अध्याय 7 — एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर | कक्षा XII इतिहास | भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-2
कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-2)
आपकी जेब में इस अध्याय का एक चित्र पहले से है — कौन-सा?
- ₹50 के नोट को पलटिए
- वहाँ हम्पी का पत्थर-रथ है — विट्ठल मन्दिर, विजयनगर
- जो शहर 1565 में उजड़ गया, वह आज हर जेब में घूमता है
एक नाम, दो अर्थ
“विजय का शहर” — यह नाम एक शहर और एक साम्राज्य, दोनों के लिए प्रयुक्त था। समकालीन लोग साम्राज्य को कहते थे — कर्नाटक साम्राज्यमु।
अध्याय की कहानी — तीन वाक्यों में
प्रस्तावना, पृ. 170
- स्थापना चौदहवीं शताब्दी में; विस्तार कृष्णा नदी से सुदूर दक्षिण तक
- 1565 में आक्रमण, लूट — फिर शहर उजड़ गया
- पर कृष्णा-तुंगभद्रा दोआब के निवासियों की स्मृति में जीवित रहा — नाम मिला हम्पी (मातृदेवी पम्पादेवी से)
शहर मरा, स्मृति नहीं — यही इस अध्याय की पहली सीख है
पुनर्खोज के पाँच स्रोत
इतिहासकार का औज़ार-बक्सा
- मौखिक परंपराएँ — पुरोहितों-निवासियों की स्मृतियाँ
- पुरातात्त्विक खोजें — भग्नावशेष, उत्खनन
- स्थापत्य के नमूने — मन्दिर, किलेबंदी, महल
- अभिलेख — मन्दिर-दान, घटनाएँ
- अन्य दस्तावेज़ — यात्री-वृत्तांत; तेलुगु, कन्नड़, तमिल, संस्कृत साहित्य
हर खंड में पूछिए — “यह बात हमें किस स्रोत से पता चली?”
1 | हम्पी की खोज | मैकेन्जी 1800; अभिलेख 1836; छायाचित्र 1856
कर्नल कॉलिन मैकेन्जी — 1800 ई.
खोज का आरंभ
- अभियंता तथा पुराविद — ईस्ट इण्डिया कंपनी में कार्यरत
- हम्पी का पहला सर्वेक्षण मानचित्र तैयार किया
- 1815 — भारत का पहला सर्वेयर जनरल; 1821 (मृत्यु) तक पद पर
- शुरुआती जानकारी का आधार — विरुपाक्ष मंदिर व पम्पादेवी पूजास्थल के पुरोहितों की स्मृतियाँ
खोज का पहला स्रोत पत्थर नहीं — जीवित स्मृति थी
मैकेन्जी की अपनी भाषा पढ़िए
स्रोत 1, पृ. 171
ब्रिटिश प्रशासन के सुप्रभाव में आने से पहले दक्षिण भारत खराब प्रबंधन की दुर्गति से लंबे समय तक जूझता रहा।
उद्देश्य था — “भारत के अतीत को समझना और उपनिवेश के प्रशासन को आसान बनाना।” ज्ञान यहाँ शासन का उपकरण है।
खोज व संरक्षण की शृंखला
- 1800मैकेन्जी की यात्रा — पहला सर्वेक्षण मानचित्र
- 1836अभिलेखकर्ताओं द्वारा दर्जनों अभिलेखों का संग्रह आरंभ
- 1856ग्रिनलो — भवनों के पहले विस्तृत छायाचित्र
- 1876फ्लीट — मन्दिर-अभिलेखों का प्रलेखन
- 1902जॉन मार्शल के अधीन संरक्षण-कार्य
- 1976राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल
- 1986यूनेस्को विश्व पुरातत्व स्थल
2 | राय, नायक तथा सुल्तान | स्थापना; व्यापार; चरमोत्कर्ष-पतन; अमर-नायक
स्थापना और पड़ोसी
§2, पृ. 171-172
- 1336 (?) — दो भाइयों हरिहर और बुक्का द्वारा स्थापना
- सीमाओं में अलग-अलग भाषाएँ व धार्मिक परंपराएँ मानने वाले लोग
- उत्तर में संघर्ष — दक्कन के सुल्तान व उड़ीसा के गजपति से
- कारण — उर्वर नदी घाटियाँ + विदेशी व्यापार की संपदा
संघर्ष के दोनों कारण आर्थिक हैं — धार्मिक नहीं। यह वाक्य याद रखिए।
पदवियों का त्रिकोण
| पदवी | अर्थ | धारक |
|---|---|---|
| गजपति | हाथियों का स्वामी | उड़ीसा के शासक |
| अश्वपति | घोड़ों का स्वामी | दक्कन के सुल्तान |
| नरपति | लोगों का स्वामी | विजयनगर के राय |
तीनों शक्तियों ने अपने सैनिक बल के प्रतीक को ही पहचान बना लिया
घोड़े : युद्ध की धुरी, व्यापार की जान
§2.1 — शासक और व्यापारी
- युद्धकला प्रभावशाली अश्वसेना पर आधारित
- घोड़ों का आयात — अरब तथा मध्य एशिया से
- आरंभिक नियंत्रण अरब व्यापारियों का; स्थानीय समूह — कुदिरई चेट्टी
- 1498 से नये खिलाड़ी — पुर्तगाली (बेहतर सामरिक तकनीक, बंदूकें)
- बाज़ार प्रसिद्ध — मसाले, वस्त्र, रत्न; व्यापार = प्रतिष्ठा का मानक
राजा स्वयं व्यापार-नीति लिखता है
स्रोत 2 — अमुक्तमाल्यद (तेलुगु), कृष्णदेव राय
सुदूर देशों के व्यापारियों, जो हाथियों और अच्छे घोड़ों का आयात करते हैं, को रोज़ बैठक में बुलाकर, तोहफ़े देकर तथा उचित मुनाफ़े की स्वीकृति देकर अपने साथ संबद्ध करना चाहिए।
“ऐसा करने पर ये वस्तुएँ कभी भी तुम्हारे दुश्मनों तक नहीं पहुँचेंगी।” — यह परोपकार नहीं, रणनीति है।
चार राजवंश — सं-सु-तु-अ
§2.2 — सत्ता की शृंखला
- संगम — पहला वंश; 1485 तक
- सुलुव — सैनिक कमांडर; 1503 तक
- तुलुव — कृष्णदेव राय इसी वंश से
- अरावीडु — 1542 से सत्रहवीं सदी के अंत तक
दो बार सैनिक कमांडरों ने सत्ता छीनी — सेना ही शक्ति थी, सेना ही ख़तरा
कृष्णदेव राय
चारित्रिक विशेषता — विस्तार और दृढ़ीकरण। 1512 रायचूर दोआब → 1514 उड़ीसा का दमन → 1520 बीजापुर की पराजय। साथ में — अतुलनीय शांति और समृद्धि।
कृष्णदेव राय — निर्माता और लेखक
- कुछ बेहतरीन मन्दिरों का निर्माण; दक्षिण भारतीय मन्दिरों में भव्य गोपुरम जोड़े
- माँ के नाम पर उपनगर — नगलपुरम्
- शासनकला पर तेलुगु कृति — अमुक्तमाल्यद
- विजयनगर के सबसे विस्तृत विवरण उसी के या तुरंत बाद के काल से
स्रोत जहाँ सघन हों, इतिहास वहीं मोटा होता है — इसे स्रोत-पक्षपात कहते हैं
1565 — राक्षसी-तांगड़ी (तालीकोटा)
§2.2 — पतन
- 1529 में कृष्णदेव की मृत्यु → उत्तराधिकारियों को विद्रोही नायकों की चुनौती
- रामराय की नीति — एक सुल्तान को दूसरे के विरुद्ध करना
- परिणाम — सुल्तान एक हो गए: बीजापुर + अहमदनगर + गोलकुण्डा
- करारी शिकस्त → शहर पर धावा, लूट → कुछ ही वर्षों में उजड़ गया
- साम्राज्य पूर्व की ओर — पेनुकोण्डा, फिर चन्द्रगिरी
सुल्तान और राय — शत्रुता ही सब कुछ नहीं
§2.2 — चार प्रमाण ★
- कृष्णदेव राय ने सल्तनतों के दावेदारों का समर्थन किया
- विरुद धारण किया — “यवन राज्य की स्थापना करने वाला”
- बीजापुर के सुल्तान ने विजयनगर का उत्तराधिकार-विवाद सुलझाया
- दोनों पक्ष एक-दूसरे के स्थायित्व के इच्छुक थे
संबंध “धार्मिक भिन्नताओं के बावजूद हमेशा या अपरिहार्य रूप से शत्रुतापूर्ण नहीं” — NCERT
अमर-नायक प्रणाली — प्रमुख राजनीतिक खोज
§2.3 | तत्त्व दिल्ली सल्तनत की इक़्ता से लिए गए “प्रतीत होते हैं”
- राय सैनिक कमांडरों को प्रशासन हेतु राज्य-क्षेत्र देता
- वे किसानों, शिल्पकर्मियों, व्यापारियों से कर वसूलते
- राजस्व से — अश्व-गज दल (साम्राज्य की सैनिक शक्ति) + मन्दिर व सिंचाई का रख-रखाव
- वार्षिक भेंट + दरबार में स्वयं उपस्थिति; नियंत्रण हेतु स्थानांतरण
सत्रहवीं सदी में यही नायक स्वतंत्र हो गए — जिस प्रणाली ने साम्राज्य बनाया, उसी ने तोड़ा
3 | राजधानी और परिप्रदेश | जल-संपदा; किलेबंदियाँ; शहरी केंद्र
छह विदेशी आँखें
बॉक्स “शहर के विषय में खोज”, पृ. 176
- 15वीं सदी — निकोलो दे कॉन्ती (इटली), अब्दुर रज़्ज़ाक (फ़ारस का दूत), अफ़ानासी निकितिन (रूस)
- 16वीं सदी — बरबोसा, पेस, नूनिज़ (तीनों पुर्तगाली)
- साथ में — राजाओं-नायकों के अभिलेख (मन्दिर-दान, घटनाएँ)
15वीं सदी = तीन देश; 16वीं = तीनों पुर्तगाली। कारण? — 1498 याद कीजिए
पेस की पहली नज़र
स्रोत 3 — “विशाल, फैला हुआ शहर”
वहाँ से मैंने जो देखा वह मुझे रोम जितना विशाल प्रतीत हुआ, और देखने में अत्यंत सुन्दर… पेड़ों के कई उपवन, पानी की कई नालियाँ, कई स्थानों पर झीलें…
यात्री ने महल नहीं गिनाए — पानी और बग़ीचे गिनाए। शुष्क प्रायद्वीप में यही सबसे बड़ा चमत्कार था।
जल-संपदा — विडंबना से व्यवस्था तक
§3.1
- सबसे चौंकाने वाला तथ्य — तुंगभद्रा द्वारा निर्मित प्राकृतिक कुण्ड; नदी उत्तर-पूर्व को बहती है
- चारों ओर ग्रेनाइट पहाड़ियों की “करधनी”
- पर क्षेत्र — प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक
- समाधान — लगभग हर धारा पर बाँध और हौज़
नदी पास थी, फिर भी शहर प्यासा हो सकता था — नियोजन ने उसे जल-नगर बना दिया
दो प्रमुख जल-संरचनाएँ
| संरचना | काल | कार्य |
|---|---|---|
| कमलपुरम् जलाशय | 15वीं सदी का आरंभ | खेतों की सिंचाई + नहर से “राजकीय केंद्र” तक जल |
| हिरिया नहर | संभवत: संगम वंश | तुंगभद्रा के बाँध से; धार्मिक व शहरी केंद्र के बीच की घाटी की सिंचाई |
हिरिया नहर आज भी भग्नावशेषों के बीच बहती देखी जा सकती है
एक जलाशय कैसे बनता था
स्रोत 4 — पेस
जल 9 मील से भी अधिक की दूरी से पाइपों से आता है… इस जलाशय को बनाने के लिए इस राजा ने एक पूरी पहाड़ी को तुड़वा दिया… वहाँ पन्द्रह से बीस हज़ार आदमी थे, चींटियों की तरह।
इंजीनियरी + श्रम का पैमाना — पर श्रमिक अनाम हैं। “चींटियों की तरह” — यह उपमा याद रखिए, अध्याय के अंत में लौटेगी।
किलेबंदी — रज़्ज़ाक की “सात पंक्तियाँ”
§3.2
- फ़ारसी दूत अब्दुर रज़्ज़ाक (कालीकट भेजा गया) — दुर्गों की सात पंक्तियाँ
- घेरा — केवल शहर नहीं: खेत, बग़ीचे, जंगल भी
- बाहरी दीवार — पहाड़ियों को जोड़ती; बिना गारे की चिनाई
- पत्थर फानाकार (Wedge-shaped) — इसी से टिके रहते थे
- भीतरी भाग मिट्टी-मलवे का; बाहर निकले वर्गाकार-आयताकार बुर्ज
किलेबंदी में खेत — फ़ायदा बनाम क़ीमत
“एक अधिक महँगी तथा व्यापक नीति”
फ़ायदे
- लंबी घेराबंदी में खाद्य आत्मनिर्भरता
- घेराबंदियाँ महीनों-वर्षों चलती थीं
- सामान्य उपाय (अनाजगार) से अधिक टिकाऊ
- किसान व जल-स्रोत सुरक्षित
क़ीमत
- निर्माण बहुत महँगा — NCERT स्वयं कहती है
- लंबी रक्षा-रेखा — अधिक सैनिक चाहिए
- रख-रखाव का स्थायी बोझ
- जितनी लंबी दीवार, उतने कमज़ोर बिंदु
प्रमाण तीन तरफ़ से — रज़्ज़ाक + पेस + आधुनिक पुरातत्त्व : इसे मिलान (Corroboration) कहते हैं
प्रवेशद्वार बोलते हैं
§3.2 — इंडो-इस्लामी शैली
- प्रवेशद्वार पर मेहराब और ऊपर गुंबद — तुर्की सुल्तानों द्वारा प्रवर्तित स्थापत्य के चारित्रिक तत्त्व
- कला-इतिहासकार इसे इंडो-इस्लामिक (हिंद-इस्लामी) कहते हैं
- विकास — स्थानीय स्थापत्य-परंपराओं से संपर्क द्वारा
- सड़कें — पहाड़ों से बचकर घाटियों से; मन्दिर-द्वारों से आगे, दोनों ओर बाज़ार
शहरी केंद्र — जो लगभग खो गया
§3.3
- सामान्य आवासों के कम पुरातात्त्विक साक्ष्य — वे छप्पर के थे (बरबोसा: “फिर भी सुदृढ़”; व्यवसाय के आधार पर लंबी गलियाँ)
- परिष्कृत चीनी मिट्टी मिली → “हो सकता है” वहाँ अमीर व्यापारी रहते हों
- मुस्लिम रिहायशी मुहल्ला — पर मक़बरों-मस्जिदों का स्थापत्य मन्दिरों के मण्डपों जैसा
- अनेक छोटे पूजा-स्थल = विविध संप्रदाय; कुएँ व जलाशय = जन-जल-स्रोत
भवन का कार्य अलग-अलग, स्थापत्य-भाषा साझा — कारीगर एक ही थे
4 | राजकीय केंद्र | महानवमी डिब्बा; कमल महल; हज़ार राम
‘राजकीय’ केंद्र — नाम पर मत जाइए
§4 — दक्षिण-पश्चिमी भाग
- नाम राजकीय, पर भीतर 60 से अधिक मन्दिर
- लगभग 30 संरचनाएँ महल — आनुष्ठानिक कार्यों से असंबद्ध
- मन्दिर — पूरी तरह राजगिरी (पत्थर) से
- धर्मेतर भवन — अधिरचना विकारी (नाशवान) वस्तुओं से
इसीलिए मन्दिर आज भी खड़े हैं और महलों के केवल चबूतरे बचे हैं
महानवमी डिब्बा
आधार-क्षेत्र; ऊँचाई 40 फीट — शहर के सबसे ऊँचे स्थानों में से एक पर विशालकाय मंच। ऊपर लकड़ी की संरचना थी; आधार उभारदार उत्कीर्णन से पटा है।
महानवमी — जब राज्य मंच पर चढ़ता था
§4.1 — दशहरा (उत्तर) / दुर्गा पूजा (बंगाल) / नवरात्री (प्रायद्वीप)
- शरद मास का दस-दिवसीय त्यौहार; महानवमी = “महान नवाँ दिवस”
- धर्मानुष्ठान — मूर्ति-पूजा, राज्य के अश्व की पूजा, भैंसों-पशुओं की बलि
- आयोजन — नृत्य, कुश्ती; सज्जित घोड़ों-हाथियों-रथों व सैनिकों की शोभायात्रा
- राजनीति — नायकों-अधीनस्थ राजाओं की औपचारिक भेंट
- अंतिम दिन — राजा व नायकों की सेनाओं का निरीक्षण; नायकों की भेंट + नियत कर
धर्म + राजस्व + सेना — तीनों एक मंच पर : “रुतबे, ताक़त तथा अधिराज्य का प्रदर्शन”
पर एक पहेली बाक़ी है
NCERT की ईमानदारी
- क्या आज का महानवमी डिब्बा सचमुच इस अनुष्ठान का केंद्र था?
- विद्वानों की शंका — चारों ओर का स्थान शोभायात्रा के लिए पर्याप्त नहीं
- पेस इसे (सभा मंडप सहित) “विजय का भवन” कहता है — चित्रित मंच, ऊपर कपड़े का कमरा, मूर्ति का पूजा-स्थल और राज्य का सिंहासन
राजकीय केंद्र की कई संरचनाओं की तरह — यह भी पहेली है
राजकीय केंद्र के अन्य भवन
| भवन | तथ्य | सावधानी |
|---|---|---|
| कमल महल | नौ मीनारें; इंडो-इस्लामी मेहराबें; संभवत: परिषदीय सदन (मैकेन्जी का नक्शा) | नाम 19वीं सदी के अंग्रेज़ यात्रियों का |
| हज़ार राम मन्दिर | संभवत: केवल राजपरिवार हेतु; दीवारों पर रामायण के दृश्यांश | केंद्रीय मूर्तियाँ अब नहीं |
| “हाथियों का अस्तबल” | गुंबददार कक्षों की पंक्ति | क्या सच में अस्तबल था? — NCERT स्वयं पूछती है |
खड़ा रेखाचित्र (Elevation) = ऊर्ध्व दृश्य; नक्शा (Plan) = समस्तरी दृश्य
5 | धार्मिक केंद्र | पवित्र भूदृश्य; वैधता; गोपुरम्-मण्डप
राजधानी यहीं क्यों बसी?
§5.1 — चट्टानी उत्तरी भाग, नदी-तट
- मान्यता 1 — पहाड़ियाँ रामायण के बाली-सुग्रीव के वानर राज्य की रक्षक
- मान्यता 2 — पम्पादेवी ने विरुपाक्ष (राज्य के संरक्षक देवता, शिव के रूप) से विवाह हेतु तप किया
- वह विवाह आज भी हर वर्ष विरुपाक्ष मन्दिर में धूम-धाम से होता है
- साथ में — साम्राज्य-पूर्व के जैन मन्दिर
क्षेत्र कई-धार्मिक मान्यताओं से संबद्ध था — राजधानी ने पवित्रता को सत्ता से जोड़ा
मन्दिर क्या-क्या थे?
§5.1 — परंपरा: पल्लव, चालुक्य, होयसाल, चोल
- शासक का ईश्वर से जुड़ाव — देवता को राजा से जोड़ा जाता था
- शिक्षा के केंद्र
- भूमि व संपदा के दान से पोषित
- अतएव — धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक केंद्र
- शासक के लिए — सत्ता, संपत्ति, निष्ठा के समर्थन-मान्यता के माध्यम
वैधता के तीन प्रतीक
§5.1 ★
- शासन का दावा — भगवान विरुपाक्ष की ओर से
- सभी राजकीय आदेशों पर कन्नड़ लिपि में — “श्री विरुपाक्ष”
- विरुद — “हिन्दू सूरतराणा” : अरबी सुल्तान का संस्कृत अनुवाद = हिंदू सुल्तान
- नवाचार — मन्दिरों में राजकीय प्रतिकृति मूर्तियाँ; राजा की मन्दिर-यात्राएँ = राजकीय अवसर
एक हिंदू राजा ‘सुल्तान’ की उपाधि क्यों लेता है? — क्योंकि वह युग की प्रतिष्ठा-भाषा थी
राय गोपुरम् — पत्थर में लिखा घोषणापत्र
§5.2
- राजकीय प्रवेशद्वार — केंद्रीय देवालयों की मीनारों को बौना कर देते थे
- लंबी दूरी से मन्दिर के होने का संकेत
- शासक की ताक़त की याद — इतनी ऊँचाई के लिए साधन, तकनीक, कौशल चाहिए
- साथ में — मण्डप और लंबे स्तंभों वाले गलियारे
राजा का बनवाया द्वार, देवता के गर्भगृह से ऊँचा — स्थापत्य में छिपा राजनीतिक वाक्य
विरुपाक्ष और विट्ठल
§5.2 — दो मन्दिर, दो पाठ
- विरुपाक्ष — प्राचीनतम अंश नवीं-दसवीं सदी; कृष्णदेव राय ने राज्यारोहण पर मण्डप व पूर्वी गोपुरम् जोड़े → केंद्रीय देवालय परिसर के छोटे भाग तक सीमित रह गया
- सभागार — मूर्तियों के समक्ष संगीत-नृत्य-नाटक, देव-विवाह, झूला
- विट्ठल — महाराष्ट्र में पूजित विष्णु-रूप की पूजा कर्नाटक में = परंपराओं का आत्मसात; रथ के आकार का अनूठा मन्दिर
- रथ गलियाँ — गोपुरम् से सीधी; दोनों ओर मण्डपों में व्यापारियों की दुकानें
तीर्थयात्री ही ग्राहक था — पवित्रता और वाणिज्य एक ही सड़क पर चलते थे
6-7 | अंकन और अनुत्तरित प्रश्न | मानचित्रण; लकड़ी की खोई दुनिया; अनाम श्रमिक
शहर को नापने की विधि
§6 — 1976 राष्ट्रीय महत्त्व; 1980 के दशक की परियोजना
- सम्पूर्ण क्षेत्र → 25 वर्गाकार भाग (वर्णमाला के अक्षर)
- हर वर्ग → छोटे वर्ग → और छोटी इकाइयाँ
- लगभग बीस वर्ष, विश्व-भर के दर्जनों विद्वान
- परिणाम — हज़ारों संरचनाओं के अंश; सड़कें-बाज़ार पुन: प्राप्त — पहचान स्तंभ आधारों व मंचों से
“एक समय जो बाज़ार जीवंत थे, उनका बस अब यही कुछ बचा है” — NCERT
जो अब नहीं दिखता
फ़्रिट्ज़, मिशेल, नागराज राव
हमें नष्ट हो चुकी लकड़ी की वस्तुओं — स्तंभ, टेक, धरन, भीतरी छत, छज्जों, मीनारों — की एक पूरी श्रेणी की कल्पना करनी पड़ती है, जो प्लास्टर से सजाए और संभवत: चटकीले रंगों से चित्रित थे।
आज का भूरा पत्थर तब का रंगीन शहर नहीं है — जो दिखता है, वह पूरा सच नहीं।
राजा दर्ज़ है, बनाने वाला मौन
§7 + बॉक्स “कृष्णदेव राय”
जो हम जानते हैं
- चिदम्बरम गोपुरम् में राजा की सुंदर प्रतिमा
- पेस का वर्णन — “मझला कद, कुछ मोटा, चेहरे पर चेचक के दाग़”
- कला आदर्श दिखाती है, विवरण मनुष्य
जो हम नहीं जानते
- नक्शे कौन बनाता था?
- राजगीर-मूर्तिकार कहाँ से आते थे? वेतन क्या था?
- क्या उन्हें युद्ध में बंदी बनाया जाता था?
- सामान्य स्त्री-पुरुष-बच्चे इन भवनों के बारे में क्या सोचते थे?
“चींटियों की तरह” गिने गए 15-20 हज़ार श्रमिकों में से एक का भी नाम नहीं बचा
अध्याय का सूत्र
पत्थर बताता है क्या बना; यात्री बताता है कैसा दिखता था; अभिलेख बताता है किसने बनवाया — पर जिसने हाथों से बनाया, वह आज भी मौन है।
परीक्षा-दृष्टि — याद रखने योग्य शृंखलाएँ
अंतिम पुनरावृत्ति
- 1336? → सं-सु-तु-अ → 1509-29 (12-14-20) → 1565 → पेनुकोण्डा-चन्द्रगिरी
- 1800 मैकेन्जी → 1856 → 1876 → 1902 → 1976 → 1986 यूनेस्को
- तीन अंचल + बीच में कृषि-क्षेत्र (हिरिया नहर)
- यात्री: 15वीं = 3 देश; 16वीं = 3 पुर्तगाली
- श्री विरुपाक्ष • हिन्दू सूरतराणा • राय गोपुरम् • अमर-नायक ← इक़्ता
NCERT की अनिश्चितता-भाषा (“संभवत:”, “1336?”) उत्तर में सुरक्षित रखिए — यही परिपक्वता है

