अध्याय 5लोकतंत्र के परिणाम

शिक्षण नोट्स27 मिनट

पाठ्यपुस्तक — लोकतांत्रिक राजनीति, कक्षा 10 राजनीति विज्ञान · NCERT · पृष्ठ 63 से 74


शून्य — पढ़ाने से पहले यह समझ लीजिए

★★यह पूरी पुस्तक का — और पूरे कक्षा-10 सामाजिक विज्ञान का — अंतिम अध्याय है। किताब स्वयं कहती है — “अब जब कि हम लोकतंत्र की अपनी यात्रा के आखिरी पड़ाव पर हैं तब विशिष्ट बातों की चर्चा से आगे जाने और कुछ सामान्य किस्म के सवाल पूछने का वक्त आ गया है।” यह अध्याय नई जानकारी का नहीं — हिसाब-किताब का अध्याय है। चार अध्यायों में जो पढ़ा, उसका तुलन-पत्र (balance sheet) — हर खाते में उम्मीद बनाम हक़ीक़त।

अध्याय की बनावट — एक तुलन-पत्र, पाँच खाते

खातापृष्ठउम्मीदहक़ीक़त (किताब का फ़ैसला)
1 — शासन का स्वरूप65–67उत्तरदायी, ज़िम्मेवार, पारदर्शी, भ्रष्टाचार-मुक्तमिला-जुला — पर वैधता में लोकतंत्र निर्विवाद रूप से बेहतर
2 — आर्थिक संवृद्धि67–68तेज़ विकास! तानाशाहियों का record थोड़ा बेहतर — पर गरीब देशों में अंतर लगभग समाप्त
3 — असमानता-गरीबी69असमानता में कमी! “ज़्यादा सफल नहीं हो पाई हैं”
4 — सामाजिक सामंजस्य70–71विविधता में तालमेल★बड़ा गुण — पर दो शर्तों के साथ
5 — गरिमा-आज़ादी71–72हर नागरिक का सम्मान★★“किसी भी अन्य शासन प्रणाली से काफ़ी आगे”

★★अध्याय की आत्मा दो वाक्यों में — “लोकतंत्र शासन का एक स्वरूप भर है। यह कुछ चीज़ों को हासिल करने की स्थितियाँ तो बना सकता है पर नागरिकों को ही उन स्थितियों का लाभ लेकर अपने लक्ष्यों को हासिल करना होता है।” और — “लोकतंत्र हमारी सभी सामाजिक बुराइयों को मिटा देने वाली जादू की छड़ी भी नहीं है।”

बोर्ड पर पूरे अध्याय भर रहने वाली पंक्ति —

“लोकतंत्र जादू की छड़ी नहीं है — पर वह अकेली व्यवस्था है जो अपनी जाँच ख़ुद करवाती है।”

1 — मूल्यांकन कैसे करें? (पृष्ठ 64)

पाँच उम्मीदें — मैडम लिंगदोह की कक्षा से(कक्षा 9 की याद)★

“लोकतंत्र को सबसे बेहतर बताया गया था क्योंकि यह —

  1. नागरिकों में समानता को बढ़ावा देता है;
  2. व्यक्ति की गरिमा को बढ़ाता है;
  3. इससे फ़ैसलों में बेहतरी आती है;
  4. टकरावों को टालने-सँभालने का तरीका देता है; और 5. इसमें गलतियों को सुधारने की गुंजाइश होती है।”

★सूत्र — “समानता · गरिमा · फ़ैसले · टकराव · गलती-सुधार”

दुविधा — और यही अध्याय का इंजन है★★

“सो, हम एक दुविधा की स्थिति में आ जाते हैं: सैद्धांतिक रूप में तो लोकतंत्र को अच्छा माना जाता है पर व्यवहार में इसे इतना अच्छा नहीं माना जाता। इस दुविधा के चलते लोकतंत्र के नतीजों पर ज़्यादा गहराई से विचार करना ज़रूरी हो जाता है।” और सवाल — “क्या हम सिर्फ़ नैतिक कारणों से ही लोकतंत्र को पसंद करते हैं? या फिर, लोकतंत्र के समर्थन के पीछे कुछ युक्तिपरक कारण भी हैं?” ★(अध्याय 1 के दो तर्क याद कीजिए — वही जोड़ी यहाँ लौटती है।)

सावधानी की तीन बातें

  • “आज दुनिया के सौ देश किसी न किसी तरह की लोकतांत्रिक व्यवस्था चलाने का दावा करते हैं” — औपचारिक संविधान, चुनाव, दल, बुनियादी अधिकारों की गारंटी — पर सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक स्थितियाँ अलग-अलग, इसलिए नतीजे भी अलग-अलग।
  • ! “कई बार हम लोकतंत्र को हर मर्ज की दवा मान लेते हैं और उससे हर चीज़ की उम्मीद करने लगते हैं… जब हमारी कुछ उम्मीदें पूरी नहीं होतीं तो हम लोकतंत्र की अवधारणा को ही दोष देने लगते हैं।”
  • ★★“पहला कदम यही है कि हम पहले यह मानें कि लोकतंत्र शासन का एक स्वरूप भर है। यह कुछ चीज़ों को हासिल करने की स्थितियाँ तो बना सकता है पर नागरिकों को ही उन स्थितियों का लाभ लेकर अपने लक्ष्यों को हासिल करना होता है।”

2 — खाता 1: उत्तरदायी, ज़िम्मेवार और वैध शासन (पृष्ठ 65–67)★★

सबसे बड़ी चिंता

“लोकतंत्र में सबसे बड़ी चिंता यह होती है कि लोगों का अपना शासक चुनने का अधिकार और शासकों पर नियंत्रण बरकरार रहे। वक्त-ज़रूरत और यथासंभव… लोगों को निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी करने में सक्षम होना चाहिए ताकि लोगों के प्रति ज़िम्मेवार सरकार बन सके।”

“पर क्या लोकतांत्रिक सरकार कार्यकुशल होती है?” — किताब का सुंदर जवाब★

आरोपजवाब
“अलोकतांत्रिक सरकारों को विधायिका का सामना नहीं करना होता… बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक नज़रिए का ख्याल नहीं रखना पड़ता” — इसलिए वे तेज़ फ़ैसले ले सकती हैंतेज़ फ़ैसला “ऐसे फ़ैसले भी” हो सकता है “जिसे लोग स्वीकार न करें”
“लोकतांत्रिक सरकार सारी प्रक्रिया को पूरा करने में ज़्यादा समय ले सकती है”★★“लेकिन इसने पूरी प्रक्रिया को माना है इसलिए इस बात की ज़्यादा संभावना है कि लोग उसके फ़ैसलों को मानेंगे और वे ज़्यादा प्रभावी होंगे। इस प्रकार लोकतंत्र में फ़ैसला लेने में जो वक्त लगता है वह बेकार नहीं जाता।”

पारदर्शिता★

“लोकतंत्र में इस बात की पक्की व्यवस्था होती है कि फ़ैसले कुछ कायदे-कानून के अनुसार होंगे और अगर कोई नागरिक यह जानना चाहे कि फ़ैसले लेने में नियमों का पालन हुआ है या नहीं तो वह इसका पता कर सकता है। उसे यह न सिर्फ़ जानने का अधिकार है बल्कि उसके पास इसके साधन भी उपलब्ध हैं। इसे पारदर्शिता कहते हैं। यह चीज़ अक्सर गैर-लोकतांत्रिक सरकारों में नहीं होती।”

मूल्यांकन के तीन पैमाने — और मिला-जुला record

पैमानाrecord
नियमित और निष्पक्ष चुनावज़्यादा सफल — “पर ऐसे चुनाव कराने में जिसमें सबको अवसर मिले” उतनी नहीं
प्रमुख नीतियों-नए कानूनों पर खुली सार्वजनिक चर्चा“उनका रिकॉर्ड ज़्यादा अच्छा नहीं रहा है”
नागरिकों का सूचना का अधिकार! “नागरिकों के साथ सूचनाओं का साझा करने के मामले में उनका रिकॉर्ड खराब रहा है”

! और भ्रष्टाचार — “इन दो मामलों में भी लोकतांत्रिक सरकारों का रिकॉर्ड प्रभावशाली नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ अक्सर लोगों को उनकी ज़रूरतों के लिए तरसाती हैं और आबादी के एक बड़े हिस्से की माँगों की उपेक्षा करती हैं।” ★पर संतुलन भी — “इसके साथ इस पर भी ध्यान दें कि गैर-लोकतांत्रिक सरकारें कम भ्रष्ट या लोगों की ज़रूरतों के प्रति संवेदनशील हैं — यह कहने का कोई आधार नहीं है।”

पर एक मामले में लोकतंत्र निर्विवाद विजेता — वैधता★★

“बहरहाल, एक मामले में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था निश्चित रूप से अन्य शासनों से बेहतर है: यह वैध शासन व्यवस्था है। यह सुस्त हो सकती है, कम कार्य-कुशल हो सकती है, इसमें भ्रष्टाचार हो सकता है, यह लोगों की ज़रूरतों की कुछ हद तक अनदेखी कर सकती है लेकिन लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था लोगों की अपनी शासन व्यवस्था है।”

और इसका प्रमाण — दक्षिण एशिया के आँकड़े (SDSA-2007) —

“लोकतंत्र बेहतर” मानने वालेप्रतिशत
श्रीलंका71
भारत70
बांग्लादेश69
नेपाल62
! पाकिस्तान37

★“पाकिस्तान को छोड़कर हर जगह लोकतंत्र को तानाशाही के ऊपर वरीयता” — और “जहाँ लोकतांत्रिक सरकारें नहीं हैं, वहाँ भी लोग अपने द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का शासन चाहते हैं।” ★★“अपने लिए समर्थन पैदा करने की लोकतंत्र की क्षमता भी लोकतंत्र का एक परिणाम ही है और इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।”

3 — खाता 2: आर्थिक संवृद्धि और विकास (पृष्ठ 67–68)★

चार्ट 1 — विभिन्न देशों में आर्थिक विकास की दरें(1950–2000)

शासन का प्रकारविकास दर
सभी लोकतांत्रिक शासन3.95
सभी तानाशाहियाँ4.42
तानाशाही वाले गरीब देश4.34
लोकतंत्र वाले गरीब देश4.28

“अगर हम 1950 से 2000 के बीच के सभी लोकतांत्रिक शासनों और तानाशाहियों के कामकाज की तुलना करें तो पाएँगे कि आर्थिक संवृद्धि के मामले में तानाशाहियों का रिकॉर्ड थोड़ा बेहतर है।” ★★पर — “जब हम सिर्फ़ गरीब मुल्कों के रिकॉर्ड की ही तुलना करते हैं तो अंतर लगभग समाप्त हो जाता है।” (4.34 बनाम 4.28)

किताब का संतुलित फ़ैसला

“उच्चतर आर्थिक संवृद्धि हासिल करने में लोकतांत्रिक शासन की यह अक्षमता हमारे लिए चिंता का कारण है। पर अकेले इसी कारण से लोकतंत्र को खारिज नहीं किया जा सकता। जैसा कि आपने अर्थशास्त्र में पढ़ा है — आर्थिक विकास कई कारकों मसलन देश की जनसंख्या के आकार, वैश्विक स्थिति, अन्य देशों से सहयोग और देश द्वारा तय की गई आर्थिक प्राथमिकताओं पर भी निर्भर करता है।” ★“तानाशाही और लोकतांत्रिक शासन वाले देशों के आर्थिक विकास दर में अंतर भले ज़्यादा हो लेकिन इसके बावजूद लोकतांत्रिक व्यवस्था का चुनाव ही बेहतर है क्योंकि इसके अन्य अनेक सकारात्मक फ़ायदे हैं।”

4 — खाता 3: असमानता और गरीबी में कमी (पृष्ठ 69)ध्यान

राजनीतिक बराबरी — पर आर्थिक खाई

“लोकतांत्रिक व्यवस्था राजनीतिक समानता पर आधारित होती है। प्रतिनिधियों के चुनाव में हर व्यक्ति का वज़न बराबर होता है। व्यक्तियों को राजनीतिक क्षेत्र में परस्पर बराबरी का दर्जा तो मिल जाता है लेकिन इसके साथ-साथ हम आर्थिक असमानताओं को भी बढ़ता हुआ पाते हैं।” “मुट्ठी भर धनकुबेर आय और संपत्ति में अपने अनुपात से ज़्यादा हिस्सा पाते हैं… समाज के सबसे निचले हिस्से के लोगों को जीवन बसर करने के लिए काफ़ी कम साधन मिलते हैं… कई बार उन्हें भोजन, कपड़ा, मकान, शिक्षा और इलाज जैसी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने में मुश्किल आती है।”

चार्ट 2 — चुने हुए देशों में आय की असमानता(राष्ट्रीय आय में हिस्सा)

देशऊपर के 20%नीचे के 20%
दक्षिण अफ्रीका64.82.9
ब्राज़ील63.02.6
रूस53.74.4
अमरीका50.04.0
ब्रिटेन45.06.0
★डेनमार्क34.59.6
★हंगरी34.410.0

★★किताब का फ़ैसला — “वास्तविक जीवन में लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ आर्थिक असमानताओं को कम करने में ज़्यादा सफल नहीं हो पाई हैं।” और सबसे चुभने वाली बात — “हमारे मतदाताओं में गरीबों की संख्या काफ़ी बड़ी है इसलिए कोई भी पार्टी उनके मतों से हाथ धोना नहीं चाहेगी। फिर भी लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित सरकारें गरीबी के सवाल पर उतना ध्यान देने को तत्पर नहीं जान पड़तीं जितने कि आप उनसे उम्मीद करते हैं।” उदाहरण — “बांग्लादेश में आधी से ज़्यादा आबादी गरीबी में जीवन गुज़ारती है। अनेक गरीब देशों के लोग अपनी खाद्य-आपूर्ति के लिए भी अब अमीर देशों पर निर्भर हो गए हैं।”

5 — खाता 4: सामाजिक विविधताओं में सामंजस्य (पृष्ठ 70–71)★★

लोकतंत्र का बड़ा गुण

“लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ अनेक तरह के सामाजिक विभाजनों को सँभालती हैं। हमने पहले अध्याय में देखा कि किस तरह बेल्जियम ने अपने यहाँ के विभिन्न जातीय समूहों की आकांक्षाओं के बीच सफलतापूर्वक सामंजस्य स्थापित किया… इससे इन टकरावों के विस्फोटक या हिंसक रूप लेने का अंदेशा कम हो जाता है।” “कोई भी समाज अपने विभिन्न समूहों के बीच के टकरावों को पूरी तरह और स्थायी रूप से नहीं खत्म कर सकता पर हम इन अंतरों और विभेदों का आदर करना सीख सकते हैं और इनके बीच बातचीत से सामंजस्य बैठाने का तरीका विकसित कर सकते हैं। इस काम के लिए लोकतंत्र सबसे अच्छा है।” “गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ आमतौर पर अपने अंदरूनी सामाजिक मतभेदों से आँखें फेर लेती हैं या उन्हें दबाने की कोशिश करती हैं।”

पर दो शर्तें — श्रीलंका की याद के साथ★★

“पर श्रीलंका का उदाहरण हमें इस बात की भी याद दिलाता है कि इस परिणाम को हासिल करने के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को स्वयं भी दो शर्तों को पूरा करना होता है —

#शर्त
1“लोकतंत्र का सीधे-सीधे अर्थ बहुमत की राय से शासन करना नहीं है। बहुमत को सदा ही अल्पमत का ध्यान रखना होता है। उसके साथ काम करने की ज़रूरत होती है। तभी, सरकार जन-सामान्य की इच्छा का प्रतिनिधित्व कर पाती है। बहुमत और अल्पमत की राय कोई स्थायी चीज़ नहीं होती।”
★★2“बहुमत के शासन का अर्थ धर्म, नस्ल अथवा भाषायी आधार के बहुसंख्यक समूह का शासन नहीं होता। बहुमत के शासन का मतलब होता है कि हर फ़ैसले या चुनाव में अलग-अलग लोग और समूह बहुमत का निर्माण कर सकते हैं या बहुमत में हो सकते हैं। लोकतंत्र तभी तक लोकतंत्र रहता है जब तक, प्रत्येक नागरिक को किसी न किसी अवसर पर बहुमत का हिस्सा बनने का मौका मिलता है। ! अगर किसी को जन्म के आधार पर बहुसंख्यक समुदाय का हिस्सा बनने से रोका जाता है तब लोकतांत्रिक शासन उस व्यक्ति या समूह के लिए समावेशी नहीं रह जाता।”

★यह पूरी किताब का धागा एक जगह आ जाता है — अध्याय 1 (बेल्जियम-श्रीलंका) + अध्याय 3 (बहुसंख्यकवाद-सांप्रदायिकता) — यहीं इनका निष्कर्ष है।

6 — खाता 5: नागरिकों की गरिमा और आज़ादी (पृष्ठ 71–72)★★

★★“व्यक्ति की गरिमा और आज़ादी के मामले में लोकतांत्रिक व्यवस्था किसी भी अन्य शासन प्रणाली से काफ़ी आगे है। प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ के लोगों से सम्मान पाना चाहता है।… गरिमा और आज़ादी की चाह ही लोकतंत्र का आधार है।”

दो उदाहरण — और दोनों पिछले अध्यायों से जुड़ते हैं★

उदाहरणकिताब की बात
स्त्रियों की गरिमा“दुनिया के अधिकांश समाज पुरुष-प्रधान समाज रहे हैं। महिलाओं के लंबे संघर्ष के बाद अब जाकर यह माना जाने लगा है कि महिलाओं के साथ गरिमा और समानता का व्यवहार लोकतंत्र की ज़रूरी शर्त है।” ★“एक बार सिद्धांत रूप में इस बात को स्वीकार कर लिया गया है तो अब औरतों के लिए वैधानिक और नैतिक रूप से अपने प्रति गलत मान्यताओं और व्यवहारों के खिलाफ़ संघर्ष करना आसान हो गया है। अलोकतांत्रिक व्यवस्था में यह बात संभव न थी क्योंकि वहाँ व्यक्तिगत आज़ादी और गरिमा न तो वैधानिक रूप से मान्य है, न नैतिक रूप से।”
जातिगत समानता“भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था ने कमज़ोर और भेदभाव का शिकार हुई जातियों के लोगों के समान दर्जे और समान अवसर के दावे को बल दिया है। आज भी जातिगत भेदभाव और दमन के उदाहरण देखने को मिलते हैं पर इनके पक्ष में कानूनी या नैतिक बल नहीं होता।”

★यह अध्याय 3 का ही निष्कर्ष है — “संभवतः इसी एहसास के चलते आम लोग अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति ज़्यादा चौकस हुए हैं।”

7 — निष्कर्ष: जाँच जो कभी ख़त्म नहीं होती (पृष्ठ 72)★★

“लोकतंत्र की एक खासियत है कि इसकी जाँच-परख और परीक्षा कभी खत्म नहीं होती। वह एक जाँच पर खरा उतरे तो अगली जाँच आ जाती है। लोगों को जब लोकतंत्र से थोड़ा लाभ मिल जाता है तो वे और लाभों की माँग करने लगते हैं… वे लोकतंत्र से और अच्छा काम चाहते हैं।” ★★“यही कारण है कि जब हम उनसे लोकतंत्र के कामकाज के बारे में पूछते हैं तो वे हमेशा अपनी अन्य अपेक्षाओं का पुलिंदा खोल देते हैं और शिकायतों का अंबार लगा देते हैं। शिकायतों का बने रहना भी लोकतंत्र की सफलता की गवाही देता है। इससे पता चलता है कि लोग सचेत हो गए हैं और वे सत्ता में बैठे लोगों के कामकाज का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने लगे हैं।” ★★“लोकतंत्र के कामकाज से लोगों का असंतोष जताना लोकतंत्र की सफलता का ही तो गान है — साथ ही यह लोगों के प्रजा से नागरिक बनने की गवाही भी देता है।” और अंतिम प्रमाण — “आज अधिकांश लोग मानते हैं कि सरकार की चाल-ढाल पर उनके वोट से असर पड़ता है।” (“हमारे वोट का असर पड़ता है” — भारत 67 · नेपाल 75 · बांग्लादेश 66 · श्रीलंका 65 · पाकिस्तान 50 · दक्षिण एशिया 65)

★★कक्षा में अंतिम बात इसी वाक्य पर — “शिकायत करना ही सबूत है कि हम प्रजा नहीं, नागरिक हैं। प्रजा चुप रहती है — नागरिक सवाल पूछता है।”

8 — NCERT प्रश्नावली के पूरे उत्तर (पृष्ठ 73–74)

प्रश्न 1 — लोकतंत्र किस तरह उत्तरदायी, ज़िम्मेवार और वैध सरकार का गठन करता है?

(क) उत्तरदायी — लोगों को “अपना शासक चुनने का अधिकार और शासकों पर नियंत्रण” रहता है; लोग निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी कर सकते हैं। सरकार नियमित-निष्पक्ष चुनाव, नीतियों पर खुली सार्वजनिक चर्चा और सूचना के अधिकार के पैमानों पर परखी जाती है। (ख) ज़िम्मेवार — फ़ैसले “कुछ कायदे-कानून के अनुसार” होते हैं और नागरिक पालन की जाँच कर सकता है — यही पारदर्शिता है, जो “अक्सर गैर-लोकतांत्रिक सरकारों में नहीं होती।” फ़ैसलों में समय भले लगे, “लोकतंत्र में फ़ैसला लेने में जो वक्त लगता है वह बेकार नहीं जाता” — प्रक्रिया मानने से फ़ैसले ज़्यादा स्वीकार्य और प्रभावी होते हैं। (ग) वैध — “एक मामले में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था निश्चित रूप से अन्य शासनों से बेहतर है: यह वैध शासन व्यवस्था है… लोगों की अपनी शासन व्यवस्था है।” इसीलिए “पूरी दुनिया में लोकतंत्र के विचार के प्रति जबरदस्त समर्थन का भाव है” — दक्षिण एशिया में भी (लोकतंत्र बेहतर: श्रीलंका 71 · भारत 70 · बांग्लादेश 69)।

प्रश्न 2 — लोकतंत्र किन स्थितियों में सामाजिक विविधता को सँभालता है और सामंजस्य बैठाता है?

लोकतंत्र “अनेक तरह के सामाजिक विभाजनों को सँभालता” है (उदाहरण — बेल्जियम); उसमें “प्रतिद्वंद्विताओं को सँभालने की प्रक्रिया” विकसित हो जाती है जिससे टकराव विस्फोटक/हिंसक नहीं बनते; “इस काम के लिए लोकतंत्र सबसे अच्छा है” — जबकि गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ मतभेदों से “आँखें फेर लेती हैं या उन्हें दबाने की कोशिश करती हैं।” ★पर दो शर्तें पूरी होनी चाहिए (श्रीलंका की सीख) — (1) “बहुमत को सदा ही अल्पमत का ध्यान रखना होता है… तभी सरकार जन-सामान्य की इच्छा का प्रतिनिधित्व कर पाती है”; बहुमत-अल्पमत की राय स्थायी नहीं होती। (2) “बहुमत के शासन का अर्थ धर्म, नस्ल अथवा भाषायी आधार के बहुसंख्यक समूह का शासन नहीं होता” — “लोकतंत्र तभी तक लोकतंत्र रहता है जब तक प्रत्येक नागरिक को किसी न किसी अवसर पर बहुमत का हिस्सा बनने का मौका मिलता है”; जन्म के आधार पर रोका जाए तो शासन समावेशी नहीं रहता।

प्रश्न 3 — कथनों के पक्ष या विपक्ष में तर्क★

(क) “औद्योगिक देश ही लोकतंत्र का भार उठा सकते हैं, गरीब देशों को तानाशाही चाहिए” — विपक्ष में। चार्ट 1 ख़ुद दिखाता है कि गरीब देशों में तानाशाही (4.34) और लोकतंत्र (4.28) की विकास दर का “अंतर लगभग समाप्त हो जाता है”; और लोकतंत्र के “अन्य अनेक सकारात्मक फ़ायदे” हैं — वैधता, गरिमा, टकराव-प्रबंधन। ★दक्षिण एशिया के गरीब देशों की जनता भी लोकतंत्र को ही वरीयता देती है। (ख) “लोकतंत्र असमानता कम नहीं कर सकता” — आंशिक पक्ष, पर पूर्ण नहीं। सच है कि “वास्तविक जीवन में… ज़्यादा सफल नहीं हो पाई हैं”; पर लोकतंत्र राजनीतिक समानता देता है (“हर व्यक्ति का वज़न बराबर”) और गरीब मतदाताओं की बड़ी संख्या के कारण दबाव की संभावना हमेशा खुली रहती है — असमानता घटाना नागरिकों की सक्रियता पर निर्भर है, क्योंकि “लोकतंत्र शासन का एक स्वरूप भर है।” (ग) “गरीब देशों की सरकार गरीबी-आहार-स्वास्थ्य-शिक्षा की जगह उद्योगों-ढाँचे पर खर्च करे” — विपक्ष में। (अर्थशास्त्र अध्याय 1 की याद) — लोगों को भोजन, कपड़ा, मकान, शिक्षा और इलाज जैसी “बुनियादी ज़रूरतें” पहले चाहिए; इनके बिना मानव-पूँजी ही नहीं बनती जिस पर उद्योग टिकते हैं; और लोकतांत्रिक सरकार को “लोगों की ज़रूरतों और माँगों का ध्यान” रखना ही उसका धर्म है। (घ) “आर्थिक समानता अमीर-गरीब दोनों तरह के लोकतांत्रिक देशों में है” — विपक्ष में (कथन ग़लत)। चार्ट 2 — अमरीका जैसे अमीर लोकतंत्र में भी ऊपर के 20% के पास 50% आय और नीचे के 20% के पास 4%; दक्षिण अफ्रीका 64.8/2.9। यानी “लोकतांत्रिक शासन के अंदर भी भारी आर्थिक असमानता” हो सकती है। (ङ) “सबको एक वोट = कोई प्रभुत्व और टकराव नहीं” — विपक्ष में (कथन ग़लत)। एक वोट राजनीतिक बराबरी देता है, पर सामाजिक-आर्थिक प्रभुत्व और टकराव बने रहते हैं; लोकतंत्र टकरावों को “पूरी तरह और स्थायी रूप से” ख़त्म नहीं करता — वह उन्हें सँभालने का तरीक़ा देता है।

प्रश्न 4 — चुनौतियों की पहचान + नीतिगत-संस्थागत उपाय★

(क) मंदिर के अलग दरवाज़े (ओडिशा) — चुनौती: जातिगत भेदभाव और छुआछूत — नागरिकों की गरिमा पर चोट। ★पर यह घटना लोकतंत्र की ताक़त भी दिखाती है — उच्च न्यायालय के निर्देश से एक ही दरवाज़े से सबको प्रवेश मिला; “जातिगत भेदभाव के पक्ष में कानूनी या नैतिक बल नहीं होता।” उपाय — छुआछूत-विरोधी क़ानूनों का कड़ा क्रियान्वयन; सामाजिक शिक्षा। (ख) किसान आत्महत्याएँ — चुनौती: आर्थिक असमानता और गरीबी — सरकारें “गरीबी के सवाल पर उतना ध्यान देने को तत्पर नहीं।” उपाय — क़र्ज़-राहत और फ़सल बीमा; सिंचाई-मूल्य समर्थन; ★और किसानों की संगठित आवाज़ — क्योंकि लोकतंत्र में “दबाव” ही नीतियाँ बदलवाता है। (ग) मुठभेड़ में नागरिकों की हत्या का आरोप (जम्मू-कश्मीर, गंडवारा) — चुनौती: नागरिकों की आज़ादी और गरिमा बनाम राज्य की शक्ति। ★पर “इस घटना की जाँच के आदेश” दिए गए — यही उत्तरदायी शासन है: लोकतंत्र में सुरक्षा बल भी जवाबदेह हैं। उपाय — स्वतंत्र जाँच; मानवाधिकार संस्थाओं की निगरानी; दोषियों पर कार्रवाई।

प्रश्न 5 — लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं ने सफलतापूर्वक:

उत्तर देखिए

उत्तर — (घ) राजनीतिक गैर-बराबरी के विचार को समाप्त कर दिया है। (! बाक़ी तीनों ग़लत — टकराव समाप्त नहीं होते, आर्थिक असमानताएँ बनी रहती हैं, हाशिए के समूहों पर मतभेद मिटे नहीं हैं। पर “हर व्यक्ति का वज़न बराबर” — राजनीतिक बराबरी लोकतंत्र ने सचमुच दी है।)

प्रश्न 6 — लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं:★

उत्तर देखिए

उत्तर — (ग) बहुसंख्यकों का शासन। कारण — “बहुमत के शासन का अर्थ धर्म, नस्ल अथवा भाषायी आधार के बहुसंख्यक समूह का शासन नहीं होता” — यही तो अध्याय 1 और 3 की भी सीख थी।

प्रश्न 7 — अध्ययन बताते हैं कि:

उत्तर देखिए

उत्तर — (ख) लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में असमानताएँ बनी रहती हैं। (! “लोकतंत्र और विकास साथ चलते हैं” — चार्ट 1 इसे सिद्ध नहीं करता; “तानाशाही में असमानताएँ नहीं होतीं” और “तानाशाहियाँ बेहतर साबित हुई हैं” — दोनों ग़लत।)

प्रश्न 8 — नन्नू का उदाहरण(पृष्ठ 74)★★

कहानी — पूर्वी दिल्ली की झुग्गी बस्ती का दिहाड़ी मजदूर नन्नू; राशन कार्ड गुम; जनवरी 2006 में डुप्लीकेट के लिए अर्ज़ी; तीन महीने चक्कर — कोई सुनवाई नहीं। फिर उसने ★सूचना के अधिकार (RTI) से अपनी “अर्ज़ी की दैनिक प्रगति”, “काम करने वाले अधिकारियों के नाम” और “काम न करने की सूरत में उनके खिलाफ़ होने वाली कार्रवाई” का ब्यौरा माँगा। हफ़्ते भर के अंदर इंस्पेक्टर घर आया — “तुम्हारा राशन कार्ड तैयार है”; अगले दिन सबसे बड़े अधिकारी ने गर्मजोशी से स्वागत किया, चाय पिलाई और कहा — “अब आपका काम हो गया है इसलिए सूचना के अधिकार वाला अपना आवेदन आप वापस ले लें।” नन्नू का उदाहरण क्या बताता है? — (1) पारदर्शिता की ताक़त — नागरिक को “न सिर्फ़ जानने का अधिकार है बल्कि उसके पास इसके साधन भी उपलब्ध हैं”; (2) जवाबदेही का डर काम करता है — तीन महीने में जो नहीं हुआ, वह कार्रवाई के ब्यौरे माँगते ही हफ़्ते में हो गया; (3) ★★और सबसे बड़ी बात — एक दिहाड़ी मजदूर ने बिना रिश्वत, बिना सिफ़ारिश, केवल एक लोकतांत्रिक अधिकार से व्यवस्था को झुका दिया — यही “प्रजा से नागरिक बनना” है। अधिकारियों पर क्या असर हुआ? — रवैया उपेक्षा से गर्मजोशी में बदल गया — क्योंकि अब उनके नाम दर्ज होने और कार्रवाई का प्रश्न था; आवेदन वापस लेने का आग्रह ख़ुद इस बात का प्रमाण है कि RTI उन पर भारी पड़ा।

9 — अनिवार्य तथ्य

तथ्यब्योरा
पाँच उम्मीदेंसमानता · गरिमा · फ़ैसले · टकराव · गलती-सुधार
सौ देशलोकतांत्रिक व्यवस्था चलाने का दावा
तीन पैमानेचुनाव · सार्वजनिक चर्चा · सूचना का अधिकार
★चार्ट 1 (1950–2000)लोकतंत्र 3.95 · तानाशाही 4.42 · गरीब देशों में 4.28 बनाम 4.34
चार्ट 2द.अफ्रीका 64.8/2.9 · ब्राज़ील 63.0/2.6 · अमरीका 50.0/4.0 · डेनमार्क 34.5/9.6 · हंगरी 34.4/10.0
“लोकतंत्र बेहतर”श्रीलंका 71 · भारत 70 · बांग्लादेश 69 · नेपाल 62 · ! पाकिस्तान 37
“वोट का असर पड़ता है”नेपाल 75 · भारत 67 · बांग्लादेश 66 · श्रीलंका 65 · पाकिस्तान 50 · द.एशिया 65
दो शर्तेंअल्पमत का ध्यान · बहुमत ≠ जन्म-आधारित समूह
नन्नूदिहाड़ी मजदूर · पूर्वी दिल्ली · जनवरी 2006 · राशन कार्ड · RTI से हफ़्ते में काम

10 — शब्दावली

शब्दअर्थ
वैध शासनवह शासन जो “लोगों की अपनी शासन व्यवस्था” हो — भले धीमा या कम कार्यकुशल हो।
पारदर्शितानागरिक का यह अधिकार और साधन कि वह जाँच सके — “फ़ैसले लेने में नियमों का पालन हुआ है या नहीं।”
उत्तरदायी सरकारजो लोगों के प्रति जवाबदेह हो — चुनाव, चर्चा और सूचना के पैमानों पर परखी जा सके।
राजनीतिक समानता“हर व्यक्ति का वज़न बराबर” — एक व्यक्ति, एक वोट, एक मोल।
समावेशी शासनजिसमें “प्रत्येक नागरिक को किसी न किसी अवसर पर बहुमत का हिस्सा बनने का मौका” मिले।
आर्थिक संवृद्धिदेश की आर्थिक विकास दर — जो कई कारकों (जनसंख्या, वैश्विक स्थिति, सहयोग, प्राथमिकताएँ) पर निर्भर है।
गरिमाहर व्यक्ति की सम्मान पाने की चाह — “गरिमा और आज़ादी की चाह ही लोकतंत्र का आधार है।”

11 — एक वाक्य में पूरा अध्याय

लोकतंत्र से हमें पाँच उम्मीदें थीं और जाँच में तुलन-पत्र मिला-जुला निकला — शासन धीमा पर “फ़ैसला लेने में जो वक्त लगता है वह बेकार नहीं जाता” और वैधता में लोकतंत्र निर्विवाद विजेता है (“लोगों की अपनी शासन व्यवस्था”); आर्थिक संवृद्धि में तानाशाहियों का record थोड़ा बेहतर (3.95 बनाम 4.42) पर गरीब देशों में अंतर लगभग समाप्त (4.28 बनाम 4.34); असमानता घटाने में लोकतंत्र “ज़्यादा सफल नहीं” रहा; सामाजिक विविधता सँभालने में वह “सबसे अच्छा” है — बशर्ते बहुमत अल्पमत का ध्यान रखे और बहुमत का अर्थ जन्म-आधारित समूह का शासन न हो; और गरिमा-आज़ादी में वह “किसी भी अन्य प्रणाली से काफ़ी आगे” है; क्योंकि “लोकतंत्र शासन का एक स्वरूप भर है — स्थितियाँ वह बनाता है, लक्ष्य नागरिकों को हासिल करने होते हैं” — और इसीलिए “शिकायतों का बने रहना भी लोकतंत्र की सफलता की गवाही देता है… यह लोगों के प्रजा से नागरिक बनने की गवाही भी देता है।”