अध्याय 3जाति, धर्म और लैंगिक मसले

शिक्षण नोट्स51 मिनट

पाठ्यपुस्तक — लोकतांत्रिक राजनीति, कक्षा 10 राजनीति विज्ञान · NCERT · पृष्ठ 29 से 45


शून्य — पढ़ाने से पहले यह ज़रूर पढ़िए

!! यह पूरी कक्षा-10 सामाजिक विज्ञान की सबसे संवेदनशील पाठ्य-सामग्री है। यहाँ जाति, धर्म और लिंग — तीनों आते हैं, और आपकी कक्षा में इन तीनों के अलग-अलग पक्ष से आए बच्चे बैठे हैं। किताब की आलोचना कभी किसी समुदाय की नहीं है। वह सांप्रदायिकता और जातिवाद नाम की राजनीतिक प्रवृत्तियों की आलोचना करती है। यह फ़र्क़ कक्षा में पहले ही दिन साफ़ शब्दों में कह दीजिए — वरना बच्चे ग़लत नतीजा घर ले जाएँगे। ! और किसी दल, नेता, जाति या समुदाय का नाम लेकर उदाहरण मत दीजिए। किताब ने एक भी नहीं दिया — और यही उसकी ताक़त है।

अध्याय का मूल दावा — पहले ही पन्ने पर★★

“सामाजिक विविधता लोकतंत्र के लिए कोई खतरा नहीं होती। राजनीति में सामाजिक असमानताओं की अभिव्यक्ति कोई असंभव बात नहीं है। कई बार तो यह अभिव्यक्ति लोकतंत्र के लिए लाभकर भी होती है।” (पृष्ठ 29)

और अध्याय का काम यह तय करना है कि कब लाभकर है और कब नुकसानदेह — किताब के अपने शब्दों में:

“फिर, हम यह देखने की कोशिश करेंगे कि इन असमानताओं पर आधारित अलग-अलग अभिव्यक्तियाँ लोकतंत्र के लिए लाभकर हैं या नुकसानदेह।”

अध्याय की बनावट — तीन विभाजन, और दो अलग-अलग नतीजे

हिस्सापृष्ठविषयनतीजा
130–35लैंगिक मसले और राजनीति★सकारात्मक — इसे राजनीतिक बनाना ज़रूरी था
236–38धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति! नकारात्मक — जब धर्म राष्ट्र का आधार बना दिया जाए
338–43जाति और राजनीति★! दोनों — इसने वंचितों को आवाज़ दी, पर अकेली पहचान बनकर नुकसान भी किया

किताब स्वयं यह ढाँचा पृष्ठ 38 पर बताती है — “हमने राजनीति में सामाजिक विभाजन की दो अभिव्यक्तियाँ देखीं। इनमें एक मोटे तौर पर सकारात्मक या लाभदायक है तो दूसरी नकारात्मक या नुकसानदेह।”

और अध्याय की आत्मा — यह एक वाक्य★★

“हर व्यक्ति कई तरह की भूमिका निभाता है। उसकी हैसियत और पहचान अलग-अलग होती है।” (पृष्ठ 37)

यही एक वाक्य सांप्रदायिकता और जातिवाद — दोनों का खंडन कर देता है। बोर्ड पर पूरे अध्याय भर यह पंक्ति रहनी चाहिए —

★★“पहचान एक नहीं होती। और जो किसी को सिर्फ़ एक पहचान में क़ैद कर दे — वही सांप्रदायिकता है, वही जातिवाद है।”

भाग 1 — लैंगिक मसले और राजनीति

1 — निजी और सार्वजनिक का विभाजन (पृष्ठ 30)

श्रम का लैंगिक विभाजन★

परिभाषा — “काम के बँटवारे का वह तरीका जिसमें घर के अंदर के सारे काम परिवार की औरतें करती हैं या अपनी देखरेख में घरेलू नौकरों/नौकरानियों से कराती हैं।”

“लड़के और लड़कियों के पालन-पोषण के क्रम में यह मान्यता उनके मन में बैठा दी जाती है कि औरतों की मुख्य ज़िम्मेवारी गृहस्थी चलाने और बच्चों का पालन-पोषण करने की है।” “औरतें घर के अंदर का सारा काम काज, जैसे — खाना बनाना, सफ़ाई करना, कपड़े धोना और बच्चों की देखरेख करना आदि करती हैं जबकि मर्द घर के बाहर का काम करते हैं।”

और यहीं किताब सबसे तीखा सवाल पूछती है★★

“ऐसा नहीं है कि मर्द ये सारे काम नहीं कर सकते। दरअसल वे सोचते हैं कि ऐसे कामों को करना औरतों के ज़िम्मे है। पर जब सिलाई-कटाई से लेकर इन्हीं सारे कामों के लिए पैसे मिलते हैं तो मर्द ख़ुशी-ख़ुशी यही काम घर के बाहर करते हैं। अधिकांश दर्जी या होटल के रसोइए पुरुष होते हैं।”

★★यह कक्षा में धीरे-धीरे पढ़वाइए और फिर पूछिए — “घर में खाना बनाना औरत का काम है। पर होटल में खाना बनाने वाला शेफ़ पुरुष होता है। ★तो सवाल काम का है या पैसे का?” यह एक सवाल पूरे भाग का दरवाज़ा खोल देता है।

और औरतें बाहर भी काम करती हैं

“इसी प्रकार औरतें घर के बाहर का काम न करती हों — ऐसा भी नहीं है। गाँवों में स्त्रियाँ पानी और जलावन जुटाने से लेकर खेत में खटने तक का काम करती हैं। शहरों में भी हम देखते हैं कि कोई गरीब स्त्री किसी मध्यमवर्गीय परिवार में नौकरानी का काम कर रही है और मध्यमवर्गीय स्त्री काम करने के लिए दफ़्तर जा रही है।” ★“सच्चाई यह है कि अधिकतर महिलाएँ अपने घरेलू काम के अतिरिक्त अपनी आमदनी के लिए कुछ न कुछ काम करती हैं लेकिन उनके काम को ज़्यादा मूल्यवान नहीं माना जाता और उन्हें दिन रात काम करके भी उसका श्रेय नहीं मिलता।”

नतीजा — और यही “राजनीति” वाली बात है★

“श्रम के इस तरह के विभाजन का नतीजा यह हुआ है कि औरत तो घर की चारदीवारी में सिमट के रह गई है और बाहर का सार्वजनिक जीवन पुरुषों के कब्ज़े में आ गया है। मनुष्य जाति की आबादी में औरतों का हिस्सा आधा है पर सार्वजनिक जीवन में, खासकर राजनीति में उनकी भूमिका नगण्य ही है।”

★किताब की एक छात्रा यही सवाल पूछती है (पृष्ठ 30) — “राजनीति विज्ञान की इस किताब में हम घरेलू कामकाज की चर्चा क्यों कर रहे हैं? क्या यह राजनीति है?” और किताब का ही जवाब दूसरी छात्रा देती है — “क्यों नहीं? अगर राजनीति का मतलब सत्ता है तो परिवार में पुरुष की प्रधानता को भी राजनीतिक मानना चाहिए।” — ★यह पूरे भाग की कुंजी है।

2 — समय का उपयोग सर्वेक्षण (पृष्ठ 32)★

“देश के छह राज्यों में ‘समय का उपयोग’ संबंधी सर्वेक्षण किया गया। इससे पता चलता है कि एक औरत रोज़ाना साढ़े सात घंटे से ज़्यादा काम करती है जबकि एक मर्द औसतन रोज़ साढ़े छह घंटे ही काम करता है।”

समय का उपयोग(दैनिक — घंटे और मिनट में)

गतिविधियाँपुरुषमहिला
आमदनी वाले काम6:002:40
★घर के काम0:305:00
गप्पबाजी1:251:20
बिना काम के/फ़ुरसत3:403:50
सोना, शरीर की साफ़-सफ़ाई, पढ़ना वग़ैरह12:2511:10
(स्रोत — भारत सरकार, समय का उपयोग सर्वेक्षण, 1998–99)

★★कक्षा में “घर के काम” वाली पंक्ति पर घेरा लगाइए — 0:30 बनाम 5:00 — और यही किताब का निष्कर्ष है: “फिर भी पुरुषों द्वारा किया गया काम ही ज़्यादा दीख पड़ता है क्योंकि उससे आमदनी होती है। औरतें भी ढेर सारे ऐसे काम करती हैं जिनसे अप्रत्यक्ष रूप से आमदनी होती है लेकिन उनका ज़्यादातर काम घर की चारदीवारी के अंदर होता है। इसके लिए उन्हें पैसे नहीं मिलते इसलिए औरतों का काम दिखाई नहीं देता।”

★किताब की एक बच्ची का संवाद ज़रूर पढ़वाइए (पृष्ठ 33) — “मम्मी हरदम बाहर वालों से कहती हैं: ‘मैं काम नहीं करती। मैं तो हाउसवाइफ़ हूँ।’ पर मैं देखती हूँ कि वह लगातार काम करते रहती है। अगर वह जो करती है उसे काम नहीं कहते तो फिर काम किसे कहते हैं?”

3 — लैंगिक असमानता का असली आधार (पृष्ठ 30)★★

“लैंगिक असमानता को स्वाभाविक या कहें कि प्राकृतिक और अपरिवर्तनीय मान लिया जाता है। लेकिन, लैंगिक असमानता का आधार स्त्री और पुरुष की जैविक बनावट नहीं बल्कि इन दोनों के बारे में प्रचलित रूढ़ छवियाँ और तयशुदा सामाजिक भूमिकाएँ हैं।”

★★यह वाक्य अभ्यास प्रश्न 7 का सीधा उत्तर है और इस पूरे भाग की परिभाषा है। एक वाक्य में — “फ़र्क़ शरीर का नहीं, समाज के बनाए नियमों का है।”

4 — नारीवादी आंदोलन (पृष्ठ 31–32)

नारीवादी — “औरत और मर्द के समान अधिकारों और अवसरों में विश्वास करने वाली महिला या पुरुष।” ★इस परिभाषा में “या पुरुष” शब्द पर ज़रूर ध्यान दिलाइए — “नारीवादी सिर्फ़ औरतें नहीं होतीं।”

आंदोलन ने क्या माँगा और क्या मिला

कब/क्याविवरण
पहले“पहले सिर्फ़ पुरुषों को ही सार्वजनिक मामलों में भागीदारी, वोट देने या सार्वजनिक पदों के लिए चुनाव लड़ने की अनुमति थी।”
आंदोलन“दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में औरतों ने अपने संगठन बनाए और बराबरी के अधिकार हासिल करने के लिए आंदोलन किए। विभिन्न देशों में महिलाओं को वोट का अधिकार प्रदान करने के लिए आंदोलन हुए।”
माँगेंराजनीतिक और वैधानिक दर्जा ऊँचा उठाना; शिक्षा तथा रोज़गार के अवसर बढ़ाना
★मूलगामी माँग“मूलगामी बदलाव की माँग करने वाले महिला आंदोलनों ने औरतों के व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में भी बराबरी की माँग उठाई।”
नतीजा“आज हम वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक, कॉलेज और विश्वविद्यालयी शिक्षक जैसे पेशों में बहुत-सी औरतों को पाते हैं जबकि पहले इन कामों को महिलाओं के लायक नहीं माना जाता था।”
★कहाँ सबसे आगेस्वीडन, नॉर्वे और फिनलैंड जैसे स्कैंडिनेवियाई देशों में “सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी का स्तर काफ़ी ऊँचा है”

5 — भारत में भेदभाव के पाँच रूप (पृष्ठ 33–34)★★

“हमारे देश में आज़ादी के बाद से महिलाओं की स्थिति में कुछ सुधार हुआ है पर वे अभी भी पुरुषों से काफ़ी पीछे हैं। हमारा समाज अभी भी पितृ-प्रधान है।” पितृ-प्रधान — “इसका शाब्दिक अर्थ तो पिता का शासन है पर इस पद का प्रयोग महिलाओं की तुलना में पुरुषों को ज़्यादा महत्व, ज़्यादा शक्ति देने वाली व्यवस्था के लिए भी किया जाता है।”

#रूपब्योरा
★1साक्षरता“महिलाओं में साक्षरता की दर अब भी मात्र 54 फ़ीसदी है जबकि पुरुषों में 76 फ़ीसदी।”
2उच्च शिक्षा“स्कूल पास करने वाली लड़कियों की एक सीमित संख्या ही उच्च शिक्षा की ओर कदम बढ़ा पाती है।” ★“कई जगह लड़कियों ने बाजी मार ली है… लेकिन आगे की पढ़ाई के दरवाज़े उनके लिए बंद हो जाते हैं क्योंकि माँ बाप… लड़कों पर ज़्यादा खर्च करना पसंद करते हैं।”
3काम और मज़दूरी“भारत में औसतन एक स्त्री एक पुरुष की तुलना में रोजाना एक घंटा ज़्यादा काम करती है पर उसको ज़्यादातर काम के लिए पैसे नहीं मिलते।” और समान मज़दूरी अधिनियम के बावजूद “खेल-कूद की दुनिया से लेकर सिनेमा के संसार तक और कल-कारखानों से लेकर खेत-खलिहान तक महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम मज़दूरी मिलती है, भले ही दोनों ने समान काम किया हो।”
! 4लिंग अनुपात“भारत के अनेक हिस्सों में माँ-बाप को सिर्फ़ लड़के की चाह होती है… इससे देश का लिंग अनुपात [प्रति हज़ार लड़कों पर लड़कियों की संख्या] गिरकर 919 रह गया है।” नक्शा बताता है कि कई जगहों पर यह 850 और कहीं-कहीं 800 से भी नीचे चला गया है।
! 5हिंसा“महिलाओं के उत्पीड़न, शोषण और उन पर होने वाली हिंसा की खबरें हमें रोज़ पढ़ने को मिलती हैं। शहरी इलाके तो महिलाओं के लिए खास तौर से असुरक्षित हैं। वे अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि वहाँ भी उन्हें मारपीट तथा अनेक तरह की घरेलू हिंसा झेलनी पड़ती है।”

! चौथे और पाँचवें बिंदु को शांत आवाज़ में, तथ्य की तरह पढ़ाइए। कक्षा में ऐसे बच्चे हो सकते हैं जिन्होंने यह घर में देखा हो। दृश्य मत खींचिए; तथ्य बोलिए और आगे बढ़िए।

6 — महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व (पृष्ठ 35)★★

“ये कोई छुपी हुई बात नहीं है कि औरतों की भलाई या उनके साथ समान व्यवहार वाले मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। इसी के चलते विभिन्न नारीवादी समूह और महिला आंदोलन इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि जब तक औरतों का सत्ता पर नियंत्रण नहीं होगा तब तक इस समस्या का निपटारा नहीं हो सकता।”

आँकड़े — ये ज़रूर याद रखिए

कहाँकितना
★लोकसभा“महिला सांसदों की संख्या पहली बार 2019 में ही 14.36 फ़ीसदी तक पहुँच सकी”
! राज्यों की विधान सभाएँ“उनका प्रतिनिधित्व 5 फ़ीसदी से भी कम है”
विश्व में स्थान“भारत इस मामले में अफ्रीका और लातिन अमरीका के कई विकासशील देशों से भी पीछे है”
मंत्रिमंडल“कभी-कभार कोई महिला प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की कुर्सी तक आ गई है पर मंत्रिमंडलों में पुरुषों का ही वर्चस्व रहा है”
★स्थानीय निकायपंचायतों और नगरपालिकाओं में एक तिहाई पद आरक्षित; “आज भारत के ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में निर्वाचित महिलाओं की संख्या 10 लाख से ज़्यादा है”

विश्व की संसदों में महिलाओं का प्रतिशत(अक्टूबर 2018)★

क्षेत्रप्रतिशत
नॉर्डिक देश42.3
अमरीका (उत्तरी और दक्षिणी)29.5
यूरोप (ओ.एस.सी.ई.)26.4
सहारा मरुस्थल के दक्षिणवर्ती देश23.7
विश्व का औसत24
एशिया19.8
पैसेफिक18.6
अरब मुल्क15.6
! भारत11.8

★कक्षा में सिर्फ़ तीन आँकड़े बोर्ड पर लिखिए — नॉर्डिक 42.3 · विश्व औसत 24 · भारत 11.8 — और पूछिए “भारत विश्व औसत से कितना पीछे है?”

नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023★★

“महिला संगठनों और कार्यकर्ताओं की माँग थी कि लोक सभा और राज्य विधान सभाओं की भी कम से कम एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर देनी चाहिए। संसद में इस आशय का एक विधेयक पेश भी किया गया था, पर कई दशकों से वह लंबित था।” ★★“2023 में, नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण अधिनियम 2023) पारित किया गया है जिससे लोकसभा, विधानसभा और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों का आरक्षण दिया जायेगा।”

और इस पूरे भाग का निष्कर्ष★★

“लैंगिक विभाजन इस बात की एक मिसाल है कि कुछ खास किस्म के सामाजिक विभाजनों को राजनीतिक रूप देने की ज़रूरत है। इससे यह भी पता चलता है कि जब सामाजिक विभाजन एक राजनीतिक मुद्दा बन जाता है तो वंचित समूहों को किस तरह लाभ होता है।” और किताब का अपना सवाल — “क्या आपको लगता है कि अगर महिलाओं से भेदभाव भरे व्यवहार का मसला राजनीतिक तौर पर न उठता तो उनको लाभ मिल पाना संभव था?”

भाग 2 — धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति

7 — पहले वह जो ग़लत नहीं है (पृष्ठ 36)★

“यह विभाजन लैंगिक विभाजन जैसा सार्वभौम तो नहीं है पर विश्व में धार्मिक विभिन्नता आज बड़ी व्यापक हो चली है… लैंगिक विभाजन के विपरीत धार्मिक विभाजन अक्सर राजनीति के मैदान में अभिव्यक्त होता है।”

किताब पहले तीन ऐसी बातें गिनाती है जो धर्म और राजनीति से जुड़ी हैं, पर “बहुत गलत या खतरनाक भी नहीं लगतीं” —

#बात
★1गांधी जी कहा करते थे कि “धर्म को कभी भी राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता।” — पर ध्यान दीजिए: “धर्म से उनका मतलब हिंदू या इस्लाम जैसे धर्म से न होकर नैतिक मूल्यों से था जो सभी धर्मों से जुड़े हैं। उनका मानना था कि राजनीति धर्म द्वारा स्थापित मूल्यों से निर्देशित होनी चाहिए।”
2मानवाधिकार समूहों की माँग — “सरकार को सांप्रदायिक दंगों को रोकने और धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए विशेष कदम उठाने चाहिए।”
3महिला-आंदोलन का कहना — “सभी धर्मों में वर्णित पारिवारिक कानून महिलाओं से भेदभाव करते हैं… सरकार को इन कानूनों को समतामूलक बनाने के लिए उनमें बदलाव करने चाहिए।”

पारिवारिक कानून — “विवाह, तलाक, गोद लेना और उत्तराधिकार जैसे परिवार से जुड़े मसलों से संबंधित कानून। हमारे देश में सभी धर्मों के लिए अलग-अलग पारिवारिक कानून हैं।”

★★और किताब की कसौटी — यह वाक्य ज़रूर लिखवाइए — “लोगों को अपने धार्मिक समुदाय के तौर पर अपनी ज़रूरतों, हितों और माँगों को राजनीति में उठाने का अधिकार होना चाहिए… ★अगर शासन सभी धर्मों के साथ समान बरताव करता है तो उसके ऐसे कामों में कोई बुराई नहीं है।”

8 — सांप्रदायिकता क्या है (पृष्ठ 36–37)★★

परिभाषा — शब्दश: याद कीजिए

“समस्या तब शुरू होती है जब धर्म को राष्ट्र का आधार मान लिया जाता है।” “समस्या तब और विकराल हो जाती है जब राजनीति में धर्म की अभिव्यक्ति एक समुदाय की विशिष्टता के दावे और पक्षपोषण का रूप लेने लगती है तथा इसके अनुयायी दूसरे धर्मावलंबियों के खिलाफ़ मोर्चा खोलने लगते हैं।” “ऐसा तब होता है जब एक धर्म के विचारों को दूसरे से श्रेष्ठ माना जाने लगता है… इस प्रक्रिया में जब राज्य अपनी सत्ता का इस्तेमाल किसी एक धर्म के पक्ष में करने लगता है तो स्थिति और विकट होने लगती है।” ★★“राजनीति में धर्म को इस तरह जोड़ना ही सांप्रदायिकता है।”

सांप्रदायिक सोच किस मान्यता पर टिकी है★

“सांप्रदायिक राजनीति इस सोच पर आधारित होती है कि धर्म ही सामाजिक समुदाय का निर्माण करता है।” इस सोच के अनुसार — • “एक खास धर्म में आस्था रखने वाले लोग एक ही समुदाय के होते हैं” • “उनके मौलिक हित एक जैसे होते हैं” • “समुदाय के लोगों के आपसी मतभेद… कोई अहमियत नहीं रखते” • “किसी अलग धर्म को मानने वाले लोग दूसरे सामाजिक समुदाय का हिस्सा नहीं हो सकते” • “अलग-अलग धर्मों के लोगों के हित तो अलग-अलग होंगे ही और उनमें टकराव भी होगा” • और आगे बढ़ने पर — “दूसरे धर्मों के अनुयायी एक ही राष्ट्र में समान नागरिक के तौर पर नहीं रह सकते… या तो एक समुदाय के लोगों को दूसरे समुदाय के वर्चस्व में रहना होगा या फिर उनके लिए अलग राष्ट्र बनाना होगा।”

और किताब का खंडन — यही अध्याय की आत्मा है★★

“यह मान्यता बुनियादी रूप से गलत है। एक धर्म के लोगों के हित और उनकी आकांक्षाएँ हर मामले में एक जैसी हों — यह संभव नहीं है। ★★हर व्यक्ति कई तरह की भूमिका निभाता है। उसकी हैसियत और पहचान अलग-अलग होती है। हर समुदाय में तरह-तरह के विचार के लोग होते हैं। इन सभी को अपनी बात कहने का अधिकार है इसलिए एक धर्म से जुड़े सभी लोगों को किसी गैर-धार्मिक संदर्भ में एक करके देखना उस समुदाय की विभिन्न आवाज़ों को दबाना है।”

★★कक्षा में यह करके दिखाइए — किसी एक बच्चे से पूछिए “तुम कौन हो?” और जितने जवाब आ सकें, बोर्ड पर लिखिए — बेटा/बेटी · भाई/बहन · विद्यार्थी · क्रिकेट खेलने वाला · राजस्थानी · भारतीय · अपने मोहल्ले का… फिर कहिए — “इनमें से किसी एक को उठाकर बाक़ी सब मिटा दिया जाए — तो वह तुम रह जाओगे या नहीं?” जो ऐसा करता है, उसी को किताब सांप्रदायिकता कहती है — और आगे यही बात जाति के लिए भी कहेगी।

9 — सांप्रदायिकता के चार रूप (पृष्ठ 37)★

“सांप्रदायिकता राजनीति में अनेक रूप धारण कर सकती है:”

#रूपविवरण
★1दैनंदिन जीवन में“सांप्रदायिकता की सबसे आम अभिव्यक्ति दैनंदिन जीवन में ही दिखती है। इनमें धार्मिक पूर्वाग्रह, धार्मिक समुदायों के बारे में बनी बनाई धारणाएँ और एक धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ मानने की मान्यताएँ शामिल हैं।” ! “ये चीज़ें इतनी आम हैं कि अक्सर हम उन पर ध्यान तक नहीं देते जबकि ये हमारे अंदर ही बैठी होती हैं।”
2राजनीतिक प्रभुत्व की कोशिश“जो लोग बहुसंख्यक समुदाय के होते हैं उनकी यह कोशिश बहुसंख्यकवाद का रूप ले लेती है। जो अल्पसंख्यक समुदाय के होते हैं उनमें यह विश्वास अलग राजनीतिक इकाई बनाने की इच्छा का रूप ले लेता है।”
3सांप्रदायिक गोलबंदी“इसमें धर्म के पवित्र प्रतीकों, धर्मगुरुओं, भावनात्मक अपील और अपने ही लोगों के मन में डर बैठाने जैसे तरीकों का उपयोग बहुत आम है। चुनावी राजनीति में एक धर्म के मतदाताओं की भावनाओं या हितों की बात उठाने जैसे तरीके अक्सर अपनाए जाते हैं।”
! 4हिंसा, दंगा और नरसंहार“कई बार सांप्रदायिकता सबसे गंदा रूप लेकर संप्रदाय के आधार पर हिंसा, दंगा और नरसंहार कराती है। विभाजन के समय भारत और पाकिस्तान में भयावह सांप्रदायिक दंगे हुए थे। आज़ादी के बाद भी बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई है।”

★याद रखने का सूत्र — “रोज़ · प्रभुत्व · गोलबंदी · हिंसा” ★★और सबसे ज़रूरी बात पहले रूप के साथ है — किताब कहती है कि यह “हमारे अंदर ही बैठी होती” है। कक्षा में किताब की एक छात्रा का सवाल ज़रूर पढ़वाइए — “मैं अक्सर दूसरे धर्म के लोगों के बारे में चुटकुले सुनाता हूँ। क्या इससे मैं भी सांप्रदायिक बन जाता हूँ?” ★यह सवाल कक्षा में खुला छोड़िए — जवाब मत दीजिए। बच्चे ख़ुद सोचें।

10 — धर्मनिरपेक्ष शासन (पृष्ठ 37–38)★★

“सांप्रदायिकता हमारे देश के लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती रही है। हमारे संविधान निर्माता इस चुनौती के प्रति सचेत थे। इसी कारण उन्होंने धर्मनिरपेक्ष शासन का मॉडल चुना।”

चार संवैधानिक प्रावधान — यह तालिका शब्दश: याद कीजिए

#प्रावधान
★1“भारतीय राज्य ने किसी भी धर्म को राजकीय धर्म के रूप में अंगीकार नहीं किया है। श्रीलंका में बौद्ध धर्म, पाकिस्तान में इस्लाम और इंग्लैंड में ईसाई धर्म का जो दर्जा रहा है उसके विपरीत भारत का संविधान किसी धर्म को विशेष दर्जा नहीं देता।”
2“संविधान सभी नागरिकों और समुदायों को किसी भी धर्म का पालन करने और प्रचार करने की आज़ादी देता है।”
3“संविधान धर्म के आधार पर किए जाने वाले किसी तरह के भेदभाव को अवैधानिक घोषित करता है।”
★4“संविधान धार्मिक समुदायों में समानता सुनिश्चित करने के लिए शासन को धार्मिक मामलों में दखल देने का अधिकार देता है। जैसे, यह छुआछूत की इजाज़त नहीं देता।”

★सूत्र — “कोई राजकीय धर्म नहीं · आज़ादी · भेदभाव अवैध · दख़ल का अधिकार” ! चौथा प्रावधान सबसे कम समझा जाता है। समझाइए — “धर्मनिरपेक्षता का मतलब यह नहीं कि राज्य धर्म से आँख मूँद ले। अगर धर्म के नाम पर किसी के साथ अन्याय हो रहा हो तो राज्य दख़ल दे सकता है — जैसे छुआछूत के मामले में।”

और अध्याय की सबसे बड़ी पंक्तियाँ★★

“इस हिसाब से देखें तो धर्मनिरपेक्षता कुछ पार्टियों या व्यक्तियों की एक विचारधारा भर नहीं है। यह विचार हमारे संविधान की बुनियाद है।” “सांप्रदायिकता भारत में सिर्फ़ कुछ लोगों के लिए ही एक खतरा नहीं है। यह भारत की बुनियादी अवधारणा के लिए एक चुनौती है, एक खतरा है।” ★★“हमारी तरह का धर्मनिरपेक्ष संविधान ज़रूरी चीज़ है पर अकेले इसी के बूते सांप्रदायिकता का मुकाबला नहीं किया जा सकता। हमें अपने दैनंदिन जीवन में सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों और दुष्प्रचारों का मुकाबला करना होगा तथा धर्म पर आधारित गोलबंदी का मुकाबला राजनीति के दायरे में करने की ज़रूरत है।”

★यह आख़िरी वाक्य अध्याय 2 की बात दोहराता है — “संविधान ज़रूरी है, पर काफ़ी नहीं।” यह कड़ी बच्चों को ज़रूर दिखाइए।

भाग 3 — जाति और राजनीति

11 — जातिगत असमानताएँ (पृष्ठ 38)★

★★“लिंग और धर्म पर आधारित विभाजन तो दुनिया भर में हैं पर जाति पर आधारित विभाजन सिर्फ़ भारतीय समाज में ही देखने को मिलता है।” — (यही अभ्यास प्रश्न 11 का उत्तर है।)

जाति व्यवस्था क्या है

“सभी समाजों में कुछ सामाजिक असमानताएँ और एक न एक तरह का श्रम का विभाजन मौजूद होता है। अधिकतर समाजों में पेशा परिवार की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाता है। लेकिन जाति व्यवस्था इसका एक अतिवादी और स्थायी रूप है।” “इसमें पेशे के वंशानुगत विभाजन को रीति-रिवाजों की मान्यता प्राप्त है… उनमें आपस में ही बेटी-रोटी अर्थात शादी और खानपान का संबंध रहता है। अन्य जाति समूहों में उनके बच्चों की न तो शादी हो सकती है न महत्वपूर्ण आयोजनों में उनकी पाँत में बैठकर दूसरी जाति के लोग भोजन कर सकते हैं।”

वर्ण-व्यवस्था — “जाति समूहों का पदानुक्रम जिसमें एक जाति के लोग हर हाल में सामाजिक पायदान में सबसे ऊपर रहेंगे तो किसी अन्य जाति समूह के लोग क्रमागत के रूप से उनके नीचे।” यह “अन्य जाति-समूहों से भेदभाव और उन्हें अपने से अलग मानने की धारणा पर आधारित” है, और इसमें “‘अंत्यज’ जातियों के साथ छुआछूत का व्यवहार किया जाता था।”

चार समाज सुधारक — यह नाम याद रखिए★

“यही कारण है कि ज्योतिबा फुले, महात्मा गांधी, डॉ. आंबेडकर और पेरियार रामास्वामी नायकर जैसे राजनेताओं और समाज सुधारकों ने जातिगत भेदभाव से मुक्त समाज व्यवस्था बनाने की बात की और उसके लिए काम किया।” ★सूत्र — “फुले · गांधी · आंबेडकर · पेरियार”

क्या बदला

“इन महापुरुषों के प्रयासों और सामाजिक-आर्थिक बदलावों के चलते आधुनिक भारत में जाति की संरचना और जाति व्यवस्था में भारी बदलाव आया है।” बदलाव के कारण — आर्थिक विकास · शहरीकरण · साक्षरता और शिक्षा का विकास · पेशा चुनने की आज़ादी · गाँवों में ज़मींदारी व्यवस्था का कमज़ोर पड़ना शहरीकरण — “ग्रामीण इलाकों से निकलकर लोगों का शहरों में बसना।” ★“शहरी इलाकों में तो अब ज़्यादातर इस बात का कोई हिसाब नहीं रखा जाता कि ट्रेन या बस में आपके साथ कौन बैठा है या रेस्तराँ में आपकी मेज़ पर बैठकर खाना खा रहे आदमी की जाति क्या है?” “संविधान में किसी भी तरह के जातिगत भेदभाव का निषेध किया गया है। संविधान ने जाति व्यवस्था से पैदा हुए अन्याय को समाप्त करने वाली नीतियों का आधार तय किया है।”

पर जाति गई नहींध्यान

“बहरहाल, समकालीन भारत से जाति प्रथा विदा नहीं हुई है। जाति व्यवस्था के कुछ पुराने पहलू अभी भी बरकरार हैं — • “अभी भी ज़्यादातर लोग अपनी जाति या कबीले में ही शादी करते हैं” • ! “स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान के बावजूद छुआछूत की प्रथा अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है” • “जाति व्यवस्था के अंतर्गत सदियों से कुछ समूहों को लाभ की स्थिति में तो कुछ समूहों को दबाकर रखा गया है। इसका प्रभाव सदियों बाद आज तक नज़र आता है।”

★★और किताब का सबसे तीखा तर्क — यह ज़रूर पढ़ाइए — “जिन जातियों में पहले से ही पढ़ाई-लिखाई का चलन मौजूद था और जिनकी शिक्षा पर पकड़ थी, आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में भी उन्हीं का बोलबाला है। जिन जातियों को पहले शिक्षा से वंचित रखा जाता था उनके सदस्य अभी भी स्वाभाविक तौर पर पिछड़े हुए हैं। यही कारण है कि शहरी मध्यम वर्ग में अगड़ी जाति के लोगों का अनुपात असामान्य रूप से काफ़ी ज़्यादा है। जाति और आर्थिक हैसियत में काफ़ी निकट का संबंध है।”

12 — जातिगत असमानता के आँकड़े (पृष्ठ 42 का बॉक्स)★

गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करने वालों का प्रतिशत(1999–2000)

जाति और समुदायग्रामीणशहरी
अनुसूचित जनजातियाँ45.835.6
अनुसूचित जातियाँ35.938.3
अन्य पिछड़ी जातियाँ27.0029.5
मुसलमान अगड़ी जातियाँ26.834.2
हिंदू अगड़ी जातियाँ11.79.9
ईसाई अगड़ी जातियाँ9.65.4
ऊँची जाति के सिख0.04.9
अन्य अगड़ी जातियाँ16.02.7
सभी समूह27.023.4
(गरीबी रेखा = प्रति व्यक्ति प्रति माह 327 रुपए [ग्रामीण] और 455 रुपए [शहरी] से कम खर्च; स्रोत — राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण, 55वाँ दौर)

तीन निष्कर्ष — यही याद रखिए, तालिका नहीं★

  1. “औसत आर्थिक हैसियत… अभी भी वर्णव्यवस्था के साथ गहरा संबंध दर्शाती है यानी ‘ऊँची’ जाति के लोगों की आर्थिक स्थिति सबसे अच्छी है। दलित तथा आदिवासियों की आर्थिक स्थिति सबसे खराब है, जबकि पिछड़ी जातियाँ बीच की स्थिति में हैं।”
  2. “हर जाति में गरीब लोग हैं, पर भारी दरिद्रता में… जीवन बसर करने वालों में ज़्यादा बड़ी संख्या सबसे निचली जातियों के लोगों की है।”
  3. “आज सभी जातियों में अमीर लोग हैं पर यहाँ भी ऊँची जाति वालों का अनुपात बहुत ज़्यादा है और निचली जातियों का बहुत कम।”

★इन तीनों का सार एक वाक्य में — “जाति अब भी आर्थिक हैसियत तय करती है, पर अब वह अकेली नहीं करती।”

13 — राजनीति में जाति (पृष्ठ 39)★★

जातिवाद क्या है

“सांप्रदायिकता की तरह जातिवाद भी इस मान्यता पर आधारित है कि जाति ही सामाजिक समुदाय के गठन का एकमात्र आधार है।” इस चिंतन पद्धति के अनुसार — “एक जाति के लोग एक स्वाभाविक सामाजिक समुदाय का निर्माण करते हैं तथा उनके हित एक जैसे होते हैं और दूसरी जाति के लोगों से उनके हितों का कोई मेल नहीं होता।” ★★और खंडन वही है जो धर्म के मामले में था — “यह मान्यता हमारे अनुभव से पुष्ट नहीं होती। हमारे अनुभव बताते हैं कि जाति हमारे जीवन का एक पहलू ज़रूर है लेकिन यही एकमात्र या सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण पहलू नहीं है।”

राजनीति में जाति के तीन रूप

#रूप
1“जब पार्टियाँ चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नाम तय करती हैं तो चुनाव क्षेत्र के मतदाताओं की जातियों का हिसाब ध्यान में रखती हैं… जब सरकार का गठन किया जाता है तो… ध्यान रखते हैं कि उसमें विभिन्न जातियों और कबीलों के लोगों को उचित जगह दी जाए।”
2“राजनीतिक पार्टियाँ और उम्मीदवार समर्थन हासिल करने के लिए जातिगत भावनाओं को उकसाते हैं। कुछ दलों को कुछ जातियों के मददगार और प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है।”
★3“सार्वभौम वयस्क मताधिकार और एक व्यक्ति-एक वोट की व्यवस्था ने राजनीतिक दलों को विवश किया कि वे… सक्रिय हों। इससे उन जातियों के लोगों में नयी चेतना पैदा हुई जिन्हें अभी तक छोटा और नीच माना जाता था।”

★तीसरा रूप सबसे महत्त्वपूर्ण है — क्योंकि यही लोकतंत्र का सकारात्मक असर है।

14 — “चुनाव जातियों का खेल है” — यह सच नहीं (पृष्ठ 41)★★

“राजनीति में जाति पर जोर देने के कारण कई बार यह धारणा बन सकती है कि चुनाव जातियों का खेल है, कुछ और नहीं। यह बात सच नहीं है। ज़रा इन चीज़ों पर गौर कीजिए:”

#कारण
★1“देश के किसी भी एक संसदीय चुनाव क्षेत्र में किसी एक जाति के लोगों का बहुमत नहीं है इसलिए हर पार्टी और उम्मीदवार को चुनाव जीतने के लिए एक जाति और एक समुदाय से ज़्यादा लोगों का भरोसा हासिल करना पड़ता है।”
2“कोई भी पार्टी किसी एक जाति या समुदाय के सभी लोगों का वोट हासिल नहीं कर सकती। जब लोग किसी जाति विशेष को किसी एक पार्टी का ‘वोट बैंक’ कहते हैं तो इसका मतलब यह होता है कि उस जाति के ज़्यादातर लोग उसी पार्टी को वोट देते हैं।”
3“अगर किसी चुनाव क्षेत्र में एक जाति के लोगों का प्रभुत्व माना जा रहा हो तो अनेक पार्टियों को उसी जाति का उम्मीदवार खड़ा करने से कोई रोक नहीं सकता। ऐसे में कुछ मतदाताओं के सामने उनकी जाति के एक से ज़्यादा उम्मीदवार होते हैं तो किसी-किसी जाति के मतदाताओं के सामने उनकी जाति का एक भी उम्मीदवार नहीं होता।”
★★4“हमारे देश में सत्तारूढ़ दल, वर्तमान सांसदों और विधायकों को अक्सर हार का सामना करना पड़ता है। अगर जातियों और समुदायों की राजनीतिक पसंद एक ही होती तो ऐसा संभव नहीं हो पाता।”

★★चौथा कारण सबसे ताक़तवर है और सबसे कम पढ़ाया जाता है।* कक्षा में यह पूछिए — *“अगर वोट सिर्फ़ जाति से पड़ते, तो कोई सांसद या विधायक कभी हारता ही नहीं। पर वे हारते हैं — रोज़ हारते हैं। ★तो वोट सिर्फ़ जाति से नहीं पड़ता।”

और किताब जोड़ती है — “मतदाता अपनी जातियों से जितना जुड़ाव रखते हैं अक्सर उससे ज़्यादा गहरा जुड़ाव राजनीतिक दलों से रखते हैं। एक जाति या समुदाय के भीतर भी अमीर और गरीब लोगों के हित अलग-अलग होते हैं… सरकार के कामकाज के बारे में लोगों की राय और नेताओं की लोकप्रियता का चुनावों पर अक्सर निर्णायक असर होता है।”

15 — जाति के अंदर राजनीति (पृष्ठ 41)★

“अभी तक हमने इसी चीज़ पर गौर किया है कि राजनीति में जाति की क्या भूमिका होती है। पर, इसका यह मतलब नहीं है कि जाति और राजनीति के बीच सिर्फ़ एकतरफ़ा संबंध होता है। राजनीति भी जातियों को राजनीति के अखाड़े में लाकर जाति व्यवस्था और जातिगत पहचान को प्रभावित करती है।” ★“इस तरह, सिर्फ़ राजनीति ही जातिग्रस्त नहीं होती जाति भी राजनीतिग्रस्त हो जाती है।”

#कैसे
1“हर जाति खुद को बड़ा बनाना चाहती है। सो, पहले वह अपने समूह की जिन उप जातियों को छोटा या नीचा बताकर अपने से बाहर रखना चाहती थी अब उन्हें अपने साथ लाने की कोशिश करती है।”
2“चूँकि एक जाति अपने दम पर सत्ता पर कब्ज़ा नहीं कर सकती इसलिए वह ज़्यादा राजनीतिक ताकत पाने के लिए दूसरी जातियों या समुदायों को साथ लेने की कोशिश करती है और इस तरह उनके बीच संवाद और मोल-तोल होता है।”
3“राजनीति में नए किस्म की जातिगत गोलबंदी भी हुई हैं, जैसे ‘अगड़ा’ और ‘पिछड़ा’।”

16 — अंतिम फ़ैसला — दोनों पक्ष (पृष्ठ 43)★★

लाभ — “जातिगत राजनीति ने दलित और पिछड़ी जातियों के लोगों के लिए सत्ता तक पहुँचने तथा निर्णय प्रक्रिया को बेहतर ढंग से प्रभावित करने की स्थिति भी पैदा की है। अनेक पार्टियाँ और गैर-राजनीतिक संगठन खास जातियों के खिलाफ़ भेदभाव समाप्त करने, उनके साथ ज़्यादा सम्मानजनक व्यवहार करने, उनके लिए ज़मीन-जायदाद और अवसर उपलब्ध कराने की माँग को लेकर आंदोलन करते रहे हैं।”

! हानि — “पर, इसके साथ ही यह भी सच है कि सिर्फ़ जाति पर जोर देना नुकसानदेह हो सकता है। जैसा कि धर्म के मसले से स्पष्ट होता है, सिर्फ़ जातिगत पहचान पर आधारित राजनीति लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं होती। ★इससे अक्सर गरीबी, विकास, भ्रष्टाचार जैसे ज़्यादा बड़े मुद्दों से लोगों का ध्यान भी भटकता है। कई बार जातिवाद तनाव, टकराव और हिंसा को भी बढ़ावा देता है।”

★★यही अध्याय का अंतिम संतुलन है, और परीक्षा में दोनों पक्ष अनिवार्य हैं।

17 — भारत की सामाजिक और धार्मिक विविधता (पृष्ठ 40 का बॉक्स)

धार्मिक समुदायों की आबादी(2011)

समुदायप्रतिशत
हिंदू79.8
मुसलमान14.2
ईसाई2.3
सिख1.7
अन्य2% (बौद्ध 0.7 · जैन 0.4 · अन्य धर्म 0.7 · कोई धर्म नहीं 0.2)

★किताब की मुख्य बात — “आज़ादी के बाद से प्रत्येक धार्मिक समुदाय की आबादी तो काफ़ी बढ़ी है पर कुल आबादी में उनका अनुपात ज़्यादा नहीं बदला है।” ★★और एक भ्रांत धारणा का सीधा खंडन — “एक आम लेकिन भ्रांत धारणा यह है कि देश की आबादी में मुसलमानों का प्रतिशत इतना बढ़ जाएगा कि दूसरे धार्मिक समुदाय उससे पीछे हो जाएँगे। प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त उच्चस्तरीय समिति (सच्चर समिति) के आकलन से स्पष्ट होता है कि मुस्लिम आबादी का अनुपात थोड़ा ज़रूर बढ़ेगा लेकिन अगले पचास सालों में भी यह बढ़कर 3–4 प्रतिशत तक ही रहेगी। इससे साबित होता है कि… विभिन्न धार्मिक समुदायों के अनुपात में कोई बड़ा उलट-फेर नहीं होने वाला।” ! यह हिस्सा ज़रूर पढ़ाइए — यह किताब का तथ्य से अफ़वाह तोड़ने वाला हिस्सा है, और यही एक अच्छे नागरिक की आदत है।

जाति समूहों के आँकड़े

समूहप्रतिशत
अनुसूचित जातियाँ (2011)16.6
अनुसूचित जनजातियाँ (2011)8.6
अन्य पिछड़ी जातियाँ (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण, 2004-05 का अनुमान)करीब 41

“मुल्क की आबादी में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ी जातियों का हिस्सा लगभग दो तिहाई तथा हिंदुओं की आबादी का लगभग तीन-चौथाई है।” ! किताब यह भी बताती है — “जनगणना में अभी तक अन्य पिछड़ी जातियों की गिनती नहीं की जाती।”

18 — NCERT प्रश्नावली के पूरे उत्तर (पृष्ठ 44–45)

प्रश्न 1 — जीवन के उन विभिन्न पहलुओं का ज़िक्र करें जिनमें भारत में स्त्रियों के साथ भेदभाव होता है या वे कमज़ोर स्थिति में होती हैं।

(1) ★साक्षरता — “महिलाओं में साक्षरता की दर अब भी मात्र 54 फ़ीसदी है जबकि पुरुषों में 76 फ़ीसदी।” (2) उच्च शिक्षा — स्कूल पास करने वाली लड़कियों की “एक सीमित संख्या ही उच्च शिक्षा की ओर कदम बढ़ा पाती है”, क्योंकि “माँ बाप… लड़कों पर ज़्यादा खर्च करना पसंद करते हैं।” (3) काम और श्रेय — “एक स्त्री एक पुरुष की तुलना में रोजाना एक घंटा ज़्यादा काम करती है पर उसको ज़्यादातर काम के लिए पैसे नहीं मिलते इसलिए अक्सर उसके काम को मूल्यवान नहीं माना जाता।” (4) मज़दूरी — समान मज़दूरी अधिनियम के बावजूद “खेल-कूद की दुनिया से लेकर… खेत-खलिहान तक महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम मज़दूरी मिलती है, भले ही दोनों ने समान काम किया हो।” (5) ! लिंग अनुपात — “माँ-बाप को सिर्फ़ लड़के की चाह होती है… इससे देश का लिंग अनुपात गिरकर 919 रह गया है”, और कई जगह 850 तथा कहीं-कहीं 800 से भी नीचे। (6) ! हिंसा — “शहरी इलाके तो महिलाओं के लिए खास तौर से असुरक्षित हैं। वे अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि वहाँ भी उन्हें मारपीट तथा अनेक तरह की घरेलू हिंसा झेलनी पड़ती है।” (7) राजनीतिक प्रतिनिधित्व — लोकसभा में 2019 में पहली बार 14.36 फ़ीसदी, विधान सभाओं में 5 फ़ीसदी से भी कम।

प्रश्न 2 — विभिन्न तरह की सांप्रदायिक राजनीति का ब्यौरा दें और सबके साथ एक-एक उदाहरण भी दें।★

(1) दैनंदिन जीवन में — “धार्मिक पूर्वाग्रह, धार्मिक समुदायों के बारे में बनी बनाई धारणाएँ और एक धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ मानने की मान्यताएँ।” ★उदाहरण — दूसरे धर्म के लोगों के बारे में चुटकुले सुनाना या “वे सब ऐसे ही होते हैं” जैसी बात कहना। किताब कहती है — “ये चीज़ें इतनी आम हैं कि अक्सर हम उन पर ध्यान तक नहीं देते।” (2) राजनीतिक प्रभुत्व की कोशिश — बहुसंख्यक समुदाय में यह बहुसंख्यकवाद का रूप ले लेती है और अल्पसंख्यक समुदाय में अलग राजनीतिक इकाई बनाने की इच्छा का। ★उदाहरण — (पिछले अध्याय से) श्रीलंका में सिंहली बहुसंख्यकवाद, जिसके जवाब में तमिल ईलम की माँग उठी। (3) सांप्रदायिक गोलबंदी — “धर्म के पवित्र प्रतीकों, धर्मगुरुओं, भावनात्मक अपील और अपने ही लोगों के मन में डर बैठाने जैसे तरीक़े।” उदाहरण — चुनाव में “एक धर्म के मतदाताओं की भावनाओं या हितों की बात उठाने” वाले भाषण। (4) ! हिंसा, दंगा और नरसंहार — यह इसका “सबसे गंदा रूप” है। उदाहरण — “विभाजन के समय भारत और पाकिस्तान में भयावह सांप्रदायिक दंगे हुए थे।”

प्रश्न 3 — बताइए कि भारत में किस तरह अभी भी जातिगत असमानताएँ जारी हैं।

(1) “अभी भी ज़्यादातर लोग अपनी जाति या कबीले में ही शादी करते हैं।” (2) ! “स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान के बावजूद छुआछूत की प्रथा अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।” (3) ★शिक्षा में — “जिन जातियों में पहले से ही पढ़ाई-लिखाई का चलन मौजूद था… आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में भी उन्हीं का बोलबाला है। जिन जातियों को पहले शिक्षा से वंचित रखा जाता था उनके सदस्य अभी भी स्वाभाविक तौर पर पिछड़े हुए हैं।” (4) आर्थिक हैसियत में — “शहरी मध्यम वर्ग में अगड़ी जाति के लोगों का अनुपात असामान्य रूप से काफ़ी ज़्यादा है। जाति और आर्थिक हैसियत में काफ़ी निकट का संबंध है।” (5) गरीबी के आँकड़े — औसत आर्थिक हैसियत “अभी भी वर्णव्यवस्था के साथ गहरा संबंध दर्शाती है”; “दलित तथा आदिवासियों की आर्थिक स्थिति सबसे खराब है, जबकि पिछड़ी जातियाँ बीच की स्थिति में हैं।”

प्रश्न 4 — दो कारण बताएँ कि क्यों सिर्फ़ जाति के आधार पर भारत में चुनावी नतीजे तय नहीं हो सकते।★

(1) ★“देश के किसी भी एक संसदीय चुनाव क्षेत्र में किसी एक जाति के लोगों का बहुमत नहीं है”, इसलिए हर उम्मीदवार को एक से ज़्यादा जातियों और समुदायों का भरोसा हासिल करना पड़ता है। (2) ★★“हमारे देश में सत्तारूढ़ दल, वर्तमान सांसदों और विधायकों को अक्सर हार का सामना करना पड़ता है। अगर जातियों और समुदायों की राजनीतिक पसंद एक ही होती तो ऐसा संभव नहीं हो पाता।” (अन्य स्वीकार्य कारण — कोई पार्टी किसी जाति के सभी लोगों का वोट नहीं पा सकती; और एक ही जाति के कई उम्मीदवार अलग-अलग पार्टियों से खड़े हो सकते हैं। साथ ही “सरकार के कामकाज के बारे में लोगों की राय और नेताओं की लोकप्रियता का चुनावों पर अक्सर निर्णायक असर होता है।”)

प्रश्न 5 — भारत की विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति क्या है?

(1) लोकसभा — “महिला सांसदों की संख्या पहली बार 2019 में ही 14.36 फ़ीसदी तक पहुँच सकी है।” (2) राज्यों की विधान सभाएँ — “उनका प्रतिनिधित्व 5 फ़ीसदी से भी कम है।” (3) विश्व में स्थान — “भारत इस मामले में दुनिया के देशों में काफ़ी नीचे है… अफ्रीका और लातिन अमरीका के कई विकासशील देशों से भी पीछे है।” (विश्व औसत 24, भारत 11.8) (4) मंत्रिमंडल — “कभी-कभार कोई महिला प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की कुर्सी तक आ गई है पर मंत्रिमंडलों में पुरुषों का ही वर्चस्व रहा है।” (5) ★जहाँ स्थिति बेहतर है — पंचायती राज में एक तिहाई पद आरक्षित हैं और “आज भारत के ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में निर्वाचित महिलाओं की संख्या 10 लाख से ज़्यादा है।” (6) ★★नया कदम — 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हुआ, “जिससे लोकसभा, विधानसभा और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों का आरक्षण दिया जायेगा।”

प्रश्न 6 — किन्हीं दो प्रावधानों का ज़िक्र करें जो भारत को धर्मनिरपेक्ष देश बनाते हैं।★

(1) “भारतीय राज्य ने किसी भी धर्म को राजकीय धर्म के रूप में अंगीकार नहीं किया है… भारत का संविधान किसी धर्म को विशेष दर्जा नहीं देता।” (2) “संविधान सभी नागरिकों और समुदायों को किसी भी धर्म का पालन करने और प्रचार करने की आज़ादी देता है।” (अन्य दो — संविधान धर्म के आधार पर भेदभाव को अवैधानिक घोषित करता है; और वह धार्मिक समुदायों में समानता सुनिश्चित करने के लिए शासन को धार्मिक मामलों में दखल देने का अधिकार देता है — “जैसे, यह छुआछूत की इजाज़त नहीं देता।”)

प्रश्न 7 — जब हम लैंगिक विभाजन की बात करते हैं तो हमारा अभिप्राय होता है:★

उत्तर देखिए

उत्तर — (ख) समाज द्वारा स्त्री और पुरुष को दी गई असमान भूमिकाएँ कारण — किताब का वाक्य: “लैंगिक असमानता का आधार स्त्री और पुरुष की जैविक बनावट नहीं बल्कि इन दोनों के बारे में प्रचलित रूढ़ छवियाँ और तयशुदा सामाजिक भूमिकाएँ हैं।” — इसीलिए विकल्प (क) जैविक अंतर ग़लत है।

प्रश्न 8 — भारत में यहाँ औरतों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है:

उत्तर देखिए

उत्तर — (घ) पंचायती राज की संस्थाएँ (★ध्यान रहे — 2023 का नारी शक्ति वंदन अधिनियम लोकसभा और विधानसभाओं के लिए 33% आरक्षण देगा, पर अभ्यास का यह प्रश्न पहले से लागू व्यवस्था पूछ रहा है, जो पंचायती राज में है।)

प्रश्न 9 — सांप्रदायिक राजनीति इस धारणा पर आधारित है कि:★

कथनसही/ग़लत
(अ) एक धर्म दूसरों से श्रेष्ठ हैसही
(ब) विभिन्न धर्मों के लोग समान नागरिक के रूप में खुशी-खुशी साथ रह सकते हैंग़लत (यह तो सांप्रदायिकता के विपरीत सोच है)
(स) एक धर्म के अनुयायी एक समुदाय बनाते हैंसही
(द) एक धार्मिक समूह का प्रभुत्व बाकी सभी धर्मों पर कायम करने में शासन की शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकताग़लत
उत्तर देखिए

उत्तर — (ग) अ और स

प्रश्न 10 — भारतीय संविधान के बारे में इनमें से कौन-सा कथन ग़लत है?

उत्तर देखिए

उत्तर — (ख) यह एक धर्म को राजकीय धर्म बताता है। कारण — किताब का वाक्य: “भारतीय राज्य ने किसी भी धर्म को राजकीय धर्म के रूप में अंगीकार नहीं किया है।”

प्रश्न 11 — रिक्त स्थान★

“जाति पर आधारित सामाजिक विभाजन सिर्फ़ भारत में ही है।” कारण — “लिंग और धर्म पर आधारित विभाजन तो दुनिया भर में हैं पर जाति पर आधारित विभाजन सिर्फ़ भारतीय समाज में ही देखने को मिलता है।”

प्रश्न 12 — सुमेलित कीजिए★

सूची Iसूची II
1. अधिकारों और अवसरों के मामले में स्त्री और पुरुष की बराबरी मानने वाला व्यक्ति(ख) नारीवादी
2. धर्म को समुदाय का मुख्य आधार मानने वाला व्यक्ति(क) सांप्रदायिक
3. जाति को समुदाय का मुख्य आधार मानने वाला व्यक्ति(घ) जातिवादी
4. व्यक्तियों के बीच धार्मिक आस्था के आधार पर भेदभाव न करने वाला व्यक्ति(ग) धर्मनिरपेक्ष
उत्तर देखिए

उत्तर — (सा) 1-ख · 2-क · 3-घ · 4-ग

19 — इस अध्याय के अनिवार्य तथ्य

तथ्यविवरण
54% / 76%महिला / पुरुष साक्षरता दर
★919लिंग अनुपात (प्रति हज़ार लड़कों पर लड़कियाँ); कहीं 850, कहीं 800 से भी नीचे
7:30 बनाम 6:30औरत / मर्द का रोज़ाना काम; और घर के काम — 5:00 बनाम 0:30
14.36%लोकसभा में महिला सांसद (पहली बार 2019 में)
5% से कमराज्यों की विधान सभाओं में महिलाएँ
11.8 / 24 / 42.3संसद में महिलाएँ — भारत / विश्व औसत / नॉर्डिक देश
★एक तिहाई · 10 लाखस्थानीय निकायों में आरक्षण / निर्वाचित महिलाएँ
★★2023 · 33%नारी शक्ति वंदन अधिनियम — लोकसभा, विधानसभा और दिल्ली विधानसभा में आरक्षण
79.8 · 14.2 · 2.3 · 1.7हिंदू · मुसलमान · ईसाई · सिख (2011)
16.6 · 8.6 · ~41अनुसूचित जातियाँ · अनुसूचित जनजातियाँ · अन्य पिछड़ी जातियाँ
चार सुधारकफुले · गांधी · आंबेडकर · पेरियार
चार रूपसांप्रदायिकता — रोज़ · प्रभुत्व · गोलबंदी · हिंसा
चार प्रावधानधर्मनिरपेक्षता — कोई राजकीय धर्म नहीं · आज़ादी · भेदभाव अवैध · दख़ल का अधिकार

20 — शब्दावली

शब्दअर्थ
श्रम का लैंगिक विभाजन“काम के बँटवारे का वह तरीका जिसमें घर के अंदर के सारे काम परिवार की औरतें करती हैं या अपनी देखरेख में घरेलू नौकरों/नौकरानियों से कराती हैं।”
नारीवादी“औरत और मर्द के समान अधिकारों और अवसरों में विश्वास करने वाली महिला या पुरुष।”
पितृ-प्रधानशाब्दिक अर्थ पिता का शासन; पर यह महिलाओं की तुलना में पुरुषों को ज़्यादा महत्व और शक्ति देने वाली व्यवस्था के लिए प्रयुक्त होता है।
लिंग अनुपातप्रति हज़ार लड़कों पर लड़कियों की संख्या (भारत में 919)।
सांप्रदायिकताराजनीति में धर्म को इस तरह जोड़ना कि एक धर्म को दूसरे से श्रेष्ठ माना जाए और राज्य किसी एक धर्म के पक्ष में सत्ता का इस्तेमाल करे।
धर्मनिरपेक्ष शासनवह शासन जो किसी धर्म को राजकीय धर्म न बनाए, सबको धर्म की आज़ादी दे, भेदभाव को अवैध माने और समानता के लिए दख़ल दे सके।
पारिवारिक कानून“विवाह, तलाक, गोद लेना और उत्तराधिकार जैसे परिवार से जुड़े मसलों से संबंधित कानून”; भारत में सभी धर्मों के लिए अलग-अलग।
जाति व्यवस्थावह व्यवस्था जिसमें पेशे के वंशानुगत विभाजन को रीति-रिवाजों की मान्यता प्राप्त है और शादी तथा खानपान का संबंध अपने ही समूह में रहता है।
वर्ण-व्यवस्था“जाति समूहों का पदानुक्रम जिसमें एक जाति के लोग हर हाल में सामाजिक पायदान में सबसे ऊपर रहेंगे तो अन्य क्रमागत रूप से उनके नीचे।”
जातिवादयह मान्यता कि जाति ही सामाजिक समुदाय के गठन का एकमात्र आधार है।
शहरीकरण“ग्रामीण इलाकों से निकलकर लोगों का शहरों में बसना।”
वोट बैंकवह जाति या समुदाय जिसके ज़्यादातर लोग किसी एक पार्टी को वोट देते हैं।

21 — एक वाक्य में पूरा अध्याय

सामाजिक विविधता लोकतंत्र के लिए ख़तरा नहीं है — सवाल यह है कि वह राजनीति में किस रूप में आती है; लैंगिक विभाजन को राजनीतिक बनाना ज़रूरी था, क्योंकि तभी आरक्षण, अधिकार और आवाज़ मिली (पंचायतों में एक तिहाई, 10 लाख से ज़्यादा निर्वाचित महिलाएँ, और 2023 का नारी शक्ति वंदन अधिनियम); पर सांप्रदायिकता — यानी “राजनीति में धर्म को इस तरह जोड़ना” कि एक धर्म को श्रेष्ठ माना जाए — “भारत की बुनियादी अवधारणा के लिए एक चुनौती है, एक ख़तरा है”, जिसका उत्तर संविधान का धर्मनिरपेक्ष मॉडल है, यद्यपि “अकेले इसी के बूते सांप्रदायिकता का मुकाबला नहीं किया जा सकता”; और जाति — जो “सिर्फ़ भारतीय समाज में ही देखने को मिलती है” — ने एक ओर दलित और पिछड़ी जातियों को सत्ता तक पहुँचने की स्थिति दी, तो दूसरी ओर “सिर्फ़ जातिगत पहचान पर आधारित राजनीति लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं होती”; और तीनों का उत्तर किताब के एक ही वाक्य में है — “हर व्यक्ति कई तरह की भूमिका निभाता है। उसकी हैसियत और पहचान अलग-अलग होती है।”