कक्षा 12 • राजनीति विज्ञान • समकालीन विश्व राजनीति • अध्याय 6 — पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन
कक्षा — 12 · विषय — राजनीति विज्ञान (समकालीन विश्व राजनीति) · पृष्ठ — 81 से 98
पेड़, पानी और हवा — क्या ये भूगोल के विषय हैं या राजनीति के?
★★“कौन पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है? इस पर रोक लगाने की जिम्मेदारी किसकी है? धरती के प्राकृतिक संसाधनों पर किसको कितने इस्तेमाल का हक है?” ★★“इन सवालों के जवाब बहुधा इस बात से निर्धारित होते हैं कि कौन देश कितना ताकतवर है।” इसीलिए — “ये मसले गहरे अर्थों में राजनीतिक हैं।”
0 | पहले दो चेतावनियाँ | यह अध्याय पहले ‘अध्याय 8’ था
पाठ्यक्रम-युक्तिकरण — अब छह अध्यायों में पुष्ट
| पुराना क्रम | अध्याय | अब | QR कोड |
|---|---|---|---|
| 1 | शीतयुद्ध का दौर | ❌ हटाया गया | — |
| 2 | दो ध्रुवीयता का अंत | ✓ अध्याय 1 | 12108CH02 |
| 3 | समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व | ❌ हटाया गया | — |
| 4 | सत्ता के समकालीन केन्द्र | ✓ अध्याय 2 | 12108CH04 |
| 5 | समकालीन दक्षिण एशिया | ✓ अध्याय 3 | 12108CH05 |
| 6 | अंतर्राष्ट्रीय संगठन | ✓ अध्याय 4 | 12108CH06 |
| 7 | समकालीन विश्व में सुरक्षा | ✓ अध्याय 5 | 12108CH07 |
| 8 | पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन | ✓ अध्याय 6 | 12108CH08 |
और इस अध्याय में दो अनाथ-संदर्भ रह गए हैंध्यान
दोनों पृ. 82 पर
- ! पहला — गलत अध्याय-क्रमांक: “अध्याय सात में हमने विश्व-राजनीति के दायरे को थोड़ा बढ़ाकर उसमें गरीबी और महामारी जैसे विषय भी शामिल कर लिए हैं।” → वह अब अध्याय 5 (समकालीन विश्व में सुरक्षा) है।
- ! दूसरा — गलत पृष्ठ-संख्या: “(अराल सागर की अवस्थिति देखने के लिए पृष्ठ 24 पर दिए मानचित्र को देखें।)” → पृष्ठ 24 अब अध्याय 2 का है और उस पर चीन के कार्टून हैं।
✓ पर एक संदर्भ सही है (पृ. 97) — “अगले अध्याय में वैश्वीकरण के विरोध में चल रहे आंदोलन की चर्चा की गई है।” — अगला अध्याय 7 वही है।
1 | पर्यावरण ‘राजनीति’ कैसे बना? | 1960 का दशक, और एक सूची
पहले नुकसान की सूची देखिए
पृ. 82–83
- कृषि-भूमि — “दुनिया भर में कृषि-योग्य भूमि में अब कोई बढ़ोत्तरी नहीं हो रही”; उर्वरता घट रही; चारागाहों के चारे खत्म होने को; मत्स्य-भंडार घट रहा → खाद्य-उत्पादन में कमी
- वन और जैव-विविधता — वन जलवायु और जलचक्र को संतुलित रखते हैं, पर कटाई जारी और लोग विस्थापित
- ★ओज़ोन परत में छेद — “पारिस्थितिकी तंत्र और मनुष्य के स्वास्थ्य पर एक बड़ा खतरा”
- समुद्रतट — मध्यवर्ती भाग अब भी स्वच्छ, पर तटवर्ती जल जमीनी क्रियाकलापों से प्रदूषित
66.3 करोड़ · 2.40 अरब · 30 लाख
संयुक्त राष्ट्रसंघ की मानव विकास रिपोर्ट (2016) — विकासशील देशों की 66.3 करोड़ जनता को स्वच्छ जल नहीं; 2 अरब 40 करोड़ आबादी साफ-सफाई से वंचित; और इस वजह से 30 लाख से ज्यादा बच्चे हर साल मौत के शिकार।
ये मसले राजनीतिक क्यों हैं — दो स्तर
यही पूरे अध्याय की धुरी है
- पहला स्तर — सरकारें कदम उठाती हैं; और ★“इन मसलों में अधिकांश ऐसे हैं कि किसी एक देश की सरकार इनका पूरा समाधान अकेले दम पर नहीं कर सकती।”
- ★★दूसरा और गहरा स्तर — “कौन नुकसान पहुँचाता है? रोक की जिम्मेदारी किसकी? संसाधनों पर किसका कितना हक?” → “इन सवालों के जवाब बहुधा इस बात से निर्धारित होते हैं कि कौन देश कितना ताकतवर है।”
साइड-टिप्पणी (पृ. 82): “जंगल के सवाल पर राजनीति, पानी के सवाल पर राजनीति और वायुमंडल के मसले पर राजनीति! फिर, किस बात में राजनीति नहीं है!”
चिंता से राजनीति तक
- 1960का दशक — “आर्थिक विकास के कारण पर्यावरण पर होने वाले असर की चिंता ने राजनीतिक चरित्र ग्रहण किया”
- 1972‘क्लब ऑव रोम’ ने ‘लिमिट्स टू ग्रोथ’ प्रकाशित की — “बढ़ती जनसंख्या के आलोक में प्राकृतिक संसाधनों के विनाश का अंदेशा”
- 1987बर्टलैंड रिपोर्ट — ‘अवर कॉमन फ्यूचर’ — “आर्थिक विकास के चालू तौर-तरीके आगे चलकर टिकाऊ साबित नहीं होंगे”
- 1992★★पृथ्वी सम्मेलन, रियो डी जनेरियो — पर्यावरण विश्व-राजनीति के केंद्र में
अराल सागर — एक चेतावनी
चित्र-शीर्षक, पृ. 82
- “अराल के आसपास बसे हज़ारों लोगों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा क्योंकि पानी के विषाक्त होने से मत्स्य-उद्योग नष्ट हो गया।”
- “पानी में नमक की सांद्रता के ज्यादा बढ़ जाने से पैदावार कम हो गई। अनेक अनुसंधान हुए लेकिन इस समस्या का समाधान न हो सका।”
- ★व्यंग्य: “लोग एक-दूसरे से कहते हैं कि जितने लोग सागर के अध्ययन के लिए आये वे अगर एक-एक बाल्टी पानी भी लाते तो यह सागर भर गया होता।”
2 | पृथ्वी सम्मेलन 1992 | और वह खाई जो खुलकर सामने आ गई
पृथ्वी सम्मेलन — पाँच तथ्य
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| कब और कहाँ | 1992 · रियो डी जनेरियो, ब्राज़ील |
| किसका | संयुक्त राष्ट्रसंघ का — पर्यावरण और विकास के मुद्दे पर |
| कौन शामिल | 170 देश · हजारों स्वयंसेवी संगठन · अनेक बहुराष्ट्रीय निगम |
| पृष्ठभूमि | बर्टलैंड रिपोर्ट, 1987 — ‘अवर कॉमन फ्यूचर’ |
| महत्त्व | “पर्यावरण को लेकर बढ़ते सरोकारों को इस सम्मेलन में एक ठोस रूप मिला” |
उत्तर बनाम दक्षिण — दो अलग अजेंडे
| पक्ष | कौन | मुख्य चिंता |
|---|---|---|
| उत्तरी गोलार्द्ध | धनी और विकसित देश | ★“ओज़ोन परत की छेद और वैश्विक तापवृद्धि (ग्लोबल वर्मिंग)” |
| दक्षिणी गोलार्द्ध | गरीब और विकासशील देश | ★“आर्थिक विकास और पर्यावरण प्रबंधन के आपसी रिश्ते को सुलझाने” की चिंता |
रियो के परिणाम
प्रश्न 4 का सीधा उत्तर
- 1. “जलवायु-परिवर्तन, जैव-विविधता और वानिकी के संबंध में कुछ नियमाचार निर्धारित हुए।”
- 2. ★“इसमें ‘अजेंडा-21’ के रूप में विकास के कुछ तौर-तरीके भी सुझाए गए।”
- 3. ★★‘टिकाऊ विकास’ पर सहमति — “आर्थिक वृद्धि का तरीका ऐसा होना चाहिए कि इससे पर्यावरण को नुकसान न पहुँचे।”
- ! 4. “लेकिन इसके बाद भी आपसी अंतर और कठिनाइयाँ बनी रहीं।”
और दो आलोचनाएँ — जो पाठ्यपुस्तक स्वयं दर्ज़ करती है
- ! “समस्या यह थी कि ‘टिकाऊ विकास’ पर अमल कैसे किया जाएगा।”
- !★“कुछ आलोचकों का कहना है कि ‘अजेंडा-21’ का झुकाव पर्यावरण संरक्षण को सुनिश्चित करने के बजाय आर्थिक वृद्धि की ओर है।”
कार्टून (पृ. 84): “अगर आप इस ग्रह को बचाना चाहते हैं तो अपने हाथ उठाएँ…” — धनी आदमी हाथ तो उठाता है, पर उंगलियाँ क्रॉस किए हुए।
3 | विश्व की साझी संपदा | जो किसी की नहीं, इसलिए सबकी
दो परिभाषाएँ — इन्हें मिलाइए मत
प्रश्न 5 का उत्तर
- ★साझी संपदा — “उन संसाधनों को कहते हैं जिन पर किसी एक का नहीं बल्कि पूरे समुदाय का अधिकार होता है।” उदाहरण — संयुक्त परिवार का चूल्हा, चारागाह, मैदान, कुआँ या नदी।
- ★★वैश्विक संपदा / ‘मानवता की साझी विरासत’ — “विश्व के कुछ हिस्से और क्षेत्र किसी एक देश के संप्रभु क्षेत्राधिकार से बाहर होते हैं। इसीलिए उनका प्रबंधन साझे तौर पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा किया जाता है।”
चार — और सिर्फ चार
“इसमें पृथ्वी का वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष शामिल हैं।” — यही ‘विश्व की साझी विरासत’ है।
तीन समझौते
- 1959अंटार्कटिका संधि
- 1987मॉन्ट्रियल न्यायाचार (प्रोटोकॉल)
- 1991अंटार्कटिका पर्यावरणीय न्यायाचार
और सुरक्षा में सबसे बड़ी दिक्कत
- ! “‘वैश्विक संपदा’ की सुरक्षा के सवाल पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग कायम करना टेढ़ी खीर है।”
- ★“पारिस्थितिकी से जुड़े हर मसले के साथ एक बड़ी समस्या यह जुड़ी है कि अपुष्ट वैज्ञानिक साक्ष्यों और समय-सीमा को लेकर मतभेद पैदा होते हैं।”
- ★इसीलिए — “1980 के दशक के मध्य में अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन परत में छेद की खोज एक आँख खोल देने वाली घटना है।”
- ★★बाहरी अंतरिक्ष में भी वही असमानता — “जो दोहन-कार्य हो रहे हैं उनके फायदे न तो मौजूदा पीढ़ी में सबके लिए बराबर हैं और न आगे की पीढ़ियों के लिए।”
अंटार्कटिका — चार आँकड़े जो पूछे जाते हैं
| मान | आँकड़ा |
|---|---|
| क्षेत्रफल | 1 करोड़ 40 लाख वर्ग किलोमीटर |
| विश्व के निर्जन क्षेत्र का हिस्सा | 26 प्रतिशत |
| ★स्थलीय हिम | 90 प्रतिशत |
| ★धरती का स्वच्छ जल | 70 प्रतिशत |
अंटार्कटिका पर किसका स्वामित्व — दो दावे
बॉक्स, पृ. 85
- ★संप्रभु अधिकार का वैधानिक दावा — ब्रिटेन · अर्जेन्टीना · चिले · नार्वे · फ्रांस · ऑस्ट्रेलिया · न्यूजीलैंड
- ★“अन्य अधिकांश देशों ने इससे उलटा रुख अपनाया कि अंटार्कटिक प्रदेश विश्व की साझी संपदा है और यह किसी भी देश के क्षेत्राधिकार में शामिल नहीं है।”
- पारिस्थितिकी: ★क्रिल मछली — “समुद्री आहार शृंखला की धुरी”; और अंदरूनी हिमानी परत — “ग्रीन हाऊस गैस के जमाव का महत्त्वपूर्ण सूचना-स्रोत; लाखों बरस पहले के वायुमंडलीय तापमान का पता”
- ! “1959 के बाद गतिविधियाँ वैज्ञानिक अनुसंधान, मत्स्य आखेट और पर्यटन तक सीमित रहीं — लेकिन इतनी कम गतिविधियों के बावजूद कुछ हिस्से तेल के रिसाव के दबाव में अपनी गुणवत्ता खो रहे हैं।”
4 | साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ | समानता का अर्थ ‘एक-सा व्यवहार’ नहीं
दो रवैये
| पक्ष | तर्क |
|---|---|
| उत्तर के विकसित देश | पर्यावरण पर चर्चा “उसी रूप में जिस दशा में पर्यावरण आज मौजूद है” — यानी “पर्यावरण के संरक्षण में हर देश की जिम्मेदारी बराबर हो” |
| दक्षिण के विकासशील देश | “पारिस्थितिकी को नुकसान अधिकांशतया विकसित देशों के औद्योगिक विकास से पहुँचा है” → “उन्हें इस नुकसान की भरपाई की जिम्मेदारी भी ज्यादा उठानी चाहिए”; और “विकासशील देश अभी औद्योगीकरण से गुजर रहे हैं — उन पर वे प्रतिबंध न लगें जो विकसित देशों पर लगते हैं” |
रियो-घोषणापत्र — प्रश्न 6 का उत्तर यहीं है
पर्यावरण के विश्वव्यापी अपक्षय में विभिन्न राज्यों का योगदान अलग-अलग है। इसे देखते हुए विभिन्न राज्यों की ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ होंगी। विकसित देशों के समाजों का वैश्विक पर्यावरण पर दबाव ज्यादा है और इन देशों के पास विपुल प्रौद्योगिक एवं वित्तीय संसाधन हैं। इसे देखते हुए टिकाऊ विकास के अंतर्राष्ट्रीय प्रयास में विकसित देश अपनी ख़ास जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं।
NCERT, अध्याय 6, पृ. 87
UNFCCC से क्योटो तक — कड़ी समझिए
यह क्रम परीक्षा में पूछा जाता है
- ★1992 — UNFCCC (यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कंवेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज) — सिद्धांतों की रूपरेखा। देश “अपनी क्षमता के अनुरूप, पर्यावरण के अपक्षय में अपनी हिस्सेदारी के आधार पर” प्रयास करेंगे।
- इसमें दो बातें स्वीकार की गईं —
- ★“ऐतिहासिक रूप से भी और मौजूदा समय में भी ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन में सबसे ज्यादा हिस्सा विकसित देशों का है।”
- ★“विकासशील देशों का प्रतिव्यक्ति उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम है।”
- ★★इसीलिए — “चीन, भारत और अन्य विकासशील देशों को क्योटो-प्रोटोकॉल की बाध्यताओं से अलग रखा गया है।”
- ★1997 — क्योटो प्रोटोकॉल (जापान के क्योटो में) — “औद्योगिक देशों के लिए ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लक्ष्य निर्धारित”; गैसें — कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, हाइड्रो-फ्लोरो कार्बन।
साइड-टिप्पणी (पृ. 87): “यह जायज सिद्धांत है! हमारे देश में जारी आरक्षण की नीति की तरह! है न?”
5 | साझी संपदा और देवस्थान | जो सदियों से चला आ रहा है
साझी संपदा — परिभाषा और उसका संकट
- ★“साझी संपदा का अर्थ होता है ऐसी संपदा जिस पर किसी समूह के प्रत्येक सदस्य का स्वामित्व हो।”
- ★“ऐसे संसाधन की प्रकृति, उपयोग के स्तर और रख-रखाव के संदर्भ में समूह के हर सदस्य को समान अधिकार प्राप्त होंगे और समान उत्तरदायित्व निभाने होंगे।”
- !★★चार कारण जिनसे यह सिमट रही है — “निजीकरण, गहनतर खेती, आबादी की वृद्धि और पारिस्थितिकी तंत्र की गिरावट” → “पूरी दुनिया में साझी संपदा का आकार घट रहा है, उसकी गुणवत्ता और गरीबों को उसकी उपलब्धता कम हो रही है।”
साइड-टिप्पणी (पृ. 88): “लोग कहते हैं कि लातिनी अमरीका में एक नदी बेच दी गई। साझी संपदा कैसे बेची जा सकती है?”
भारत के पावन वन-प्रांत — ‘देवस्थान’ के नाम
| राज्य | स्थानीय नाम |
|---|---|
| राजस्थान | वानी · केंकड़ी · ओरान |
| झारखंड | जहेरा थान · सरना |
| मेघालय | लिंगदोह |
| केरल | काव |
| उत्तराखंड | थान · देवभूमि |
| महाराष्ट्र | देव रहतिस |
देवस्थान क्या सिखाता है
बॉक्स, पृ. 88
- “इस प्रथा में वनों के कुछ हिस्सों को काटा नहीं जाता। इन स्थानों पर देवता अथवा किसी पुण्यात्मा का वास माना जाता है।”
- ★“‘देवस्थान’ को हम ऐसी व्यवस्था के रूप में देख सकते हैं जिसके अंतर्गत पुराने समाज प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल इस तरह करते हैं कि पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बना रहे।”
- ★“इससे जैव-विविधता और पारिस्थितिकी-संरक्षण में ही नहीं, सांस्कृतिक वैविध्य को भी कायम रखने में मदद मिल सकती है।”
- ★★“संसाधनों की विरलता नहीं, प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा ही वह आधार थी जिसने इतने युगों से वनों को बचाए रखने की प्रतिबद्धता कायम रखी।”
! और आज की कठिन समस्या: “कानूनी स्वामित्व राज्य का हो और व्यावहारिक नियंत्रण समुदाय के हाथ में। इन दोनों के नीतिगत मानक अलग-अलग हैं।”
6 | पर्यावरण के मसले पर भारत का पक्ष | ऐतिहासिक उत्तरदायित्व
भारत और क्योटो
- ★★“भारत ने 2002 में क्योटो प्रोटोकॉल (1997) पर हस्ताक्षर किए और इसका अनुमोदन किया।”
- ★छूट क्यों मिली — “औद्योगीकरण के दौर में ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन के मामले में इनका कुछ ख़ास योगदान नहीं था”; और “औद्योगीकरण के दौर को मौजूदा वैश्विक तापवृद्धि और जलवायु-परिवर्तन का जिम्मेदार माना जाता है।”
- ! आलोचकों का जवाब: “भारत और चीन भी जल्दी ही ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन के मामले में विकसित देशों की भाँति अगली कतार में नज़र आयेंगे।”
3.8 · 0.9 · 1.6
विश्व का औसत (सन् 2000) — 3.8 टन प्रति व्यक्ति। भारत (2000 तक) — 0.9 टन। भारत का 2030 का अनुमान — 1.6 टन। ★★यानी “2030 तक प्रति व्यक्ति उत्सर्जन बढ़ने के बावजूद विश्व के औसत के आधे से भी कम होगा।”
भारत का मुख्य तर्क — ‘ऐतिहासिक उत्तरदायित्व’
पृ. 89–90
- ★“इस तर्क के अनुसार ग्रीनहाऊस गैसों के रिसाव की ऐतिहासिक और मौजूदा जवाबदेही ज्यादातर विकसित देशों की है।”
- ★★“इसमें जोर देकर कहा गया है कि ‘विकासशील देशों की पहली और अपरिहार्य प्राथमिकता आर्थिक तथा सामाजिक विकास की है।’”
- जून 2005, ग्रुप-8 की बैठक — भारत ने ध्यान दिलाया कि “विकासशील देशों में ग्रीन हाऊस गैसों की प्रति व्यक्ति उत्सर्जन दर विकसित देशों की तुलना में नाममात्र है।”
- ! भारत किसके खिलाफ है — तेजी से औद्योगिक होते देशों (ब्राजील, चीन, भारत) पर बाध्यता; “यह बात इस नियमाचार की मूल भावना के विरुद्ध है।”
भारत के ठोस कदम
प्रश्न 9 का उत्तर यहीं से बनता है
- ★नेशनल ऑटो-फ्यूल पॉलिसी — “वाहनों के लिए स्वच्छतर ईंधन अनिवार्य”
- ★ऊर्जा-संरक्षण अधिनियम, 2001 · ★बिजली अधिनियम, 2003 — “नवीकरणीय (Renewable) ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा”
- प्राकृतिक गैस का आयात और स्वच्छ कोयले पर आधारित प्रौद्योगिकी
- ★बायोडीजल राष्ट्रीय मिशन — “2011-12 तक बायोडीजल तैयार; 1 करोड़ 10 लाख हेक्टेयर भूमि का इस्तेमाल”
- ★★“भारत ने 2 अक्तूबर 2016 को पेरिस जलवायु समझौते को अनुमोदित किया।”
- ★“पुनर्नवीकृत होने वाली ऊर्जा के सबसे बड़े कार्यक्रमों में से एक भारत में चल रहा है।”
और दो बातें जो अक्सर छूट जाती हैं
- ! 1997 का पुनरावलोकन — मुख्य निष्कर्ष: “विकासशील देशों को रियायती शर्तों पर नये और अतिरिक्त वित्तीय संसाधन तथा बेहतर प्रौद्योगिकी मुहैया कराने की दिशा में कोई सार्थक प्रगति नहीं हुई है।”
- ★क्षेत्रीय पहल — “‘दक्षेस’ (SAARC) में शामिल देश पर्यावरण के प्रमुख वैश्विक मसलों पर एक समान राय बनायें ताकि इस क्षेत्र की आवाज़ वज़नी हो सके।”
! और आलोचना भी दर्ज़ है (साइड-टिप्पणी, पृ. 89): “मैं समझ गया! पहले उन लोगों ने धरती को बर्बाद किया और अब धरती को चौपट करने की हमारी बारी है। क्या यही है हमारा पक्ष?”
7 | पर्यावरण आंदोलन | सरकारें नहीं, कार्यकर्ता
आंदोलन क्यों महत्वपूर्ण हैं
- ★“कुछ महत्त्वपूर्ण पेशकदमियाँ सरकारों की तरफ से नहीं बल्कि विश्व के विभिन्न भागों में सक्रिय पर्यावरण के प्रति सचेत कार्यकर्ताओं ने की हैं।”
- ★“आज पूरे विश्व में पर्यावरण आंदोलन सबसे ज्यादा जीवंत, विविधतापूर्ण तथा ताकतवर सामाजिक आंदोलनों में शुमार किए जाते हैं।”
- ★★“सामाजिक चेतना के दायरे में ही राजनीतिक कार्रवाई के नये रूप जन्म लेते हैं या उन्हें खोजा जाता है।”
- ★“मौजूदा पर्यावरण आंदोलनों की एक मुख्य विशेषता उनकी विविधता है।”
तीन तरह के आंदोलन
| प्रकार | कहाँ | मुख्य बात |
|---|---|---|
| वन-आंदोलन | मैक्सिको, चिले, ब्राज़ील, मलेशिया, इंडोनेशिया, महादेशीय अफ्रीका, भारत | ! “तीन दशकों की सक्रियता के बावजूद वनों की कटाई खतरनाक गति से जारी; पिछले दशक में विश्व के विशालतम वनों का विनाश बढ़ा” |
| खनिज-उद्योग विरोधी | फिलीपीन्स — ‘वेस्टर्न माइनिंग कारपोरेशन’ के विरुद्ध | ★“इस कंपनी का विरोध खुद इसके स्वदेश यानी ऑस्ट्रेलिया में हुआ” — परमाण्विक शक्ति की मुख़ालफत और आदिवासी अधिकारों की पैरोकारी के कारण |
| बाँध-विरोधी | ★विश्व का पहला — 1980 का दशक, ऑस्ट्रेलिया, फ्रैंकलिन नदी; आज तुर्की से थाईलैंड और दक्षिण अफ्रीका तक, इंडोनेशिया से चीन तक | ★★भारत — नर्मदा आंदोलन सबसे प्रसिद्ध; और “भारत के ये आंदोलन एक अर्थ में समानधर्मी हैं क्योंकि ये अहिंसा पर आधारित हैं।” |
खनिज-उद्योग के पाँच नुकसान
- “धरती के भीतर मौजूद संसाधनों को बाहर निकालता है”
- “रसायनों का भरपूर उपयोग करता है”
- “भूमि और जलमार्गों को प्रदूषित करता है”
- “स्थानीय वनस्पतियों का विनाश करता है”
- ★“इसके कारण जन-समुदायों को विस्थापित होना पड़ता है”
चित्र (पृ. 92): “बांग्लादेश के दिनाजपुर के शहर फुलवाड़ी में एक पूरा-का-पूरा समुदाय कोयला खनन परियोजना के विरोध में उठ खड़ा हुआ।”
क्या वन निर्जन होते हैं? — अध्याय का सबसे गहरा विचार
| उत्तरी देशों का नज़रिया | दक्षिणी देशों का नज़रिया | |
|---|---|---|
| वन क्या है | “जनविहीन”; “निर्जन प्रांत” — वनभूमि को निर्जन भूमि का दर्जा | ★“दक्षिणी देशों के वन निर्जन नहीं हैं” |
| मनुष्य कहाँ है | ! “यह दृष्टिकोण मनुष्य को प्रकृति का हिस्सा नहीं मानता” | ★★“पर्यावरण के अधिकांश मसले इस मान्यता पर आधारित हैं कि लोग वनों में भी रहते हैं।” |
| पर्यावरण किससे बचाना है | “बाग-बगीचे या अभयारण्य में तब्दील कर मनुष्यों से बचाया जाना चाहिए” | मनुष्य समस्या नहीं, समाधान का हिस्सा है |
| कहाँ हावी | ऑस्ट्रेलिया, स्कैंडिनेविया, उत्तरी अमरीका, न्यूजीलैंड | — |
पर दक्षिण में भी विजनपन के अभियान हैं
- फिलीपीन्स — ‘हरित-संगठनों’ (Green Organisations) ने गरुड़ तथा अन्य शिकारी पक्षियों को बचाने की मुहिम
- भारत — ‘बंगाल-टाइगर’ को बचाने की मुहिम, “क्योंकि इनकी संख्या लुप्त होने की हद तक कम हो चली थी”
- अफ्रीका — हाथीदाँत के व्यापार और हाथियों को निर्दयतापूर्वक मारने के विरुद्ध लंबा अभियान
- ब्राजील और इंडोनेशिया के जंगलों में विजनपन के प्रसिद्ध संघर्ष
- ★“इनमें से अनेक अभियानों की शुरुआत और वित्तीय मदद वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड (WWF) जैसे संगठनों ने की। ऐसे प्रयासों में स्थानीय लोगों की मदद भी ली गई।”
8 | संसाधनों की भू-राजनीति | तेल और पानी
पूरे खंड की परिभाषा — एक पंक्ति में
‘किसे, क्या, कब, कहाँ और कैसे हासिल होता है’ — ‘संसाधनों की भू-राजनीति’ इन्हीं सवालों से जूझती है।
NCERT, अध्याय 6, पृ. 92
संसाधन और सत्ता — एक ऐतिहासिक क्रम
- 17वींसदी से — इमारती लकड़ी; “समुद्री नौवहन स्वयं इमारती लकड़ियों पर आधारित था” — यूरोपीय शक्तियों की प्राथमिकता
- युद्धदोनों विश्वयुद्धों में सामरिक संसाधनों, खासकर तेल की निर्बाध आपूर्ति का महत्त्व उजागर हुआ
- शीतशीतयुद्ध — विकसित देशों के चार कदम: सेना की तैनाती · संसाधनों का भंडारण · मनपसंद सरकारों की बहाली · बहुराष्ट्रीय निगमों को समर्थन
- आज★★“वैश्विक रणनीति में तेल लगातार सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन बना हुआ है।”
तेल — चार आँकड़े
| मान | आँकड़ा |
|---|---|
| पश्चिम एशिया/खाड़ी का विश्व तेल-उत्पादन में हिस्सा | 30 प्रतिशत |
| ★इस क्षेत्र में विश्व के ज्ञात तेल-भंडार का हिस्सा | 64 प्रतिशत — “यही एकलौता क्षेत्र है जो माँग बढ़ने पर पूर्ति कर सकता है” |
| ★सऊदी अरब | कुल तेल-भंडार का एक चौथाई; विश्व का सबसे बड़ा तेल-उत्पादक |
| ★इराक | ज्ञात भंडार में दूसरा; “संभावना है कि इराक का तेल-भंडार 112 अरब बैरल से कहीं ज्यादा हो” |
और वह विरोधाभास जो सब कुछ समझा देता है
- ★★“संयुक्त राज्य अमरीका, यूरोप, जापान तथा चीन और भारत में इस तेल की खपत होती है — लेकिन ये देश इस इलाके से बहुत दूरी पर हैं।”
- ★“तेल के साथ विपुल संपदा जुड़ी है और इसी कारण इस पर कब्ज़ा जमाने के लिए राजनीतिक संघर्ष छिड़ता है। पेट्रोलियम का इतिहास युद्ध और संघर्षों का भी इतिहास है।”
- ★बॉक्स (पृ. 94): “दुनिया को परिवहन के लिए जितनी ऊर्जा की ज़रूरत पड़ती है उसका 95 फीसदी पेट्रोलियम से ही पूरा होता है। पूरी औद्योगिक दुनिया पेट्रोलियम के बूते टिकी है।”
कार्टून (पृ. 93) — ‘इसे कहते हैं नव-उपनिवेशवाद’: “हमने तुम्हारे देश को मटियामेट कर दिया है। अब उसके पुनर्निर्माण का खर्चा दो।” / “हम भुगतान के रूप में पेट्रोलियम जैसे प्राकृतिक संसाधन स्वीकार करते हैं।”
पानी — और ‘जलयुद्ध’
पृ. 94–95
- ★“विश्व के कुछ भागों में साफ पानी की कमी हो रही है। साथ ही, विश्व के हर हिस्से में स्वच्छ जल समान मात्रा में मौजूद नहीं है।”
- ★★“संभावना है कि साझे जल-संसाधन को लेकर पैदा मतभेद 21वीं सदी में फसाद की जड़ साबित हों… इसी को इंगित करने के लिए विश्व-राजनीति के कुछ विद्वानों ने ‘जलयुद्ध’ शब्द गढ़ा है।”
- ★मतभेद का ढाँचा — “जलधारा के उद्गम से दूर बसा हुआ देश उद्गम के नजदीक बसे हुए देश द्वारा इस पर बाँध बनाने, अत्यधिक सिंचाई करने या इसे प्रदूषित करने पर आपत्ति जताता है।”
- ★दो उदाहरण — 1950 और 1960 के दशक में इज़रायल, सीरिया तथा जार्डन (जॉर्डन और यारमुक नदी का बहाव मोड़ने की कोशिश); और आज तुर्की, सीरिया तथा इराक के बीच फरात नदी पर बाँध को लेकर तनातनी।
9 | मूलवासी और उनके अधिकार | अध्याय का नैतिक निष्कर्ष
पहले परिभाषा — और वह UN की है
1982
- ★★“संयुक्त राष्ट्रसंघ ने 1982 में इनकी एक शुरुआती परिभाषा दी। इन्हें ऐसे लोगों का वंशज बताया गया जो किसी मौजूदा देश में बहुत दिनों से रहते चले आ रहे थे। फिर किसी दूसरी संस्कृति या जातीय मूल के लोग विश्व के दूसरे हिस्से से उस देश में आये और इन लोगों को अधीन बना लिया।”
- ★“किसी देश के ‘मूलवासी’ आज भी उस देश की संस्थाओं के अनुरूप आचरण करने से ज्यादा अपनी परंपरा, सांस्कृतिक रिवाज तथा अपने ख़ास सामाजिक, आर्थिक ढर्रे पर जीवन-यापन करना पसंद करते हैं।”
★“मूलवासियों का सवाल पर्यावरण, संसाधन और राजनीति को एक साथ जोड़ देता है।”
मूलवासी — आँकड़े
| स्थान | संख्या |
|---|---|
| ★विश्व भर में (भारत सहित) | लगभग 30 करोड़ |
| फिलीपीन्स — कोरडिलेरा | 20 लाख |
| चिले — मापुशे | 10 लाख |
| बांग्लादेश — चटगांव पर्वतीय क्षेत्र | 6 लाख |
| उत्तर अमरीका | 35 लाख |
| पनामा नहर के पूरब — कुना | 50 हज़ार |
| उत्तरी सोवियत | 10 लाख |
उनकी माँग और उनका जुमला
- ★“सरकारों से इनकी माँग है कि इन्हें मूलवासी कौम के रूप में अपनी स्वतंत्र पहचान रखने वाला समुदाय माना जाए।”
- ★★“अपने मूल वासस्थान पर हक की दावेदारी में विश्वभर के मूलनिवासी यह जुमला इस्तेमाल करते हैं कि हम यहाँ ‘अनंत काल से रहते चले आ रहे हैं’।”
- ★“भौगोलिक रूप से चाहे मूलवासी अलग-अलग जगहों पर कायम हैं, लेकिन जमीन और उस पर आधारित जीवन-प्रणालियों के बारे में इनकी विश्वदृष्टि आश्चर्यजनक रूप से एक जैसी है।”
और यह सवाल पूरे अध्याय का निचोड़ है
भूमि की हानि का अर्थ है, आर्थिक-संसाधनों के एक आधार की हानि और यह मूलवासियों के जीवन के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है। उस राजनीतिक आज़ादी का क्या मतलब जो जीने के लिए साधन ही न मुहैया कराये?
NCERT, अध्याय 6, पृ. 96
भारत में मूलवासी
- ★“भारत में ‘मूलवासी’ के लिए अनुसूचित जनजाति या आदिवासी शब्द प्रयोग किया जाता है। ये कुल जनसंख्या का आठ प्रतिशत हैं।”
- “अपवादस्वरूप कुछेक घुमन्तू जनजातियों को छोड़ दें तो भारत की अधिकांश आदिवासी जनता अपने जीवन-यापन के लिए खेती पर निर्भर है।”
- ! “ब्रितानी औपनिवेशिक शासन कायम होने के बाद से जनजातीय समुदायों का सामना बाहरी लोगों से हुआ।”
- ★★“हालाँकि राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से इनको संवैधानिक सुरक्षा हासिल है, लेकिन देश के विकास का इन्हें ज्यादा लाभ नहीं मिल सका है।”
- ★★“ऐसी परियोजनाओं से विस्थापित होने वालों में यह समुदाय सबसे बड़ा है। दरअसल इन लोगों ने विकास की बहुत बड़ी कीमत चुकायी है।”
साइड-टिप्पणी (पृ. 96): “आदिवासी जनता और उनके आंदोलनों के बारे में कुछ ज्यादा बातें क्यों नहीं सुनायी पड़तीं? क्या मीडिया का उनसे कोई मनमुटाव है?”
अंतर्राष्ट्रीय आवाज़
- ★“1970 के दशक में विश्व के विभिन्न भागों के मूलवासियों के नेताओं के बीच संपर्क बढ़ा। इससे इनके साझे अनुभवों और सरोकारों को एक शक्ल मिली।”
- ★★“1975 में ‘वर्ल्ड काउंसिल ऑफ इंडिजिनस पीपल’ का गठन हुआ। संयुक्त राष्ट्रसंघ में सबसे पहले इस परिषद् को परामर्शदायी परिषद् का दर्ज़ा दिया गया।”
- “इसके अतिरिक्त आदिवासियों के सरोकारों से संबद्ध 10 अन्य स्वयंसेवी संगठनों को भी यह दर्ज़ा दिया गया है।”
- ✓ “अगले अध्याय में वैश्वीकरण के विरोध में चल रहे आंदोलन की चर्चा की गई है। इनमें अनेक आंदोलनों ने मूलवासियों के अधिकारों पर जोर दिया है।”
10 | समेटते हुए | पूरा अध्याय कुछ पंक्तियों में
तीन जोड़े जो अलग-अलग हैं
| युग्म | भेद |
|---|---|
| साझी संपदा बनाम वैश्विक संपदा | समुदाय की संपत्ति (चारागाह, कुआँ) बनाम किसी देश के संप्रभु क्षेत्राधिकार से बाहर (वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह, बाहरी अंतरिक्ष) |
| 1992 बनाम 1997 बनाम 2002 | पृथ्वी सम्मेलन + UNFCCC · क्योटो प्रोटोकॉल · भारत का हस्ताक्षर और अनुमोदन |
| उत्तरी बनाम दक्षिणी वन-दृष्टि | वन = निर्जन प्रांत, मनुष्य प्रकृति से बाहर बनाम “लोग वनों में भी रहते हैं” |
एक वाक्य जो पूरा अध्याय है
“इन सवालों के जवाब बहुधा इस बात से निर्धारित होते हैं कि कौन देश कितना ताकतवर है।” — पर्यावरण के हर विवाद में, चाहे वह तेल हो, पानी हो, वन हो या उत्सर्जन — अंत में यही तय करता है कि किसकी बात मानी जाएगी।
और अंत में — दो सवाल कक्षा के लिए खुले छोड़िए
प्रश्न 8 और 9 की तैयारी
- “क्या ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ न्यायसंगत सिद्धांत है — या विकासशील देशों के लिए बहाना?”
- “पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना आर्थिक विकास — क्या यह सचमुच संभव है? भारत के कौन-से कदम इसका उदाहरण हैं?”
★★इन दोनों पर पाठ्यपुस्तक दोनों पक्ष देती है — उत्तर में भी दोनों रखिए। यही सबसे ऊँचे अंक दिलाता है।

