कक्षा — 10 · विषय — सामाजिक विज्ञान (अर्थशास्त्र) · पृष्ठ — 39 से 53 · कुल कालांश — 9
पूरी योजना एक नज़र में
| कालांश | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| 1 | मुद्रा और आवश्यकताओं का दोहरा संयोग | 39–40 |
| 2 | मुद्रा के आधुनिक रूप — करेंसी और माँग जमा; चैक | 40–42 |
| 3 | बैंकों की ऋण संबंधी गतिविधियाँ (15% वाला नियम) | 42 |
| 4 | ★★साख की दो स्थितियाँ — सलीम और स्वप्ना | 43–44 |
| 5 | ऋण की शर्तें और समर्थक ऋणाधार; मेघा का आवास ऋण | 44–45 |
| 6 | ★सोनपुर गाँव — चार लोग, चार शर्तें | 46–47 |
| 7 | ★★औपचारिक और अनौपचारिक साख; RBI की भूमिका; आलेख 1 व 2 | 48–50 |
| 8 | ★स्वयं सहायता समूह और बांग्लादेश का ग्रामीण बैंक | 50–52 |
| 9 | पुनरावृत्ति और अभ्यास | 52–53 |
★इस अध्याय की सबसे बड़ी बात — पहले चार पृष्ठ मुद्रा के हैं, पर असली अध्याय पृष्ठ 43 से शुरू होता है — साख से। और वहाँ किताब कोई एक-तरफ़ा जवाब नहीं देती: “ऋण उपयोगी होगा या नहीं, यह परिस्थिति के ख़तरों और हानि होने पर प्राप्त सहयोग की संभावना पर निर्भर करता है।”
कालांश 1 — मुद्रा और आवश्यकताओं का दोहरा संयोग
उद्देश्य — विद्यार्थी ‘आवश्यकताओं का दोहरा संयोग’ समझा सकें और बता सकें कि मुद्रा उसे कैसे हल करती है।
(क) शुरुआत — 12 मिनट ·वस्तु विनिमय का खेल
पाँच बच्चों को अलग-अलग चीज़ें दे दीजिए — पेंसिल, रबड़, कॉपी, टिफ़िन, पानी की बोतल — और कहिए:
“बिना पैसे के आपस में बदलकर सबको अपनी मनचाही चीज़ पानी है। दो मिनट का समय है।”
कक्षा उलझ जाएगी। तभी कहिए — “इसी उलझन का नाम है आवश्यकताओं का दोहरा संयोग।”
(ख) मुख्य शिक्षण — 20 मिनट
- जूता निर्माता वाला उदाहरण पढ़वाइए (पृष्ठ 39)
- ★परिभाषा शब्दश: लिखवाइए — “दोनों पक्ष एक दूसरे से चीज़ें ख़रीदने और बेचने पर सहमति रखते हों”
- वस्तु विनिमय प्रणाली का अर्थ
- और मुद्रा का हल — “मुद्रा महत्त्वपूर्ण मध्यवर्ती भूमिका प्रदान करके… ज़रूरत को ख़त्म कर देती है”; इसीलिए इसे विनिमय का माध्यम कहते हैं
(ग) समापन — 8 मिनट
किताब का ही प्रश्न — “क्या आप कुछ ऐसे उदाहरण सोच सकते हैं, जहाँ वस्तुओं तथा सेवाओं का विनिमय या मज़दूरी की अदायगी वस्तु विनिमय के जरिए हो रही है?” (बटाईदारी में फसल का हिस्सा · मज़दूरी के बदले अनाज · गाँव में नाई या लुहार को फसल के समय अनाज)
कालांश 2 — मुद्रा के आधुनिक रूप
उद्देश्य — विद्यार्थी करेंसी और माँग जमा को मुद्रा सिद्ध कर सकें।
(क) मुद्रा का सफ़र — 8 मिनट
अनाज और पशु → सोना-चाँदी-ताँबे के सिक्के → काग़ज़ के नोट और सिक्के पृष्ठ 40 के चित्र दिखाइए — आहत सिक्के (लगभग 2500 वर्ष पुराने) · गुप्तकालीन · तुगलक · अकबरकालीन सोने की मोहर · आधुनिक सिक्का
(ख) 10 रुपये का नोट — 12 मिनट★★
असली नोट कक्षा में लेकर जाइए और पूछिए: “इस पर क्या लिखा है? पढ़कर सुनाओ।”
“मैं धारक को दस रुपये अदा करने का वचन देता हूँ” + गवर्नर के हस्ताक्षर ★फिर पूछिए — “यह तो सिर्फ़ काग़ज़ है। इसकी क़ीमत कहाँ से आती है?” उत्तर की चार कड़ियाँ — “सरकार प्राधिकृत करती है” · “RBI केंद्रीय सरकार की तरफ़ से जारी करता है” · “किसी व्यक्ति या संस्था को मुद्रा जारी करने की इजाज़त नहीं” · “कोई क़ानूनी तौर पर रुपयों में अदायगी को अस्वीकार नहीं कर सकता”
(ग) बैंकों में निक्षेप और माँग जमा — 12 मिनट
- लोग बैंक में क्यों रखते हैं — सुरक्षित · सूद · ज़रूरत पर निकालने की सुविधा
- ★माँग जमा की परिभाषा — “बैंक खातों में जमा धन को माँग के ज़रिए निकाला जा सकता है”
(घ) चैक — 8 मिनट
पृष्ठ 41 का चैक का चित्र दिखाइए और पाँच हिस्से पहचनवाइए — खाता नंबर · बैंक शाखा संख्या · चैक नंबर · रकम · हस्ताक्षर। फिर एम. सलीम वाली प्रक्रिया समझाइए — “यह लेन-देन बिना नकद की अदायगी के पूरा हो जाता है।”
कालांश 3 — बैंकों की ऋण संबंधी गतिविधियाँ
उद्देश्य — विद्यार्थी बैंक की मध्यस्थ भूमिका और उसकी आय का स्रोत बता सकें।
(क) 15 प्रतिशत वाला सवाल — 15 मिनट★★
बोर्ड पर लिखिए: “मान लो बैंक में 100 रुपये जमा हुए।” फिर पूछिए — “बैंक इनका क्या करता है?”
उत्तर देखिए
उत्तर — “बैंक जमा का केवल 15 प्रतिशत हिस्सा नकद के रूप में अपने पास रखते हैं”; बाक़ी 85 रुपये ऋण पर चले जाते हैं। क्यों? — “क्योंकि किसी एक विशेष दिन में, केवल कुछ जमाकर्ता ही नकद निकालने के लिए आते हैं।”
(ख) मध्यस्थता का चित्र — 15 मिनट
पृष्ठ 42 का चित्र बोर्ड पर बनाइए — जमाकर्ता ← बैंक → कर्ज़दार
★“बैंक जिनके पास अतिरिक्त राशि है (जमाकर्ता) एवं जिन्हें राशि की ज़रूरत है (कर्ज़दार) के बीच मध्यस्थता का काम करते हैं।” आय का स्रोत — “कर्ज़दारों से लिए गए ब्याज और जमाकर्ताओं को दिये गये ब्याज के बीच का अंतर।”
(ग) चर्चा — 10 मिनट
किताब का ही सवाल — “अगर सभी जमाकर्ता एक ही समय में अपनी धन राशि की माँग करने बैंक पहुँच जाएँ तो क्या होगा?” यह प्रश्न बच्चों को बहुत रोचक लगता है — इसे खुला छोड़िए और उनके जवाब सुनिए।
कालांश 4 — साख की दो स्थितियाँ (अध्याय का दिल)★★
उद्देश्य — विद्यार्थी बता सकें कि एक ही ऋण किसी के लिए वरदान और किसी के लिए जाल क्यों बन जाता है।
(क) ऋण की परिभाषा — 5 मिनट
“ऋण (उधार) से हमारा तात्पर्य एक सहमति से है जहाँ साहूकार कर्ज़दार को धन, वस्तुएँ या सेवाएँ मुहैया कराता है और बदले में भविष्य में कर्ज़दार से भुगतान करने का वादा लेता है।”
(ख) दो कहानियाँ — 20 मिनट
दो अलग बच्चों से दोनों बॉक्स ज़ोर से पढ़वाइए — जैसे नाटक हो।
- सलीम — 3000 जोड़ी जूते, एक महीना, दो स्रोतों से ऋण, अच्छा-ख़ासा लाभ
- स्वप्ना — 3 एकड़, मूँगफली, फसल बर्बाद, कर्ज़ बड़ा हुआ, ज़मीन बेचनी पड़ी
(ग) तालिका भरवाइए — 12 मिनट★
बोर्ड पर तीन पंक्तियाँ — ऋण क्यों चाहिए था · जोखिम क्या था · परिणाम क्या हुए — और दो कॉलम (सलीम / स्वप्ना)।
(घ) समापन — 8 मिनट
बोर्ड पर लिखकर कक्षा से बुलवाइए —
“ऋण उपयोगी होगा या नहीं, यह परिस्थिति के ख़तरों और हानि होने पर प्राप्त सहयोग की संभावना पर निर्भर करता है।” और यह भी पूछिए — “स्वप्ना की स्थिति को जोखिम भरा बनाने वाले तीन कारण कौन-से थे?” (कीटनाशक · साहूकार · मौसम)
कालांश 5 — ऋण की शर्तें
उद्देश्य — विद्यार्थी चारों शर्तें और समर्थक ऋणाधार की परिभाषा दे सकें।
(क) चार शर्तें — 10 मिनट
ब्याज दर · समर्थक ऋणाधार · आवश्यक कागज़ात · भुगतान के तरीक़े
(ख) समर्थक ऋणाधार — 15 मिनट★★
परिभाषा शब्दश: लिखवाइए, फिर पूछिए:
“अगर तुम्हें बैंक से कर्ज़ लेना हो, तो तुम्हारे घर में क्या-क्या गिरवी रखा जा सकता है?” (ज़मीन · घर · गाड़ी · पशु · बैंक में जमा पूँजी · गहने) फिर धीरे से यह पूछिए — “और जिसके पास इनमें से कुछ भी न हो, वह क्या करे?” — यही सवाल पूरे अध्याय को आगे ले जाता है।
(ग) मेघा का आवास ऋण — 12 मिनट
तालिका बच्चों से भरवाइए — 5 लाख · 10 साल · नौकरी और वेतन संबंधी रिकार्ड · 12% वार्षिक · मासिक किस्तें · घर के सभी कागज़
(घ) समापन — 8 मिनट
रिक्त स्थान भरवाइए — “ऋण लेते समय कर्ज़दार आसान ऋण शर्तों को देखता है” → निम्न ब्याज दर, आसान अदायगी, कम समर्थक ऋणाधार और कागज़ात।
कालांश 6 — सोनपुर गाँव★
उद्देश्य — विद्यार्थी विभिन्न लोगों की ऋण-शर्तों की तुलना कर सकें।
(क) चार कहानियाँ — 18 मिनट
चार बच्चों से चार बॉक्स पढ़वाइए — श्यामल · अरुण · रमा · कृषक सहकारी समिति।
(ख) तुलना-तालिका — 15 मिनट★★
बोर्ड पर यह तालिका बनवाइए — और उत्तर बच्चों से निकलवाइए —
| कौन | ज़मीन | किससे ऋण | ब्याज (वार्षिक) |
|---|---|---|---|
| अरुण | 7 एकड़ | बैंक | 8.5% |
| श्यामल | 1.5 एकड़ | महाजन/व्यापारी | 60% → 36% |
| रमा | कुछ नहीं | भूस्वामी | 60% |
★फिर एक ही सवाल पूछिए — “इसमें कोई नियम दिख रहा है?” → “जिसके पास जितनी ज़्यादा ज़मीन, उतना सस्ता ऋण।”
(ग) समापन — 7 मिनट
“जिसके पास पहले से है, उसे सस्ता कर्ज़ मिलता है। जिसके पास नहीं है, उसे महँगा।” और यह भी बताइए कि व्यापारी श्यामल से यह वादा भी लेता है कि फसल उसी को बेचेगा — “यानी ब्याज तो लिया ही, फसल भी सस्ते में ले ली।”
कालांश 7 — औपचारिक और अनौपचारिक साख★★
उद्देश्य — विद्यार्थी दोनों में अंतर कर सकें, RBI की भूमिका बता सकें और दोनों आलेख पढ़ सकें।
(क) दो वर्ग — 8 मिनट
औपचारिक — बैंक और सहकारी समितियाँ; अनौपचारिक — साहूकार, व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार, दोस्त
(ख) आलेख 1 — 10 मिनट
आलेख खुलवाकर सातों हिस्से पढ़वाइए और बच्चों से जोड़ निकलवाइए —
औपचारिक = 51 + 10 + 5 = 66%; अनौपचारिक = 23 + 7 + 3 + 1 = 34% यहाँ रुककर बताइए कि साहूकार अकेला 23 प्रतिशत है — यानी हर चार में से लगभग एक ऋण साहूकार से।
(ग) RBI की तीन ज़िम्मेदारियाँ — 10 मिनट★
नकद शेष की जाँच · छोटे किसानों-उद्योगों को भी ऋण · कितना और किनको ऋण दिया, इसकी जानकारी ! और फिर यह चुभने वाला वाक्य — “अनौपचारिक क्षेत्रक में… कोई संस्था नहीं है… उन्हें नाजायज़ तरीक़ों से अपने पैसे वापस लेने से रोकने वाला कोई नहीं है।”
(घ) आलेख 2 — 12 मिनट★★
चारों पाई-चार्ट पढ़वाइए और एक ही पंक्ति में लिखवाइए —
गरीब 46 / 54 · कम संपत्ति वाले 62 / 38 · समृद्ध 73 / 27 · अमीर 83 / 17 ★फिर पूछिए — “क्या नियम दिख रहा है?” → “जो जितना अमीर है, उसे उतना सस्ता (औपचारिक) ऋण मिलता है।” और किताब की पंक्ति — “अमीर परिवार औपचारिक ऋणदाताओं से सस्ता ऋण ले रहे हैं, जबकि गरीब परिवारों को कर्ज़ के लिए बहुत सारा पैसा देना पड़ता है।”
कालांश 8 — स्वयं सहायता समूह★
उद्देश्य — विद्यार्थी स्वयं सहायता समूह की बनावट और उसका मूल विचार बता सकें।
(क) समस्या पहले — 8 मिनट
“ऋणाधार की अनुपलब्धता एक प्रमुख कारण है, जिससे गरीब बैंकों से ऋण नहीं ले पाते।” और साहूकार बिना ऋणाधार दे तो देता है, पर “ब्याज की दरें बहुत ऊँची रखते हैं, लेन-देन की लिखा पढ़ी भी पूरी नहीं करते और निर्धन कर्ज़दारों को तंग करते हैं।” फिर पूछिए — “तो निकलने का रास्ता क्या है?”
(ख) समूह की बनावट — 15 मिनट
15-20 पड़ोसी · नियमित बैठक · ₹25 से 100 की बचत · समूह से छोटे कर्ज़ · साहूकार से कम ब्याज · 1-2 वर्ष बाद बैंक से ऋण, समूह के नाम पर
(ग) मूल विचार — 10 मिनट★★
“एक भी सदस्य अगर ऋण वापस नहीं लौटाता तो समूह के अन्य सदस्य इस मामले को गंभीरता से लेते हैं। इसी कारण, बैंक निर्धन महिलाओं को ऋण देने के लिए तैयार हो जाते हैं… यद्यपि उनके पास कोई ऋणाधार नहीं होता।” ★इसे एक वाक्य में कहिए — “यहाँ ज़मीन की जगह भरोसा गिरवी रखा जाता है।” और तीसरा लाभ मत भूलिए — “समूह की नियमित बैठकों के ज़रिए लोगों को एक आम मंच मिलता है, जहाँ वह… स्वास्थ्य, पोषण और घरेलू हिंसा इत्यादि पर आपस में चर्चा कर पाती हैं।”
(घ) बांग्लादेश का ग्रामीण बैंक — 7 मिनट
1970 · 2018 में 9 लाख सदस्य · 81,600 गाँव · ज़्यादातर गरीब महिलाएँ
प्रो. मोहम्मद युनूस का कथन बोर्ड पर लिखिए, और पूछिए — “नोबेल अर्थशास्त्र का नहीं, शांति का मिला था। क्यों?”
कालांश 9 — पुनरावृत्ति और अभ्यास
(क) दो-पंक्ति की पुनरावृत्ति — 10 मिनट
मुद्रा — दोहरा संयोग ख़त्म करती है; करेंसी और माँग जमा; बैंक 15% नकद रखकर मध्यस्थता करते हैं। साख — सलीम बनाम स्वप्ना; चार शर्तें; समर्थक ऋणाधार ही असली दीवार है; अमीर 83% औपचारिक, गरीब 46%; और स्वयं सहायता समूह वह दरवाज़ा है जो ऋणाधार के बिना खुलता है।
(ख) अभ्यास — 25 मिनट
रिक्त स्थान (प्रश्न 12) और बहुविकल्पी (प्रश्न 13) कक्षा में ही कराइए; फिर प्रश्न 11 (80 प्रतिशत छोटे किसान) पर समूह-चर्चा।
(ग) अतिरिक्त परियोजना — 10 मिनट
पृष्ठ 53 की तालिका — आठ व्यवसाय, ऋण का कारण, और बैंक से मिलने की संभावना — गृहकार्य के रूप में दीजिए।
और अंत में पूछिए — “तुमने वर्गीकरण के लिए किन कारकों का उपयोग किया?” → नियमित आय · ऋणाधार · कागज़ात।
शिक्षक के लिए चार सूचनाएँ
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★यह अध्याय पृष्ठ 43 से असली शुरू होता है। पहले चार पृष्ठ (मुद्रा) ज़रूरी हैं पर तेज़ी से निपटाइए; समय साख वाले हिस्से पर लगाइए — परीक्षा भी वहीं से आती है।
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सलीम और स्वप्ना की कहानियाँ पढ़वाइए, सुनाइए मत। और तालिका बच्चों से भरवाइए। यह अध्याय का सबसे यादगार हिस्सा है।
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सोनपुर की तुलना-तालिका बोर्ड पर बनवाइए — जब बच्चे 8.5% बनाम 60% एक साथ देखते हैं, तब बात बिना कहे पहुँच जाती है।
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! साहूकार को ‘खलनायक’ मत बनाइए। किताब ख़ुद कहती है कि “अनौपचारिक ऋणदाता जैसे साहूकार इन कर्ज़दारों को व्यक्तिगत स्तर पर जानते हैं और इस कारण अक्सर बिना ऋणाधार के भी ऋण देने के लिए तैयार हो जाते हैं।” समस्या उनकी नीयत भर नहीं — व्यवस्था की है, जहाँ गरीब के पास कोई और दरवाज़ा ही नहीं।