अध्याय 1लेखन कला और शहरी जीवन

शिक्षण नोट्स68 मिनट

NCERT — विश्व इतिहास के कुछ विषय, विषय 1 (Reprint 2026-27), पृ. 1–28

खंड: एक — प्रारंभिक समाज • कालक्रम: 6 लाख वर्ष पूर्व से 1 ई.पू.

0. खंड-प्रस्तावना: प्रारंभिक समाज (पृ. 2–4)

  • इस अनुभाग का विषय सुदूर अतीत है — लाखों वर्ष पहले, मानव अस्तित्व की शुरुआत से।
  • सर्वप्रथम अफ़्रीका में मानव प्राणियों का प्रादुर्भाव (Emergence) हुआ; पुरातत्त्व विज्ञानियों ने इन प्रारंभिक चरणों का अध्ययन हड्डियों और पत्थर के औज़ारों के अवशेषों की सहायता से किया।
  • पुरातत्त्व विज्ञानियों के पुनर्निर्माण (Reconstruction) के मुख्य प्रश्न —
    • प्रारंभिक मानव कैसे घरों में रहते थे?
    • कंदमूल एवं बीज इकट्ठा करके और जानवरों का शिकार करके भरण-पोषण कैसे करते थे?
    • अपने भावों एवं विचारों को अभिव्यक्त करने के कौन-से तरीके थे?
    • आग और भाषा का प्रयोग कब और कैसे शुरू हुआ?
  • विचारणीय प्रश्न: आज की दुनिया के शिकारी-संग्राहक समुदायों के जीवन के अध्ययन से क्या अतीत की जानकारी मिल सकती है?
  • विषय एक में मेसोपोटामिया (वर्तमान इराक) के प्रारंभिक नगरों की चर्चा है — इन नगरों का विकास मंदिरों के आस-पास हुआ; ये सुदूर व्यापार के केंद्र थे। पुरातात्त्विक साक्ष्यों — पुरानी बस्तियों के अवशेष और बहुतायत से पाई गई लिखित सामग्रियों — के आधार पर शिल्पियों, लिपिकों, श्रमिकों, पुरोहितों, राजा-रानियों के जीवन का पुनर्निर्माण किया गया है।
  • मूल विचारणीय प्रश्न: यदि लेखन कला का विकास न हुआ होता, तो इन शहरों में विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ कैसे संभव होतीं?
  • सर्वप्रथम नगरों की स्थापना से कम-से-कम पाँच हज़ार वर्ष पहले मनुष्य जंगलों, गुफाओं, कामचलाऊ घरों-आसरों तथा शिलाश्रयों (Rock shelters) में रहते थे; फिर गाँवों और शहरों में रहना शुरू किया।

खेती की ओर संक्रमण (पृ. 3)

  • अत्यंत दूरगामी प्रभाव वाला परिवर्तन: धीरे-धीरे खानाबदोश ज़िंदगी छोड़कर खेती के लिए एक स्थान पर बसना — लगभग दस हज़ार साल पहले शुरू।
  • खेती अपनाने से पहले लोग भोजन के लिए पेड़-पौधों की उपज इकट्ठी करते थे; धीरे-धीरे पौधों की जानकारी मिली — वे कहाँ उगते हैं, किस मौसम में फलते हैं — इसी आधार पर पौधे उगाना सीखा।
  • फसलों का क्षेत्रीय वितरण —
क्षेत्रफसलें
पश्चिमी एशियागेहूँ और जौ, मटर, कई तरह की दालें
पूर्वी तथा दक्षिण-पूर्वी एशियाज्वार-बाजरा और धान
अफ़्रीकाज्वार-बाजरा
  • इसी काल में भेड़-बकरी, ढोर (Cattle), सूअर और गधे जैसे जानवरों को पालतू बनाना (Domestication) सीखा।
  • रेशों से वस्त्र: पौधों के रेशे — रूई तथा पटसन; पशुओं के रेशे — ऊन से कपड़े बुने जाने लगे।
  • लगभग पाँच हज़ार साल पहले ढोरों और गधों को हलों तथा गाड़ियों में जोता जाने लगा।
  • आनुषंगिक परिवर्तन:
    • फसल पकने तक एक स्थान पर रहना ज़रूरी → स्थायी निवास, अधिक स्थायी घर।
    • मिट्टी के बर्तन बनाना सीखा — अनाज इकट्ठा करने और तरह-तरह के भोजन बनाने के लिए; भोजन को अधिक स्वादिष्ट और सुपाच्य बनाने की प्रक्रिया पर ध्यान।
    • पत्थर के औज़ारों की तकनीक बदली — पहले वाले तरीके भी चालू रहे, पर कुछ औज़ार घिसाई की विशद प्रक्रिया से चिकने और पॉलिशदार बनाए जाने लगे; नए उपकरण — अनाज की पिसाई-सफाई के लिए ओखली व मूसल, पत्थर की कुल्हाड़ी, कसिया और फावड़ा (जुताई हेतु भूमि साफ करने और बीज बोने के लिए खुदाई)।
    • कुछ इलाकों में ताँबा और टिन (राँगा) जैसी धातुओं के खनिजों का उपयोग शुरू; ताँबे के खनिज उनके खास नीले, हरे रंग की वजह से इस्तेमाल होते थे → आगे चलकर धातुओं से गहने और औज़ार बनाने का रास्ता खुला।
    • दूरस्थ स्थानों (और समुद्रों) से मिलने वाली वस्तुओं की जानकारी बढ़ी: लकड़ी, पत्थर, हीरे-जवाहरात, धातुएँ, सीपियाँ और ऑब्सीडियन (Obsidian — ज्वालामुखी का पक्का जमा हुआ लावा); लोग इनकी जानकारी और वस्तुएँ एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाते थे → प्रसार।
  • परिणाम: व्यापार में वृद्धि → गाँवों और कस्बों का विकास → आवागमन बढ़ा → पुराने छोटे-छोटे जन-समुदायों की जगह छोटे-छोटे राज्य विकसित। ये परिवर्तन बहुत धीमी गति से (कई हज़ार वर्ष) हुए, पर शहर स्थापित होते ही परिवर्तनों की रफ़्तार तेज़ हो गई।
  • कुछ विद्वानों ने इसे ‘क्रांति’ (Revolution) कहा — लोगों के जीवन में संभवतः इतना अधिक परिवर्तन आ गया था कि उन्हें पहचानना ही मुश्किल हो गया था। (संकेत: वी. गॉर्डन चाइल्ड की ‘नवपाषाण क्रांति’ की अवधारणा)
  • NCERT की सावधानी: प्रारंभिक इतिहास में निरंतरताओं और परिवर्तनों — दोनों का अवलोकन करें।
  • हमने प्रारंभिक समाजों में से कुछ को ही उदाहरण के रूप में चुना है; अन्य प्रकार के प्रारंभिक समाज भी थे — किसान समुदाय, पशुचारक (ग्वाले), शिकारी-संग्राहक समुदाय और नगरवासी।

0क. कालक्रम एक (पृ. 5–8) — 6 लाख वर्ष पूर्व से 1 ई.पू.

बॉक्स: कालक्रम का अध्ययन कैसे करें (पृ. 5)

  • राजाओं के युद्धों की अपेक्षा उन प्रक्रियाओं/घटनाओं की तिथियाँ अंकित करना कठिन है जिनके द्वारा सामान्य स्त्रियों-पुरुषों ने इतिहास को प्रभावित किया।
  • कुछ तिथियाँ किसी प्रक्रिया के आरंभ या उसकी परिपक्व अवस्था को दर्शाती हैं।
  • इतिहासकार नए-नए साक्ष्यों के आधार पर तिथियों में लगातार संशोधन करते रहते हैं।
  • कालक्रम को सुविधा की दृष्टि से भौगोलिक आधार पर बाँटा गया है, पर वास्तविक ऐतिहासिक विकास प्रायः इन सीमाओं के पार जाते हैं।
  • ऐतिहासिक प्रक्रियाओं में काल-अनुक्रम प्रायः ऊपर-नीचे या अतिव्यापित (Overlapping) होता है।
  • खाली खानों का अर्थ यह नहीं कि उस काल में कुछ विशेष घटित नहीं हुआ — कभी-कभी इसका अर्थ केवल यह है कि हमें अभी तक पता नहीं है।
  • यह कालक्रम मानव के उदय, पौधों-पशुओं के बसने की प्रक्रिया (Domestication), प्रमुख प्रौद्योगिक विकासों (आग का आविष्कार, धातुओं के प्रयोग, हल द्वारा खेती, पहिए/चाक), नगरों के आविर्भाव और लेखन के प्रयोग पर प्रकाश डालता है।

प्रमुख प्रविष्टियाँ (चयनित, क्षेत्रवार)

तिथिअफ़्रीकायूरोप
6 लाख–500,000 वर्ष पूर्वआस्ट्रेलोपिथिकस के जीवाश्म (56 लाख वर्ष पूर्व); अग्नि के प्रयोग के साक्ष्य (14 लाख वर्ष पूर्व)—
500,000–150,000 वर्ष पूर्वप्राज्ञ मानव (होमो सैपियंस) के जीवाश्म (195,000 वर्ष पूर्व)अग्नि के प्रयोग के साक्ष्य (400,000 वर्ष पूर्व)
50,000–30,000—प्राज्ञ मानव के जीवाश्म (40,000)
30,000–10,000गुफा-आवासों में चित्रकारी (27,500)गुफा-चित्रकारी (विशेषकर फ्रांस और स्पेन)
7000–6000 ई.पू.पशुओं और कुत्तों को पालतू बनाया गयागेहूँ-जौ की खेती (यूनान, 6000–5000)
4000–3000गधे को पालतू बनाया, ज्वार-बाजरा की खेती, ताँबे का प्रयोगताँबे का प्रयोग (क्रीट); घोड़े पालतू (पूर्वी यूरोप, 3000–2000)
3000–2000हल-कृषि, प्रथम राजवंश, नगर, पिरामिड, कैलेंडर, चित्रात्मक लिपि, पैपाइरस पर लेखन (मिस्र)नगर, महल, काँसे का प्रयोग, कुम्हार का चाक, व्यापार (क्रीट, 2000–1900); लिपि का विकास (क्रीट, 1700–1600)
1500–1400काँच की बोतलों का प्रयोग (मिस्र)—
1100–1000—लोहे का प्रयोग हुआ
900–800पश्चिम एशिया के फोनिशियनों ने उत्तरी अफ़्रीका में कार्थेज नगर की स्थापना की; भूमध्यसागरीय व्यापार का विस्तारप्रथम ओलिंपिक खेल (यूनान, 776 ई.पू.)
800–600लोहे का प्रयोग (सूडान; मिस्र)सिक्कों का प्रयोग (यूनान); रोम गणराज्य की स्थापना (510 ई.पू.)
500–400फ़ारसियों का मिस्र पर आक्रमणएथेन्स में ‘प्रजातंत्र’ की स्थापना (यूनान)
400–300मिस्र में सिकंदरिया (Alexandria) की स्थापना (332 ई.पू.) — ज्ञान का प्रमुख केंद्रमकदूनिया के सिकंदर ने मिस्र और पश्चिम एशिया के भागों को जीता (336–323 ई.पू.)
तिथिएशियादक्षिण एशिया
6 लाख–500,000 वर्ष पूर्वअग्नि का प्रयोग (700,000 वर्ष पूर्व, चीन)रिवात में पाषाणकालीन स्थल (1,900,000 वर्ष पूर्व, पाकिस्तान)
150,000–50,000 वर्ष पूर्वप्राज्ञ मानव के जीवाश्म (100,000, पश्चिम एशिया)—
30,000–10,000कुत्ते को पालतू बनाया (14,000, पश्चिम एशिया)भीमबैटका के गुफा चित्र (मध्य-प्रदेश); होमो सैपियंस के जीवाश्म (25,500, श्रीलंका)
8000–7000 ई.पू.भेड़-बकरियों को पालतू बनाया, गेहूँ-जौ की खेती (पश्चिम एशिया)—
7000–6000सूअर-पशुओं को पालतू बनाया (पश्चिम व पूर्व एशिया)प्रारंभिक कृषि-बस्तियाँ (बलूचिस्तान)
6000–5000कुक्कुट-पालन, ज्वार-बाजरा तथा अरबी (Yam) की खेती (पूर्वी एशिया)—
5000–4000कपास की खेती (दक्षिण एशिया); ताँबे का प्रयोग (पश्चिम एशिया)—
4000–3000कुम्हार के चाक का प्रयोग, पहिए का प्रयोग (3600 ई.पू.), लेखन का प्रयोग (3200 ई.पू., मेसोपोटामिया), काँसे का प्रयोगताँबे का प्रयोग
3000–2000हल-कृषि, नगर (मेसोपोटामिया); सिल्क का प्रयोग (चीन); घोड़े पालतू; चावल की खेती (दक्षिण-पूर्व एशिया)हड़प्पाकालीन संस्कृति के नगर, लिपि का प्रयोग (लगभग 2700 ई.पू.)
2000–1900खास पानी में रहने वाली भैंस पालतू (पूर्वी एशिया)—
1600–1500नगर, लेखन, राज्य (शांग राजवंश), काँसे का प्रयोग (चीन)—
1500–1400लोहे का प्रयोग (पश्चिम एशिया)ऋग्वेद की रचना
1200–1100—लोहे का प्रयोग, महापाषाण (Megaliths) (दकन और दक्षिण भारत)
1100–1000एक कोहान वाले ऊँट को पालतू बनाया (अरब)—
600–500सिक्कों का प्रयोग (तुर्की); फ़ारसी साम्राज्य (546 ई.पू.) — राजधानी पर्सिपोलिस; चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस (लगभग 551 ई.पू.)नगरों-राज्यों की स्थापना, पहली बार सिक्कों का प्रयोग, जैन और बौद्ध धर्म का प्रसार
400–300—मौर्य साम्राज्य की स्थापना (लगभग 321 ई.पू.)
300–200चीन में एक साम्राज्य की स्थापना (221 ई.पू.); चीन की विशाल दीवार का निर्माण-कार्य प्रारंभ—
तिथिअमरीकाआस्ट्रेलिया/प्रशान्त महासागरीय द्वीप
50,000–30,000 वर्ष पूर्व—प्राज्ञ मानव के जीवाश्म; समुद्र-यात्रा के प्राचीनतम संकेत (45,000 वर्ष पूर्व)
30,000–10,000 वर्ष पूर्वहोमो सैपियंस के जीवाश्म (12,000 वर्ष पूर्व)चित्रकला (20,000 वर्ष पूर्व)
7000–6000 ई.पू.कुम्हड़ा (Squash) की खेती—
5000–4000सेम की खेती—
4000–3000कपास और लौकी की खेती—
3000–2000गिनि पिग, टर्की पालतू; मक्के की खेती—
2000–1900आलू, मिर्च, कैसावा, मूँगफली की खेती; लामा और ऐल्पेका पालतू—
1200–1100मैक्सिको खाड़ी के चारों ओर ओल्मेक लोगों की बस्तियाँ, प्रारंभिक मंदिर और मूर्ति-शिल्पपोलिनेशिया और माइक्रोनेशिया में बस्तियाँ
1000–900चित्रात्मक लिपि का विकास—

क्रियाकलाप (पृ. 8): प्रत्येक छह खानों से एक तिथि लीजिए और उस क्षेत्र के पुरुषों-स्त्रियों के लिए उस तिथि की प्रक्रिया/घटना के महत्त्व पर विचार-विमर्श कीजिए।

1. प्रस्तावना: मेसोपोटामिया — सभ्यता का परिचय (पृ. 9)

  • शहरी जीवन की शुरुआत मेसोपोटामिया में हुई — फ़रात (Euphrates) और दज़ला (Tigris) नदियों के बीच स्थित प्रदेश; आजकल इराक गणराज्य का हिस्सा।
  • नाम की व्युत्पत्ति (पाद-टिप्पणी): ‘मेसोपोटामिया’ यूनानी भाषा के दो शब्दों — मेसोस (Mesos) यानी मध्य, और पोटैमोस (Potamos) यानी नदी — से बना है; अर्थात् दज़ला-फ़रात नदियों के बीच की उपजाऊ धरती।
  • मेसोपोटामिया की सभ्यता प्रसिद्ध है — संपन्नता, शहरी जीवन, विशाल एवं समृद्ध साहित्य, गणित और खगोलविद्या के लिए।
  • मेसोपोटामिया की लेखन-प्रणाली और साहित्य पूर्वी भूमध्यसागरीय प्रदेशों, उत्तरी सीरिया तथा तुर्की में 2000 ई.पू. के बाद फैला → उस समस्त क्षेत्र के राज्यों के बीच आपस में, यहाँ तक कि मिस्र के फ़राओ (Pharaoh) के साथ भी, मेसोपोटामिया की भाषा और लिपि में लिखा-पढ़ी होने लगी।

क्षेत्रीय नाम और भाषाओं का क्रम

कालक्षेत्र/भाषा
आरंभिक कालशहरीकृत दक्षिणी भाग — सुमेर (Sumer) और अक्कद (Akkad)
2000 ई.पू. के बादबेबीलोन महत्त्वपूर्ण शहर बना → दक्षिणी क्षेत्र बेबीलोनिया कहलाया
लगभग 1100 ई.पू. सेअसीरियाइयों ने उत्तर में राज्य स्थापित किया → वह क्षेत्र असीरिया (Assyria)
प्रथम ज्ञात भाषासुमेरियन (सुमेरी)
लगभग 2400 ई.पू.अक्कदी भाषी लोगों के आगमन के बाद अक्कदी ने सुमेरी का स्थान लिया; सिकंदर के समय (336–323 ई.पू.) तक कुछ क्षेत्रीय परिवर्तनों के साथ फलती-फूलती रही
1400 ई.पू. सेअरामाइक (Aramaic) का धीरे-धीरे प्रवेश — हिब्रू से मिलती-जुलती; 1000 ई.पू. के बाद व्यापक रूप से बोली जाने लगी; आज भी इराक के कुछ भागों में बोली जाती है
  • पुरातत्त्व की शुरुआत: मेसोपोटामिया में पुरातत्त्वीय खोज 1840 के दशक में शुरू; एक-दो स्थलों पर (जैसे उरुक और मारी) उत्खनन कई दशकों तक चलता रहा। (तुलना: भारत में किसी भी स्थल पर इतने लंबे अरसे तक खुदाई की कोई परियोजना नहीं चली।)
  • प्राप्त स्रोत: सैकड़ों की संख्या में इमारतें, मूर्तियाँ, आभूषण, कब्रें, औज़ार और मुद्राएँ; हज़ारों की संख्या में लिखित दस्तावेज़।

1क. मेसोपोटामिया और बाइबिल-परंपरा (पृ. 9–10)

  • यूरोपवासियों के लिए मेसोपोटामिया महत्त्वपूर्ण था क्योंकि बाइबल के प्रथम भाग ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ में इसका उल्लेख कई संदर्भों में है — ‘बुक ऑफ़ जेनेसिस’ (Book of Genesis) में ‘शिमार’ (Shimar) का उल्लेख है जिसका तात्पर्य सुमेर — ईंटों से बने शहरों की भूमि से है।
  • यूरोप के यात्री-विद्वज्जन मेसोपोटामिया को एक तरह से अपने पूर्वजों की भूमि मानते थे; आरंभिक पुरातत्त्वीय खोज में ओल्ड टेस्टामेंट को अक्षरशः सत्य सिद्ध करने का प्रयत्न था।
  • सन् 1873: एक ब्रिटिश समाचार-पत्र ने ब्रिटिश म्यूज़ियम द्वारा प्रारंभ किए गए खोज अभियान का खर्च उठाया, जिसका उद्देश्य ऐसी पट्टिका (Tablet) ढूँढ़ना था जिस पर बाइबल में उल्लिखित जलप्लावन (Flood) की कहानी अंकित हो।
  • 1960 के दशक तक समझ बदल गई: ओल्ड टेस्टामेंट की कहानियाँ अक्षरशः सही नहीं हैं, लेकिन वे इतिहास के महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों के अतीत को अपने ढंग से अभिव्यक्त करती हैं; पुरातात्त्विक तकनीकें अधिकाधिक उन्नत और परिष्कृत हुईं; आम लोगों के जीवन की परिकल्पना भी की जाने लगी; बाइबल की कहानियों की अक्षरशः सच्चाई प्रमाणित करने का कार्य गौण हो गया।

बॉक्स (पृ. 10): जलप्लावन की कथाएँ

  • बाइबल के अनुसार: जलप्लावन पृथ्वी पर संपूर्ण जीवन को नष्ट करने वाला था; परमेश्वर ने जीवन सुरक्षित रखने के लिए नोआ (Noah) नामक मनुष्य को चुना; नोआ ने विशाल नाव बनाई और उसमें सभी जीव-जंतुओं का एक-एक जोड़ा रख लिया; जलप्लावन में बाकी सब नष्ट हो गया, नाव के जोड़े बच गए।
  • मेसोपोटामिया के परंपरागत साहित्य में भी ठीक ऐसी ही कहानी मिलती है — मुख्य पात्र का नाम ‘ज़िउसूद्र’ (Ziusudra) या ‘उतनापिष्टिम’ (Utnapishtim)।
  • क्रियाकलाप 1: जलप्लावन जैसी पुराण-कथाएँ इतिहास के महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों की यादों को अमिट रखने का तरीका हैं — जलप्लावन से पहले और बाद का जनजीवन कैसा रहा होगा, पता लगाएँ।
  • मानचित्र 1 (पृ. 10): पश्चिम एशिया — काला सागर, कैस्पियन सागर, भूमध्यसागर, अरल सागर; तुर्की, सीरिया-लेबनान, ईरान; दज़ला-फ़रात नदियाँ; मारी, बेबीलोन, उरूक, उर (चिह्नित); मिस्र (नील नदी), अरबी रेगिस्तान, फ़ारस की खाड़ी, अरब सागर, सिन्धु नदी।

2. मेसोपोटामिया और उसका भूगोल (पृ. 10–11)

  • इराक भौगोलिक विविधता का देश है। प्रमुख प्राकृतिक क्षेत्र —
क्षेत्रविशेषताएँआजीविका
पूर्वोत्तरहरे-भरे, ऊँचे-नीचे मैदान; वृक्षाच्छादित पर्वत-शृंखलाएँ; पर्याप्त वर्षा; स्वच्छ झरने, जंगली फूलअच्छी फ़सल; 7000–6000 ई.पू. के बीच यहाँ खेती शुरू
उत्तरऊँची भूमि — ‘स्टेपी’ (Steppe) घास के मैदानपशुपालन खेती की तुलना में अधिक अच्छा साधन; सर्दियों की वर्षा के बाद भेड़-बकरियाँ छोटी-छोटी झाड़ियों और घास से भरण-पोषण करती हैं
पूर्वदज़ला की सहायक नदियाँईरान के पहाड़ी प्रदेशों में जाने के लिए परिवहन का अच्छा साधन
दक्षिणरेगिस्तानयहीं सबसे पहले नगरों और लेखन-प्रणाली का प्रादुर्भाव हुआ
  • रेगिस्तान में नगर क्यों संभव हुए? फ़रात और दज़ला नदियाँ उत्तरी पहाड़ों से निकलकर अपने साथ उपजाऊ बारीक मिट्टी (सिल्ट) लाती हैं; बाढ़ आने पर या सिंचाई के लिए पानी खेतों में ले जाने पर यह उपजाऊ मिट्टी वहाँ जमा हो जाती है।
  • फ़रात रेगिस्तान में प्रवेश के बाद कई धाराओं में बँटकर बहने लगती है; कभी-कभी इन धाराओं में बाढ़ आ जाती थी; पुराने ज़माने में ये धाराएँ सिंचाई की नहरों का काम देती थीं — आवश्यकता पड़ने पर गेहूँ, जौ, मटर, मसूर के खेतों की सिंचाई की जाती थी।
  • महत्त्वपूर्ण तुलना: रोम साम्राज्य (विषय 3) सहित सभी पुरानी व्यवस्थाओं में दक्षिणी मेसोपोटामिया की खेती सबसे ज़्यादा उपज देने वाली हुआ करती थी — हालाँकि यहाँ फ़सल के लिए आवश्यक वर्षा की कमी रहती थी।
  • खेती के अलावा — भेड़-बकरियाँ स्टेपी घास के मैदानों, पूर्वोत्तरी मैदानों और पहाड़ों के ढालों पर पाली जाती थीं (ये स्थान बाढ़ वाली नदियों से काफी ऊँचाई पर) → भारी मात्रा में मांस, दूध और ऊन; नदियों में मछलियों की कोई कमी नहीं; गर्मियों में खजूर के पेड़ (पिंड खजूर) खूब फल देते थे।
  • ! सावधानी (NCERT): “हमें यह सोचने की गलती नहीं करनी चाहिए कि शहरों का विकास केवल ग्रामीण समृद्धि के बल पर ही हुआ था।” — अन्य कारक भी थे (आगे के खंड)।
  • मानचित्र 2 (पृ. 11): मेसोपोटामिया — पर्वत, स्टेपी, रेगिस्तान (मरुस्थल), दक्षिण का सिंचित क्षेत्र; असीरिया क्षेत्र में निनवैह, निमरूद, अस्सुर; स्टेपी में मारी; दक्षिण में बगदाद, बेबीलोन, तेल अबू सलाबिख, उरुक, उर; वर्षा-सिंचित कृषि प्रदेश की दक्षिणी सीमा दिखाई गई है।

3. शहरीकरण का महत्त्व (पृ. 12)

  • शहर/नगर केवल बड़ी संख्या में लोगों के रहने के स्थान नहीं — जब किसी अर्थव्यवस्था में खाद्य उत्पादन के अतिरिक्त अन्य आर्थिक गतिविधियाँ (व्यापार, उत्पादन/विनिर्माण, तरह-तरह की सेवाएँ) विकसित होने लगती हैं, तब स्थान पर जनसंख्या का घनत्व बढ़ता है → कस्बे बनते हैं।
  • शहरी अर्थव्यवस्था की कसौटी: खाद्य उत्पादन के अलावा व्यापार, उत्पादन और सेवाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका।
  • आत्मनिर्भरता का अंत — परस्पर निर्भरता: नगर के लोग आत्मनिर्भर नहीं रहते; उन्हें नगर/गाँव के अन्य लोगों द्वारा उत्पन्न वस्तुओं या सेवाओं की ज़रूरत → आपस में बराबर लेन-देन।
  • उदाहरण (श्रम-विभाजन): पत्थर की मुद्रा (Seal) बनाने वाले को —
    • पत्थर उकेरने के लिए काँसे के औज़ारों की ज़रूरत — जो वह स्वयं नहीं बना सकता;
    • मुद्राओं के लिए आवश्यक रंगीन पत्थर कहाँ से मिलेंगे, यह भी वह नहीं जानता;
    • उसकी विशेषज्ञता सिर्फ नक्काशी तक सीमित; औज़ार बनाने वाले को भी धातु-ताँबा या राँगा (टिन) लाने के लिए खुद बाहर नहीं जाना पड़ता; उसे ईंधन के लिए हरदम लकड़ी के कोयले की ज़रूरत रहती है।
    • → इस प्रकार श्रम-विभाजन (Division of Labour) शहरी-जीवन की विशेषता है।
  • सामाजिक संगठन की आवश्यकता:
    • शहरी विनिर्माताओं के लिए ईंधन, धातु, विभिन्न प्रकार के पत्थर, लकड़ी आदि भिन्न-भिन्न जगहों से आती हैं → संगठित व्यापार और भंडारण चाहिए।
    • अनाज व अन्य खाद्य-पदार्थ गाँवों से शहरों में आते हैं → संग्रह तथा वितरण की व्यवस्था चाहिए।
    • अनेक क्रियाकलापों में तालमेल: मुद्रा काटने वालों को केवल पत्थर ही नहीं, तराशने के लिए औज़ार और बर्तन भी चाहिए।
    • ऐसी प्रणाली में कुछ लोग आदेश देते हैं और दूसरे उनका पालन करते हैं।
    • शहरी अर्थव्यवस्था को अपना हिसाब-किताब लिखित रूप में रखना होता है।

बॉक्स (पृ. 12): काँसे का युग

  • मेसोपोटामिया के प्राचीनतम नगरों का निर्माण कांस्य युग यानी लगभग 3000 ई.पू. में शुरू हुआ।
  • काँसा (Bronze) = ताँबा + राँगा (टिन) का मिश्रण — इसका मतलब है कि ये धातुएँ दूर-दूर से मँगाई जाती थीं।
  • उपयोग: बढ़ई का काम, मनकों में छेद करने, पत्थर की मुद्राएँ उकेरने, फर्नीचर में जड़ने, सीपियाँ काटने आदि कामों के लिए धातु के औज़ार; मेसोपोटामियाई हथियार भी काँसे के होते थे (जैसे भालों की नोकें — पृ. 38 का चित्र)।

बॉक्स (पृ. 12): वार्का शीर्ष (Warka Head)

  • 3000 ई.पू., उरुक नगर; स्त्री का सिर — सफ़ेद संगमरमर को तराशकर बनाया गया।
  • आँखों और भौंहों में क्रमशः नीले लाजवर्द (Lapis lazuli), सफ़ेद सीपी और काले डामर (Bitumen) की जड़ाई की गई होगी।
  • सिर के ऊपर एक खाँचा — शायद गहना पहनाने के लिए।
  • मूर्तिकला का विश्व-प्रसिद्ध नमूना; मुख, ठोड़ी और गालों की सुकोमल-सुंदर बनावट के लिए प्रशंसित; ऐसे कठोर पत्थर में तराशा गया जिसे काफी अधिक दूरी से लाना पड़ा होगा।
  • प्रश्न (कैप्शन): पत्थर लाने से लेकर इस मूर्ति के निर्माण में किन विशेषज्ञों का योगदान रहा होगा?
  • क्रियाकलाप 2: क्या शहरी जीवन धातुओं के इस्तेमाल के बिना संभव होता? चर्चा कीजिए।

4. शहरों में माल की आवाजाही (पृ. 13)

  • मूल विषमता: मेसोपोटामिया खाद्य-संसाधनों में समृद्ध, पर खनिज-संसाधनों का अभाव।
  • दक्षिण के अधिकांश भागों में कमी —
    • औज़ार, मोहरें (मुद्राएँ), आभूषण बनाने के लिए पत्थरों की कमी;
    • इराकी खजूर और पोपलार की लकड़ी गाड़ियों, गाड़ियों के पहिए या नावें बनाने के लिए खास अच्छी नहीं;
    • औज़ार, पात्र या गहनों के लिए कोई धातु उपलब्ध नहीं।
  • समाधान — विनिमय व्यापार: प्राचीन मेसोपोटामियाई लकड़ी, ताँबा, राँगा (टिन), चाँदी, सोना, सीपी और विभिन्न प्रकार के पत्थर — तुर्की और ईरान अथवा खाड़ी-पार के देशों से मँगाते थे; बदले में अपना कपड़ा और कृषि-जन्य उत्पाद काफी मात्रा में भेजते थे। (उन देशों में खनिज थे, पर खेती की गुंज़ाइश कम।)
  • वस्तुओं का नियमित आदान-प्रदान तभी संभव, जब कोई सामाजिक संगठन हो जो विदेशी अभियानों और विनिमयों को निर्देशित करे — दक्षिणी मेसोपोटामिया के लोगों ने ऐसे संगठन स्थापित करने की शुरुआत की।
  • परिवहन — शहरी विकास की शर्त:
    • शिल्प, व्यापार और सेवाओं के अलावा कुशल परिवहन व्यवस्था भी शहरी विकास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण।
    • भारवाही पशुओं की पीठ पर या बैलगाड़ियों में अनाज/काठ-कोयला लाना बहुत कठिन — बहुत समय लगता है, पशुओं के चारे पर काफी खर्च — शहरी अर्थव्यवस्था यह बोझ नहीं उठा सकती।
    • सबसे सस्ता तरीका — जलमार्ग: अनाज के बोरों से लदी नावें/बजरे नदी की धारा अथवा हवा के वेग से चलते हैं — जिसमें कोई खर्चा नहीं; जानवरों से ढुलाई पर उन्हें चारा खिलाना पड़ता है।
    • पुराने मेसोपोटामिया की नहरें और प्राकृतिक जलधाराएँ छोटी-बड़ी बस्तियों के बीच माल के परिवहन के अच्छे मार्ग थीं।
    • फ़रात नदी उन दिनों व्यापार के लिए ‘विश्व-मार्ग’ (World route) थी। (आगे मारी नगर के विवरण से स्पष्ट होगा।)

5. लेखन कला का विकास (पृ. 13–14)

  • भाषा बनाम लेखन: सभी समाजों के पास भाषा होती है जिसमें उच्चरित ध्वनियाँ अपना अर्थ प्रकट करती हैं — यह मौखिक/शाब्दिक भावाभिव्यक्ति है। लिखना भी उससे उतना अलग नहीं जितना हम समझ बैठते हैं — लेखन/लिपि का अर्थ है: उच्चरित ध्वनियों को दृश्य संकेतों या चिह्नों (Signs) के रूप में प्रस्तुत करना।
  • पहली पट्टिकाएँ — लगभग 3200 ई.पू.: उनमें चित्र जैसे चिह्न और संख्याएँ दी गई हैं; बैलों, मछलियों और रोटियों आदि की लगभग 5000 सूचियाँ मिली हैं — दक्षिणी शहर उरुक के मंदिरों में आने वाली और वहाँ से बाहर जाने वाली चीज़ों की।
  • लेखन का सामाजिक मूल: “लेखन कार्य तभी शुरू हुआ जब समाज को अपने लेन-देन का स्थायी हिसाब रखने की ज़रूरत पड़ी” — क्योंकि शहरी जीवन में लेन-देन अलग-अलग समय पर होते थे, उन्हें करने वाले कई लोग होते थे, और सौदा भी कई प्रकार के माल का होता था।
  • बॉक्स (पृ. 13): चिकनी मिट्टी की पट्टिकाएँ — लगभग 3200 ई.पू.; प्रत्येक पट्टिका की ऊँचाई 3.5 से.मी. या उससे कम; इन पर बने संकेत-चित्र: बैल, मछली, अनाज और नाव; साथ में कीलाकार अक्षर संकेत (śe, kur, i, ma) दिखाए गए हैं।

पट्टिका-निर्माण और कीलाकार लिपि की तकनीक (पृ. 14)

  • लिपिक चिकनी मिट्टी को गीला करता, फिर गूंधकर और थापकर ऐसे आकार की पट्टी बनाता जिसे वह आसानी से एक हाथ में पकड़ सके।
  • वह सावधानीपूर्वक उसकी सतहों को चिकना बनाता; फिर सरकंडे की तीली की तीखी नोक से नम, चिकनी सतह पर कीलाकार चिह्न (Cuneiform) बना देता था।
  • पट्टिकाएँ धूप में सूखकर पक्की हो जाती थीं — वे मिट्टी के बर्तनों जैसी ही मज़बूत हो जाती थीं।
  • अपरिवर्तनीयता: जब उन पर लिखा हिसाब असंगत/गैर-ज़रूरी हो जाता, तो पट्टिका फेंक दी जाती थी; सूखी पट्टी पर कोई नया चिह्न नहीं लिखा जा सकता था → प्रत्येक सौदे के लिए, चाहे वह कितना भी छोटा हो, अलग पट्टिका की ज़रूरत होती थी।
  • इसीलिए मेसोपोटामिया के खुदाई स्थलों पर सैकड़ों पट्टिकाएँ मिली हैं — और इसी स्रोत-संपदा के कारण आज हम मेसोपोटामिया के बारे में इतना कुछ जानते हैं।
  • बॉक्स (पाद-टिप्पणी): क्यूनीफ़ार्म (कीलाकार) — लातिनी शब्द क्यूनियस (Cuneus) = ‘खूँटी’ और फ़ोर्मा (Forma) = ‘आकार’ से बना है।
  • बॉक्स (पृ. 14, हाशिया): दोनों ओर कीलाक्षरों में लिखी चिकनी मिट्टी की एक पट्टिका — यह एक गणितीय अभ्यास है; अग्रभाग में सबसे ऊपर एक त्रिभुज और उसके आर-पार कुछ रेखाएँ अंकित हैं; अक्षर मिट्टी में दबाकर अंकित किए गए हैं।

कीलाकार लिपि का विकास-क्रम

तिथिविकास
लगभग 3200 ई.पू.पहली पट्टिकाएँ — चित्र-चिह्न व संख्याएँ; मंदिरों का हिसाब
लगभग 2600 ई.पू.वर्ण कीलाकार हो गए; भाषा — सुमेरियन; लेखन का प्रयोग हिसाब-किताब के अलावा — शब्द-कोश बनाने, भूमि के हस्तांतरण को कानूनी मान्यता देने, राजाओं के कार्यों का वर्णन करने, कानून में परिवर्तनों को उद्घोषित करने के लिए
2400 ई.पू. के बादसुमेरियन भाषा का स्थान धीरे-धीरे अक्कदी भाषा ने लिया
ईसवी सन् की पहली शताब्दी तकअक्कदी भाषा में कीलाकार लेखन का रिवाज चलता रहा — यानी 2000 से अधिक वर्षों तक

6. लेखन प्रणाली (पृ. 14–15)

  • कीलाक्षर/कीलाकार चिह्न जिस ध्वनि के लिए प्रयुक्त होता था, वह एकाकी व्यंजन या स्वर नहीं (जैसे अंग्रेज़ी वर्णमाला में m या a), बल्कि अक्षर (Syllables) होते थे (जैसे -put-, -la-, -in-)।
  • इस कारण मेसोपोटामिया के लिपिक को सैकड़ों चिह्न सीखने पड़ते थे; उसे गीली पट्टी पर उसके सूखने से पहले ही लिखना होता था।
  • लेखन = बड़ी कुशलता का काम; इसलिए लिखने का काम अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता था।
  • बौद्धिक उपलब्धि: किसी भाषा-विशेष की ध्वनियों को दृश्य रूप में प्रस्तुत करना एक महान बौद्धिक उपलब्धि थी।

7. साक्षरता (पृ. 15)

  • मेसोपोटामिया में बहुत कम लोग पढ़-लिख सकते थे। कारण —
    1. चिह्नों/प्रतीकों की संख्या सैकड़ों में थी;
    2. ये चिह्न कहीं अधिक पेचीदा थे। (संकेत: पृष्ठ 33 पर दिया गया चित्र देखें।)
  • यदि राजा स्वयं पढ़ सकता था, तो वह चाहता था कि उसके प्रशस्तिपूर्ण अभिलेखों में इस तथ्य का उल्लेख अवश्य किया जाए — साक्षरता की दुर्लभता का प्रमाण।
  • लिखावट बोलने के तरीके को दर्शाती थी: अधिकांश लेखन मौखिक शैली में; अधिकारी द्वारा राजा को लिखा गया पत्र पढ़कर सुनाया जाता था, इसलिए उसकी शुरुआत इस तरह होती थी — “मेरे ‘अमुक’ मालिक को… उनका ‘अमुक’ सेवक निवेदन करता है… मुझे सौंपे गए काम को मैंने पूरा कर दिया है…!”
  • सृष्टि के बारे में लिखे गए एक लंबे पौराणिक काव्य के अंत में लिखा है — “इन काव्य पंक्तियों को सदा याद रखा जाए और बड़े-बूढ़े लोग इन्हें छोटों को पढ़ाएँ; बुद्धिमान और विद्वान लोग इन पर चर्चा करें; पिता इन्हें अपने पुत्रों के लिए बार-बार दोहराएँ; (यहाँ तक कि) ग्वालों के कान भी इन पंक्तियों को सुनने के लिए सदा खुले रहें।” — अर्थात् साहित्य का प्रसार मौखिक पाठ और श्रवण से होता था।

8. लेखन का प्रयोग — एनमर्कर का महाकाव्य (पृ. 15–16)

  • शहरी जीवन, व्यापार और लेखन कला के संबंधों को उरुक के एक प्राचीन शासक एनमर्कर (Enmerkar) के बारे में लिखे गए सुमेरियन महाकाव्य में स्पष्ट किया गया है।
  • मेसोपोटामिया की परंपरागत कथाओं के अनुसार उरुक एक अत्यंत सुंदर शहर था जिसे अक्सर केवल ‘शहर’ कहकर ही पुकारा जाता था।
  • सुमेर के व्यापार की पहली घटना एनमर्कर के साथ जोड़ी जाती है — उन दिनों ‘व्यापार क्या होता है, यह कोई नहीं जानता था।’
  • कथा-सार:
    • एनमर्कर अपने शहर के एक सुंदर मंदिर को सजाने के लिए लाजवर्द (Lapis lazuli) और अन्य बहुमूल्य रत्न तथा धातुएँ मँगाना चाहता था।
    • उसने अपना एक दूत सुदूर देश अरट्टा (Aratta) के शासक के पास भेजा।
    • दूत ने राजा के आदेश का पालन किया — रात में चाँद-तारों की रोशनी और उनसे सूचित दिशा के अनुसार, दिन में सूरज के साथ आगे बढ़ा; रास्ते में आने वाले ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों को लाँघने के लिए ऊपर चढ़ता और उतरता रहा — “उसने पाँच पर्वतमालाएँ, छः पर्वतमालाएँ और फिर सात पर्वतमालाएँ पार कीं”; जब वह पहाड़ की तलहटी में पहुँचा तो वहाँ रहने वाले ‘सूसा’ (Susa) नगर के लोगों ने उसे छोटे चूहों की तरह नमस्कार किया। (पाद-टिप्पणी: कवि का तात्पर्य — ऊँचे पहाड़ से नीचे घाटी की सभी चीज़ें बहुत छोटी लगती हैं।)
    • दूत अरट्टा के मुखिया से लाजवर्द या चाँदी नहीं ला पाया; उसे बार-बार लंबी यात्राओं के बाद खाली हाथ लौटना पड़ा; वह अरट्टा के मुखिया से चाँदी प्राप्त करने के लिए राजा की ओर से तरह-तरह की धमकियाँ और आश्वासन देता रहा।
    • अंत में दूत इतना थक गया/चकरा गया कि वह अपनी बात को सही तरह से व्यक्त ही नहीं कर पाया और राजा के संदेशों का घालमेल कर दिया।
    • तब राजा एनमर्कर ने अपने हाथ से चिकनी मिट्टी की पट्टिका बनाई और उस पर शब्द लिख दिए — “उन दिनों, मिट्टी पर शब्द लिखने का रिवाज नहीं था।”
    • जब लिखी हुई पट्टिका दूत ने अरट्टा के शासक के हाथों में दी, “तो उसने उसकी जाँच की। उच्चरित शब्द कील यानी कीलाकार शब्द थे। उसे देखते ही उसकी त्योरियाँ चढ़ गईं। उसने पट्टिका पर नज़र गड़ाए रखी।”
  • कथा से निष्कर्ष (NCERT):
    • इस घटना को शाब्दिक रूप से सत्य नहीं माना जाना चाहिए; लेकिन इससे निष्कर्ष निकलता है कि मेसोपोटामिया की विचारधारा के अनुसार सर्वप्रथम राजा ने ही व्यापार और लेखन की व्यवस्था की थी।
    • काव्य यह भी बताता है कि लेखन कार्य सूचना इकट्ठी करने और दूर-दूर भेजने का साधन था।
    • साथ ही इससे मेसोपोटामिया की शहरी संस्कृति की उत्कृष्टता की झलक मिलती है — लेखन शहरी श्रेष्ठता का प्रतीक भी था।

9. दक्षिणी मेसोपोटामिया का शहरीकरण — मंदिर और राजा (पृ. 16–18)

  • 5000 ई.पू. से दक्षिणी मेसोपोटामिया में बस्तियों का विकास शुरू; इनमें से कुछ ने प्राचीन शहरों का रूप ले लिया।
  • शहर कई तरह के थे —
    1. जो मंदिरों के चारों ओर विकसित हुए;
    2. जो व्यापार के केंद्रों के रूप में विकसित हुए;
    3. शाही शहर (Imperial/royal towns)।
    • (पुस्तक में पहली दो श्रेणियों के शहरों पर चर्चा है।)

9.1 मंदिरों का विकास और भूमिका

  • बाहर से आकर बसने वाले लोगों ने (उनके मूल स्थान का पता नहीं) अपने गाँवों में कुछ चुने हुए स्थानों पर मंदिरों को बनाना या उनका पुनर्निर्माण करना शुरू किया।
  • सबसे पहला ज्ञात मंदिर: एक छोटा-सा देवालय जो कच्ची ईंटों का बना हुआ था।
  • मंदिर विभिन्न प्रकार के देवी-देवताओं के निवास स्थान थे — जैसे उर (Ur) के चंद्र देवता; इन्नाना (Inanna) — प्रेम व युद्ध की देवी।
  • मंदिर ईंटों से बनाए जाते थे और समय के साथ बड़े होते गए; उनके खुले आँगनों के चारों ओर कई कमरे बने होते थे।
  • कुछ प्रारंभिक मंदिर साधारण घरों जैसे ही होते थे — क्योंकि मंदिर भी किसी देवता का घर ही होता था; पर अंतर यह था: मंदिरों की बाहरी दीवारें कुछ खास अंतरालों के बाद भीतर और बाहर की ओर मुड़ी हुई होती थीं — यही मंदिरों की विशेषता थी; साधारण घरों की दीवारें ऐसी नहीं हो सकती थीं। (पृ. 16 का नक्शा: दक्षिणी मेसोपोटामिया का सबसे प्राचीन ज्ञात मंदिर — लगभग 5000 ई.पू.; वेदिका, भट्ठी, प्रवेश द्वार दिखाए गए हैं। पृ. 17 का चित्र: लगभग 3000 ई.पू. में निर्मित मंदिर — खुला आँगन और बाहरी-भीतरी मुख भाग, उत्खनित रूप में।)
  • देवता — पूजा और अर्थव्यवस्था का केंद्र-बिंदु:
    • लोग देवी-देवता के लिए अन्न, दही, मछली लाते थे (पुराने ज़माने के कुछ मंदिरों के फ़र्शों पर मछली की हड्डियों की परतें जमी हुई मिली हैं)।
    • आराध्य देव सैद्धांतिक रूप से खेतों, मत्स्य क्षेत्रों तथा स्थानीय लोगों के पशुधन का स्वामी माना जाता था।
    • समय आने पर उपज को उत्पादित वस्तुओं में बदलने की प्रक्रिया — जैसे तेल निकालना, अनाज पीसना, कातना और ऊनी कपड़ों को बुनना आदि — मंदिर में ही की जाती थी।
    • मंदिर की भूमिकाएँ: घर-परिवार से ऊपर के स्तर के व्यवस्थापक, व्यापारियों के नियोक्ता (Employer), तथा अन्न, हल जोतने वाले पशुओं, रोटी, जौ की शराब (बियर), मछली आदि के आवंटन और वितरण के लिखित अभिलेखों के पालक।
    • → इस रूप में मंदिर ने धीरे-धीरे अपने क्रियाकलाप बढ़ा लिए और मुख्य शहरी संस्था (Main urban institution) का रूप ले लिया।
  • लेकिन अन्य कारक भी विद्यमान थे (नीचे)।

9.2 प्राकृतिक संकट, युद्ध और मुखिया से राजा तक

  • कृषि के संकट: ज़मीन में प्राकृतिक उपजाऊपन होने के बावजूद खेती कई बार संकटों से घिर जाती थी —
    • फ़रात की प्राकृतिक धाराओं में किसी वर्ष बहुत ज़्यादा पानी आ जाता → फ़सलें डूब जातीं;
    • कभी-कभी धाराएँ अपना रास्ता बदल लेतीं → खेत सूखे रह जाते।
    • पुरातत्त्वीय अभिलेखों से पता चलता है कि मेसोपोटामिया के इतिहास में गाँव समय-समय पर पुनः स्थापित किए जाते रहे हैं।
  • मानव-निर्मित समस्याएँ:
    • धाराओं के ऊपरी इलाकों (Upstream) में रहने वाले लोग अपने पास की जलधारा से इतना ज़्यादा पानी अपने खेतों में ले लेते थे कि धारा के नीचे (Downstream) की ओर बसे गाँवों को पानी ही नहीं मिलता था;
    • वे अपने हिस्से की सरणी में से गाद (मिट्टी) नहीं निकालते थे, जिससे बहाव रुक जाता था और नीचे वालों को पानी नहीं मिलता था।
    • → इसलिए ज़मीन और पानी के लिए बार-बार झगड़े होते थे।
  • युद्ध और नेतृत्व का उदय:
    • जब किसी क्षेत्र में लंबे समय तक लड़ाई चलती थी, तो जो मुखिया लड़ाई जीतते थे, वे —
      • अपने साथियों एवं अनुयायियों को लूट का माल बाँटकर खुश कर देते थे;
      • हारे हुए समूहों के लोगों को बंदी बनाकर अपने साथ ले जाते थे, जिन्हें वे अपने चौकीदार या नौकर बना लेते थे।
    • इस प्रकार वे अपना प्रभाव और अनुयायियों की संख्या बढ़ा लेते थे।
    • प्रारंभ में: विजयी होने वाले ये नेता स्थायी रूप से समुदाय के मुखिया नहीं बने रहते थे — “आज हैं तो कल चले जाते थे।”
    • बाद में: एक ऐसा समय आया जब इन नेताओं ने समुदाय के कल्याण पर अधिक ध्यान देना शुरू किया → नयी-नयी संस्थाएँ और परिपाटियाँ स्थापित हुईं।
  • विजेता मुखिया की नई भूमिकाएँ (राजत्व की ओर):
    • देवताओं को कीमती भेंटें अर्पित करना → समुदाय के मंदिरों की सुंदरता बढ़ी;
    • उत्कृष्ट पत्थरों और धातुओं को लाने के लिए लोगों को बाहर भेजना — देवता और समुदाय को लाभ पहुँचाने के लिए;
    • मंदिर की धन-संपदा के वितरण का और मंदिरों में आने-जाने वाली वस्तुओं का हिसाब-किताब रखवाकर प्रभावी तरीके से संचालन करना।
    • जैसा कि एनमर्कर से जुड़ी कविताएँ व्यक्त करती हैं — इस व्यवस्था ने राजा को ऊँचा स्थान दिलाया तथा समुदाय पर उसका पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया।
  • नगरों में बसाव और सुरक्षा:
    • पारस्परिक हितों को सुदृढ़ करने के एक दौर में मुखिया लोगों ने ग्रामीणों को अपने पास बसने के लिए प्रोत्साहित किया — ताकि आवश्यकता पड़ने पर तुरंत अपनी सेना इकट्ठी कर सकें;
    • लोग भी एक-दूसरे के आस-पास रहने से स्वयं को अधिक सुरक्षित महसूस करते थे।
    • उरुक — उन दिनों के सबसे पुराने मंदिर-नगरों में से एक — से सशस्त्र वीरों और उनसे हताहत हुए शत्रुओं के चित्र मिलते हैं।
    • सावधानीपूर्वक किए गए पुरातत्त्वीय सर्वेक्षणों से पता चला: 3000 ई.पू. के आसपास जब उरुक नगर का 250 हैक्टेयर भूमि में विस्तार हुआ, तो उसके कारण दर्जनों छोटे-छोटे गाँव उजड़ गए — बड़ी संख्या में आबादी का विस्थापन हुआ।
    • उरुक का यह विस्तार शताब्दियों बाद फले-फूले मोहनजोदड़ो नगर से दो गुना था।
    • उरुक नगर की रक्षा के लिए उसके चारों ओर काफी पहले ही एक सुदृढ़ प्राचीर बना दी गई थी; उरुक नगर 4200 ई.पू. से 400 ईसवी तक बराबर अपने अस्तित्व में बना रहा; 2800 ई.पू. के आसपास वह बढ़कर 400 हैक्टेयर में फैल गया।
  • अनिवार्य श्रम (Compulsory labour):
    • युद्धबंदियों और स्थानीय लोगों को अनिवार्य रूप से मंदिर का अथवा प्रत्यक्ष रूप से शासक का काम करना पड़ता था; कृषिकर (Tax) भले ही न देना पड़े, पर काम करना अनिवार्य था।
    • काम के बदले उन्हें अनाज दिया जाता था; सैकड़ों राशन-सूचियाँ मिली हैं जिनमें काम करने वालों के नामों के आगे उन्हें दिए जाने वाले अनाज, कपड़ों और तेल आदि की मात्रा लिखी गई है।
    • एक अनुमान: इन मंदिरों में से एक मंदिर को बनाने के लिए 1500 आदमियों ने पाँच साल तक प्रतिदिन 10 घंटे काम किया था।
    • शासक के हुक्म से आम लोग पत्थर खोदने, धातु-खनिज लाने, मिट्टी से ईंटें तैयार करने और मंदिर में लगाने, और सुदूर देशों से मंदिर के लिए उपयुक्त सामान लाने के कामों में जुटे रहते थे।

9.3 उरुक की तकनीकी प्रगति (लगभग 3000 ई.पू.)

  • इसी (संगठित श्रम की) वजह से 3000 ई.पू. के आसपास उरुक में खूब तकनीकी प्रगति हुई —
    • अनेक प्रकार के शिल्पों के लिए काँसे के औज़ारों का प्रयोग;
    • वास्तुविदों ने ईंटों के स्तंभ बनाना सीख लिया — क्योंकि बड़े-बड़े कमरों की छतों के बोझ को सँभालने के लिए शहतीर बनाने हेतु उपयुक्त लकड़ी नहीं मिलती थी;
    • सैकड़ों लोगों को चिकनी मिट्टी के शंकु (Cones) बनाने और पकाने के काम में लगाया जाता था — इन शंकुओं को भिन्न-भिन्न रंगों में रँगकर मंदिरों की दीवारों में लगाया जाता था, जिससे वे दीवारें विभिन्न रंगों से सुशोभित हो जाती थीं (मोज़ेक सज्जा);
    • मूर्तिकला के क्षेत्र में उच्चकोटि की सफलता — सुंदर नमूने अधिकतर आयातित पत्थरों से तैयार किए जाते थे, आसानी से उपलब्ध चिकनी मिट्टी की अपेक्षा;
    • युगांतरकारी प्रौद्योगिक परिवर्तन — कुम्हार के चाक (Potter’s wheel) का निर्माण: आगे चलकर इस चाक से कुम्हार की कार्यशाला में एक साथ बड़े पैमाने पर दर्जनों एक जैसे बर्तन आसानी से बनाए जाने लगे — यह शहरी अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत उपयुक्त सिद्ध हुआ।

चित्र-बॉक्स (पृ. 18): स्टेल और मुद्रा-छाप

  • काले पत्थर के उत्कीर्णित शिलापट्ट (स्टेल/Stele) पर दाढ़ी वाले व्यक्ति का दोहरा चित्र (लगभग 3200 ई.पू.) — बालों और सिर पर बंधी पट्टी, कमर-पट्टी और लंबे अंगरखे के निचले हिस्से (स्कर्ट); नीचे के दृश्य में वह एक शेर पर अपने बड़े धनुष-बाण से आक्रमण करते हुए; ऊपर के दृश्य में उस उग्र शेर को आखिर अपने भाले से मार गिराता है। (पाद-टिप्पणी: स्टेल — पत्थर के ऐसे शिलापट्ट जिन पर अभिलेख उत्कीर्ण किए जाते हैं।)
  • एक बेलनाकार मुद्रा की छाप, लगभग 3200 ई.पू. — इसमें अंकित: दाढ़ी वाले सशस्त्र खड़े व्यक्ति और ऊपर काले पत्थर पर अंकित वीर का उत्कीर्णित शिलापट्ट जैसा ही पोशाक और केश-शैली वाला वीर; चित्र में तीन युद्धबंदी दिखाए गए हैं जिनके हाथ बंधे हुए हैं और चौथा व्यक्ति विजयी योद्धा से हाथ फैलाकर दया की भीख माँग रहा है। → युद्ध व बंदी प्रारंभिक नगर-जीवन की वास्तविकता थे।

10. बॉक्स (पृ. 19): मोहर — एक शहरी शिल्प-कृति

  • भारत में प्राचीन काल में पत्थर की (ठप्पेदार) मोहरें होती थीं जिन पर चिह्न अंकित होते थे।
  • मेसोपोटामिया में पहली सहस्राब्दी ई.पू. के अंत तक पत्थर की बेलनाकार मोहरें (Cylindrical seals) — जो बीच में आर-पार छिदी होती थीं — एक तीली लगाकर गीली मिट्टी के ऊपर घुमाई जाती थीं, जिससे लगातार चित्र बनता जाता था।
  • ये अत्यंत कुशल कारीगरों द्वारा उकेरी जाती थीं; कभी-कभी उन पर लेख होते थे — मालिक का नाम, उसके इष्टदेव का नाम, उसकी अपनी पदीय स्थिति आदि।
  • उपयोग: कपड़े की गठरी या बर्तन के मुँह को चिकनी मिट्टी से लीप-पोतकर उस पर मोहर घुमाई जाती थी → मिट्टी की सतह पर अंकित लिखावट की छप → गठरी/बर्तन में रखी वस्तुएँ मोहरबंद/सुरक्षित।
  • जब मोहर मिट्टी की पट्टिका पर लिखे पत्र पर घुमाई जाती थी, तो वह उस पत्र की प्रामाणिकता की प्रतीक बन जाती थी।
  • → इस प्रकार मुद्रा सार्वजनिक जीवन में नगरवासी की भूमिका को दर्शाती थी।
  • (चित्र: पाँच पुरानी बेलनाकार मोहरें और उनके छापे; प्रश्न — क्या उन पर कीलाकार लिपि अंकित है?)

11. शहरी जीवन (पृ. 19–20)

11.1 सामाजिक स्तरीकरण

  • नगरों की सामाजिक व्यवस्था में एक उच्च या संभ्रांत वर्ग (Elite) का प्रादुर्भाव हो चुका था — धन-दौलत का ज़्यादातर हिस्सा समाज के एक छोटे से वर्ग में केंद्रित था।
  • प्रमाण — उर की शाही कब्रें/समाधियाँ: राजाओं और रानियों की कुछ कब्रों में उनके साथ बहुमूल्य चीज़ें विशाल मात्रा में दफ़नाई गई मिली हैं — आभूषण, सोने के पात्र, सफ़ेद सीपियाँ, लाजवर्द जड़े हुए लकड़ी के वाद्य यंत्र, सोने के सजावटी खंजर आदि। (प्रश्न — “लेकिन आम आदमी की स्थिति क्या थी?”)

11.2 परिवार और विवाह

  • कानूनी दस्तावेज़ों (विवाह, उत्तराधिकार आदि के मामलों से संबंधित) से ज्ञात —
    • मेसोपोटामिया के समाज में एकल परिवार (Nuclear family) को ही आदर्श माना जाता था; हालाँकि एक शादीशुदा बेटा और उसका परिवार अक्सर अपने माता-पिता के साथ ही रहा करते थे। (पाद-टिप्पणी: एकल परिवार में एक पुरुष, उसकी पत्नी और बच्चे शामिल होते हैं।)
    • पिता परिवार का मुखिया होता था।
  • विवाह की प्रक्रिया/विधि:
    1. विवाह करने की इच्छा के बारे में घोषणा की जाती थी;
    2. वधू के माता-पिता विवाह के लिए अपनी सहमति देते थे;
    3. उसके बाद वर पक्ष के लोग वधू को कुछ उपहार देते थे;
    4. विवाह की रस्म पूरी होने पर दोनों पक्षों की ओर से उपहारों का आदान-प्रदान किया जाता था; वे एकसाथ बैठकर भोजन करते थे और मंदिर में जाकर भेंट चढ़ाते थे;
    5. जब नववधू को उसकी सास लेने आती थी, तब वधू को उसके पिता द्वारा उसकी दाय (उत्तराधिकार) का हिस्सा दे दिया जाता था।
  • उत्तराधिकार: पिता का घर, पशुधन, खेत आदि उसके पुत्रों को मिलते थे।

11.3 उर नगर — नगर-नियोजन का अभाव

  • उर उन नगरों में से एक था जहाँ सबसे पहले खुदाई की गई थी; साधारण घरों की खुदाई 1930 के दशक में सुव्यवस्थित ढंग से की गई।
  • मिली विशेषताएँ —
    • टेढ़ी-मेढ़ी व संकरी गलियाँ → पहिए वाली गाड़ियाँ वहाँ के अनेक घरों तक नहीं पहुँच सकती थीं; अनाज के बोरे और ईंधन के गट्ठे गधों पर लादकर घर तक लाए जाते थे।
    • पतली व घुमावदार गलियाँ तथा घरों के भू-खंडों का अनियमित आकार → नगर-नियोजन (Town planning) की पद्धति का अभाव।
    • गलियों के किनारे जल-निकासी की नालियाँ नहीं थीं — जैसी उसके समकालीन नगर मोहनजोदड़ो में पाई गई हैं।
    • जल-निकासी की नालियाँ और मिट्टी की नलिकाएँ उर के घरों के भीतरी आँगनों में पाई गई हैं → समझा जाता है कि घरों की छतों का ढलान भीतर की ओर होता था और वर्षा का पानी निकास नालियों के माध्यम से भीतरी आँगनों में बने हौज़ों में ले जाया जाता था। (पाद-टिप्पणी: हौज़ — ज़मीन में ऐसा ढका हुआ गड्ढा जिसमें पानी और मल जाता है।) शायद ऐसा इसलिए किया गया था कि तेज़ वर्षा में घर के बाहर की कच्ची गलियाँ कीचड़ से न भर जाएँ।
    • लोग घर का कूड़ा-कचरा बुहारकर गलियों में डाल देते थे → गलियों की सतहें ऊँची उठ जाती थीं → कुछ समय बाद घरों की दहलीज़ों को भी ऊँचा उठाना पड़ता था ताकि वर्षा के बाद कीचड़ बहकर घरों के भीतर न आ सके।
    • प्रकाश: कमरों के अंदर रोशनी खिड़कियों से नहीं, बल्कि उन दरवाज़ों से आती थी जो आँगन में खुला करते थे → इससे घरों के परिवारों में गोपनीयता (Privacy) भी बनी रहती थी।
  • घरों से जुड़े शकुन-अपशकुन (अंधविश्वास) — उर में पाई गई पट्टिकाओं पर लिखे मिले:
    • घर की देहली ऊँची उठी हुई हो → धन-दौलत लाती है;
    • सामने का दरवाज़ा किसी दूसरे के घर की ओर न खुले → सौभाग्य प्रदान करता है;
    • घर का लकड़ी का मुख्य दरवाज़ा (भीतर की ओर न खुलकर) बाहर की ओर खुले → पत्नी अपने पति के लिए यंत्रणा (कष्ट) का कारण बनेगी।
  • कब्रिस्तान: उर में नगरवासियों के लिए एक कब्रिस्तान था जिसमें शासकों तथा जन-साधारण की समाधियाँ पाई गईं; लेकिन कुछ लोग साधारण घरों के फ़र्शों के नीचे भी दफ़नाए हुए पाए गए।
  • (हाशिया-चित्र: उर नगर का एक रिहायशी इलाका, लगभग 2000 ई.पू. — प्रश्न: टेढ़ी-मेढ़ी गलियों के अलावा, क्या आप दो या तीन बंद गलियाँ खोज सकते हैं?)

12. पशुचारक क्षेत्र में एक व्यापारिक नगर — मारी (पृ. 21–24)

12.1 मारी की स्थिति और अर्थव्यवस्था

  • 2000 ई.पू. के बाद मारी (Mari) नगर शाही राजधानी के रूप में खूब फला-फूला।
  • मारी दक्षिण के उस मैदानी भाग में स्थित नहीं है जहाँ खेती की पैदावार भरपूर होती थी, बल्कि वह फ़रात नदी की उर्ध्वधारा (Upstream) पर स्थित है।
  • मानचित्र 3 (पृ. 21): विभिन्न रंगों से दर्शाया गया है कि इस ऊपरी क्षेत्र में खेती और पशुपालन साथ-साथ चलते थे — कृषि भूमि, चरागाह भूमि (भेड़-बकरियाँ), पठार, मौसमी घास क्षेत्र, बाढ़-ग्रस्त क्षेत्र।
  • मारी राज्य में किसान और पशुचारक दोनों तरह के लोग थे, लेकिन प्रदेश का अधिकांश भाग भेड़-बकरी चराने के काम में ही लाया जाता था।
  • किसान-पशुचारक विनिमय: पशुचारकों को अनाज, धातु के औज़ार आदि की ज़रूरत → बदले में वे पनीर, चमड़ा, मांस आदि देते थे; बाड़े के पशुओं के गोबर से बनी खाद भी किसानों के लिए बहुत उपयोगी होती थी।
  • किसान-गड़रिया संघर्ष के रूप:
    • गड़रिये अपनी भेड़-बकरियों को पानी पिलाने के लिए खेतों से गुज़ार ले जाते थे → किसान की फसल को नुकसान;
    • गड़रिये खानाबदोश होते थे और कई बार किसानों के गाँवों पर हमला बोलकर उनका इकट्ठा माल लूट लेते थे;
    • दूसरी तरफ, बस्तियों में रहने वाले लोग भी पशुचारकों का रास्ता रोक देते थे और उन्हें अपने पशुओं को नदी-नहर तक नहीं जाने देते थे।

12.2 खानाबदोशों का आगमन और राजवंश

  • मेसोपोटामिया के इतिहास में पश्चिमी मरुस्थल से यायावर (Nomadic) समुदायों के झुंड के झुंड कृषि से समृद्ध मुख्य भूमि प्रदेश में आते रहते थे —
    • गड़रिये गर्मियों में अपने साथ इस उपजाऊ क्षेत्र के बोए हुए खेतों में अपनी भेड़-बकरियाँ ले आते थे;
    • ये समूह फसल काटने वाले मज़दूरों अथवा भाड़े के सैनिकों के रूप में आते थे और समृद्ध होकर यहीं बस जाते थे;
    • उनमें से कुछ ने तो अपना खुद का शासन स्थापित करने की शक्ति भी प्राप्त कर ली थी।
  • ऐसे खानाबदोश लोग: अक्कदी (Akkadians), एमोराइट (Amorites), असीरियाई (Assyrians) और आर्मीनियन (Aramaeans) जाति के थे। (आगे विषय 5 में इन पशुचारक समाजों के शासकों के बारे में कुछ अधिक जानकारी दी गई है।)
  • मारी के राजा एमोराइट समुदाय के थे —
    • उनकी पोशाक वहाँ के मूल निवासियों से भिन्न होती थी;
    • उन्होंने मेसोपोटामिया के देवी-देवताओं का आदर ही नहीं किया, बल्कि स्टेपी क्षेत्र के देवता डैगन (Dagan) के लिए मारी नगर में एक मंदिर भी बनवाया।
  • महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष (NCERT): इस प्रकार मेसोपोटामिया का समाज और वहाँ की संस्कृति भिन्न-भिन्न प्रकार के लोगों और संस्कृतियों के लिए खुली थी; और संभवतः विभिन्न जातियों तथा समुदायों के लोगों के परस्पर मिश्रण से ही वहाँ की सभ्यता में जीवन-शक्ति उत्पन्न हुई।
  • (चित्र, पृ. 21: एक योद्धा — हाथों में लंबा भाला और खपच्ची की ढाल; एमोराइट लोगों की खास किस्म की पोशाक जो सुमेरियन योद्धा की पोशाक से भिन्न (पृ. 38 से तुलना); यह चित्र एक सीपी पर उकेरा गया था, लगभग 2600 ई.पू.।)

12.3 ज़िमरीलिम का राजमहल (1810–1760 ई.पू.) (पृ. 22–23)

  • मारी का विशाल राजमहल —
    • शाही परिवार का निवास स्थान;
    • प्रशासन और उत्पादन का केंद्र — विशेष रूप से कीमती धातुओं के आभूषणों के निर्माण का मुख्य केंद्र।
  • प्रसिद्धि: अपने समय में इतना प्रसिद्ध था कि उसे देखने के लिए ही उत्तरी सीरिया का एक छोटा राजा आया था; वह अपने साथ मारी के राजा ज़िमरीलिम (Zimrilim) के नाम उसके एक अन्य राजा का परिचय पत्र लेकर आया था।
  • राजा का भोजन: दैनिक सूचियों से पता चलता है — राजा की भोजन की मेज़ पर हर रोज़ भारी मात्रा में खाद्य पदार्थ पेश किए जाते थे: आटा, रोटी, मांस, मछली, फल, मदिरा और बीयर; वह संभवतः अपने साथियों के साथ सफ़ेद पत्थर जड़े आँगन (106) में बैठकर बाकायदा भोजन करता था।
  • वास्तु-विन्यास:
    • राजमहल का सिर्फ़ एक ही प्रवेश द्वार था जो उत्तर की ओर बना हुआ था;
    • उसके विशाल, खुले प्राँगण — जैसे 131 — सुंदर पत्थरों से जड़े हुए थे;
    • राजा विदेशी अतिथियों और अपने प्रमुख लोगों से कमरा-132 में मिलता था, जहाँ के भित्ति-चित्रों (Wall paintings) को देखकर आगंतुक लोग हतप्रभ रह जाते थे;
    • राजमहल 2.4 हैक्टेयर क्षेत्र में स्थित एक अत्यंत विशाल भवन था जिसमें 260 कक्ष बने हुए थे।
    • (नक्शा, पृ. 22: सिंहासन कक्ष, सभागृह (132), बाहरी आँगन (131), भीतरी आँगन (106), प्रवेश द्वार, कुआँ; चित्र: प्राँगण 131; लिपिक कार्यालय — बेंचों और मिट्टीदानों के साथ, मिट्टीदानों में पट्टिकाएँ रखी जाती थीं; पृ. 23: कार्यशाला और रसोई, शाही निवास, शौचालय और स्नान-गृह, कमरा 132 की दीवार पर की गई चित्रकारी।)
  • क्रियाकलाप 3: चित्र में प्रवेश द्वार से भीतरी आँगन तक के मार्ग का पता लगाइए; भंडारगृह में क्या रखा जाता होगा? रसोईघर की पहचान कैसे की जा सकती है?

12.4 सतर्क राजा और व्यापार (पृ. 24)

  • सतर्कता: मारी के राजाओं को सदा सतर्क एवं सावधान रहना पड़ता था — विभिन्न जन-जातियों के चरवाहों को राज्य में चलने-फिरने की इजाज़त तो थी, परन्तु उन पर कड़ी नज़र रखी जाती थी।
    • राजाओं तथा पदाधिकारियों के पत्र-व्यवहार में पशुचारकों की गतिविधियों और शिविरों का उल्लेख;
    • एक पदाधिकारी ने राजा को लिखा — उसने रात को बार-बार आग से किए गए ऐसे संकेतों को देखा है जो एक शिविर से दूसरे शिविर को भेजे गए थे; उसे संदेह है कि कहीं किसी छापे या हमले की योजना तो नहीं बनाई जा रही।
  • व्यापारिक स्थिति: मारी नगर एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण व्यापारिक स्थल पर स्थित था — यहाँ से होकर लकड़ी, ताँबा, राँगा (टिन), तेल, मदिरा और कई किस्मों का माल नावों के जरिए फ़रात नदी के रास्ते दक्षिण और तुर्की, सीरिया और लेबनान के ऊँचे इलाकों के बीच लाया-ले जाया जाता था।
  • व्यापार-नियंत्रण और कर:
    • दक्षिणी नगरों को घिसाई-पिसाई के पत्थर, चक्कियाँ, लकड़ी और शराब तथा तेल के पीपे ले जाने वाले जलपोत (बजरे) मारी में रुका करते थे;
    • मारी के अधिकारी जलपोत पर जाया करते थे, उस पर लदे हुए सामान की जाँच करते थे (नदी में चलने वाली एक नाव में 300 मदिरा के पीपे रखे जा सकते थे);
    • उसे आगे बढ़ने की इजाज़त देने से पहले उसमें लदे माल की कीमत का लगभग 10 प्रतिशत प्रभार (शुल्क) वसूल करते थे। जौ(?) विशेष किस्म की नौकाओं में आता था।
  • धातु-व्यापार: सबसे महत्त्वपूर्ण — कुछ पट्टिकाओं में साइप्रस के द्वीप ‘अलाशिया’ (Alashiya) से आने वाले ताँबे का उल्लेख — यह द्वीप उन दिनों ताँबे तथा टिन के व्यापार के लिए मशहूर था; मारी में राँगे (टिन) का भी व्यापार होता था।
  • महत्त्व: क्योंकि काँसा औज़ार और हथियार बनाने के लिए मुख्य औद्योगिक सामग्री थी, इसलिए इसके व्यापार का बहुत महत्त्व था।
  • निष्कर्ष: यद्यपि मारी राज्य सैनिक दृष्टि से उतना सबल नहीं था, परंतु व्यापार और समृद्धि के मामले में वह अद्वितीय था।

13. बॉक्स (पृ. 24): मेसोपोटामिया के नगरों की खुदाई — आधुनिक तकनीक

  • आज मेसोपोटामिया के पुरास्थलों के उत्खनक (Excavators) पहले के उत्खनकों की तुलना में बहुत अधिक कुशल हैं; उनके कार्य की यथार्थता एवं परिशुद्धता और अभिलेखन (Recording) का स्तर बहुत ऊँचा है।
  • इसलिए अब उस तरह बड़े-बड़े इलाकों की खुदाई नहीं की जाती जैसी उर नगर में की गई थी; इसके अलावा, बहुत कम पुरातत्त्वविदों के पास इतनी बड़ी धनराशि होती है कि वे एक साथ खननकर्ताओं के बड़े दल को खुदाई के काम पर लगा सकें।
  • उदाहरण — अबू सलाबिख (Abu Salabikh):
    • एक छोटा कस्बा — लगभग 2500 ई.पू. में 10 हैक्टेयर ज़मीन पर बसा हुआ; आबादी 10,000 से कम;
    • इसकी दीवारों की रूपरेखा की ऊपरी सतहों को सर्वप्रथम खरोंचकर निकाला गया — टीले की ऊपरी सतह को बेलचे, फावड़े या अन्य औज़ारों के धारदार चौड़े सिरे से कुछ मिलीमीटर तक खरोंचा जाता है;
    • नीचे की मिट्टी में कहीं-कहीं नमी पाई गई; पुरातत्त्वविदों ने भिन्न-भिन्न रंगों में उसकी बनावट तथा ईंटों की दीवारों की स्थिति, गड्ढों और अन्य विशेषताओं का पता लगा लिया;
    • जिन थोड़े-से घरों की खोज की गई उन्हें खोदकर निकाला गया;
    • वनस्पति व पशु-अवशेष: पौधों और पशुओं के अवशेषों को प्राप्त करने के लिए टनों मिट्टी की छानबीन की; इसके चलते पौधों और पशुओं की अनेक प्रजातियों का पता लगाया; बड़ी मात्रा में जली हुई मछलियों की हड्डियाँ मिलीं जो बुहार कर बाहर गलियों में डाल दी गई थीं;
    • वहाँ गोबर के उपलों के जले अवशेषों में से निकले हुए ईंधन में से पौधों के बीज और रेशे मिले — इससे इस स्थान पर रसोईघर होने का पता चला;
    • घरों में रहने के कमरे कौन-से थे, यह जानने के संकेत बहुत कम मिले हैं;
    • वहाँ की गलियों में सूअरों के छोटे बच्चों के दाँत पाए गए → निष्कर्ष: किसी भी अन्य मेसोपोटामियाई नगर की तरह यहाँ भी सूअर छुट्टे घूमा करते थे; एक घर में तो आँगन के नीचे — जहाँ किसी मृतक को दफ़नाया गया था — सूअर की कुछ हड्डियों के अवशेष मिले: प्रतीत होता है कि व्यक्ति के मरणोपरांत जीवन में खाने के लिए सूअर का कुछ मांस रखा गया था;
    • पुरातत्त्वविदों ने कमरों के फ़र्श का बारीकी से अध्ययन (Micromorphology) यह जानने के लिए किया कि घर के कौन-से कमरों पर पोपलार (एक लंबा पतला पेड़) के लट्ठों, खजूर की पत्तियों और घासफूस की छतें थीं और कौन-से कमरे बिना किसी छत के खुले आकाश के नीचे थे।

14. मेसोपोटामिया संस्कृति में शहरों का महत्त्व — गिल्गेमिश महाकाव्य (पृ. 25)

  • मेसोपोटामिया वासी शहरी जीवन को महत्त्व देते थे जहाँ अनेक समुदायों और संस्कृतियों के लोग साथ-साथ रहा करते थे; युद्ध में शहरों के नष्ट हो जाने के बाद वे उन्हें अपने काव्यों के जरिए याद किया करते थे।
  • सबसे अधिक मर्मस्पर्शी वर्णन — गिल्गेमिश (Gilgamesh) महाकाव्य के अंत में; यह काव्य 12 पट्टिकाओं पर लिखा गया था।
  • गिल्गेमिश की कथा:
    • ऐसा कहा जाता है कि गिल्गेमिश ने एनमर्कर के कुछ समय बाद उरुक नगर पर शासन किया था;
    • वह एक महान योद्धा था जिसने दूर-दूर तक के प्रदेशों को अपने अधीन कर लिया था;
    • उसे गहरा झटका तब लगा जब उसका वीर मित्र अचानक मर गया;
    • इससे दुःखी होकर वह अमरत्व की खोज में निकल पड़ा; उसने सागरों-महासागरों को पार किया और दुनियाभर का चक्कर लगाया; मगर उसे अपने साहसिक कार्य में सफलता नहीं मिली;
    • हारकर गिल्गेमिश अपने नगर उरुक लौट आया; वहाँ जब वह अपने आपको सांत्वना देने के लिए शहर की चहारदीवारी के पास आगे-पीछे चहलकदमी कर रहा था, तभी उसकी नज़र नींव में पड़ी उन पकी ईंटों पर गई जिनसे उसकी नींव डाली गई थी — वह भावविभोर हो उठा।
    • इस प्रकार उरुक नगर की विशाल प्राचीर पर आकर उस महाकाव्य की लंबी वीरतापूर्ण और साहस भरी कथा का अंत हो जाता है।
  • व्याख्या (NCERT): यहाँ गिल्गेमिश एक जनजातीय योद्धा की तरह यह नहीं कहता कि उसका अंत निश्चित है पर उसके पुत्र तो जीवित रहेंगे — बल्कि उसे अपने नगर में ही सांत्वना मिलती है जिसे उसकी प्यारी प्रजा ने बनाया था। → नगर ही उसकी अमरता है; यह मेसोपोटामियाई नगर-गौरव की पराकाष्ठा है।

15. लेखन कला की देन — कालगणना और गणित (पृ. 25–26)

  • मर्मस्पर्शी कहानियाँ-किस्से तो मौखिक रूप से भी जीवित रखे जा सकते हैं, पर विज्ञान को जीवित रखने के लिए लिखित दस्तावेज़ों और किताबों की ज़रूरत पड़ती है — ताकि विद्वानों की आगे आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें पढ़ सकें।
  • संभवतः मेसोपोटामिया की दुनिया को सबसे बड़ी देन है — उसकी कालगणना (Calendar/chronology) और गणित की विद्वत्तापूर्ण परंपरा।
  • गणितीय पट्टिकाएँ (लगभग 1800 ई.पू.):
    • गुणा और भाग की तालिकाएँ; वर्ग तथा वर्गमूल; चक्रवृद्धि ब्याज (Compound interest) की सारणियाँ;
    • 2 का वर्गमूल दिया गया: 1 + 24/60 + 51/60² + 10/60³ = 1.41421296 — सही उत्तर 1.41421356 से थोड़ा-सा ही भिन्न;
    • विद्यार्थियों के अभ्यास-प्रश्न: यदि एक खेत का क्षेत्रफल इतना-इतना है और वह एक अंगुल गहरे पानी में डूबा हुआ है, तो संपूर्ण पानी का आयतन बताओ।
  • समय-विभाजन की देन:
    • पृथ्वी के चारों ओर चंद्रमा की परिक्रमा के अनुसार एक पूरे वर्ष का 12 महीनों में विभाजन;
    • एक महीने का 4 हफ़्तों में;
    • एक दिन का 24 घंटों में;
    • एक घंटे का 60 मिनटों में विभाजन;
    • — यह सब आज हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का अचेतन हिस्सा है और मेसोपोटामियावासियों से ही हमें मिला है।
    • प्रसार-मार्ग: समय का यह विभाजन सिकंदर के उत्तराधिकारियों ने अपनाया → वहाँ से रोम → फिर इस्लाम की दुनिया → फिर मध्ययुगीन यूरोप में पहुँचा। (यह कैसे हुआ — विषय 5 में।)
  • खगोल-प्रेक्षण:
    • जब कभी सूर्य और चंद्र ग्रहण होते थे, तो उनका घटित होना वर्ष, मास और दिन के अनुसार हिसाब रखा जाता था;
    • रात को आकाश में तारों और तारामंडलों की स्थिति पर बराबर नज़र रखते हुए उनका भी हिसाब रखा जाता था।
  • शर्त — लेखन और विद्यालय: ये सारी उपलब्धियाँ संभव नहीं होतीं यदि लेखन कला और विद्यालयों का अभाव होता — जहाँ विद्यार्थी पुरानी लिखित पट्टिकाओं को पढ़ते और उनकी नकल करते थे; और जहाँ कुछ छात्रों को साधारण प्रशासन का हिसाब-किताब रखने वाले लेखाकार न बनाकर ऐसा प्रतिभासंपन्न व्यक्ति बनाया जाता था जो अपने पूर्वजों की बौद्धिक उपलब्धियों को आगे बढ़ा सकें।
  • “यह सोचना गलत होगा कि मेसोपोटामिया के शहरी लोग आधुनिक तौर-तरीकों से परिचित नहीं थे।” — अंत में अतीत के प्रलेखों/परंपराओं को खोजने और सुरक्षित रखने के दो प्रारंभिक प्रयत्नों का अवलोकन (नीचे खंड 16–17)।

16. बॉक्स (पृ. 26): एक पुराकालीन पुस्तकालय — असुरबनिपाल का पुस्तकालय

  • लौहयुग में, उत्तरी प्रदेशों के असीरियाई लोगों ने एक साम्राज्य की स्थापना की जो 720 से 610 ई.पू. तक अपनी उन्नति के शिखर पर रहा; यह साम्राज्य मिस्र तक फैला हुआ था।
  • राज्य की अर्थव्यवस्था उन दिनों लूटमार की हो गई थी — अधीनस्थ प्रजाजनों को दबाकर उनसे खाद्य-सामग्री, पशु, धातु तथा शिल्प की वस्तुओं के रूप में बेगार और नज़राना जबरदस्ती लिया जाता था।
  • बड़े-बड़े असीरियाई शासक — जो बाहर से आकर बसे थे — दक्षिणी क्षेत्र बेबीलोनिया को उच्च संस्कृति का केंद्र मानते थे।
  • असीरिया का आखिरी राजा असुरबनिपाल (Assurbanipal, 668–627 ई.पू.) ने उत्तर में स्थित अपनी राजधानी निनवैह (Nineveh) में एक पुस्तकालय की स्थापना की —
    • उसने इतिहास, महाकाव्य, शकुन साहित्य (Omen literature), ज्योतिष विद्या, स्तुतियों और कविताओं की पट्टिकाओं को इकट्ठा करने का बहुत प्रयत्न किया और उसमें सफल रहा;
    • उसने अपने लिपिकों को दक्षिण में पुरानी पट्टिकाओं का पता लगाने के लिए भेजा;
    • क्योंकि दक्षिण में लिपिकों को विद्यालयों में पढ़ना-लिखना सिखाया जाता था, जहाँ उन्हें दर्जनों की संख्या में पट्टिकाओं की नकलें तैयार करनी होती थीं — बेबीलोनिया में ऐसे भी नगर थे जो पट्टिकाओं के विशाल संग्रह तैयार किए जाने और प्राप्त करने के लिए मशहूर थे;
    • हालाँकि लगभग 1800 ई.पू. के बाद सुमेरियन भाषा बोली जानी बंद हो गई थी, लेकिन विद्यालयों में वह शब्दावलियों, संकेत-सूचियों, द्विभाषी (सुमेरी और अक्कदी) पट्टिकाओं आदि के माध्यम से अब भी पढ़ाई जाती थी;
    • इसीलिए 650 ई.पू. में भी, 2000 ई.पू. तक पुरानी कीलाकार अक्षरों में लिखी पट्टिकाएँ पढ़ी और समझी जा सकती थीं — और असुरबनिपाल के आदमी यह जानते थे कि पुरानी पट्टिकाओं और उनकी प्रतिकृतियों को कहाँ खोजा जा सकता है।
  • गिल्गेमिश महाकाव्य जैसी महत्त्वपूर्ण पट्टिकाओं की प्रतियाँ तैयार की गईं; प्रतियाँ तैयार करने वाले उन पर अपना नाम और तिथि लिखते थे।
  • कुछ पट्टिकाओं के अंत में असुरबनिपाल का उल्लेख: “मैं असुरबनिपाल, ब्रह्मांड का सम्राट, असीरिया का शासक जिसे देवताओं ने विशाल बुद्धि प्रदान की है, जिसने विद्वानों के पांडित्य के गूढ़ ज्ञान को प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की। मैंने देवताओं के बुद्धि-विवेक को पट्टिकाओं पर लिखा है… और मैंने पट्टिकाओं की जाँच की और उन्हें संगृहीत किया। मैंने उन्हें निनवै स्थित अपने इष्टदेव नाबू के मंदिर के पुस्तकालय में भविष्य में उपयोग के लिए रख दिया — अपने जीवन के लिए, अपनी आत्मा के कल्याण के लिए, और अपने शाही सिंहासन की नींव को मज़बूत बनाए रखने के लिए..!”
  • सूचीकरण (Cataloguing): इससे भी महत्त्वपूर्ण काम था पट्टिकाओं की सूची तैयार करने का — एक टोकरी-भर पट्टिकाओं को मिट्टी के लेबल से इस प्रकार अंकित किया गया: “असंख्य पट्टिकाएँ भूत-प्रेत निवारण विषय पर, ‘अमुक’ व्यक्ति द्वारा लिखी गईं।”
  • संग्रह का आकार: असुरबनिपाल के पुस्तकालय में कुल मिलाकर 1000 मूलपाठ (Texts) थे और लगभग 30,000 पट्टिकाएँ थीं, जिन्हें विषयानुसार वर्गीकृत किया गया था।

17. बॉक्स (पृ. 27): और, एक आरंभिक पुरातत्त्ववेता — नैबोनिडस

  • पृष्ठभूमि — नव-बेबीलोनियाई काल: दक्षिणी कछार के एक शूरवीर नैबोपोलास्सर (Nabopolassar) ने 625 ई.पू. में बेबीलोनिया को असीरियाई आधिपत्य से मुक्त कराया; उसके उत्तराधिकारियों ने राज्यक्षेत्र का विस्तार किया और बेबीलोन में भवन-निर्माण की परियोजनाएँ पूरी कीं।
  • उस समय से लेकर 539 ई.पू. में ईरान के एकेमेनिड लोगों (Achaemenids) द्वारा विजित होने के बाद और 331 ई.पू. में सिकंदर से पराजित होने तक, बेबीलोन दुनिया का एक प्रमुख नगर बना रहा —
    • क्षेत्रफल 850 हैक्टेयर से अधिक;
    • चहारदीवारी तिहरी थी;
    • इसमें बड़े-बड़े राजमहल और मंदिर मौजूद थे;
    • एक ज़िगुरात (Ziggurat) यानी सीढ़ीदार मीनार;
    • नगर के मुख्य अनुष्ठान केंद्र तक शोभायात्रा के लिए एक विस्तृत मार्ग;
    • व्यापारिक घराने दूर-दूर तक कारोबार करते थे;
    • गणितज्ञों तथा खगोलविदों ने अनेक नयी खोजें कीं।
  • नैबोनिडस (Nabonidus) — स्वतंत्र बेबीलोन का अंतिम शासक:
    • स्वप्न-कथा: उसने लिखा है कि उर के नगर-देवता ने उसे सपने में दर्शन दिए और उसे सुदूर दक्षिण के उस पुरातन नगर के कार्यभार को सँभालने के लिए एक महिला पुरोहित (Priestess) नियुक्त करने का आदेश दिया। उसने लिखा — “चूँकि बहुत लंबे समय से उच्च महिला पुरोहित का प्रतिष्ठान भुला दिया गया था, उसके विशिष्ट लक्षणों को कहीं नहीं बताया गया है, मैंने दिन-पर-दिन उसके बारे में सोचा…”
    • स्टेल की खोज: वह आगे कहता है कि उसे एक बहुत पुराने राजा (जिसका शासनकाल हम आज 1150 ई.पू. के आसपास मानते हैं) का पट्टलेख (Stele) मिला और उस पर उसने महिला पुरोहित की आकृति अंकित देखी; उसने उसके आभूषणों और वेशभूषा को ध्यानपूर्वक देखा; फिर उसने अपनी पुत्री को वैसी ही वेशभूषा से सुसज्जित कर महिला पुरोहित के रूप में प्रतिष्ठित किया।
    • सारगोन की मूर्ति: एक अन्य अवसर पर, नैबोनिडस के आदमी उसके पास एक टूटी हुई मूर्ति लाए जिस पर अक्कद के राजा सारगोन (Sargon) का नाम खुदा था (आज हम जानते हैं कि उस राजा ने 2370 ई.पू. के आसपास शासन किया था); नैबोनिडस और निस्संदेह अनेक बुद्धिजीवियों ने भी प्राचीन काल के इस महान राजा के बारे में सुन रखा था; नैबोनिडस ने महसूस किया कि उसे उस मूर्ति की मरम्मत करानी चाहिए। वह लिखता है — “देवताओं के प्रति भक्ति और राजा के प्रति अपनी निष्ठा के कारण, मैंने कुशल शिल्पियों को बुलाया और उसका खंडित सिर बदलवा दिया।”
  • क्रियाकलाप 4: आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि असुरबनिपाल और नैबोनिडस ने मेसोपोटामिया की प्राचीन परंपराओं की कद्र की?

कालरेखा (काल-रेखा, पृ. 28)

तिथिघटना
लगभग 7000–6000 ई.पू.उत्तरी मेसोपोटामिया के मैदानों में खेती की शुरुआत
लगभग 5000 ई.पू.दक्षिणी मेसोपोटामिया में सबसे पुराने मंदिरों का बनना
लगभग 3200 ई.पू.मेसोपोटामिया में लेखन-कार्य की शुरुआत
लगभग 3000 ई.पू.उरुक का एक विशाल नगर के रूप में विकास; काँसे के औज़ारों के इस्तेमाल में बढ़ोतरी
लगभग 2700–2500 ई.पू.आरंभिक राजाओं का शासनकाल जिनमें गिल्गेमिश जैसे पौराणिक राजा भी शामिल हैं
लगभग 2600 ई.पू.कीलाकार लिपि का विकास
लगभग 2400 ई.पू.सुमेरियन के स्थान पर अक्कदी भाषा का प्रयोग
2370 ई.पू.सारगोन, अक्कद सम्राट
लगभग 2000 ई.पू.सीरिया, तुर्की और मिस्र तक कीलाकार लिपि का प्रसार; महत्त्वपूर्ण शहरी केन्द्रों के रूप में मारी और बेबीलोन का उद्भव
लगभग 1800 ई.पू.गणितीय मूलपाठों की रचना; अब सुमेरियन बोलचाल की भाषा नहीं रही
लगभग 1100 ई.पू.असीरियाई राज्य की स्थापना
लगभग 1000 ई.पू.लोहे का प्रयोग
720–610 ई.पू.असीरियाई साम्राज्य
668–627 ई.पू.असुरबनिपाल का शासन
331 ई.पू.सिकंदर ने बेबीलोन को जीत लिया
लगभग पहली शताब्दी (ईसवी)अक्कदी भाषा और कीलाकार लिपि प्रयोग में रहीं
1850 (ईसवी)कीलाकार लिपि के अक्षरों को पहचाना व पढ़ा गया

NCERT अभ्यास प्रश्न (पृ. 28)

संक्षेप में उत्तर दीजिए —

  1. आप यह कैसे कह सकते हैं कि प्राकृतिक उर्वरता तथा खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर ही आरंभ में शहरीकरण के कारण थे?
  2. आपके विचार से निम्नलिखित में से कौन-सी आवश्यक दशाएँ थीं जिनकी वजह से प्रारंभ में शहरीकरण हुआ था और कौन-कौन सी बातें शहरों के विकास के फलस्वरूप उत्पन्न हुईं? — (क) अत्यंत उत्पादक खेती, (ख) जल-परिवहन, (ग) धातु और पत्थर की कमी, (घ) श्रम विभाजन, (ङ) मुद्राओं का प्रयोग, (च) राजाओं की सैन्य-शक्ति जिसने श्रम को अनिवार्य बना दिया।
  3. यह कहना क्यों सही होगा कि खानाबदोश पशुचारक निश्चित रूप से शहरी जीवन के लिए खतरा थे?
  4. आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि पुराने मंदिर बहुत कुछ घर जैसे ही होंगे?

संक्षेप में निबंध लिखिए — 5. शहरी जीवन शुरू होने के बाद कौन-कौन सी नयी संस्थाएँ अस्तित्व में आईं? आपके विचार से उनमें से कौन-सी संस्थाएँ राजा की पहल पर निर्भर थीं? 6. किन पुरानी कहानियों से हमें मेसोपोटामिया की सभ्यता की झलक मिलती है?

शिक्षक-संदर्भ: चर्चा कीजिए / क्रियाकलाप (In-text prompts)

#पृष्ठक्रियाकलाप
—8कालक्रम के छह खानों से एक-एक तिथि चुनकर उस क्षेत्र के स्त्री-पुरुषों के लिए उसके महत्त्व पर विचार-विमर्श
110जलप्लावन-कथाएँ: जलप्लावन से पहले और बाद का जनजीवन कैसा रहा होगा
212क्या शहरी जीवन धातुओं के इस्तेमाल के बिना संभव होता?
—12वार्का शीर्ष: पत्थर लाने से मूर्ति-निर्माण तक किन विशेषज्ञों का योगदान?
—19मोहरों के छापों का विवरण दें; क्या उन पर कीलाकार लिपि अंकित है?
—20उर के रिहायशी इलाके के चित्र में बंद गलियाँ खोजें
323ज़िमरीलिम महल: प्रवेश द्वार से भीतरी आँगन का मार्ग; भंडारगृह में क्या; रसोईघर की पहचान कैसे?
427असुरबनिपाल और नैबोनिडस ने प्राचीन परंपराओं की कद्र क्यों की?

अतिरिक्त पठन (पुस्तक-संदर्भ)

  • पृ. 33 — कीलाकार चिह्नों की जटिलता दर्शाने वाला चित्र (साक्षरता खंड में संदर्भित)।
  • पृ. 38 — सुमेरियन योद्धा की पोशाक और काँसे के भाले की नोकें (एमोराइट पोशाक व काँसे के हथियारों से तुलना हेतु संदर्भित)।
  • विषय 3 — रोम साम्राज्य (कृषि-तुलना); विषय 5 — यायावर साम्राज्य (पशुचारक शासक; कालगणना का प्रसार)।