कक्षा 12 • राजनीति विज्ञान • समकालीन विश्व राजनीति • अध्याय 7 — वैश्वीकरण
कक्षा — 12 · विषय — राजनीति विज्ञान (समकालीन विश्व राजनीति) · पृष्ठ — 99 से 112
जनार्दन दफ्तर पहुँचते ही “जॉन” बन जाता है।
★उसकी छुट्टियाँ भारतीय कैलेंडर से नहीं, अमरीका के कैलेंडर से मेल खाती हैं। ★★यही वैश्वीकरण है — और यही इसका सवाल भी: हमें क्या मिला, और किस कीमत पर? यह पुस्तक का अंतिम अध्याय है • अवधारणा • कारण • तीन प्रभाव • भारत • प्रतिरोध
0 | पहले एक ज़रूरी चेतावनी | यह अध्याय पहले ‘अध्याय 9’ था
पाठ्यक्रम-युक्तिकरण — अब पूरा नक्शा
| पुराना क्रम | अध्याय | अब | QR कोड |
|---|---|---|---|
| 1 | शीतयुद्ध का दौर | ❌ हटाया गया | — |
| 2 | दो ध्रुवीयता का अंत | ✓ अध्याय 1 | 12108CH02 |
| 3 | समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व | ❌ हटाया गया | — |
| 4 | सत्ता के समकालीन केन्द्र | ✓ अध्याय 2 | 12108CH04 |
| 5 | समकालीन दक्षिण एशिया | ✓ अध्याय 3 | 12108CH05 |
| 6 | अंतर्राष्ट्रीय संगठन | ✓ अध्याय 4 | 12108CH06 |
| 7 | समकालीन विश्व में सुरक्षा | ✓ अध्याय 5 | 12108CH07 |
| 8 | पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन | ✓ अध्याय 6 | 12108CH08 |
| 9 | वैश्वीकरण | ✓ अध्याय 7 | 12108CH09 |
और इस अध्याय का अनाथ-संदर्भ सबसे गंभीर हैध्यान
पृ. 107
- मुद्रित पाठ: “हम लोग अमरीकी वर्चस्व वाले अध्याय तीन में वर्चस्व के सांस्कृतिक अर्थ के अंतर्गत इस बात को पढ़ चुके हैं।”
- !! वह अध्याय — ‘समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व’ — पूरी तरह हटा दिया गया है। वह पुस्तक में है ही नहीं।
- बाकी अनाथ-संदर्भों में अध्याय खिसका था; यहाँ अध्याय गायब है।
✓ इसकी भरपाई खंड 5 में की गई है — ‘वर्चस्व का सांस्कृतिक अर्थ’ वहाँ अलग से समझाया गया है।
1 | वैश्वीकरण की अवधारणा | तीन कहानियाँ, और पाँच उलटे उदाहरण
तीन कहानियाँ जिनसे अध्याय शुरू होता है
| कौन | क्या हो रहा है | क्या दिखाती है |
|---|---|---|
| ★जनार्दन | कॉल-सेंटर; “दफ्तर में घुसने के साथ ही वह जॉन बन जाता है”; छुट्टियाँ अमरीका के कैलेंडर से | सेवाओं का वैश्वीकरण |
| ★रामधारी | साइकिल “बनी तो चीन में थी लेकिन बिक भारत में रही है”; पिछले साल ‘बार्बी डॉल’ जो अमरीका में बनी थी | वस्तुओं की आवाजाही |
| ★सारिका | परिवार में पहली पीढ़ी की शिक्षित; नौकरी का अवसर, जो “परिवार की महिलाएँ सोच भी नहीं सकती थीं” | ★★जीवन-मूल्यों के बीच दुविधा |
और तुरंत बाद — पाँच उलटे उदाहरण
पाठ्यपुस्तक स्वयं संतुलन बनाती है
- ! “फसल के मारे जाने से कुछ किसानों ने आत्महत्या कर ली। इन किसानों ने एक बहुराष्ट्रीय कंपनी से बड़े महंगे बीज खरीदे थे।”
- “यूरोप स्थित एक बड़ी कंपनी को एक भारतीय कंपनी ने खरीद लिया” — और खरीदी गई कंपनी के मालिक विरोध कर रहे थे
- ★“अनेक खुदरा दुकानदारों को भय है कि… उनकी रोजी-रोटी जाती रहेगी।”
- “मुम्बई के एक फिल्म-निर्माता पर आरोप लगे कि उसने हॉलीवुड में बनी एक फिल्म की कहानी उठाकर अपनी फिल्म बना ली है।”
- ! “पश्चिमी परिधान पहनने वाली कॉलेज की छात्राओं को एक उग्रवादी संगठन ने धमकी दी है।”
तीन निष्कर्ष — ये तीनों उत्तर में लिखे जा सकते हैं
- 1. ★“वैश्वीकरण हर अर्थ में सकारात्मक ही नहीं होता; लोगों पर इसके दुष्प्रभाव भी पड़ सकते हैं।”
- 2. ★“दरअसल ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा है जो मानते हैं कि वैश्वीकरण के सकारात्मक प्रभाव कम और नकारात्मक प्रभाव ज्यादा हैं।”
- 3. ★★“वैश्वीकरण सिर्फ आर्थिक मसलों से नहीं जुड़ा और ज़रूरी नहीं कि प्रभाव की दिशा हमेशा धनी मुल्कों से ग़रीब मुल्कों की ओर गतिशील हो।”
प्रवाह
“एक अवधारणा के रूप में वैश्वीकरण की बुनियादी बात है — प्रवाह।” — और चार प्रवाह हैं: ★★विचार · पूँजी · वस्तु · लोग।
और सबसे ज़रूरी बात
- ★★“यहाँ सबसे ज़रूरी बात है ‘विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव’ जो ऐसे प्रवाहों की निरंतरता से पैदा हुआ है और कायम भी है।”
- ★★“वैश्वीकरण एक बहुआयामी अवधारणा है। इसके राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अवतार हैं और इनके बीच ठीक-ठीक भेद किया जाना चाहिए।”
- ! “यह मान लेना ग़लत है कि वैश्वीकरण केवल आर्थिक परिघटना है।” और “यह मान लेना भी भूल होगी कि वैश्वीकरण एकदम सांस्कृतिक परिघटना है।”
और यह वाक्य पूरे अध्याय की चेतावनी है
वैश्वीकरण का प्रभाव बड़ा विषम रहा है — यह कुछ समाजों को बाकियों की अपेक्षा और समाज के एक हिस्से को बाकी हिस्सों की अपेक्षा ज्यादा प्रभावित कर रहा है। ऐसे में ज़रूरी हो जाता है कि विशिष्ट संदर्भों पर पर्याप्त ध्यान दिए बिना हम वैश्वीकरण के प्रभाव के बारे में सर्व-सामान्य निष्कर्ष निकालने से परहेज करें।
NCERT, अध्याय 7, पृ. 102
2 | वैश्वीकरण के कारण | प्रौद्योगिकी — और उससे भी आगे
पहला सवाल — “इसमें नया क्या है?”
- “अगर इन चार तरह के प्रवाहों की ही बात है तो फिर वैश्वीकरण मानव-इतिहास के अधिकांश समय जारी रहा है।”
- ★★तो नयी बात क्या है — “नयी बात है इन प्रवाहों की गति और इनके प्रसार का धरातल। ये दोनों बातें मौजूदा वैश्वीकरण को अनूठा बनाती हैं।”
- “वैश्वीकरण का एक मजबूत ऐतिहासिक आधार है इसलिए ज़रूरी है कि हम इन प्रवाहों को इतिहास के संदर्भ में देखें।”
प्रौद्योगिकी — ‘अपरिहार्य कारण’
प्रश्न 3 और 7 का उत्तर
- ★★“हालाँकि वैश्वीकरण के लिए कोई एक कारक जिम्मेवार नहीं, फिर भी प्रौद्योगिकी अपने आप में एक अपरिहार्य कारण साबित हुई है।”
- ★“टेलीग्राफ, टेलीफोन और माइक्रोचिप के नवीनतम आविष्कारों ने विश्व के विभिन्न भागों के बीच संचार की क्रांति कर दिखायी है।”
- ★★और वह शानदार ऐतिहासिक समानांतर: “शुरू-शुरू में जब छपाई (मुद्रण) की तकनीक आयी थी तो उसने राष्ट्रवाद की आधारशिला रखी। इसी तरह आज हम यह अपेक्षा कर सकते हैं कि प्रौद्योगिकी का प्रभाव हमारे सोचने के तरीके पर पड़ेगा।”
पर तकनीक अकेली काफी नहीं
- ! “संचार-साधनों की तरक्की और उनकी उपलब्धता मात्र से वैश्वीकरण अस्तित्व में आया हो — ऐसी बात नहीं।”
- ★★“यहाँ ज़रूरी बात यह है कि विश्व के विभिन्न भागों के लोग अब समझ रहे हैं कि वे आपस में जुड़े हुए हैं।”
- ★“आज हम इस बात को लेकर सजग हैं कि विश्व के एक हिस्से में घटने वाली घटना का प्रभाव विश्व के दूसरे हिस्से में भी पड़ेगा।”
- उदाहरण — “बर्ड फ्लू अथवा ‘सुनामी’ किसी एक राष्ट्र की हदों में सिमटे नहीं रहते। ये घटनाएँ राष्ट्रीय-सीमाओं का जोर नहीं मानतीं।”
★और एक असमानता जो आगे काम आएगी — “विश्व के विभिन्न भागों के बीच पूँजी और वस्तु की गतिशीलता लोगों की आवाजाही की तुलना में ज्यादा तेज और व्यापक होगी।”
3 | राजनीतिक प्रभाव | तीन पहलू — और तीनों अलग दिशाओं में
पाठ्यपुस्तक तीन पहलू माँगती है
प्रश्न 8 का पूरा उत्तर यहीं है
- “राज्य की संप्रभुता की परंपरागत धारणा पर वैश्वीकरण का असर कैसे होता है? इस सवाल का जवाब देते समय हमें कम से कम तीन पहलुओं का ध्यान रखना होगा।”
पहला पहलू — राज्य की क्षमता में कमी
- ★“वैश्वीकरण के कारण राज्य की क्षमता यानी सरकारों को जो करना है उसे करने की ताकत में कमी आती है।”
- ★★“पूरी दुनिया में कल्याणकारी राज्य की धारणा अब पुरानी पड़ गई है और इसकी जगह न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य ने ले ली है।”
- “राज्य अब कुछेक मुख्य कामों तक ही अपने को सीमित रखता है, जैसे कानून और व्यवस्था को बनाये रखना तथा अपने नागरिकों की सुरक्षा करना।”
- ★★“लोक कल्याणकारी राज्य की जगह अब बाज़ार आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का प्रमुख निर्धारक है।”
- ★“पूरे विश्व में बहुराष्ट्रीय निगम अपने पैर पसार चुके हैं… इससे सरकारों के अपने दम पर फ़ैसला करने की क्षमता में कमी आती है।”
दूसरा पहलू — पर राज्य की प्रधानता को चुनौती नहीं मिली
- ★“वैश्वीकरण से हमेशा राज्य की ताकत में कमी आती हो — ऐसी बात नहीं।”
- ★★“राजनीतिक समुदाय के आधार के रूप में राज्य की प्रधानता को कोई चुनौती नहीं मिली है और राज्य इस अर्थ में आज भी प्रमुख है।”
- “विश्व की राजनीति में अब भी विभिन्न देशों के बीच मौजूद पुरानी ईर्ष्या और प्रतिद्वंद्विता की दखल है।”
- ★“राज्य कानून और व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अपने अनिवार्य कार्यों को पूरा कर रहे हैं और बहुत सोच-समझकर अपने कदम उन्हीं दायरों से खींच रहे हैं जहाँ उनकी मर्जी हो।”
★★“राज्य अभी भी महत्त्वपूर्ण बने हुए हैं।”
तीसरा पहलू — बल्कि राज्य की ताकत बढ़ी भी है
यह सबसे ज्यादा छूटता है
- ★★“वस्तुत: कुछ मायनों में वैश्वीकरण के फलस्वरूप राज्य की ताकत में इजाफा हुआ है।”
- ★“अब राज्यों के हाथ में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी मौजूद है जिसके बूते राज्य अपने नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटा सकते हैं।”
- ★“इस सूचना के दम पर राज्य ज्यादा कारगर ढंग से काम कर सकते हैं। उनकी क्षमता बढ़ी है; कम नहीं हुई।”
- ★★“इस प्रकार नई प्रौद्योगिकी के परिणामस्वरूप राज्य अब पहले से ज्यादा ताकतवर हैं।”
पाठ्यपुस्तक जान-बूझकर एकतरफा निष्कर्ष नहीं देती — राज्य कमज़ोर भी हुआ, बना भी रहा, और मज़बूत भी हुआ।
कार्टून (पृ. 104) — ‘वैश्वीकरण के खतरे?’
| कल | आज |
|---|---|
| “अपना खाना जल्दी खत्म करो। चीन और भारत के भूखे लोग तुम्हारा खाना खा जाएंगे…” | “अपना होमवर्क जल्दी पूरा करो। चीन और भारत के लोग तुम्हारी नौकरी खा जाएँगें…” |
4 | आर्थिक प्रभाव | किसे फायदा, किसे नुकसान
पहले परिभाषा की समस्या
- “जैसे ही आर्थिक वैश्वीकरण का उल्लेख होता है, हमारा ध्यान अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं पर जाता है।”
- ! “हालाँकि वैश्वीकरण को इतने संकीर्ण नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए। …इन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के अलावा भी कई खिलाड़ी शामिल हैं।”
- ★★सही कसौटी — “हमें इससे होने वाले आर्थिक फायदों के बँटवारे के अर्थ में सोचना चाहिए — यानी किसे वैश्वीकरण से सबसे ज्यादा फायदा हुआ और किसे सबसे कम। यह भी देखने की ज़रूरत है कि किसने नुकसान उठाया।”
! “कुछ आर्थिक प्रवाह स्वेच्छा से होते हैं जबकि कुछ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और ताकतवर देशों द्वारा जबरन लादे जाते हैं।”
चार प्रवाहों की असली स्थिति
| प्रवाह | क्या हुआ |
|---|---|
| वस्तु | ★“पूरी दुनिया में वस्तुओं के व्यापार में इजाफा हुआ है”; आयात पर प्रतिबंध कम हो गए |
| पूँजी | ★“पूँजी की आवाजाही पर अब कहीं कम प्रतिबंध हैं” — “धनी देश के निवेशकर्ता अपना धन… विकासशील देशों में निवेश कर सकते हैं जहाँ उन्हें ज्यादा मुनाफा होगा” |
| विचार | ★“विचारों के सामने राष्ट्र की सीमाओं की बाधा नहीं रही” — इंटरनेट और कंप्यूटर से जुड़ी सेवाएँ |
| !★★लोग | “जिस सीमा तक वस्तुओं और पूंजी का प्रवाह बढ़ा है उस सीमा तक लोगों की आवाजाही नहीं बढ़ सकी है।” |
और यही आर्थिक वैश्वीकरण की सबसे बड़ी विषमता है
उत्तर में ज़रूर लिखिए
- ★★“विकसित देश अपनी वीजा-नीति के जरिए अपनी राष्ट्रीय सीमाओं को बड़ी सतर्कता से अभेद्य बनाए रखते हैं ताकि दूसरे देशों के नागरिक विकसित देशों में आकर कहीं उनके नागरिकों के नौकरी-धंधे न हथिया लें।”
- ★और एक और चेतावनी — “हर जगह एक समान नीति अपना लेने का मतलब यह नहीं होता कि हर जगह परिणाम भी समान होंगे। …यहाँ भी हमें सर्व-सामान्य निष्कर्ष निकालने के बजाय संदर्भ-विशेष पर ध्यान देना होगा।”
“आर्थिक वैश्वीकरण के कारण पूरे विश्व में जनमत बड़ी गहराई से बँट गया है।”
तीनों पक्ष — एक साथ
| पक्ष | तर्क |
|---|---|
| ! आलोचक (सामाजिक न्याय के पक्षधर) | “आबादी के एक बड़े छोटे तबके को फायदा होगा जबकि नौकरी और जन-कल्याण (शिक्षा, स्वास्थ्य, साफ-सफाई) के लिए सरकार पर आश्रित रहने वाले लोग बदहाल हो जाएँगे।” → माँग: ★‘सामाजिक सुरक्षा कवच’ |
| !! तीखे आलोचक | “‘सामाजिक सुरक्षा-कवच’ की बात अव्यावहारिक है और इतना भर उपाय पर्याप्त नहीं होगा”; और ★“कुछ अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक वैश्वीकरण को विश्व का ‘पुन:उपनिवेशीकरण’ कहा है।” |
| ✓ समर्थक | “इससे समृद्धि बढ़ती है और ‘खुलेपन’ के कारण ज्यादा से ज्यादा आबादी की खुशहाली बढ़ती है”; ★“आर्थिक वैश्वीकरण अपरिहार्य है और इतिहास की धारा को अवरुद्ध करना कोई बुद्धिमानी नहीं।” |
| ⚖️ मध्यमार्गी | ★★“वैश्वीकरण ने चुनौतियाँ पेश की हैं और सजग-सचेत होकर पूरी बुद्धिमत्ता से इसका सामना किया जाना चाहिए।” |
और इस पर तो सब सहमत हैं
- ★“बहरहाल, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि ‘पारस्परिक निर्भरता’ की रफ्तार अब तेज हो चली है। वैश्वीकरण के फलस्वरूप विश्व के विभिन्न भागों में सरकार, व्यवसाय तथा लोगों के बीच जुड़ाव बढ़ रहा है।”
साइड-टिप्पणी (पृ. 106): “जब हम सामाजिक सुरक्षा-कवच की बात करते हैं तो इसका सीधा-सादा मतलब होता है कि कुछ लोग तो वैश्वीकरण के चलते बदहाल होंगे ही! तभी तो सामाजिक सुरक्षा-कवच की बात की जाती है। है न?”
5 | सांस्कृतिक प्रभाव | समरूपता — और उसका उलटा
पहले वह अवधारणा जो हटाए गए अध्याय में थी
अनाथ-संदर्भ की भरपाई
- ‘वर्चस्व’ (Hegemony) के तीन अर्थ —
- सैन्य वर्चस्व — बल का असंतुलन
- संरचनात्मक वर्चस्व — वैश्विक अर्थव्यवस्था के नियम बनाने की क्षमता
- ★★सांस्कृतिक वर्चस्व — जब किसी शक्ति के विचार, मूल्य और जीवन-शैली इतने सामान्य लगने लगें कि उनका विकल्प ही सोचा न जा सके। यहाँ सहमति बल से नहीं, आकर्षण से पैदा होती है।
★यही ‘मैक्डोनॉल्डीकरण’ और ‘नीली जीन्स’ वाले उदाहरणों का सैद्धांतिक आधार है।
यह हमें कहाँ छूता है
- ★“वैश्वीकरण के परिणाम सिर्फ आर्थिक और राजनीतिक दायरों में ही नज़र नहीं आते; हम घर में बैठे हों तब भी इसकी चपेट में होते हैं।”
- ★★“हम जो कुछ खाते-पीते-पहनते हैं अथवा सोचते हैं — सब पर इसका असर नज़र आता है। हम जिन बातों को अपनी पसंद कहते हैं वे बातें भी वैश्वीकरण के असर में तय होती हैं।”
सांस्कृतिक समरूपता — और एक बहुत ज़रूरी बारीकी
- “वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभावों को देखते हुए इस भय को बल मिला है कि यह प्रक्रिया विश्व की संस्कृतियों को खतरा पहुँचाएगी।”
- ★★“सांस्कृतिक समरूपता का यह अर्थ नहीं कि किसी विश्व-संस्कृति का उदय हो रहा है। विश्व-संस्कृति के नाम पर दरअसल शेष विश्व पर पश्चिमी संस्कृति लादी जा रही है।”
- ★तर्क: “बर्गर अथवा नीली जीन्स की लोकप्रियता का नजदीकी रिश्ता अमरीकी जीवनशैली के गहरे प्रभाव से है क्योंकि राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभुत्वशाली संस्कृति कम ताकतवर समाजों पर अपनी छाप छोड़ती है।”
- ★★“जो यह तर्क देते हैं वे अक्सर दुनिया के ‘मैक्डोनॉल्डीकरण’ की तरफ इशारा करते हैं।”
- ! खतरा किसके लिए — “चूँकि इससे पूरे विश्व की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर धीरे-धीरे खत्म होती है इसलिए यह केवल गरीब देशों के लिए ही नहीं बल्कि समूची मानवता के लिए खतरनाक है।”
और अब पाठ्यपुस्तक पलटती है
यह खंड का दिल है
- ★★“इसके साथ-साथ यह मान लेना एक भूल है कि वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभाव सिर्फ नकारात्मक हैं।”
- ★“संस्कृति कोई जड़ वस्तु नहीं होती। हर संस्कृति हर समय बाहरी प्रभावों को स्वीकार करते रहती है।”
- “कभी-कभी बाहरी प्रभावों से हमारी पसंद-नापसंद का दायरा बढ़ता है तो कभी इनसे परंपरागत सांस्कृतिक मूल्यों को छोड़े बिना संस्कृति का परिष्कार होता है।”
और यह उदाहरण कक्षा कभी नहीं भूलती
बर्गर मसाला-डोसा का विकल्प नहीं है इसलिए बर्गर से वस्तुत: कोई खतरा नहीं है। …दूसरी तरफ, नीली जीन्स भी हथकरघा पर बुने खादी के कुर्ते के साथ खूब चलती है। …मज़ेदार बात तो यह है कि इस अनूठे पहरावे को अब उसी देश को निर्यात किया जा रहा है जिसने हमें नीली जीन्स दी है। जीन्स के ऊपर कुर्ता पहने अमरीकियों को देखना अब संभव है।
NCERT, अध्याय 7, पृ. 108
सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण
“सांस्कृतिक समरुपता वैश्वीकरण का एक पहलू है तो वैश्वीकरण से इसका उलटा प्रभाव भी पैदा हुआ है। वैश्वीकरण से हर संस्कृति कहीं ज्यादा अलग और विशिष्ट होते जा रही है। इस प्रक्रिया को सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण कहते हैं।” ! पर संतुलन के साथ — “इसका मतलब यह नहीं कि संस्कृतियों के मेलजोल में उनकी ताकत का सवाल गौण है।”
बॉक्स — ‘उफ! फिर से एक हिंदुस्तानी’
जनार्दन की कहानी का दूसरा पहलू
- ★“कॉल-सेन्टर में काम करना अपने आप में आँख खोल देने वाला साबित हो सकता है… एक औसत अमरीकी हमारी अपेक्षा से कहीं ज्यादा जीवंत और ईमानदार होता है…”
- ! “‘कॉल’ हिन्दुस्तान में ‘अटेन्ड’ की जा रही है, यह जानकर फोन करने वाले का लहजा कभी-कभी नफ़रत से भर उठता है”; और “अमरीकी हर भारतीय को इस रूप में देखने लगे हैं मानो वह उनकी नौकरी छीनने वाला हो…”
- ★★“‘चंद मिनट पहले मैंने एक दक्षिण अफ्रीकी से बात की और अब एक हिन्दुस्तानी से मुखातिब हूँ’ या “आह री किस्मत! फिर एक हिन्दुस्तानी! प्लीज किसी अमरीकी से बात कराइए…!""
(स्रोत: 10 जनवरी 2005 के ‘द हिंदू’ में रंजीता उर्स की रिपोर्ट)
6 | भारत और वैश्वीकरण | तीन चरण, और एक कसौटी
भारत की कहानी
- सदी“पूँजी, वस्तु, विचार और लोगों की आवाजाही का भारतीय इतिहास कई सदियों का है” — वैश्वीकरण भारत के लिए नया नहीं
- औप.औपनिवेशिक दौर — “ब्रिटेन के साम्राज्यवादी मंसूबों के परिणामस्वरूप भारत आधारभूत वस्तुओं और कच्चे माल का निर्यातक तथा बने-बनाये सामानों का आयातक देश था”
- 1947संरक्षणवाद — “दूसरे पर निर्भर रहने के बजाय खुद सामान बनाया जाए”; और “दूसरों देशों को निर्यात की अनुमति नहीं होगी ताकि हमारे अपने उत्पादक चीजों को बनाना सीख सकें”
- 1991★★“वित्तीय संकट से उबरने और आर्थिक वृद्धि की ऊँची दर हासिल करने की इच्छा से भारत में आर्थिक-सुधारों की योजना शुरू हुई” — व्यापार और विदेशी निवेश पर बाधाएँ हटीं
संरक्षणवाद की कीमत
- ! “इस ‘संरक्षणवाद’ से कुछ नयी दिक्कतें पैदा हुईं।”
- ! “कुछ क्षेत्रों में तरक्की हुई तो कुछ ज़रूरी क्षेत्रों जैसे स्वास्थ्य, आवास और प्राथमिक शिक्षा पर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितने के वे हकदार थे।”
- ! “भारत में आर्थिक-वृद्धि की दर धीमी रही।”
और यह वाक्य पूरे अध्याय का नैतिक निष्कर्ष है
यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत के लिए यह सब कितना अच्छा साबित हुआ है, क्योंकि अंतिम कसौटी ऊँची वृद्धि-दर नहीं बल्कि इस बात को सुनिश्चित करना है कि आर्थिक बढ़वार के फायदों में सबका साझा हो ताकि हर कोई खुशहाल बने।
NCERT, अध्याय 7, पृ. 109
7 | वैश्वीकरण का प्रतिरोध | दो दिशाओं से, और एक ज़रूरी बारीकी
दो तरह के आलोचक — यह भेद परीक्षा में पूछा जाता है
| पक्ष | तर्क |
|---|---|
| ★★वामपंथी | “मौजूदा वैश्वीकरण विश्वव्यापी पूंजीवाद की एक ख़ास अवस्था है जो धनिकों को और ज्यादा धनी (तथा इनकी संख्या में कमी) और गरीब को और ज्यादा ग़रीब बनाती है।” और — “राज्य के कमजोर होने से गरीबों के हित की रक्षा करने की उसकी क्षमता में कमी आती है।” |
| ★★दक्षिणपंथी | राजनीतिक — “राज्य के कमजोर होने की चिंता”; “कम से कम कुछ क्षेत्रों में आर्थिक आत्मनिर्भरता और ‘संरक्षणवाद’ का दौर फिर कायम हो” · सांस्कृतिक — “परंपरागत संस्कृति की हानि होगी और लोग अपने सदियों पुराने जीवन-मूल्य तथा तौर-तरीकों से हाथ धो देंगे।” |
और यह बारीकी जो उत्तर को ऊपर उठा देती है
- ★★“यहाँ हम गौर करें कि वैश्वीकरण-विरोधी आंदोलन भी विश्वव्यापी नेटवर्क में भागीदारी करते हैं और अपने से मिलती-जुलती सोच रखने वाले दूसरे देशों के लोगों से गठजोड़ करते हैं।”
- ★★“वैश्वीकरण-विरोधी बहुत से आंदोलन वैश्वीकरण की धारणा के विरोधी नहीं बल्कि वैश्वीकरण के किसी खास कार्यक्रम के विरोधी हैं जिसे वे साम्राज्यवाद का एक रूप मानते हैं।”
यानी विरोध ‘वैश्वीकरण’ का नहीं, ‘नव-उदारवादी वैश्वीकरण’ का है।
प्रतिरोध के पड़ाव
- 1999सिएट्ल — विश्व व्यापार संगठन की मंत्री-स्तरीय बैठक; बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन। तर्क — “उदीयमान वैश्विक आर्थिक-व्यवस्था में विकासशील देशों के हितों को समुचित महत्त्व नहीं दिया गया है।”
- 2001★★वर्ल्ड सोशल फोरम (WSF) की पहली बैठक — ब्राजील के पोर्तो अलेग्रे में
- 2004चौथी बैठक — मुंबई में
- 2024फरवरी में नेपाल में बैठक
WSF में कौन-कौन
- ★“इस मंच के तहत मानवाधिकार-कार्यकर्त्ता, पर्यावरणवादी, मजदूर, युवा और महिला कार्यकर्त्ता एकजुट होकर नव-उदारवादी वैश्वीकरण का विरोध करते हैं।”
भारत में प्रतिरोध — दोनों तरफ से
पृ. 111
- “सामाजिक आंदोलनों से लोगों को अपने पास-पड़ोस की दुनिया को समझने में मदद मिलती है।”
- ★वामपंथी — “आर्थिक वैश्वीकरण के ख़िलाफ़ वामपंथी तेवर की आवाजें राजनीतिक दलों की तरफ से उठी हैं तो इंडियन सोशल फोरम जैसे मंचों से भी।”; “औद्योगिक श्रमिक और किसानों के संगठनों ने बहुराष्ट्रीय निगमों के प्रवेश का विरोध किया है।”
- ★★“कुछ वनस्पतियाँ मसलन ‘नीम’ को अमरीकी और यूरोपीय फर्मों ने पेटेन्ट कराने के प्रयास किए। इसका भी कड़ा विरोध हुआ।”
- ★दक्षिणपंथी — विरोध “केबल नेटवर्क के जरिए उपलब्ध कराए जा रहे विदेशी टी.वी. चैनलों से लेकर वैलेन्टाईन-डे मनाने तथा स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं की पश्चिमी पोशाकों के लिए बढ़ती अभिरुचि तक”
8 | और जहाँ से शुरू हुए, वहीं लौटिए | विरोध भी एकजुट नहीं है
पोस्टर (पृ. 99) — ‘विश्व सामाजिक मंच : एक मुक्त आकाश’
नारा — “एक और दुनिया मुमकिन है”
- मंच के भीतर की बहसें — “एक ओर पुराने किस्म की सतही वामपंथी राजनीति है और दूसरी ओर अलग-अलग रंगों वाली अराजकतावादी ताकतें… इनका साझे मुद्दों पर सघन रूप से एक होना नामुमकिन है।”
- “नवउदारवाद नई बोतल में पुरानी शराब है… इसे हर कीमत पर खत्म कर देना चाहिए। क्या यह कुछ अच्छा भी हो सकता है? हम भी उतने ही भ्रमित हैं जितने की आप।”
- “विकल्पों की खोज और निर्माण की यह प्रक्रिया बहुलता और विविधता भरी होगी। इसका संदर्भ गैर दलीय और गैर सरकारी होगा।”
और लाल पैनल — मंच की ही तीखी आलोचना
- ! “बेहतर है कि मुंबई प्रतिरोध 2004 तथाकथित विश्व सामाजिक मंच का विरोध कर रहा है।” — आरोप: “अलोकतांत्रिक तौर-तरीके” और “साम्राज्यवादी देशों और बड़े व्यापार के धन पर निर्भरता”
- ! “विश्व सामाजिक मंच… संघर्ष को सुधारवाद की तरफ मोड़ना चाहता है।”
- !! “एन.जी.ओ. साम्राज्यवाद के दलाल हैं। ये जनता को भरमाते-बरगालते हैं और भ्रष्ट करते हैं।”
★★कक्षा के लिए: अध्याय जहाँ से शुरू हुआ था वहीं लौट आता है — और यही उसका सबसे बड़ा पाठ है: वैश्वीकरण-विरोध भी एकजुट नहीं है, उसके भीतर भी उतनी ही बहस है।
9 | समेटते हुए | अध्याय, और पूरी पुस्तक
एक सारणी में पूरा अध्याय
| पहलू | सार |
|---|---|
| अवधारणा | प्रवाह — विचार, पूँजी, वस्तु, लोग; और ‘विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव’ |
| प्रकृति | बहुआयामी — राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक; और प्रभाव विषम |
| कारण | प्रौद्योगिकी (अपरिहार्य, पर अकेली काफी नहीं) + जुड़ाव की चेतना |
| राजनीतिक प्रभाव | क्षमता में कमी · प्रधानता बरकरार · ताकत में इजाफा — तीनों एक साथ |
| आर्थिक प्रभाव | वस्तु, पूँजी और विचार का प्रवाह बढ़ा; ! लोगों का नहीं — वीजा-नीति |
| सांस्कृतिक प्रभाव | समरूपता (पश्चिमी संस्कृति का दबाव) और वैभिन्नीकरण (हर संस्कृति और विशिष्ट) — दोनों |
| भारत | औपनिवेशिक निर्यातक → संरक्षणवाद → 1991 के सुधार; कसौटी — “फायदों में सबका साझा” |
| प्रतिरोध | वामपंथी और दक्षिणपंथी — दोनों से; सिएट्ल 1999 · WSF 2001/2004/2024 |
और पूरी पुस्तक — सात अध्याय, एक-एक पंक्ति में
| अध्याय | सार |
|---|---|
| 1. दो ध्रुवीयता का अंत | सोवियत संघ का विघटन और एक-ध्रुवीय विश्व |
| 2. सत्ता के समकालीन केन्द्र | यूरोपीय संघ, आसियान और चीन — नये शक्ति-केंद्र |
| 3. समकालीन दक्षिण एशिया | पड़ोस की राजनीति और सार्क |
| 4. अंतर्राष्ट्रीय संगठन | “संयुक्त राष्ट्रसंघ के बिना दुनिया और बदहाल होगी” |
| 5. समकालीन विश्व में सुरक्षा | “सुरक्षा किसकी?” — राज्य की या जनता की |
| 6. पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन | “जवाब इस बात से तय होते हैं कि कौन देश कितना ताकतवर है” |
| 7. वैश्वीकरण | “विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव” — और उसका विषम प्रभाव |
एक सवाल, सात अध्याय
पूरी पुस्तक एक ही सवाल के इर्द-गिर्द घूमती है — शीतयुद्ध के बाद दुनिया में ताकत कहाँ चली गई? पहले चार अध्याय बताते हैं कहाँ; अगले तीन बताते हैं कि उसका असर आम आदमी पर क्या पड़ा।

