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कक्षा 10 · राजनीति विज्ञान

राजनीतिक दल

अध्याय 4

भरत चौधरी और वनिता कुमारी ने बनाया · marushala.com

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अध्याय 4 — राजनीतिक दल · लोकतांत्रिक राजनीति · कक्षा 10

कक्षा — 10 · विषय — राजनीति विज्ञान (लोकतांत्रिक राजनीति) · पृष्ठ — 46 से 62

कल्पना करो — कल चुनाव है और देश में कोई पार्टी ही नहीं। हर उम्मीदवार अकेला। क्या फ़र्क़ पड़ेगा?

अध्याय की शुरुआत एक विरोधाभास से

“अधिकतर आम नागरिकों के लिए लोकतंत्र का मतलब राजनीतिक दल ही है… [पर] अधिकतर लोग आम तौर पर दलों के बारे में ख़राब राय रखते हैं। अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था और राजनीतिक जीवन की हर बुराई के लिए वे दलों को ही जिम्मेवार मानते हैं।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 47

★और फिर भी — “करीब 100 साल पहले दुनिया के बस कुछ ही देशों में… दल थे। आज गिनती के ही देश ऐसे हैं जहाँ राजनीतिक दल नहीं हैं।” — नापसंद, फिर भी हर जगह। क्यों? यही पूरा अध्याय है।

1 | अर्थ और कार्य

राजनीतिक दल — परिभाषा★★

✦

“राजनीतिक दल को लोगों के एक ऐसे संगठित समूह के रूप में समझा जा सकता है जो चुनाव लड़ने और सरकार में राजनीतिक सत्ता हासिल करने के उद्देश्य से काम करता है। समाज के सामूहिक हित को ध्यान में रखकर यह समूह कुछ नीतियाँ और कार्यक्रम तय करता है।”

तीन हिस्से — नेता · सक्रिय सदस्य · अनुयायी या समर्थक

दो बारीक बातें

पृष्ठ 48

  • “सामूहिक हित एक विवादास्पद विचार है” — इसी आधार पर दल कहते हैं कि उनकी नीतियाँ औरों से बेहतर हैं
  • ★“दल किसी समाज के बुनियादी राजनीतिक विभाजन को भी दर्शाते हैं… उसका नज़रिया समाज के उस वर्ग/समुदाय विशेष की तरफ़ झुका होता है”
  • पहचान — “नीतियों और सामाजिक आधार से”

सात कार्य — सूत्र: “चुनाव · नीति · कानून · सरकार · विपक्ष · जनमत · पहुँच”★★

पृष्ठ 48-49

#कार्यपहचान-पंक्ति
1चुनाव लड़नाभारत में उम्मीदवार “दलों के नेता ही चुनते हैं” (अमरीका में — सदस्य और समर्थक)
2नीतियाँ-कार्यक्रम“तरह-तरह के विचारों को कुछ बुनियादी राय तक समेट लाती हैं”
3कानून-निर्माणसदस्य “अपने दल के नेता के निर्देश पर” फ़ैसला करते हैं
4सरकार बनाना-चलाना“नेता चुनती हैं… प्रशिक्षित करती हैं… मंत्री बनाती हैं”
★5विपक्षआलोचना + “आम जनता को भी गोलबंद करते हैं”
6जनमत-निर्माण“दलों की राय के इर्द-गिर्द ही समाज की राय बनती जाती है”
7पहुँच“राजनीतिक कार्यकर्ता से जान-पहचान बनाना… आसान होता है”

और दल क्यों सुनते हैं?★

!

“दलों को भी हर हाल में लोगों की माँगों और ज़रूरतों पर ध्यान देना होता है वरना अगले चुनाव में लोग उन्हें धूल चटा सकते हैं।”

2 | दल क्यों अनिवार्य हैं

दलों के बिना क्या होगा?

कल्पना

  • सारे उम्मीदवार स्वतंत्र/निर्दलीय
  • “कोई भी बड़े नीतिगत बदलाव के बारे में… चुनावी वायदे करने की स्थिति में नहीं होगा”
  • “सरकार बन जाएगी पर उसकी उपयोगिता संदिग्ध होगी”
  • ★“देश कैसे चले इसके लिए कोई उत्तरदायी नहीं होगा”

और प्रमाण भी है

  • गैर-दलीय पंचायत चुनाव —
  • “चुनाव के अवसर पर पूरा गाँव कई खेमों में बँट जाता है”
  • “हर खेमा सभी पदों के लिए अपने उम्मीदवारों का ‘पैनल’ उतारता है”
  • ★“राजनीतिक दल भी ठीक यही काम करते हैं।”

निष्कर्ष — अध्याय का मूल वाक्य★★

✓

“इस तरह हम कह सकते हैं कि राजनीतिक दल लोकतंत्र की एक अनिवार्य शर्त हैं।”

उदय — “प्रतिनिधित्व पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था के उभार के साथ” — बड़े-जटिल समाजों को माध्यम/एजेंसी चाहिए

3 | कितने दल?

तीन दलीय व्यवस्थाएँ★

पृष्ठ 50-51 · भारत में पंजीकृत दल — 750 से ज़्यादा

व्यवस्थादेशयाद रखिए
एकदलीयचीन! “यह लोकतांत्रिक विकल्प नहीं है”
दो दलीयअमरीका · ब्रिटेनकई दल हैं, पर दो ही प्रबल दावेदार
★बहुदलीयभारतगठबंधन/मोर्चा; 2004 — राजग · संप्रग · वाम मोर्चा

बहुदलीय के दो पक्ष — “घालमेल/अस्थिरता” बनाम ★“विभिन्न हितों और विचारों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व”

“कौन-सी प्रणाली बेहतर है?”★★

“यह कोई बहुत अच्छा सवाल नहीं है। दलीय व्यवस्था का चुनाव करना किसी मुल्क के हाथ में नहीं है। यह एक लंबे दौर के कामकाज के बाद खुद विकसित होती है… हर मुल्क और हर स्थिति में कोई एक ही आदर्श प्रणाली चले यह संभव नहीं है।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 51

भारत में बहुदलीय क्यों — “दो-तीन पार्टियाँ इतने बड़े मुल्क की सारी सामाजिक और भौगोलिक विविधताओं को समेट पाने में अक्षम हैं।”

जन-भागीदारी — एक और विरोधाभास

! भरोसा

  • “पूरी दुनिया में राजनीतिक दल ही एक ऐसी संस्था है जिस पर लोग सबसे कम भरोसा करते हैं”

★पर भागीदारी

  • भारत की सदस्यता “कनाडा, जापान, स्पेन और दक्षिण कोरिया जैसे विकसित देशों से भी ज़्यादा”
  • तीन दशकों में “धीरे-धीरे बढ़ता गया” — करीबी बताने वाले भी बढ़े

4 | मान्यता और राष्ट्रीय दल

मान्यता की शर्तें — हर परीक्षा में★★

पंजीकरण सबका · मान्यता (अलग चुनाव चिह्न) कुछ की

दलशर्त
राज्यीय दलविधानसभा चुनाव में 6% वोट + कम से कम 2 सीटें
राष्ट्रीय दललोकसभा में 6% वोट (अथवा 4 राज्यों की विधानसभाओं में) + लोकसभा की 4 सीटें

★सूत्र — “राज्यीय: 6%+2 (विधानसभा) · राष्ट्रीय: 6%+4 (लोकसभा)” — और 2023 की अधिसूचना से छः राष्ट्रीय दल

छह राष्ट्रीय दल — “आ-ब-भा-सी-कां-ए”★★

पृष्ठ 54-55 · केवल किताब के तथ्य · 2019 के आँकड़े

दलगठनएक पहचान-तथ्य
आम आदमी पार्टी26 नवंबर 20122011 के आंदोलन से; जवाबदेही-पारदर्शिता-सुशासन; 2019 — 1 सीट
बहुजन समाज पार्टी1984कांशीराम; बहुजन समाज; प्रेरणा — साहू महाराज, फुले, पेरियार, आंबेडकर; 2019 — 3.63%, 10 सीटें
भारतीय जनता पार्टी1980जनसंघ (श्यामा प्रसाद मुखर्जी, 1951) से; समग्र मानवतावाद-अंत्योदय (दीनदयाल उपाध्याय); 2019 — 303 सीटें
सीपीआई-एम1964मार्क्सवाद-लेनिनवाद; प.बंगाल में 34 वर्ष शासन; 2019 — ~1.75%, 3 सीटें
इंडियन नेशनल काँग्रेस1885सबसे पुराने में से एक; नेहरू — धर्मनिरपेक्ष गणराज्य; मध्यमार्गी; 2019 — 19.5%, 52 सीटें
नेशनल पीपुल्स पार्टीजुलाई 2013पी.ए. संगमा; पूर्वोत्तर की पहली राष्ट्रीय पार्टी; 2019 — 1 सीट

क्षेत्रीय दल — और अध्याय 2 की कड़ी★★

1996

“2014 तक, किसी एक राष्ट्रीय दल का लोकसभा में बहुमत नहीं रहा… 1996 के बाद से लगभग प्रत्येक क्षेत्रीय दल को एक या दूसरी राष्ट्रीय स्तर की गठबंधन सरकार का हिस्सा बनने का अवसर मिला है।”

★★“इससे हमारे देश में संघवाद और लोकतंत्र मज़बूत हुए हैं।” — (यही बात अध्याय 2 में पढ़ी थी)

5 | चार चुनौतियाँ

चार चुनौतियाँ — “अंदर का लोकतंत्र · वंशवाद · पैसा-अपराध · विकल्पहीनता”★★

पृष्ठ 57-59 · ! किताब यहाँ किसी दल का नाम नहीं लेती — हम भी नहीं लेंगे

#चुनौतीमुख्य पंक्ति
1आंतरिक लोकतंत्र का न होना“सारी ताकत एक या कुछेक नेताओं के हाथ में सिमट जाती है” — न सूची, न बैठकें, न आंतरिक चुनाव
2वंशवाद“शीर्ष पद पर हमेशा एक ही परिवार के लोग” — “अनुभवहीन और बिना जनाधार वाले लोग ताकत वाले पदों पर”
! 3पैसा-अपराध“कोई भी जायज़-नाजायज़ तरीका”; धन देने वाले “नीतियों और फ़ैसलों को भी प्रभावित” करते हैं
4विकल्पहीनता“वैचारिक अंतर कम” (ब्रिटेन: लेबर-कंजरवेटिव); “वही थोड़े से नेता हर दल में आते-जाते”

पहली चुनौती की सबसे तीखी पंक्ति★

“पार्टी के सिद्धांतों और नीतियों से निष्ठा की जगह नेता से निष्ठा ही ज़्यादा महत्वपूर्ण बन जाती है।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 58

और वंशवाद पर — यह प्रवृत्ति “कुछ प्राचीन लोकतांत्रिक देशों सहित कमोबेश पूरी दुनिया में” दिखाई देती है

6 | सुधार

हो चुके तीन सुधार — हर एक “सुधार + सीमा” की जोड़ी में★★

पृष्ठ 59-60

सुधार✓ लाभ! सीमा
दल-बदल कानूनदल बदलने पर सीट गँवानी होगी → दल-बदल घटा“पार्टी में विरोध का कोई स्वर उठाना और भी मुश्किल”
शपथपत्रसंपत्ति + आपराधिक मामलों का ब्यौरा अनिवार्य (उच्चतम न्यायालय)“सूचनाएँ सही हैं या नहीं, जाँच की कोई व्यवस्था नहीं”
आयोग का आदेशसांगठनिक चुनाव + आयकर रिटर्न ज़रूरी“कई बार… सिर्फ़ खानापूरी”

तीन सुझाव — “कानून · महिला · पैसा”

पृष्ठ 60

  • आंतरिक कामकाज का कानून — “सदस्यों की सूची रखें, अपने संविधान का पालन करें… स्वतंत्र प्राधिकारी को पंच बनाएँ और सबसे बड़े पदों के लिए खुला चुनाव कराएँ”
  • ★महिलाओं को “एक खास न्यूनतम अनुपात में (करीब एक तिहाई) ज़रूर टिकट दें… प्रमुख पदों पर भी आरक्षण”
  • चुनाव का खर्च सरकार उठाए — “पेट्रोल, कागज, फोन वगैरह के रूप में… या पिछले चुनाव में मिले मतों के अनुपात में नकद”

! चेतावनी — “दलों को ज़रूरत से ज़्यादा नियमों से जकड़ना नुकसानदेह… सभी दल कानून को दरकिनार करने का तरीका ढूँढ़ने लगेंगे।”

और दो अंतिम तरीके★★

जनता का दबाव

  • “चिट्ठियाँ लिखने, प्रचार करने और आंदोलनों के जरिये”
  • “आम नागरिक, दबाव समूह, आंदोलन और मीडिया”
  • “जनाधार गिरने लगेगा… तो इसे लेकर वे गंभीर होने लगेंगे”

★ख़ुद भागीदारी

  • “सुधार की इच्छा रखने वालों का खुद राजनीतिक दलों में शामिल होना”
  • “लोकतंत्र की गुणवत्ता लोकतंत्र में लोगों की भागीदारी से तय होती है”
  • “बाहर से ही बातें करते रहें तो सुधार मुश्किल है”

अध्याय का — और लगभग पूरी किताब का — अंतिम वाक्य★★

✊

“खराब राजनीति का समाधान है ज़्यादा से ज़्यादा राजनीति और बेहतर राजनीति।”

किताब का ही उदाहरण — नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस ने शिकायत की जगह ‘नागरिक शक्ति’ नाम से नया दल बनाने का रास्ता चुना (अभ्यास 11)

7 | दोहराइए

पाँच सूत्र — पूरी परीक्षा बच जाएगी

यही रट लीजिए

सूत्रकिसके लिए
“चुनाव · नीति · कानून · सरकार · विपक्ष · जनमत · पहुँच”सात कार्य
“राज्यीय: 6%+2 · राष्ट्रीय: 6%+4”मान्यता
“आ-ब-भा-सी-कां-ए” (1885 · 1964 · 1980 · 1984 · 2012 · 2013)छह राष्ट्रीय दल
“अंदर का लोकतंत्र · वंशवाद · पैसा-अपराध · विकल्पहीनता”चार चुनौतियाँ
हो चुके: “दल-बदल · शपथपत्र · आयोग” — सुझाए: “कानून · महिला · पैसा”सुधार

जहाँ बच्चे मार खाते हैंध्यान

इन्हें पहले से ठीक कर लीजिए

ग़लतीसही
मान्यता में सदन/सीटें उलटनाराज्यीय = विधानसभा, 2 सीटें · राष्ट्रीय = लोकसभा, 4 सीटें
“बसपा के संस्थापक आंबेडकर”कांशीराम (आंबेडकर = प्रेरणा-स्रोत)
भाजपा का सिद्धांत “आधुनिकता”समग्र मानवतावाद
“सरकार के लिए दल ज़रूरी नहीं”ग़लत — दल “अनिवार्य शर्त”
सुधार-सुझाव मिला देना“हो चुके ✓” / “सुझाए गए →” — अलग-अलग
दल-बदल कानून सिर्फ़ अच्छा! सीमा भी — “विरोध का स्वर… मुश्किल”

और अंत में — दो वाक्य★★

✓

“राजनीतिक दल लोकतंत्र की एक अनिवार्य शर्त हैं।” “खराब राजनीति का समाधान है ज़्यादा से ज़्यादा राजनीति और बेहतर राजनीति।”

अध्याय की आख़िरी सीख

दल हमारे बिना नहीं सुधरेंगे। राजनीति गाली नहीं — औज़ार है; और औज़ार उतना ही अच्छा होता है जितने अच्छे हाथ उसे थामते हैं।

इसीलिए — आलोचना से भागीदारी तक

जो पढ़ाते हैं, वही लिखते और जाँचते हैं

इसे बनाने वाले

  • भरत चौधरीभरत चौधरीव्याख्यातारा.उ.मा.वि. जेठान्तरी · ब्लॉक समदड़ी, जिला बालोतरा
  • वनिता कुमारीवनिता कुमारीव्याख्यातारा.उ.मा.वि. रामसीन मूंगड़ा · ब्लॉक एवं जिला बालोतरा

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