विजय प्राप्त कर ली
1921मंगोलिया का गणराज्य

7. चंगेज़ खान के उपरांत मंगोल (पृ. 68)★★★

7.1 विस्तार के दो चरण

  • चंगेज़ खान की मृत्यु के पश्चात मंगोल साम्राज्य को दो चरणों में विभाजित किया जा सकता है —
    1. पहला चरण: 1236–1242 — इस दौरान रूस के स्टेपी-क्षेत्र, बुलघार, कीव, पोलैंड तथा हंगरी में भारी सफलता प्राप्त की गई।
    2. दूसरा चरण: 1255–1300 — इसमें समस्त चीन (सन् 1279), ईरान, इराक और सीरिया पर विजय प्राप्त की गई।
  • इन अभियानों के पश्चात साम्राज्य की परिसीमाओं में स्थिरता आई।

7.2 पश्चिम में विस्तार क्यों रुका?★★★

  • सन् 1203 के बाद के दशकों में मंगोल सेनाओं को बहुत कम विपर्याय का सामना करना पड़ा।
  • परंतु ध्यान देने योग्य है कि सन् 1260 के दशक के बाद पश्चिम में युद्ध अभियानों के शुरुआती आवेग को जारी रखना संभव नहीं हो पाया।
  • यद्यपि वियना और उससे परे पश्चिमी यूरोप एवं मिस्र मंगोल सेनाओं के अधिकार में ही रहे (पाठ्य-वाक्य ऐसा ही है; भाव — वे मंगोल-लक्ष्य/दबाव-क्षेत्र में थे); तथापि उनके हंगरी के स्टेपी-क्षेत्र से पीछे हट जाने और मिस्र की सेनाओं द्वारा पराजित होने से नवीन राजनीतिक प्रवृत्तियों के उदय होने के संकेत मिले।
  • इस प्रवृत्ति के दो पहलू थे:
    1. आंतरिक उत्तराधिकार-राजनीति: जब प्रथम दो पीढ़ियों — जोची और ओगोदेई के उत्तराधिकारी — महान खान के राज्य पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए एकजुट हो गए, तब उनके लिए यूरोप में अभियान करने की अपेक्षा अपने इन हितों की रक्षा करना अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया।
    2. तोलूयिद शाखा का उभार: दूसरी स्थिति तब उत्पन्न हुई जब चंगेज़ खान के वंश की तोलूयिद शाखा के उत्तराधिकारियों ने जोची और ओगोदेई वंशों को कमज़ोर कर दिया।
  • मोंके, जो चंगेज़ खान के सबसे छोटे पुत्र तोलुई का वंशज था, उसके राज्याभिषेक के उपरांत 1250 ई. के दशक में ईरान में शक्तिशाली अभियान किए गए।
  • परंतु 1260 ई. के दशक में तोलूई के वंशजों ने चीन में अपने हितों की वृद्धि की तो उसी समय सैनिकों और रसद-सामग्रियों को मंगोल साम्राज्य के मुख्य भागों की ओर भेज दिया गया।
  • परिणामस्वरूप मिस्र की सेना का सामना करने के लिए मंगोलों ने एक छोटी, अपर्याप्त सेना भेजी।
  • मंगोलों की पराजय और तोलूई परिवार की चीन के प्रति निरंतर बढ़ती रुचि से उनका पश्चिम की ओर विस्तार रुक गया।
  • इसी दौरान रूस और चीन की सीमा पर जोची और तोलूई वंशों के अंदरूनी झगड़ों ने जोची वंशजों का ध्यान उनके संभावित यूरोपीय अभियानों से हटा दिया।
  • महत्त्वपूर्ण विरोधाभास (NCERT): पश्चिम में मंगोलों का विस्तार रुक जाने से चीन में उनके अभियान शिथिल नहीं हुए — वस्तुत: उन्होंने चीन को एकीकृत किया। “ये विरोधाभास है कि सबसे बड़ी सफलताओं को प्राप्त करने के समय ही शासक-परिवार के सदस्यों के मध्य आंतरिक विक्षोभ दिखाई देने लगे।”

8. सामाजिक, राजनैतिक और सैनिक संगठन (पृ. 68–70)★★★

8.1 सेना का स्वरूप

  • मंगोलों और अन्य अनेक यायावर समाजों में प्रत्येक तंदुरुस्त वयस्क सदस्य हथियारबंद होते थे। जब कभी आवश्यकता होती थी तो इन्हीं लोगों से सशस्त्र सेना बनती थी।
  • विभिन्न मंगोल जनजातियों के एकीकरण और उसके पश्चात विभिन्न लोगों के खिलाफ अभियानों से चंगेज़ खान की सेना में नए सदस्य शामिल हुए।
  • इससे उनकी सेना — जो अपेक्षाकृत रूप से छोटी और अविभेदित समूह थी — अविश्वसनीय रूप से एक विशाल विषमजातीय संगठन में परिवर्तित हो गई।
  • इसमें उनकी सत्ता को स्वेच्छा से स्वीकार करने वाले तुर्कीमूल के उइगुर समुदाय के लोग सम्मिलित थे।
  • केराइटों जैसे पराजित लोग भी इसमें सम्मिलित थे — जिन्हें अपनी पुरानी शत्रुता के बावजूद महासंघ में शामिल कर लिया गया। ★★

8.2 दशमलव पद्धति और पुरानी पहचानों का विनाश★★★

  • चंगेज़ खान उन विभिन्न जनजातीय समूहों — जो उसके महासंघ के सदस्य थे — की पहचान को योजनाबद्ध रूप से मिटाने को कृत-संकल्प था।
  • उसकी सेना स्टेपी-क्षेत्रों की पुरानी दशमलव पद्धति के अनुसार गठित की गई — जो दस, सौ, हज़ार और (अनुमानित) दसहज़ार सैनिकों की इकाई में विभाजित थी।
  • पुरानी पद्धति में कुल (Clan), कबीले (Tribe) और सैनिक दशमलव इकाइयाँ एक साथ अस्तित्व में थीं।
  • चंगेज़ खान ने इस प्रथा को समाप्त कर दिया। उसने प्राचीन जनजातीय समूहों को विभाजित कर उनके सदस्यों को नवीन सैनिक इकाइयों में विभक्त कर दिया।
  • उस व्यक्ति को जो अपने अधिकारी से अनुमति लिए बिना बाहर जाने की चेष्टा करता था, उसे कठोर दंड दिया जाता था।
  • सैनिकों की सबसे बड़ी इकाई लगभग दस हज़ार सैनिकों (तुमन / Tuman) की थी, जिसमें अनेक कबीलों और कुलों के लोग शामिल होते थे।
  • परिणाम: उसने स्टेपी-क्षेत्र की पुरानी सामाजिक व्यवस्था को परिवर्तित किया और विभिन्न वंशों तथा कुलों को एकीकृत कर इसके जनक चंगेज़ खान ने इन सभी को एक नवीन पहचान प्रदान की। ★★★

8.3 नोयान, आंडा और नया अभिजात वर्ग

  • नयी सैनिक टुकड़ियों को — जो उसके चार पुत्रों के अधीन थीं और विशेष रूप से चयनित कप्तानों के अधीन कार्य करती थीं — नोयान (Noyan) कहा जाता था।
  • इस नयी व्यवस्था में उसके अनुयायियों का वह समूह भी शामिल था जिन्होंने बड़ी निष्ठा से, कई वर्ष घोर प्रतिकूल अवस्था में भी चंगेज़ खान का साथ दिया था।
  • चंगेज़ खान ने सार्वजनिक रूप से अनेक ऐसे व्यक्तियों को आंडा (सगा भाई) कहकर सम्मानित किया था।
  • ऐसे अन्य और भी कई जो आंडा से निम्न श्रेणी के थे — स्वतंत्र व्यक्ति थे, इनको चंगेज़ खान ने अपने खास नौकर के पद पर रखा था। नौकर का पद इन लोगों का अपने स्वामी के साथ गहरा संबंध दर्शाता था।
  • परिणाम (सामाजिक क्रांति): इस तरह से नए वर्गीकरण ने पूर्व से चले आ रहे सरदारों के अधिकारों को सुरक्षित नहीं रखा; जबकि नए तरह से उभरे अभिजात्य वर्ग ने अपनी प्रतिष्ठा मंगोलों के महानायक के साथ अपने करीबी रिश्ते से प्राप्त की। ★★★

8.4 उलुस — पुत्रों में साम्राज्य का बँटवारा★★★

  • इस नवीन श्रेणी (Hierarchy) में चंगेज़ खान ने अपने नव-विजित लोगों पर शासन करने का उत्तरदायित्व अपने चार पुत्रों को सौंप दिया। इससे उलुस (Ulus) का गठन हुआ।
  • ‘उलुस’ शब्द का मूल अर्थ निश्चित भूभाग नहीं था — चंगेज़ खान के जीवन काल और साम्राज्य को अधिक से अधिक बढ़ाने का युग था और जिसकी सीमाएँ अत्यंत परिवर्तनशील थीं। ★★
  • जोची (ज्येष्ठ पुत्र): रूसी स्टेपी-प्रदेश प्राप्त हुआ। परंतु उसकी दूरस्थ सीमा (उलुस) निर्धारित नहीं थी — इसका विस्तार सुदूर पश्चिम तक विस्तृत था जहाँ तक उसके घोड़े स्वेच्छापूर्वक भ्रमण कर सकते थे।
  • चघताई (दूसरा पुत्र): तूरान का स्टेपी-क्षेत्र तथा पामीर के पहाड़ का उत्तरी क्षेत्र भी मिला — जो उसके भाई के प्रदेश से लगा हुआ था। संभवत: वह जैसे-जैसे पश्चिम की ओर बढ़ता गया होगा वैसे-वैसे यह अधिकार क्षेत्र भी परिवर्तित होता गया होगा।
  • ओगोदेई (तीसरा पुत्र): चंगेज़ खान ने संकेत किया था कि वह उसका उत्तराधिकारी होगा और उसे महान खान की उपाधि दी जाएगी। इस राजकुमार ने अपने राज्याभिषेक के बाद अपनी राजधानी कराकोरम में प्रतिष्ठित की।
  • तोलोए (सबसे छोटा पुत्र): अपनी पैतृक भूमि मंगोलिया प्राप्त की।
  • चंगेज़ खान का विचार था कि उसके पुत्र परस्पर मिलजुल कर साम्राज्य का शासन करेंगे और इसे ध्यान में रखते हुए उसने विभिन्न राजकुमारों के लिए अलग-अलग सैन्य-टुकड़ियाँ (तामा / Tama) निर्धारित कर दीं जो प्रत्येक उलुस में तैनात रहती थीं।
  • किरिलताई (Quriltai): परिवार के सदस्यों में राज्य की भागीदारी का बोध सरदारों की परिषद में होता था — जिसमें परिवार या राज्य के भविष्य के निर्णय, अभियानों, लूट के माल का बँटवारा, चरागाह भूमि और उत्तराधिकार आदि के समस्त निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते थे। ★★★

8.5 यम (हरकारा) पद्धति और कुबकुर कर (पृ. 70)★★★

  • चंगेज़ खान ने पहले से ही एक फुर्तीली हरकारा पद्धति अपना रखी थी जिससे राज्य के दूरदराज़ के स्थानों में परस्पर सम्पर्क रखा जाता था।
  • अपेक्षित दूरी पर निर्मित सैनिक चौकियों में स्वस्थ एवं बलवान घोड़े तथा घुड़सवार संदेशवाहक तैनात रहते थे।
  • वित्त-व्यवस्था: इस संचार पद्धति की व्यवस्था के लिए मंगोल यायावर अपने पशु-समूहों से अपने घोड़े अथवा अन्य पशुओं का दसवाँ हिस्सा प्रदान करते थे। इसे कुबकुर (Qubcur) कर कहते थे।
  • इस उगाही (Levy) को यायावर लोग अपनी स्वेच्छा से प्रदान करते थे, जिससे उन्हें अनेक लाभ प्राप्त होते थे।
  • चंगेज़ खान की मृत्यु के उपरांत इस हरकारी पद्धति (याम / Yam) में और भी सुधार लाया गया।
  • इस पद्धति की गति तथा विश्वसनीयता यात्रियों को आश्चर्य में डाल देती थी। इससे महान खानों को अपने विस्तृत महाद्वीपीय साम्राज्य के सुदूर स्थानों में होने वाली घटनाओं की निगरानी करने में सहायता मिलती थी। ★★

9. विजय के परिणाम: विनाश और पुनर्निर्माण (पृ. 70–71)★★★

9.1 विनाश का यथार्थ

  • विजित लोगों को अपने नवीन यायावर शासकों से कोई लगाव नहीं था।
  • तेरहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हुए युद्धों में —
    • अनेक नगर नष्ट कर दिए गए;
    • कृषि भूमि को हानि हुई;
    • व्यापार चौपट हो गया;
    • दस्तकारी वस्तुओं की उत्पादन-व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई;
    • सैकड़ों-हज़ारों लोग मारे गए और इससे कहीं अधिक दास बना लिए गए।
  • इसकी वास्तविक संख्या अतिशयोक्तिपूर्ण तथ्यों के जाल में खो गई है। ★★★
  • संभ्रांत लोगों से लेकर कृषक-वर्ग तक समस्त लोगों को बहुत कष्टों का सामना करना पड़ा।
  • पारिस्थितिक विनाश (महत्त्वपूर्ण): इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न अस्थिरता से ईरान के शुष्क पठार में भूमिगत नहरों (कनात / Qanat) का नियमित रूप से मरम्मत कार्य संभव नहीं हो पाया।
    • नहरों की मरम्मत न होने से मरुस्थल उस ओर फैलने लगा, जिससे बहुत बड़ा पारिस्थितिक विनाश हुआ जिससे खुरासान के कुछ हिस्से कभी नहीं उबर पाए। ★★★

9.2 पैक्स मंगोलिका (Pax Mongolica) और रेशम मार्ग★★★

  • जब सैन्य अभियानों में विराम आया तब यूरोप और चीन के भूभाग परस्पर संबंद्ध हो गए थे।
  • मंगोल विजय (Pax Mongolica) के बाद उत्पन्न शांति से व्यापारिक संबंध परिपक्व हुए।
  • मंगोलों की देखरेख में रेशम मार्ग (Silk route) पर व्यापार और भ्रमण अपने शिखर पर पहुँचा — किंतु पहले की तरह अब व्यापारिक मार्ग चीन में ही खत्म नहीं होते थे; वे उत्तर की ओर मंगोलिया तथा नवीन साम्राज्य के केंद्र कराकोरम की ओर बढ़ गए।
  • यात्रा-सुविधा: मंगोल शासन में सामंजस्य स्थापित करने के लिए संचार और यात्रियों के लिए सुलभ यात्रा आवश्यक थी।
  • सुरक्षित यात्रा के लिए यात्रियों को पास जारी किए जाते थे — जिसे फ़ारसी में पैज़ा (Paiza) और मंगोल भाषा में गेरेगे (Gerege) कहते थे। ★★★
  • इस सुविधा के लिए व्यापारी ‘बाज’ (Baj) नामक कर अदा करते थे — जिसका यह तात्पर्य था कि वे मंगोल शासक (खान) की सत्ता स्वीकार करते हैं।

मानचित्र 2 (पृ. 71): मंगोलों के अभियान

  • दर्शाए गए क्षेत्र — यूरोप, मास्को, गोल्डन होर्ड का ख़ानेत, काला सागर, कैस्पियन, भूमध्यसागर, दमिश्क, बग़दाद, निशापुर, हिरात, इल-खान साम्राज्य, ओरमुज़; बुखारा, समरकंद, ताशकंद, बल्ख़ — चघताई साम्राज्य; काराकोरम, तुर्फ़ान, महान खान का साम्राज्य, बीजिंग/ल्यांगज़ाओ, गंजाऊ; तिब्बत, दिल्ली सल्तनत, हिमालय, भारत, बर्मा, अरब।
  • संकेत-सूची: चंगेज़ खान के नेतृत्व में मंगोल साम्राज्य; 1259 के पश्चात मंगोल अभियान; रेशम मार्ग की दिशा।
  • क्रियाकलाप 2: रेशम मार्ग के क्षेत्रों को देखिए और उन वस्तुओं पर भी गौर कीजिए जो इस रास्ते में यात्रा करते हुए व्यापारियों को उपलब्ध होती थीं। इस मानचित्र में मंगोल शक्ति के चरमोत्कर्ष काल के दौरान का एक अंतिम पूर्वी बिंदु अंकित नहीं है जिससे रेशम मार्ग गुज़रता था — क्या आप इसमें उस नगर को दिखा सकते हैं जो यहाँ अंकित नहीं है? क्या ये बारहवीं शताब्दी में रेशम मार्ग पर हो सकता था? अगर नहीं तो क्यों नहीं?

10. यायावर और स्थानबद्ध समुदायों में विरोध का कम होना (पृ. 71–72)★★★

10.1 मंगोल नीति में बदलाव

  • तेरहवीं शताब्दी ई. में मंगोल साम्राज्य में यायावरों और स्थानबद्ध समुदायों में विरोध कम होते गए। उदाहरणार्थ —
    • 1230 के दशक में जब मंगोलों ने उत्तरी चीन के चिन वंश के विरुद्ध युद्ध में सफलता प्राप्त की, तो मंगोल नेताओं के एक क्रूद्ध वर्ग ने दबाव डालकर यह विचार रखा कि समस्त कृषकों को मौत के घाट उतार दिया जाए और उनकी कृषि-भूमि को चरागाह में परिवर्तित कर दिया जाए।
    • परंतु 1270 के दशक के आते-आते शुंग वंश की पराजय के उपरांत दक्षिण चीन को मंगोल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया गया।
    • तब चंगेज़ खान का पोता कुबलई खान (मृत्यु 1294) कृषकों और नगरों के रक्षक के रूप में उभरा। ★★★
  • गज़न खान (मृत्यु 1304) — जो चंगेज़ खान के सबसे छोटे पुत्र तोलूई का वंशज था — उसने अपने परिवार के सदस्यों और अन्य सेनापतियों को आगाह कर दिया था कि वे कृषकों को न लूटें!
    • एक बार अपने भाषण के दौरान उसने कहा था कि ऐसा करने से राज्य में स्थायित्व और समृद्धि नहीं आती।
    • उसके वक्तव्य की स्थानबद्ध ध्वनियाँ चंगेज़ खान को भी हैरानी में डाल देती थीं।

बॉक्स (पृ. 72): गज़न खान का भाषण [स्रोत]★★★

  • गज़न खान (1295–1304) पहला इल-खानी शासक था जिसने धर्म-परिवर्तन कर इस्लाम ग्रहण किया। उसने अपने मंगोल-तुर्की यायावर सेनापतियों को निम्न भाषण दिया जिसे संभवत: उसके ईरानी वज़ीर रशीदुद्दीन ने लिखा था और जिसे मंत्री के पत्रों में शामिल किया गया था:

“मैं फ़ारस के कृषक वर्ग के पक्ष में नहीं हूँ। यदि उन सबको लूटने का कोई उद्देश्य है, तो ऐसा करने के लिए मेरे से अधिक शक्तिशाली और कोई नहीं है, चलो हम सब मिल कर उन्हें लूटते हैं। लेकिन अगर आप निश्चित रूप से भविष्य में अपने भोजन के लिए अनाज और भोज्य-सामग्री इकट्ठा करना चाहते हैं तो मुझे आपके साथ कठोर होना पड़ेगा। आपको तर्क और बुद्धि से काम लेना सिखाना पड़ेगा। यदि आप कृषकों का अपमान करेंगे, उनसे उनके बैल और अनाज के बीज छीन लेंगे और उनकी फसलों को कुचल डालेंगे, तो आप भविष्य में क्या करेंगे? एक आज्ञाकारी कृषक वर्ग और एक विद्रोही कृषक वर्ग में अंतर समझना आवश्यक है…”

10.2 नागरिक प्रशासकों की भर्ती★★★

  • चंगेज़ खान के शासनकाल से ही मंगोलों ने विजित राज्यों से नागरिक प्रशासकों (Civil administrators) को अपने यहाँ भर्ती कर लिया था।
  • इनको कभी-कभी एक स्थान से दूसरे स्थान पर भी भेज दिया जाता था — जैसे, चीनी सचिवों का ईरान और ईरानी सचिवों का चीन में स्थानांतरण।
  • इस तरह इन्होंने दूरस्थ राज्यों को संघटित करने में भी मदद की और इनकी पृष्ठभूमि और प्रशिक्षण से वहाँ के स्थानबद्ध जन-जीवन पर होने वाली खानाबदोशों की लूटमारों की धार कम हो गई।
  • मंगोल शासकों का भी इन पर तब तक विश्वास बना रहता था जब तक ये प्रशासक अपने स्वामियों के लिए कर इकट्ठा करने की क्षमता बनाए रखते थे।
  • उदाहरण:
    • इनमें से कुछ प्रशासक काफ़ी प्रभावशाली थे और अपने प्रभाव का उपयोग खानों पर भी कर पाते थे। 1230 के दौरान चीनी मंत्री ये-लू चुत्साई (Yeh-lu Ch’u-ts’ai) ने ओगोदेई की लूटने वाली प्रवृत्ति को परिवर्तित कर दिया।
    • जुवैनी परिवार ने भी ईरान में तेरहवीं शताब्दी के उत्तरवर्ती काल में और उसके अंत में भी इसी तरह की भूमिका निभाई।
    • वज़ीर रशीदुद्दीन ने गज़न खान के लिए वह भाषण भी इसी समय तैयार किया था जो उसने अपने मंगोल देशवासियों के समक्ष दिया था — जिसमें उसने कृषक-वर्ग को सताने की बजाय उनकी रक्षा करने की बात कही थी।

11. उलुस का विभाजन और वंशों की प्रतिस्पर्धा (पृ. 72–73)★★★

11.1 स्थानबद्धता का दबाव

  • स्थानबद्ध रूप से रहने का दबाव मंगोल निवास स्थानों के नए क्षेत्रों में अधिक था — उन क्षेत्रों में जो यायावरों के मूल स्टेपी-आवास से दूर थे।
  • धीरे-धीरे तेरहवीं शताब्दी के मध्य तक, भाइयों के बीच पिता द्वारा अर्जित धन को मिल-बाँटकर इस्तेमाल करने की बजाय व्यक्तिगत राजवंश बनाने की भावना ने स्थान ले लिया — और हर एक अपने उलुस, जिसका तात्पर्य अब क्षेत्रीय यानी अधिकृत क्षेत्र का स्वामी हो गया।
  • यह अंशत: उत्तराधिकार के लिए संघर्ष का परिणाम था जिसमें चंगेज़ खान के वंशजों के बीच महान पद के लिए तथा उत्कृष्ट चरागाही भूमि पाने के लिए होड़ होती थी।
  • चीन और ईरान दोनों पर शासन करने के लिए आए तोलुई के वंशजों ने युआन और इल-खानी वंशों की स्थापना की।
  • जोची ने ‘सुनहरा गिरोह’ (Golden Horde) का गठन किया और रूस के स्टेपी-क्षेत्रों पर राज किया।
  • चघताई के उत्तराधिकारियों ने तुरान के स्टेपी-क्षेत्रों पर राज किया, जिसे आजकल तुर्किस्तान कहा जाता है।
  • ध्यान देने योग्य: मध्य-एशिया (चघताई के वंशज) तथा रूस (गोल्डन होर्ड) के स्टेपी-निवासियों में यायावर परंपराएँ सबसे अधिक समय तक चलीं। ★★★

11.2 इतिहास-लेखन की प्रतिस्पर्धा और अतिशयोक्ति★★★

  • चंगेज़ खान के वंशजों का धीरे-धीरे अलग होकर पृथक-पृथक वंश समूहों में बँट जाने का तात्पर्य था — उनका अपने पिछले परिवार से जुड़ी स्मृतियों और परंपराओं के सामंजस्य में बदलाव आना।
  • स्पष्टत: यह सब एक कुल के सदस्यों में परस्पर प्रतिस्पर्धा के परिणामस्वरूप हुआ; और इसी की एक शाखा तोलिईद (तोलूयिद) ने अपने पारिवारिक मतभेदों का वृत्तांत बड़ी निपुणता से अपने संरक्षण में प्रस्तुत किए जा रहे इतिहासों में दिया।
  • बहुत हद तक यह सब चीन और ईरान पर उनके नियंत्रण का और उनके परिवार के सदस्यों द्वारा बहुत बड़ी संख्या में विद्वानों को अपने यहाँ भर्ती करने का परिणाम था।
  • परिष्कृत रूप से कहा जा सकता है कि अतीत से अलग होने का मतलब, पिछले शासकों की अपेक्षा प्रचलित शासकों के गुणों को अधिक लोकप्रिय करना था। तुलना की इस प्रक्रिया में स्वयं चंगेज़ खान को भी नहीं छोड़ा गया।
  • इल-खानी ईरान में तेरहवीं शताब्दी के आखिर में फ़ारसी इतिहासवृत्त में महान खानों द्वारा की गई रक्तरंजित हत्याओं का विस्तृत वर्णन किया गया और मृतकों की संख्या बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ा कर दी गई।
  • ठोस उदाहरण (महत्त्वपूर्ण): एक चश्मदीद गवाह के इस विवरण के विरोध में कि बुखारा के किले की रक्षा के लिए 400 सैनिक तैनात थे, एक इल-खानी इतिहासवृत्त में यह विवरण दिया गया कि बुखारा के किले पर हुए आक्रमण में 30,000 सैनिक मारे गए। ★★★
  • यद्यपि इल-खानी विवरणों में अभी भी चंगेज़ खान की प्रशंसा की जाती थी लेकिन उनमें भी यह तसल्लीबख़्श यह कहना जोड़ दिया जाने लगा कि समय बदल गया है और अब पहले जैसा खून-खराबा समाप्त हो चुका था।
  • चंगेज़ खान के वंशजों को विरासत में जो कुछ भी मिला वह महत्त्वपूर्ण था, लेकिन उनके सामने एक समस्या थी — अब उन्हें एक स्थानबद्ध समाज में अपनी धाक जमानी थी। इस बदले हुए समय में वे वीरता की वह तस्वीर नहीं पेश कर सकते थे जैसी चंगेज़ खान ने की थी। ★★★

12. यास (Yasa) — चंगेज़ खान की विधि-संहिता (पृ. 73–74)★★★

12.1 यास पर शोध और उसका विकास

  • डेविड आयलॉन (David Ayalon) के शोध के बाद यास (Yasa) पर हाल ही में हुआ कार्य — (वह नियम संहिता, जिसके बारे में कहा जाता है कि चंगेज़ खान ने 1206 के किरिलताई में लागू की थी) — उन जटिल विधियों का विस्तृत वर्णन करता है जो महान खान की स्मृति को बनाए रखने के लिए उसके उत्तराधिकारियों द्वारा प्रयुक्त की थीं।
  • अपने प्रारंभिक स्वरूप में यास को यसाक (Yasaq) लिखा जाता था जिसका अर्थ था विधि, आज्ञप्ति व आदेश।
  • वास्तव में जो थोड़ा-बहुत विवरण यसाक के बारे में हमें मिला है उसका संबंध प्रशासनिक विनियमों से है — जैसे आखेट, सैन्य और डाक प्रणाली का संगठन।
  • तेरहवीं शताब्दी के मध्य तक, किसी तरह से मंगोलों ने यास शब्द का प्रयोग ज़्यादा सामान्य रूप में करना शुरू कर दिया। इसका मतलब था चंगेज़ खान की विधि-संहिता।

12.2 यास का सामाजिक-राजनीतिक अर्थ★★★

  • यदि हम उसी समय में घटने वाली अन्य घटनाओं की ओर देखें तो शायद हम इस शब्द के अर्थ में होने वाले परिवर्तनों को समझ सकते हैं —
    • तेरहवीं शताब्दी के मध्य तक मंगोल एक एकीकृत जनसमूह के रूप में उभरकर सामने आए और उन्होंने एक ऐसे विशाल साम्राज्य का निर्माण किया जिसे दुनिया में पहले नहीं देखा गया था।
    • उन्होंने अत्यंत जटिल शहरी समाजों पर शासन किया जिनके अपने-अपने इतिहास, संस्कृतियाँ और नियम थे।
    • हालाँकि मंगोलों का अपने साम्राज्य के क्षेत्रों पर राजनीतिक प्रभुत्व रहा, फिर भी संख्यात्मक रूप में वे अल्पसंख्यक ही थे।
    • उनके लिए अपनी पहचान और विशिष्टता की रक्षा का एकमात्र उपाय उस पवित्र नियम के अधिकार के दावे के ज़रिये हो सकता था, जो उन्हें अपने पूर्वजों से प्राप्त हुआ था।
  • इस बात की पूरी संभावना है कि यास मंगोल जनजाति की ही प्रथागत परंपराओं का एक संकलन था।
  • किंतु उसे चंगेज़ खान की विधि-संहिता कहकर मंगोलों ने भी मूसा और सुलेमान की भाँति अपने एक स्मृतिकार के होने का दावा किया — जिसकी प्रामाणिक संहिता प्रजा पर लागू की जा सकती थी।
  • यास मंगोलों को समान आस्था रखने वालों के आधार पर संयुक्त करने में सफल हुआ। उसने चंगेज़ खान और उनके वंशजों से मंगोलों की निकटता को स्वीकार किया।
  • यद्यपि मंगोलों ने भी काफी हद तक स्थानबद्ध जीवन-प्रणाली के कुछ पहलुओं को अपना लिया था, फिर भी यास ने उनको अपनी कबीलाई पहचान बनाए रखने और अपने नियमों को उन पराजित लोगों पर लागू करने का आत्म-विश्वास दिया।
  • यास एक बहुत ही सशक्त विचारधारा थी। हो सकता है कि चंगेज़ खान ने ऐसी विधि की कोई योजना पहले से न बनाई हो, लेकिन वह निश्चित रूप से उसकी कल्पना-शक्ति से प्रेरित थी, जिसने विश्वव्यापी मंगोल राज्य की संरचना में अहम भूमिका निभाई। ★★★

बॉक्स (पृ. 74): यास — बुखारा के उत्सव मैदान की दो घटनाएँ [स्रोत]★★★

  • 1221 में बुखारा पर विजय प्राप्त करने के बाद चंगेज़ खान ने वहाँ के अमीर मुसलमान निवासियों को ‘उत्सव मैदान’ में एकत्रित कर उनकी भर्त्सना की। उसने उनको पापी कहा और चेतावनी दी कि इन पापों के प्रायश्चितस्वरूप उनको अपना छिपा हुआ धन उसे देना पड़ेगा। यह वर्णन करने योग्य एक नाटकीय घटना थी जिसको लोगों ने लंबे समय तक याद रखा और उस पर चित्र बनाए।
  • सोलहवीं शताब्दी के अंत में चंगेज़ खान के सबसे बड़े पुत्र जोची का एक दूर का वंशज अब्दुल्लाह खान बुखारा के उसी उत्सव मैदान में गया।
    • चंगेज़ खान के विपरीत अब्दुल्लाह खान वहाँ छुट्टी की नमाज़ अदा करने गया।
    • उसके इतिहासकार हफ़ीज़-ए-तानीश ने अपने स्वामी की इस मुस्लिम धर्म-परायणता का विवरण अपने इतिवृत्त में दिया और साथ में यह चौंका देने वाली टिप्पणी भी की: ‘कि यह चंगेज़ खान के यास के अनुसार था।’
  • क्रियाकलाप 4: क्या इन चार शताब्दियों में यास का अर्थ बदल गया, जिसने चंगेज़ खान को अब्दुल्लाह खान से अलग कर दिया? हफ़ीज़-ए-तानीश के अनुसार अब्दुल्लाह खान ने मुसलमान उत्सव मैदान में किए गए धार्मिक अनुपालन के संबंध में चंगेज़ खान के यास का उल्लेख क्यों किया?

13. निष्कर्ष: चंगेज़ खान और मंगोलों का विश्व इतिहास में स्थान (पृ. 74–75)★★★

13.1 दो विरोधी छवियाँ

  • आज जब हम चंगेज़ खान को याद करते हैं तो हमारी कल्पना में ऐसी तस्वीरें आती हैं जैसेकि — एक विजेता, नगरों को ध्वस्त करने वाला और एक ऐसे व्यक्ति की, जो हज़ारों लोगों की मृत्यु का उत्तरदायी है।
  • तेरहवीं शताब्दी के चीन, ईरान और पूर्वी यूरोप के नगरवासी स्टेपी के इन गिरोहों को भय और घृणा की दृष्टि से देखते थे।
  • फिर भी मंगोलों के लिए चंगेज़ खान अब तक का सबसे महान शासक था —
    • उसने मंगोलों को संगठित किया;
    • लंबे समय से चली आ रही कबीलाई लड़ाइयों और चीनियों द्वारा शोषण से मुक्ति दिलवाई;
    • साथ ही उन्हें समृद्ध बनाया;
    • एक शानदार पारमहाद्वीपीय साम्राज्य बनाया;
    • और व्यापार के रास्तों और बाज़ारों को पुनर्स्थापित किया जिनसे वेनिस के मार्कोपोलो की तरह दूर के यात्री आकृष्ट हुए।
  • NCERT का पद्धति-सूत्र: “चंगेज़ खान के इन परस्पर विरोधी चित्रों का कारण एकमात्र परिप्रेक्ष्य की भिन्नता नहीं बल्कि ये विचार हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि किस तरह से एक (प्रभावशाली) दृष्टिकोण अन्य को पूरी तरह से मिटा देता है।” ★★★

13.2 बहुलतावादी शासन — एक असामान्य बात

  • स्थानबद्ध पराजित लोगों की सोच से परे कुछ देर के लिए तेरहवीं शताब्दी के उस छोटे से मंगोल अधिराज्य के बारे में सोचिए जिसने विविध मतों और आस्था वाले लोगों को सम्मिलित किया।
  • हालाँकि मंगोल शासक स्वयं भी विभिन्न धर्मों-आस्थाओं से संबंध रखने वाले थे — शमन, बौद्ध, ईसाई और अंतत: इस्लाम — लेकिन उन्होंने सार्वजनिक नीतियों पर अपने वैयक्तिक मत कभी नहीं थोपे।
  • मंगोल शासकों ने सब जातियों और धर्मों के लोगों को अपने यहाँ प्रशासकों और हथियारबंद सैन्य दल के रूप में भर्ती किया।
  • इनका शासन बहु-जातीय, बहु-भाषी, बहु-धार्मिक था जिसको अपने बहुविध संविधान का कोई भय नहीं था। यह उस समय के लिए एक असामान्य बात थी। ★★★
  • इतिहासकार अब उन विधियों का अध्ययन करने में लगे हैं जिनके माध्यम से मंगोल अपने बाद में आनेवाली शासन-प्रणालियों (जैसे कि भारत में मुगल शासकों की) के अनुसरण के लिए आदर्श प्रस्तुत कर सके।

13.3 प्रेरणा-स्रोत का प्रश्न और तैमूर (पृ. 75)

  • मंगोलों और किसी भी यायावर शासन प्रणाली से संबंधित जिस तरह के प्रलेख हैं, उनसे यह समझना वस्तुत: असंभव है कि वह कौन-सा ऐसा प्रेरणा-स्रोत था जिसने साम्राज्य निर्माण की महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए अनेक समुदाय में बँटे हुए लोगों का एक परिसंघ बनाया।
  • अंतत: मंगोल साम्राज्य भिन्न-भिन्न वातावरण में परिवर्तित हो गया, तथापि मंगोल साम्राज्य के संस्थापक की प्रेरणा एक प्रभावशाली शक्ति बनी रही।
  • चौदहवीं शताब्दी के अंत में एक अन्य राजा तैमूर, जो एक विश्वव्यापी राज्य की आकांक्षा रखता था, ने अपने को राजा घोषित करने में संकोच का अनुभव किया — क्योंकि वह चंगेज़ खान का वंशज नहीं था।
    • जब उसने अपनी स्वतंत्र संप्रभुता की घोषणा की तो अपने को चंगेज़ खानी परिवार के दामाद (गुरेगेन) के रूप में प्रस्तुत किया। ★★★

13.4 आधुनिक मंगोलिया

  • आज, दशकों के रूसी नियंत्रण के बाद, मंगोलिया एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बना रहा है।
  • उसने चंगेज़ खान को एक महान राष्ट्र-नायक के रूप में लिया है जिसका सार्वजनिक रूप से सम्मान किया जाता है और जिसकी उपलब्धियों का वर्णन गर्व के साथ किया जाता है।
  • मंगोलिया के इतिहास में इस निर्णायक समय पर चंगेज़ खान एक बार फिर मंगोलों के लिए एक आराध्य व्यक्ति के रूप में उभरकर सामने आया है — जो महान अतीत की स्मृतियों को जागृत कर राष्ट्र की पहचान बनाने की दिशा में शक्ति प्रदान करने के साथ-साथ राष्ट्र को भविष्य की ओर ले जाएगा।

चित्र-संदर्भ

  • पृ. 66–67: यूरोपीय कलाकारों द्वारा ‘बर्बरों’ का कल्पित चित्र — नरमांस भक्षण दर्शाता लातिनी शीर्षक वाला चित्र (मंगोल-विरोधी प्रचार का उदाहरण)।
  • पृ. 70: मंगोल वंश-वृक्ष — चंगेज़ (मूल), जोची, चघताई, ओगोदेई, तोलुई; मोंके, कुबलाई, हलाकू, आरिख बोके, बातू, बर्के, गोमुक। (टिप्पणी: बहुविवाहित चंगेज़ खान अनेक बच्चों के जनक थे; उनकी पटरानी बोरते के गर्भ से जन्मे चारों पुत्र उनके वंश-वृक्ष की शाखाएँ बने। ज्येष्ठ पुत्र जोची के परिवार में कोई भी सूरमा (प्रसिद्ध खान) पैदा नहीं हुआ, परन्तु उस परिवार के पास अपार शक्ति थी। तोलुई परिवार के हाथों में सत्ता आने से मोंके और कुबलई के लिए सत्ता के द्वार खुल गए।)
  • पृ. 75: मंगोलों द्वारा बग़दाद पर कब्ज़ा — रशीद अल-दीन, तबरेज़ का इतिवृत्त, चौदहवीं शताब्दी का लघुचित्र।
  • पृ. 76: कुबलई खान और चाबी, शिविर में।

NCERT अभ्यास प्रश्न (पृ. 76)★★★

संक्षेप में उत्तर दीजिए —

  1. मंगोलों के लिए व्यापार क्यों इतना महत्त्वपूर्ण था?
  2. चंगेज़ खान ने यह क्यों अनुभव किया कि मंगोल कबीलों को नवीन सामाजिक और सैनिक इकाइयों में विभक्त करने की आवश्यकता है?
  3. यास के बारे में परवर्ती मंगोलों का चिंतन किस तरह चंगेज़ खान की स्मृति के साथ जुड़े हुए उनके तनावपूर्ण संबंधों को उजागर करता है?
  4. यदि इतिहास नगरों में रहने वाले साहित्यकारों के लिखित विवरणों पर निर्भर करता है तो यायावर समाजों के बारे में हमेशा प्रतिकूल विचार ही रखे जाएँगे। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? क्या आप इसका कारण बताएँगे कि फ़ारसी इतिवृत्तकारों ने मंगोल अभियानों में मारे गए लोगों की इतनी बढ़ा-चढ़ा कर संख्या क्यों बताई है?

संक्षेप में निबंध लिखिए — 5. मंगोल और बेदोइन समाज की यायावरी विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए, यह बताइए कि आपके विचार में किस तरह उनके ऐतिहासिक अनुभव एक-दूसरे से भिन्न थे? इन भिन्नताओं से जुड़े कारणों को समझाने के लिए आप क्या स्पष्टीकरण देंगे? 6. तेरहवीं शताब्दी के मध्य में मंगोलिया द्वारा निर्मित ‘पैक्स मंगोलिका’ का निम्नलिखित विवरण उसके चरित्र को किस तरह उजागर करता है?

“एक फ्रेन्सिसकन भिक्षु, रूब्रुक निवासी विलियम को फ़्रांस के सम्राट लुई IX ने राजदूत बनाकर महान खान मोंके के दरबार में भेजा। वह 1254 में मोंके की राजधानी काराकोरम पहुँचा और वहाँ वह लोरेन, फ्रांस की एक महिला पकेट (Paquette) के संपर्क में आया जिसे हंगरी से लाया गया था। यह महिला राजकुमार की पत्नियों में से एक पत्नी की सेवा में नियुक्त थी जो नेस्तोरियन ईसाई थी। वह दरबार में एक फ़ारसी जौहरी ग्वीयोम् बूशेर के संपर्क में आया, ‘जिसका भाई पेरिस के ग्रेंड पोन्ट में रहता था।’ इस व्यक्ति को सर्वप्रथम रानी सोरगकतानी ने और उसके उपरांत मोंके के छोटे भाई ने अपने पास नौकरी में रखा। विलियम ने यह देखा कि विशाल दरबारी उत्सवों में सर्वप्रथम नेस्तोरिन पुजारियों को उनके चिह्नों के साथ तथा इसके उपरांत मुसलमान, बौद्ध और ताओ पुजारियों को महान खान को आशीर्वाद देने के लिए आमंत्रित किया जाता था।…”

शिक्षक-संदर्भ: क्रियाकलाप-सूची

#पृष्ठक्रियाकलाप
161जुवैनी का बुखारा-वृत्तांत सही मानकर — बुखारा/खुरासान के निवासी के रूप में उस भाषण का प्रभाव
271रेशम मार्ग के क्षेत्र व वस्तुएँ; मानचित्र में अनंकित पूर्वी बिंदु (नगर) खोजें; क्या यह बारहवीं शताब्दी में संभव था?
372पशुचारकों और किसानों के स्वार्थों में संघर्ष का क्या कारण था? क्या चंगेज़ खान खानाबदोश कमांडरों को दिए भाषण में इस तरह की भावनाओं को शामिल करता?
474क्या चार शताब्दियों में यास का अर्थ बदल गया? हफ़ीज़-ए-तानीश ने चंगेज़ खान के यास का उल्लेख क्यों किया?

अतिरिक्त पठन (पुस्तक-संदर्भ)

  • स्रोत-लेखक: जुवैनी (फ़ारसी इतिवृत्तकार, इल-खानी दरबार); रशीदुद्दीन (गज़न खान का वज़ीर, तबरेज़ का इतिवृत्त); हफ़ीज़-ए-तानीश (16वीं शती, अब्दुल्लाह खान का इतिहासकार); मार्कोपोलो; रूब्रुक निवासी विलियम।
  • आधुनिक विद्वान: बोरिस याकोवलेविच व्लादिमीरस्तॉव, वैसिली व्लैदिमिरोविच बारतोल्ड, इगोर दे रखेविल्ट्स, गेरहार्ड डोरफर, डेविड आयलॉन।
  • अंतर-अध्याय: विषय 2 (रोम — साम्राज्य-संचालन की तुलना); विषय 4 (इस्लाम/बद्दू यायावर-परंपरा); कक्षा XII भारत (बाबर, मुगल साम्राज्य 1526; दिल्ली सल्तनत पर मंगोल-दबाव)।