कक्षा XI • इतिहास • विषय 4 — तीन वर्ग
कक्षा — 11 · विषय — इतिहास (विश्व इतिहास के कुछ विषय)
एक बिशप ने कहा — “कुछ प्रार्थना करते हैं, दूसरे लड़ते हैं और शेष अन्य कार्य करते हैं।” यह वर्गीकरण किसके पक्ष में था?
0 | बदलती परंपराएँ | खंड-प्रस्तावना और कालक्रम तीन
साम्राज्यों के बाद की दुनिया
खंड-प्रस्तावना
- नौवीं सदी तक एशिया-यूरोप में विशाल साम्राज्यों का विकास
- मकदूनिया, रोम, अरब और मंगोल — ये चार महाद्वीपीय व पारमहाद्वीपीय थे
- मिस्र, असीरिया, चीनी और मौर्य साम्राज्यों से यही अंतर था
- जो कुछ हुआ उसमें सांस्कृतिक टकरावों की भूमिका निर्णायक थी
- साम्राज्यों का उदय अचानक नहीं होता — वे लंबे समय के बदलावों के परिणाम थे
परंपराएँ बदलती हैं — पर हमेशा एक जैसे तरीके से नहीं
‘आधुनिक समय’ कब से बनने लगा?
- पश्चिमी यूरोप में नौवीं से सत्रहवीं सदी के मध्य बहुत कुछ धीरे-धीरे विकसित हुआ
- धार्मिक विश्वासों की अपेक्षा प्रयोगों पर आधारित वैज्ञानिक ज्ञान का विकास
- लोक सेवाओं, संसद और कानूनी धाराओं के सृजन पर ध्यान
- उद्योग व कृषि की तकनीक में सुधार
- इन परिवर्तनों के परिणाम यूरोप के बाहर भी पुरज़ोर तरीके से महसूस किए गए
रोम के बाद: छोटे नगर, नए राज्य
पाँचवीं से नौवीं सदी
- पाँचवीं सदी में पश्चिम में रोमन साम्राज्य विघटित हो गया
- अवशेषों ने स्वयं को उन कबीलों की आवश्यकताओं के अनुसार ढाल लिया
- पूर्वी यूरोप-पश्चिमी एशिया की तुलना में पश्चिमी यूरोप में नगरीय केंद्र छोटे थे
- फिर भी एक्स, लंदन, रोम व सियना का महत्त्व कम नहीं था
- शार्लेमेन का साम्राज्य — नौवीं सदी के प्रारंभ का सबसे अच्छा उदाहरण
वाइकिंग — स्कैंडीनेविया के वे लोग जो 8वीं–11वीं शताब्दी में आक्रमण कर वहीं बस गए
सामंती व्यवस्था का जन्म
- पहचान: दुर्गों व मेनर-भवन के इर्द-गिर्द कृषि उत्पादन
- भूमि मेनर के लॉर्डों की, जिस पर कृषक (कृषिदास) कार्य करते थे
- कृषक वफ़ादार होने के साथ माल और सेवा प्रदान करने को वचनबद्ध
- लॉर्ड, बड़े लॉर्डों के — जो राजा के सामंत (Vassal) थे — प्रति वचनबद्ध
- कैथलिक चर्च सामंतवाद को समर्थन देता था और उसकी अपनी भूमि भी थी
जीवन की अनिश्चितताओं के बीच चर्च ने सिखाया कि मृत्यु के बाद का जीवन कैसे सहनीय बने
वाणिज्य, धर्मयुद्ध और नया नज़रिया
- बारहवीं सदी से वेनिस और जिनेवा के उद्यमियों का प्रभाव बढ़ा
- उनके जहाज़ मुस्लिम राज्यों और पूर्वी रोमन साम्राज्य से व्यापार करते रहे
- धर्म-युद्ध — सम्पत्ति का लोभ + ‘पवित्र स्थलों’ को आज़ाद कराने की भावना
- इस्लामी कला-साहित्य में मानव के प्रति सम्मान
- बाइज़ेंटाइन से आई यूनानी कला और विचार
- इन दोनों ने यूरोप को संसार देखने का एक नया नज़रिया दिया
चौदहवीं सदी से (पुनर्जागरण) रईस लोग मृत्योपरांत जीवन से अधिक इस जीवन में रुचि लेने लगे
खोज-यात्राएँ और नए लोग
- उत्तमाशा-अंतरीप होते हुए पुर्तगाली भारत पहुँचे — मसालों का महत्त्वपूर्ण स्रोत
- कोलम्बस ने पश्चिमी मार्ग खोजा और 1492 में वेस्टइंडीज़ पहुँचा
- हसन-अल-वज़्ज़ान (लियो अफ़्रीकानस) ने पोप के लिए अफ़्रीका का भूगोल पहली बार लिखा
- विल एडम्स जापानी शोगुन तोकूगावा ईयास का मित्र व सलाहकार बना
- एज़टेक महिला डोना मेरिना ने स्पेनी विजेता कोरटेस के लिए दुभाषिये का काम किया
कैथलिक चर्च अध्ययन का केंद्र था — पर उसने ग़ैर-ईसाइयों पर हमलों को भी बढ़ावा दिया
संपर्क की सबसे भारी कीमत
यूरोपवासियों के साथ आई बीमारियों ने अमरीका की जनसंख्या का विनाश कर दिया — सोलहवीं सदी के अंत तक कुछ क्षेत्रों में नब्बे प्रतिशत जनसंख्या मृत्यु के आगोश में समा गई
1 | स्रोत और इतिहासकार | आम आदमी का इतिहास कैसे लिखें?
जिनका अपना लिखा कुछ नहीं बचा
विषय 4 की पृष्ठभूमि
- रोम-पतन के बाद जर्मन मूल के समूहों ने इटली, स्पेन और फ्रांस पर अधिकार किया
- संगठित राजनीतिक बल के अभाव में प्राय: युद्ध होते थे
- इसलिए सामाजिक ढाँचे का केंद्र-बिंदु भूमि पर नियंत्रण बन गया
- विशेषताएँ जर्मन रीति-रिवाजों और शाही रोम की परंपराओं से ली गईं
- ईसाई धर्म चौथी सदी से रोमन साम्राज्य का राजकीय धर्म था
- रोम के पतन के बाद भी बचा और मध्य-उत्तरी यूरोप में फैल गया
चर्च भी यूरोप में एक मुख्य भूमिधारक और राजनीतिक शक्ति बन गया था
स्रोतों का खज़ाना
- यूरोपीय इतिहासकारों ने प्रत्येक गाँव के इतिहास तक पर विस्तृत कार्य किया
- भू-स्वामित्व के विवरण, मूल्य और कानूनी मुकदमे दस्तावेज़ों के रूप में उपलब्ध थे
- चर्चों के जन्म, मृत्यु और विवाह के अभिलेखों से परिवारों व जनसंख्या की संरचना समझी गई
- चर्च-अभिलेखों ने व्यापारिक संस्थाओं की सूचना दी
- गीत व कहानियों से त्योहारों और सामुदायिक गतिविधियों का बोध हुआ
इनसे दीर्घकालीन (जनसंख्या-वृद्धि) और अल्पकालीन (कृषक विद्रोह) — दोनों परिवर्तन समझे जा सकते हैं
मार्क ब्लॉक (1886–1944)
इतिहास की विषयवस्तु राजनीतिक इतिहास, अंतरराष्ट्रीय संबंध और महान व्यक्तियों की जीवनियों से कुछ अधिक है। उन्होंने भूगोल के महत्त्व द्वारा मानव इतिहास को गढ़ने पर ज़ोर दिया।
कृति — ‘सामंती समाज’: 900 से 1300 के मध्य फ्रांसीसी समाज का असाधारण विवरण
एक शोध जो अधूरा रह गया
- ब्लॉक ने सामाजिक संबंधों और श्रेणियों, भूमि प्रबंधन का विवरण दिया
- साथ ही उस काल की जन-संस्कृति का भी
- वे फ्रांस के उस विद्वान-वर्ग से थे जो आम लोगों के व्यवहार और रुख को समझना चाहता था
- द्वितीय विश्वयुद्ध में नाज़ियों द्वारा गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई
- इससे उनके शोध व अध्यापन कार्य पर अचानक ही विराम लग गया
इतिहासकार भी इतिहास की चपेट में आते हैं
2 | सामंतवाद | परिभाषा, उद्भव और पृष्ठभूमि
एक शब्द जिसका अर्थ है ‘भूमि का टुकड़ा’
- ‘सामंतवाद’ का प्रयोग मध्यकालीन यूरोप के आर्थिक, विधिक, राजनीतिक और सामाजिक संबंधों के लिए
- यह जर्मन शब्द ‘फ़्यूड’ (Feud) से बना है — अर्थ ‘एक भूमि का टुकड़ा’
- यह समाज मध्य फ्रांस में और बाद में इंग्लैंड व दक्षिणी इटली में विकसित हुआ
- ‘मध्यकालीन युग’ = पाँचवीं और पन्द्रहवीं सदी के मध्य का यूरोपीय इतिहास
- जड़ें रोमन प्रथाओं और शार्लमेन (742–814) के काल में
पर जीवन के सुनिश्चित तरीके के रूप में इसकी उत्पत्ति ग्यारहवीं सदी के उत्तरार्ध में हुई
आर्थिक अर्थ — और उससे आगे
लॉर्ड और कृषक का संबंध
- सामंतवाद एक तरह के कृषि उत्पादन को इंगित करता है
- कृषक अपने खेतों के साथ-साथ लॉर्ड के खेतों पर कार्य करते थे
- वे लॉर्ड को श्रम-सेवा देते थे
- बदले में लॉर्ड उन्हें सैनिक सुरक्षा देते थे
- साथ ही लॉर्ड के कृषकों पर व्यापक न्यायिक अधिकार भी थे
इसलिए सामंतवाद ने न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं पर भी अधिकार कर लिया
फ्रांस का प्रारंभिक इतिहास
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 481 | क्लोविस फ्रैंक लोगों का राजा बना |
| 496 | क्लोविस और फ्रैंक धर्म परिवर्तन करके ईसाई बने |
| 751 | पेपिन ने शासक को अपदस्थ कर नया वंश स्थापित किया |
| 768 | शार्लमेन/चार्ल्स महान का शासन |
| 800 | पोप लियो III ने शार्लमेन को ‘पवित्र रोमन सम्राट’ का ताज पहनाया |
| 840 से | नार्वे से वाइकिंग लोगों के हमले |
3 | तीन वर्ग | विचारधारा और अभिजात वर्ग
समाज को तीन हिस्सों में बाँटना
फ्रांसीसी पादरियों की अवधारणा
- प्रत्येक व्यक्ति कार्य के आधार पर तीन वर्गों में से किसी एक का सदस्य होता है
- एक बिशप ने कहा — “कुछ प्रार्थना करते हैं, दूसरे लड़ते हैं और शेष अन्य कार्य करते हैं”
- इस तरह समाज बना — पादरी, अभिजात और कृषक वर्ग से
- ध्यान दीजिए: यह वर्गीकरण स्वयं पादरियों ने ही लिखा था
- और उसमें व्यापारी या नगरवासी कहीं नहीं थे
यह समाज का वर्णन कम, उसे व्यवस्थित रखने का तर्क अधिक था
आबेस हिल्डेगार्ड — असमानता का धार्मिक तर्क
कौन चरवाहा अपने समस्त पशुओं को कोई अंतर किए बिना एक अस्तबल में रखने की सोचेगा? इसलिए मनुष्यों में भी अंतर स्थापित करना आवश्यक है… ईश्वर अपने रेवड़ में अंतर रखता है… उसके द्वारा सबको प्यार मिलता है परंतु उनमें कोई समानता नहीं है।
बिंगेन की आबेस हिल्डेगार्ड, बारहवीं सदी
वैसलेज — निष्ठा की शृंखला
दूसरा वर्ग — अभिजात
- पादरियों ने अभिजात को दूसरे वर्ग में रखा — पर वास्तव में उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण थी
- कारण: भूमि पर उनका नियंत्रण
- बड़े भू-स्वामी और अभिजात राजा के अधीन; कृषक भू-स्वामियों के अधीन
- अभिजात राजा को अपना स्वामी (Seigneur) मान लेता था
- लॉर्ड शब्द ऐसे शब्द से निकला जिसका अर्थ था ‘रोटी देने वाला’
- शपथ चर्च में बाईबल पर ली जाती थी
भूमि के प्रतीक के रूप में दिया जाता था — अधिकार-पत्र, एक छड़ी, या केवल मिट्टी का ढेला
अभिजात की विशेष हैसियत
- अपनी संपदा पर स्थायी तौर पर पूर्ण नियंत्रण
- अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा सकते थे — यह सामंती सेना कहलाती थी
- अपना स्वयं का न्यायालय लगा सकते थे
- यहाँ तक कि अपनी मुद्रा भी प्रचलित कर सकते थे
- वे अपनी भूमि पर बसे सभी व्यक्तियों के मालिक थे
- उनका घर ‘मेनर’ कहलाता था
मेनर की जागीर
छोटी में दर्जन भर, बड़ी में 50–60 परिवार
- अनाज खेतों में उगाए जाते थे
- लोहार और बढ़ई लॉर्ड के औज़ारों की देखभाल और हथियारों की मरम्मत करते थे
- राजमिस्त्री इमारतों की देखभाल करते थे
- औरतें वस्त्र कातती एवं बुनती थीं
- बच्चे लॉर्ड की मदिरा सम्पीडक में कार्य करते थे
- साथ में अरण्यभूमि, चरागाह, एक चर्च और सुरक्षा के लिए एक दुर्ग
एक ज़रूरी सुधार
मेनर कभी भी आत्मनिर्भर नहीं हो सकते थे — क्योंकि नमक, चक्की का पाट और धातु के बर्तन बाहर के स्रोतों से प्राप्त करने पड़ते थे; विलासी लॉर्डों को साजो-सामान, वाद्य यंत्र और आभूषण भी बाहर से मँगाने पड़ते थे
नाइट — एक नए वर्ग का जन्म
- नौवीं सदी से यूरोप में स्थानीय युद्ध प्राय: होते रहते थे
- शौकिया कृषक-सैनिक पर्याप्त नहीं थे; कुशल अश्वसेना की आवश्यकता थी
- लॉर्ड ने नाइट को भूमि का एक भाग दिया जिसे फ़ीफ़ (Fief) कहा गया
- फ़ीफ़ उत्तराधिकार में पाया जा सकता था — 1000–2000 एकड़ या उससे अधिक
- बदले में नाइट एक निश्चित रकम देता और युद्ध में लड़ने का वचन देता था
- वह प्रतिदिन रणकौशल और बचाव का अभ्यास करता था
नाइट अपनी सेवाएँ अन्य लॉर्डों को भी दे सकता था — पर सर्वप्रथम निष्ठा अपने लॉर्ड के लिए
‘डून दे मयान्स’ — निष्ठा का गीत
“अगर मेरे प्यारे लॉर्ड को काट दिया जाता है, तो उसकी तकदीर का मैं भागीदार बनूँगा, अगर वह लटका दिया जाता है तब मुझे भी उसके साथ लटका दें… और अगर उसे डुबा दिया जाता है तो मुझे भी उसके साथ डुबा दिया जाए।”
तेरहवीं सदी की फ्रांसीसी कविता — नाइटों के साहस की याद
4 | प्रथम वर्ग | चर्च, पादरी और मठ
एक संस्था जो राजा पर निर्भर नहीं थी
- कैथलिक चर्च के अपने नियम थे
- राजा द्वारा दी गई भूमियाँ थीं जिनसे वे कर उगाह सकते थे
- पश्चिमी चर्च के अध्यक्ष पोप थे, जो रोम में रहते थे
- मार्गदर्शन बिशपों तथा पादरियों द्वारा — जो प्रथम वर्ग के अंग थे
- अधिकतर गाँवों में अपने चर्च थे जहाँ हर रविवार लोग धर्मोपदेश सुनने आते
इसीलिए यह एक शक्तिशाली संस्था थी जो राजा पर निर्भर नहीं थी
पादरी कौन नहीं बन सकता था?
तीन प्रतिबंध
- कृषि-दास पर प्रतिबंध था
- शारीरिक रूप से बाधित व्यक्तियों पर प्रतिबंध था
- और स्त्रियों पर भी प्रतिबंध था
- जो पुरुष पादरी बनते थे वे शादी नहीं कर सकते थे
- बिशप धर्म के क्षेत्र के अभिजात माने जाते थे
- उनके पास भी लॉर्ड की तरह विस्तृत जागीरें थीं और वे शानदार महलों में रहते थे
चर्च का कर
चर्च को एक वर्ष के अंतराल में कृषक से उसकी उपज का दसवाँ भाग लेने का अधिकार था; अमीरों द्वारा अपने और मरणोपरांत अपने रिश्तेदारों के कल्याण हेतु दिया जाने वाला दान भी आय का एक स्रोत था
जब सामंती रिवाज़ चर्च में घुस आए
- चर्च की कुछ महत्त्वपूर्ण रस्में सामंती कुलीनों की नकल थीं
- प्रार्थना करते वक्त हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर घुटनों के बल झुकना
- यह नाइट द्वारा अपने वरिष्ठ लॉर्ड के प्रति वफ़ादारी की शपथ लेते वक्त अपनाए गए तरीके की नकल थी
- इसी प्रकार ईश्वर के लिए ‘लॉर्ड’ शब्द का प्रचलन भी एक उदाहरण था
- इस तरह सामंती संस्कृति चर्च के उपासना कक्षों में प्रवेश करने लगी
भिक्षु और मठ
‘मोनेस्ट्री’ — ग्रीक ‘मोनोस’ यानी अकेला रहने वाला
- कुछ अत्यधिक धार्मिक व्यक्ति एकांत ज़िंदगी जीना पसंद करते थे
- वे ऐबी (Abbeys) या मोनैस्ट्री में रहते थे — आम आबादी से बहुत दूर
- दो सबसे प्रसिद्ध मठ — 529 में इटली में सेंट बेनेडिक्ट और 910 में बरगंडी में क्लूनी
- भिक्षु का व्रत: समय प्रार्थना, अध्ययन और कृषि जैसे शारीरिक श्रम में लगाना
- पादरी-कार्य के विपरीत भिक्षु की ज़िंदगी पुरुष और स्त्रियाँ दोनों अपना सकते थे
- ऐसे पुरुष मोंक (Monk) तथा स्त्रियाँ नन (Nun) कहलाती थीं
मठ आगे चलकर स्कूल/कॉलेज और अस्पतालों से जुड़े सैकड़ों के समुदाय बन गए
बेनेडिक्टीन मठों के नियम (73 अध्याय)
अध्याय 7 — विनम्रता का अर्थ है आज्ञा पालन। अध्याय 33 — किसी भी भिक्षु को निजी संपत्ति नहीं रखनी चाहिए। अध्याय 47 — आलस्य आत्मा का शत्रु है। अध्याय 48 — मठ इस प्रकार बनाने चाहिए कि आवश्यकता की समस्त वस्तुएँ उसकी सीमा के अंदर हों।
भिक्षुओं के लिए हस्तलिखित नियम-पुस्तक — कई सदियों तक पालन
जब मठों पर सवाल उठने लगे
- चौदहवीं सदी तक मठवाद के महत्त्व और उद्देश्य पर शंकाएँ उठने लगीं
- इंग्लैंड में लैंग्लैंड की कविता ‘पियर्स प्लाउमैन’ (1360–70)
- उसमें कुछ भिक्षुओं के आरामदायक व विलासितापूर्ण जीवन की तुलना
- साधारण कृषकों, गड़रियों और गरीब मजदूरों के ‘विशुद्ध विश्वास’ से की गई
- चॉसर ने कैंटरबरी टेल्स में नन, मोंक और फ़्रायर का हास्यास्पद चित्रण किया
फ़्रायर — तेरहवीं सदी से वे भिक्षु जिन्होंने मठ छोड़कर घूम-घूम कर उपदेश देना चुना
पुराने विश्वास, नए त्योहार
- ईसाई बनने पर भी लोगों ने चमत्कार और पुराने रीति-रिवाजों को नहीं छोड़ा
- 25 दिसम्बर का जन्मदिन एक पुराने पूर्व-रोमन त्योहार का स्थान ले गया — सौर-पंचांग पर आधारित
- ईस्टर ने चन्द्र-पंचांग पर आधारित बसंत-स्वागत के प्राचीन त्योहार का स्थान लिया
- गाँव की भूमि के दौरे की प्रथा जारी रही — पर अब उसे ‘पैरिश’ कहा जाने लगा
- तीर्थयात्रा ईसाइयों के जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा थी
काम से दबे कृषक पवित्र दिनों का स्वागत करते थे — क्योंकि उस दिन काम नहीं करना पड़ता था
5 | तीसरा वर्ग | किसान, स्वतंत्र और बंधक
जो पहले दोनों वर्गों का भरण-पोषण करते थे
काश्तकार दो तरह के — स्वतंत्र किसान और सर्फ़
- सर्फ़ अंग्रेज़ी की क्रिया ‘टू सर्व’ (To serve) से बना है
- स्वतंत्र कृषक अपनी भूमि को लॉर्ड के काश्तकार के रूप में देखते थे
- सैनिक सेवा में योगदान आवश्यक — वर्ष में कम से कम चालीस दिन
- लॉर्ड की जागीर पर सप्ताह के तीन या उससे अधिक दिन काम
- इस श्रम का उत्पादन — ‘श्रम-अधिशेष’ — सीधे लॉर्ड के पास जाता था
इसके अतिरिक्त गड्ढे खोदना, लकड़ियाँ इकट्ठी करना, बाड़ बनाना, सड़कों की मरम्मत — बिना किसी मज़दूरी के
एक कर जिससे दो वर्ग मुक्त थे
राजा कृषकों पर कभी-कभी यह प्रत्यक्ष कर लगाते थे — पादरी और अभिजात वर्ग इस कर से मुक्त थे
कृषिदास का जीवन
- जिन भूखंडों पर वे कृषि करते थे वो लॉर्ड के स्वामित्व में थे
- इसलिए उनकी अधिकतर उपज भी लॉर्ड को ही मिलती थी
- वे लॉर्ड की भूमि पर भी कृषि करते थे — इसके लिए कोई मज़दूरी नहीं
- वे लॉर्ड की आज्ञा के बिना जागीर नहीं छोड़ सकते थे
- सर्फ़ केवल लॉर्ड की चक्की में आटा पीस सकते, उनके तंदूर में रोटी सेंक सकते
- और उनकी मदिरा संपीडक में ही मदिरा और बीयर तैयार कर सकते थे
लॉर्ड यह भी तय कर सकता था कि कृषिदास किसके साथ विवाह करे — और इसके लिए शुल्क लेता था
इंग्लैंड — एक अलग रास्ता
सामंतवाद का विकास ग्यारहवीं सदी से
- छठी सदी में एंजिल और सैक्सन मध्य यूरोप से आकर बसे
- इंग्लैंड देश का नाम ‘एंजिल लैंड’ का रूपांतरण है
- 1066 में नारमैंडी के ड्यूक विलियम ने इंग्लिश चैनल पार कर सैक्सन राजा को हराया
- विलियम प्रथम ने भूमि नपवाई, नक्शे बनवाए और उसे 180 नॉर्मन अभिजातों में बाँट दिया
- यही लॉर्ड राजा के प्रमुख काश्तकार बने; वे राजा को कुछ नाइट देने को बाध्य थे
किंतु वे नाइटों का अपने निजी युद्धों के लिए उपयोग नहीं कर सकते थे — इंग्लैंड में इस पर प्रतिबंध था
6 | परिवर्तन के कारक | पर्यावरण, प्रौद्योगिकी, मुद्रा
जब जलवायु बदली
- पाँचवीं से दसवीं सदी तक यूरोप का अधिकांश भाग विस्तृत वनों से घिरा था
- अत: कृषि के लिए उपलब्ध भूमि सीमित थी
- असंतुष्ट कृषक अत्याचार से बचने के लिए वनों में शरण ले सकते थे
- उस समय तीव्र ठंड का दौर — सर्दियाँ प्रचंड, फसलों का उपज-काल छोटा
- ग्यारहवीं सदी से गर्माहट का दौर शुरू हुआ, औसत तापमान बढ़ा
- कृषकों को अब लंबी अवधि मिलने लगी; मिट्टी पर पाले का असर कम
पर्यावरण इतिहासकारों के अनुसार इससे वन-क्षेत्रों में कमी और कृषि भूमि का विस्तार हुआ
पुरानी व्यवस्था की सीमाएँ
- कृषक को मिलने वाली यांत्रिक मदद — केवल बैलों की जोड़ी से चलने वाला लकड़ी का हल
- यह हल केवल पृथ्वी की सतह को खुरच ही सकता था
- भूमि प्राय: चार वर्ष में एक बार हाथ से खोदी जाती थी
- द्वि-क्षेत्रीय फसल-चक्र: आधे में सर्दी का गेहूँ, आधा परती
- अगले वर्ष परती पर राई, दूसरा आधा खाली
परिणाम: मिट्टी की उर्वरता का ह्रास, बार-बार अकाल, दीर्घकालिक कुपोषण
चुपचाप किया गया विरोध
लॉर्डों का दबाव और कृषकों की प्रतिक्रिया
- लॉर्ड अपनी आय को अधिकतम करने के लिए उत्सुक रहते थे
- भूमि का उत्पादन बढ़ाना संभव नहीं था — इसलिए कृषकों पर अधिक समय देने का दबाव
- कृषक इस अत्याचार को चुपचाप नहीं सहते थे
- चूँकि वे खुलकर विरोध नहीं कर सकते थे इसलिए उन्होंने निष्क्रिय प्रतिरोध का सहारा लिया
- वे अपने खेतों पर अधिक समय लगाने लगे और उत्पाद अपने पास रखने लगे; बेगार से बचने लगे
चरागाह-विवाद की जड़: लॉर्ड इसे व्यक्तिगत सम्पत्ति समझते थे, कृषक इसे समुदाय की साझा संपदा
चार आविष्कार जिन्होंने सब बदल दिया
ग्यारहवीं सदी तक
- लकड़ी के हल की जगह लोहे की भारी नोक वाले हल और साँचेदार पटरे
- ऐसे हल अधिक गहरा खोद सकते थे और ऊपरी मृदा को सही ढंग से पलट सकते थे
- गले के स्थान पर जुआ अब कंधे पर बाँधा जाने लगा — पशुओं को अधिक शक्ति
- घोड़े के खुरों पर लोहे की नाल लगाई जाने लगी
- अन्न पीसने और अंगूर निचोड़ने के लिए जलशक्ति और वायुशक्ति के कारखाने
त्रि-क्षेत्रीय फसल-चक्र
| खेत | ऋतु | फसल |
|---|---|---|
| पहला | शरत् | गेहूँ या राई (मानव उपभोग) |
| दूसरा | बसंत | मटर, सेम, मसूर (मानव); जौ, बाजरा (घोड़े) |
| तीसरा | — | परती यानी खाली |
प्रत्येक वर्ष तीनों खेतों का प्रयोग बदल-बदल कर होता था
उत्पादन में क्रांति
भूमि की प्रत्येक इकाई का उत्पादन तेज़ी से बढ़ा; मटर-सेम से अधिक प्रोटीन और पशुओं के लिए चारा मिला; तेरहवीं सदी तक कृषक के खेत का औसत आकार सौ एकड़ से घटकर बीस-तीस एकड़ रह गया — छोटी जोतों पर अधिक कुशल कृषि संभव थी
जब लगान सिक्कों में बदला
- पनचक्की-पवनचक्की के लिए धन नहीं था — इसलिए पहल लॉर्डों ने की
- परन्तु कृषक भी कई क्षेत्रों में पहल करने में सक्षम रहे
- उन्होंने खेती योग्य भूमि का विस्तार किया और तीन-चक्रीय व्यवस्था अपनाई
- गाँवों में लोहार की दुकानें और भट्ठियाँ स्थापित कीं — सस्ती दरों पर मरम्मत
- ग्यारहवीं सदी से आर्थिक लेन-देन अधिक से अधिक मुद्रा पर आधारित होने लगा
- लॉर्डों को नक़दी लगान सुविधाजनक लगा; कृषक फ़सल मुद्रा में बेचने लगे
परिणाम: व्यक्तिगत संबंध, जो सामंतवाद का आधार थे, कमज़ोर पड़ने लगे
7 | चौथा वर्ग? | नए नगर और नगरवासी
यूरोप की जनसंख्या
| वर्ष | जनसंख्या |
|---|---|
| 1000 | लगभग 420 लाख |
| 1200 | लगभग 620 लाख |
| 1300 | 730 लाख |
| 1400 | 450 लाख (ब्लैक डेथ के बाद) |
बेहतर भोजन, लंबा जीवन — पर सबके लिए नहीं
- बेहतर आहार का अर्थ था लंबी जीवन-अवधि
- तेरहवीं सदी तक एक औसत यूरोपीय आठवीं सदी की तुलना में दस वर्ष अधिक जी सकता था
- पुरुषों की तुलना में स्त्रियों और बालिकाओं की जीवन-अवधि छोटी होती थी
- कारण: क्योंकि पुरुष बेहतर भोजन करते थे
एक ही आँकड़े में छिपी हुई लैंगिक असमानता
नगर फिर से बढ़ने लगे
- रोम के पतन के बाद उसके नगर उजाड़ और तबाह हो गए थे
- ग्यारहवीं सदी से कृषि-विस्तार ने अधिक जनसंख्या का भार सहा — नगर फिर बढ़े
- अतिरिक्त खाद्यान्न वाले कृषकों को बिक्री-केंद्र की आवश्यकता हुई
- इससे मियादी हाट-मेलों को बढ़ावा मिला और छोटे विपणन केन्द्र विकसित हुए
- धीरे-धीरे नगर के लक्षण उभरे — नगर चौक, चर्च, सड़कें, दुकानें और शासन-कार्यालय
दूसरे स्थानों पर नगर बड़े दुर्गों, बिशपों की जागीरों और बड़े चर्चों के चारों तरफ बने
नगर की हवा स्वतंत्र बनाती है
स्वतंत्र होने की इच्छा रखने वाले अनेक कृषिदास भाग कर नगरों में छिप जाते थे। अपने लॉर्ड की नज़रों से एक वर्ष व एक दिन तक छिपे रहने में सफल रहने वाला कृषिदास एक स्वाधीन नागरिक बन जाता था।
मध्यकालीन यूरोप की एक प्रसिद्ध कहावत
श्रेणी — नगर की आर्थिक रीढ़
- आर्थिक संस्था का आधार ‘श्रेणी’ (Guild) था
- प्रत्येक शिल्प या उद्योग एक श्रेणी के रूप में संगठित था
- यह संस्था उत्पाद की गुणवत्ता, उसके मूल्य और बिक्री पर नियंत्रण रखती थी
- ‘श्रेणी सभागार’ प्रत्येक नगर का एक आवश्यक अंग था
- पहरेदार गश्त लगाकर शांति स्थापित करते; संगीतकार जुलूसों में कला दिखाते
- सरायवाले यात्रियों की देखभाल करते थे
बड़े नगरों की जनसंख्या लगभग तीस हज़ार — कहा जा सकता है कि उन्होंने एक चौथा वर्ग बना लिया था
कथीड्रल-नगर
- चर्चों को दान देना अमीर व्यापारियों द्वारा धन खर्च करने का एक तरीका था
- बारहवीं सदी से फ्रांस में कथीड्रल कहलाने वाले बड़े चर्च बनने लगे
- वे मठों की संपत्ति थे — पर लोगों के विभिन्न समूहों ने श्रम, वस्तुओं और धन से सहयोग दिया
- कथीड्रल पत्थर के बने होते थे और उन्हें पूरा करने में अनेक वर्ष लगते थे
- निर्माण पूर्ण होने पर वे स्थान तीर्थ-स्थल बन जाते
इस प्रकार उनके चारों तरफ छोटे नगर विकसित हुए
अभिरंजित काँच की खिड़कियाँ
दिन के वक्त सूरज की रोशनी उन्हें भीतर के व्यक्तियों के लिए चमकदार बनाती थी और सूर्यास्त के बाद मोमबत्तियों की रोशनी उन्हें बाहर के व्यक्तियों के लिए दृश्यमान बनाती थी; उन पर बने चित्र बाईबल की कथाओं का वर्णन करते थे
8 | चौदहवीं सदी का संकट | अकाल, चाँदी और प्लेग
पहला कारक — पर्यावरण फिर बदला
- तेरहवीं सदी के अंत तक तेज़ ग्रीष्म ऋतु का स्थान तीव्र ठंडी ग्रीष्म ने ले लिया
- पैदावार वाले मौसम छोटे हो गए; ऊँची भूमि पर फसल उगाना कठिन
- तूफानों और सागरीय बाढ़ों ने अनेक फार्म नष्ट किए — सरकार को कम आमदनी
- गहन जुताई ने तीन-क्षेत्रीय चक्र के बावजूद भूमि को कमज़ोर बना दिया
- चरागाहों की कमी से पशुओं की संख्या घटी; जनसंख्या-वृद्धि से संसाधन कम पड़े
1315 और 1317 के बीच यूरोप में भयंकर अकाल; फिर 1320 के दशक में अनगिनत पशुओं की मौतें
दूसरा कारक — चाँदी का संकट
- ऑस्ट्रिया और सर्बिया की चाँदी की खानों के उत्पादन में कमी आई
- इससे धातु-मुद्रा में भारी कमी आ गई
- जिससे व्यापार प्रभावित हुआ
- सरकार को मुद्रा में चाँदी की शुद्धता घटानी पड़ी
- और उसमें सस्ती धातुओं का मिश्रण करना पड़ा
तीसरा कारक — ब्लैक डेथ
पोतों के साथ आए चूहे
- बारहवीं-तेरहवीं सदी में वाणिज्य-विस्तार से दूर देशों के पोत यूरोपीय तटों पर आने लगे
- पोतों के साथ चूहे आए — जो ब्यूबोनिक प्लेग का संक्रमण लाए
- पश्चिमी यूरोप 1347 और 1350 के मध्य बुरी तरह प्रभावित हुआ
- यूरोप की आबादी का करीब 20% भाग काल-कवलित; कुछ स्थानों पर 40% तक
- नगर सबसे अधिक प्रभावित — क्योंकि वे व्यापार केन्द्र थे
- बंद समुदायों (मठों और आश्रमों) में लगभग कोई नहीं बचता था
जिओवानी बोकाचियो — प्लेग का चश्मदीद विवरण
“कितने बहादुर पुरुषों और महिलाओं ने अपने कुटुंबियों के साथ नाश्ता कर उसी रात्रि में अपने पूर्वजों के साथ रात्रि भोजन किया होगा… चूँकि पवित्र कब्रिस्तान पर्याप्त नहीं थे अत: उनको सैकड़ों की संख्या में बड़ी-बड़ी खंदकों में डाल दिया जाता था, जैसे कि पोत में सामान को भरा जाता है।”
जिओवानी बोकाचियो (1313–75), इतालवी लेखक
एक महामारी का उल्टा परिणाम
जनसंख्या-ह्रास से मज़दूरों की भारी कमी हुई; प्लेग के बाद इंग्लैंड में मज़दूरी की दरों में 250 प्रतिशत तक की वृद्धि हो गई — बचा हुआ श्रमिक बल अब अपनी पुरानी दरों से दुगुने की माँग कर सकता था
9 | विद्रोह और नए शासक | व्यवस्था का पुनर्गठन
जब लॉर्डों ने घड़ी पीछे घुमानी चाही
- मज़दूरी की दरें बढ़ीं और कृषि-मूल्य गिरे — अभिजात वर्ग की आमदनी घटी
- निराशा में उन्होंने हाल ही में अपनाए धन-संबंधी अनुबंधों को तोड़ दिया
- और उन्होंने पुरानी मज़दूरी सेवाओं को फिर से प्रचलित कर दिया
- इसका पढ़े-लिखे और समृद्ध कृषकों द्वारा हिंसक विरोध किया गया
- 1323 में फ्लैंडर्स, 1358 में फ्रांस और 1381 में इंग्लैंड में विद्रोह हुए
विद्रोह हारे, पर कृषक जीते
एक महत्त्वपूर्ण तथ्य
- ये विद्रोह सर्वाधिक हिंसक तरीकों से उन स्थानों पर हुए जहाँ समृद्धि हुई थी
- यह संकेत था कि कृषक पिछली सदियों में हुए लाभों को बचाने का प्रयास कर रहे थे
- तीव्र दमन के बावजूद विद्रोहों की तीव्रता ने एक बात सुनिश्चित कर दी —
- कि पुराने सामंती रिश्तों को पुन: नहीं लादा जा सकता
- धन अर्थव्यवस्था काफी विकसित थी जिसे पलटा नहीं जा सकता था
लॉर्ड विद्रोहों का दमन करने में सफल रहे — परन्तु कृषकों ने सुनिश्चित कर लिया कि दासता के पुराने दिन फिर नहीं लौटेंगे
ग्यारहवीं से चौदहवीं शताब्दियों में
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1066 | नॉर्मन लोगों की इंग्लैंड पर विजय |
| 1100 के पश्चात् | फ्रांस में कथीड्रलों का निर्माण |
| 1315–17 | यूरोप में महान अकाल |
| 1347–50 | ब्यूबोनिक प्लेग (Black Death) |
| 1338–1461 | इंग्लैंड और फ्रांस के मध्य “सौ-वर्षीय युद्ध” |
| 1381 | कृषकों के विद्रोह |
‘नए शासक’ का उदय
- पंद्रहवीं और सोलहवीं सदियों में यूरोपीय शासकों ने सैनिक एवं वित्तीय शक्ति बढ़ाई
- फ्रांस में लुई ग्यारहवें, आस्ट्रिया में मैक्समिलन
- इंग्लैंड में हेनरी सप्तम और स्पेन में ईसाबेला और फरडीनेंड
- इन निरंकुश शासकों ने संगठित स्थायी सेना, स्थायी नौकरशाही और राष्ट्रीय कर प्रणाली शुरू की
- सफलता का सबसे बड़ा कारण: जागीरदारी और सामंतशाही वाली सामंत प्रथा का विलयन
शासकों ने सामंतों से कर लेना बंद कर बंदूकों और बड़ी तोपों से सुसज्जित सेना बनाई
नाइट का अंत
“अभिजात वर्ग का विरोध राजाओं की गोली के शक्ति प्रदर्शन के समक्ष टुकड़े-टुकड़े हो गया” — तोप और बंदूक ने घुड़सवार नाइट की सैन्य उपयोगिता समाप्त कर दी
अभिजात का चतुर रूपांतरण
- अभिजात वर्ग ने अपने अस्तित्व को बचाने के लिए एक चतुरतापूर्ण परिवर्तन किया
- नई शासन-व्यवस्था के विरोधी रहने के स्थान पर वे जल्दी ही राजभक्तों में बदल गए
- इसी कारण शाही निरंकुशता को सामंतवाद का परिष्कृत रूप माना जाता है
- उन्हें प्रशासनिक सेवाओं में स्थायी स्थान दिए गए
- पर अब शासक पिरामिड के शिखर पर नहीं, बल्कि दरबारी समाज का केंद्र-बिंदु था
- धन सहयोग सुनिश्चित करने का साधन बना
इसलिए धन व्यापारियों और साहूकारों के लिए दरबार में प्रवेश का माध्यम बन गया
दो देश, दो रास्ते
फ्रांस — एस्टेट्स जनरल
- परामर्शदात्री सभा, तीन सदन
- पादरी, अभिजात तथा अन्य
- 1614 में अधिवेशन हुआ
- फिर 1789 तक नहीं बुलाई गई
- राजा शक्ति बाँटना नहीं चाहते थे
इंग्लैंड — पार्लियामेंट
- नॉर्मन विजय से पहले महान परिषद
- कर लगाने से पहले सलाह अनिवार्य
- हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स + हाउस ऑफ़ कामन्स
- चार्ल्स प्रथम का 11 वर्ष बिना संसद शासन
- प्राणदंड, गणतंत्र, फिर राजतंत्र की पुनर्स्थापना
आज फ्रांस में गणतंत्र है और इंग्लैंड में राजतंत्र — ऐसा क्यों?
सार-संक्षेप
- तीन वर्ग समाज का वर्णन कम, उसे व्यवस्थित रखने का तर्क अधिक थे
- व्यवस्था बदली बड़े युद्धों से नहीं — हल की नोक, कंधे के जुए और तीन खेतों के चक्र से
- मुद्रा ने व्यक्तिगत सामंती संबंधों को कमज़ोर किया; नगरों ने स्वतंत्रता का रास्ता दिया
- अकाल, चाँदी-संकट और ब्लैक डेथ ने पुरानी व्यवस्था की कमर तोड़ दी
- कृषक निष्क्रिय प्रतिरोध से खुले विद्रोह तक पहुँचे — और दासता वापस नहीं लौटी
सत्रहवीं सदी के बाद फ्रांस और इंग्लैंड ने अलग-अलग दिशाएँ अपनाईं — और वही आज तक दिखती हैं