अध्याय 2 — वन एवं वन्य जीव संसाधन · समकालीन भारत-2 (भूगोल) · कक्षा 10
कक्षा — 10 · विषय — भूगोल (समकालीन भारत–2) · पृष्ठ — 13 से 18
अध्याय की शुरुआत एक लोकगीत से होती है
“नारक! मेरे ईश्वर, लेपचाओं की दुनिया में आप संगीत के जनक हैं… मुझे आप अपना संगीत झरनों, नदियों, पर्वतों, वनों, कीटों और जानवरों से ग्रहण करने दें… मुझे आप अपना संगीत मधुर समीर से ग्रहण करने दें और इसे आपको ही समर्पित करने दें।”
लेपचा लोकसंगीत · पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 13
ध्यान दीजिए — इस गीत में इनसान प्रकृति से कुछ माँग नहीं रहा; वह उसे लौटाना चाहता है। यही इस पूरे अध्याय का स्वर है
हम इस ग्रह पर अकेले नहीं हैं — तो हमारे साथ कौन-कौन रहता है?
पहला विचार — हम एक जटिल तंत्र का मात्र एक हिस्सा हैं
पृष्ठ 13
- “इस ग्रह पर हम सूक्ष्म-जीवाणुओं और बैक्टीरिया, जोंक से लेकर वटवृक्ष, हाथी और ब्लू व्हेल तक करोड़ों दूसरे जीवधारियों के साथ रहते हैं”
- “मानव और दूसरे जीवधारी एक जटिल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं, जिसका हम मात्र एक हिस्सा हैं”
- हमें तीन चीज़ें चाहिए — वायु जिसमें हम साँस लेते हैं, जल जिसे हम पीते हैं, और मृदा जो अनाज पैदा करती है
- “जिसके बिना हम जीवित नहीं रह सकते; पौधे, पशु और सूक्ष्मजीवी इनका पुन: सृजन करते हैं”
“वन पारिस्थितिकी तंत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं क्योंकि ये प्राथमिक उत्पादक हैं जिन पर दूसरे सभी जीव निर्भर करते हैं”
जैव विविधता क्या है — यह वाक्य याद कीजिए
“वन्य जीवन और कृषि फसल उपजातियों में अत्यधिक जैव विविधताएँ पाई जाती हैं। यह आकार और कार्य में विभिन्न हैं परंतु अंतर्निर्भरताओं के जटिल जाल द्वारा एक तंत्र में गुँथी हुई हैं।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 13
एक वाक्य में — “आकार अलग, काम अलग — पर सब एक ही जाल में बँधे हैं”
भारत की जैव विविधता
भारत जैव विविधता के संदर्भ में विश्व के सबसे समृद्ध देशों में से एक है। यहाँ विश्व की सारी जैव उपजातियों की 8 प्रतिशत संख्या — लगभग 16 लाख — पाई जाती है
और चौंकाने वाली बात — “ये अभी खोजी जाने वाली उपजातियों से दो या तीन गुना हैं” यानी हमें अपनी ही धरती के बारे में बहुत कम पता है
और फिर पाठ्यपुस्तक एक चेतावनी देती है
“ये विविध वनस्पतिजात और प्राणिजात हमारे हर रोज़ के जीवन में इतने गुँथे हुए हैं कि हम इसकी क़द्र नहीं करते। परंतु पर्यावरण के प्रति हमारी असंवेदना के कारण पिछले कुछ समय से इन संसाधनों पर भारी दबाव बढ़ा है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 13
‘असंवेदना’ शब्द पर रुकिए — लेखक यह नहीं कह रहा कि लोग बुरे हैं; वह कह रहा है कि लोग महसूस नहीं करते। और यही सबसे बड़ी समस्या है
1 | संरक्षण क्यों ज़रूरी है | चार कारण
वन और वन्य जीवन का संरक्षण क्यों आवश्यक है
पृष्ठ 13
- संरक्षण से पारिस्थितिकी विविधता बनी रहती है
- तथा हमारे जीवन साध्य संसाधन — जल, वायु और मृदा — बने रहते हैं
- यह विभिन्न जातियों में बेहतर जनन के लिए वनस्पति और पशुओं में जीन (genetic) विविधता को भी संरक्षित करती है
- उदाहरण — हम कृषि में अभी भी पारंपरिक फसलों पर निर्भर हैं
- और जलीय जैव विविधता मोटे तौर पर मछली पालन बनाए रखने पर निर्भर है
‘जीन विविधता’ सबसे गहरा कारण है — अगर सिर्फ़ एक ही किस्म का गेहूँ बचे और उसे बीमारी लग जाए, तो पूरी फ़सल ख़त्म हो सकती है। इसीलिए विविधता ही सुरक्षा है
चित्र 2.1 — तीन तस्वीरें, और उनमें एक ही बात
पृष्ठ 14
- शांत घाटी की मुखली नर्सरी में आदिवासी युवतियाँ बाँस की पौध लगाते हुए
- छोटे-छोटे जंगली उत्पादों को बेचती आदिवासी महिलाएँ
- सूखी पत्तियों को एकत्रित करती हुई आदिवासी महिलाएँ
- तीनों तस्वीरों में एक ही बात समान है — तीनों में आदिवासी महिलाएँ हैं
पाठ्यपुस्तक यह दिखाना चाहती है कि वन सिर्फ़ पेड़ नहीं हैं — वे लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी हैं। इसी बात पर पूरा अंतिम भाग खड़ा है
2 | सरकारी प्रयास | 1972 का अधिनियम और बाघ परियोजना
भारतीय वन्यजीवन (रक्षण) अधिनियम, 1972
पृष्ठ 14 — यह सबसे पक्का प्रश्न है
- 1960 और 1970 के दशकों के दौरान पर्यावरण संरक्षकों ने राष्ट्रीय वन्यजीवन सुरक्षा कार्यक्रम की पुरजोर माँग की
- इसमें वन्य-जीवों के आवास रक्षण के अनेक प्रावधान थे
- सारे भारत में रक्षित जातियों की सूची भी प्रकाशित की गई
- इस कार्यक्रम के तहत बची हुई संकटग्रस्त जातियों के बचाव पर ज़ोर दिया गया
- तथा शिकार प्रतिबंधन, वन्यजीव आवासों के क़ानूनी रक्षण और जंगली जीवों के व्यापार पर रोक पर प्रबल ज़ोर दिया गया
तत्पश्चात् केंद्रीय सरकार व कई राज्य सरकारों ने राष्ट्रीय उद्यान और वन्य जीव पशुविहार (sanctuary) स्थापित किए
दो अलग सूचियाँ — इन्हें आपस में मत मिलाइए
किनके लिए परियोजनाएँ बनीं
- बाघ
- एक सींग वाला गैंडा
- कश्मीरी हिरण अथवा हंगुल (hangul)
- तीन प्रकार के मगरमच्छ — स्वच्छ जल, लवणीय जल और घड़ियाल
- एशियाई शेर
किनके शिकार-व्यापार पर प्रतिबंध लगा
- भारतीय हाथी
- काला हिरण
- चिंकारा
- भारतीय गोडावन (bustard)
- हिम तेंदुआ
दूसरी सूची पर “संपूर्ण अथवा आंशिक प्रतिबंध” लगाकर क़ानूनी रक्षण दिया गया — यह शब्द भी याद रखिए
अब दो संख्याएँ देखिए — 55,000 और 1,827। ये क्या हो सकती हैं?
बाघों की संख्या में गिरावट
1973 में अधिकारियों ने पाया कि देश में 20वीं शताब्दी के आरंभ में बाघों की संख्या अनुमानित 55,000 से घटकर मात्र 1,827 रह गई। यानी सौ में से तीन से भी कम बाघ बचे थे
“वन्यजीवन संरचना में बाघ (टाईगर) एक महत्त्वपूर्ण जंगली जाति है”
बाघों की घटती संख्या के कारण
पृष्ठ 14 — यह चार-बिंदु सूची अनिवार्य है
- बाघों को मारकर उनको व्यापार के लिए चोरी करना
- आवासीय स्थलों का सिकुड़ना
- भोजन के लिए आवश्यक जंगली उपजातियों की संख्या कम होना
- जनसंख्या में वृद्धि
- और दो कारण — बाघों की खाल का व्यापार, तथा उनकी हड्डियों का एशियाई देशों में परंपरागत औषधियों में प्रयोग
”…के कारण यह जाति विलुप्त होने की कगार पर पहुँच गई है”
और भारत-नेपाल की ख़ास स्थिति
“चूँकि भारत और नेपाल दुनिया की दो-तिहाई बाघों को आवास उपलब्ध करवाते हैं, अत: ये देश ही शिकार, चोरी और गैर-क़ानूनी व्यापार करने वालों के मुख्य निशाने पर हैं।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 14
यानी जिस देश में सबसे ज़्यादा बाघ हैं, वहीं सबसे ज़्यादा ख़तरा भी है
प्रोजेक्ट टाईगर — और उसका असली उद्देश्य
“‘प्रोजेक्ट टाईगर’ विश्व की बेहतरीन वन्य जीव परियोजनाओं में से एक है और इसकी शुरुआत 1973 में हुई। बाघ संरक्षण मात्र एक संकटग्रस्त जाति को बचाने का प्रयास नहीं है, अपितु इसका उद्देश्य बहुत बड़े आकार के जैवजाति को भी बचाना है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 14
बाघ एक छाते की तरह है — उसे बचाने के लिए जंगल बचाना पड़ता है, और जंगल बचने से हिरण, पक्षी, कीड़े, पेड़ और नदियाँ सब बच जाती हैं
छह बाघ रिज़र्व और उद्यान — मानचित्र के लिए अनिवार्य
पृष्ठ 15
| उद्यान / रिज़र्व | राज्य | दिशा |
|---|---|---|
| कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान | उत्तराखण्ड | उत्तर |
| सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान | पश्चिम बंगाल | पूर्व |
| बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान | मध्य प्रदेश | मध्य |
| सरिस्का वन्य जीव पशुविहार | राजस्थान | पश्चिम |
| मानस बाघ रिज़र्व | असम | पूर्वोत्तर |
| पेरियार बाघ रिज़र्व | केरल | दक्षिण |
छह अलग राज्य, छह अलग दिशाएँ — यानी बाघ पूरे भारत में हैं। और चित्र 2.2 में काज़ीरंगा (असम) का गैंडा और हिरन
संरक्षण की दिशा कैसे बदली
पृष्ठ 15
- “आजकल संरक्षण परियोजनाएँ जैव विविधताओं पर केंद्रित होती हैं न कि इसके विभिन्न घटकों पर”
- “संरक्षण नियोजन में कीटों को भी महत्त्व मिल रहा है”
- वन्य जीव अधिनियम 1980 और 1986 के तहत सैकड़ों तितलियों, पतंगों, भृंगों और एक ड्रैगनफ्लाई को भी संरक्षित जातियों में शामिल किया गया
- 1991 में पौधों की भी 6 जातियाँ पहली बार इस सूची में रखी गईं
सोच बदली — ‘बड़े और सुंदर जानवर बचाओ’ से ‘पूरा तंत्र बचाओ’ तक। यानी हमें बीस साल लगे यह समझने में कि पौधे भी विलुप्त हो सकते हैं
3 | वनों के प्रकार | आरक्षित · रक्षित · अवर्गीकृत
तीन प्रकार के वन — यह अभ्यास प्रश्न 2 है
पृष्ठ 15
| प्रकार | परिभाषा | कितना क्षेत्र |
|---|---|---|
| आरक्षित वन | वन और वन्य प्राणियों के संरक्षण की दृष्टि से सर्वाधिक मूल्यवान | देश में आधे से अधिक वन क्षेत्र |
| रक्षित वन | वन भूमि जो और अधिक नष्ट होने से बचाई जाती है | कुल वन क्षेत्र का एक-तिहाई |
| अवर्गीकृत वन | अन्य सभी वन और बंजरभूमि जो सरकार, व्यक्तियों और समुदायों के स्वामित्व में हैं | — |
तीन शब्दों में — आरक्षित = सबसे मूल्यवान · रक्षित = और नष्ट होने से बचाना · अवर्गीकृत = बाक़ी सब
स्थायी वन क्षेत्र क्या है
“आरक्षित और रक्षित वन ऐसे स्थायी वन क्षेत्र हैं जिनका रख-रखाव इमारती लकड़ी, अन्य वन पदार्थों और उनके बचाव के लिए किया जाता है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 15
! ध्यान दीजिए — स्थायी वन क्षेत्र में अवर्गीकृत वन शामिल नहीं हैं। यह 1 अंक का पक्का प्रश्न है और अकसर छूट जाता है
राज्यवार वितरण — यह तालिका सीधे परीक्षा में आती है
पृष्ठ 15–16
| श्रेणी | राज्य |
|---|---|
| स्थायी वनों में सर्वाधिक क्षेत्र | मध्य प्रदेश — कुल वन क्षेत्र का 75 प्रतिशत |
| आरक्षित वनों का बड़ा अनुपात | जम्मू और कश्मीर · आंध्र प्रदेश · उत्तराखण्ड · केरल · तमिलनाडु · पश्चिम बंगाल · महाराष्ट्र |
| रक्षित वनों का बड़ा अनुपात | बिहार · हरियाणा · पंजाब · हिमाचल प्रदेश · ओडिशा · राजस्थान |
| अवर्गीकृत वन, समुदायों के प्रबंधन में | पूर्वोत्तर के सभी राज्य और गुजरात |
आख़िरी पंक्ति ध्यान से देखिए — पूर्वोत्तर में वन सरकार के नहीं, समुदायों के प्रबंधन में हैं। यह कमी नहीं, वहाँ की पारंपरिक व्यवस्था है
समाचार-पत्र की दो कतरनें
पृष्ठ 16
- “Gharial on the brink” — घड़ियाल की संख्या 1970 के दशक के बाद से सबसे कम है
- लेखक — रोमुलस व्हिटेकर और जानकी लेनिन
- “Bird deaths blamed on dirty Yamuna” — दिल्ली सरकार की रिपोर्ट में ठहरे हुए पानी में विषैले तत्त्वों की ओर इशारा
- और पाठ्यपुस्तक का सवाल — “क्या आप उपर्युक्त समस्याओं के निदान के कारण ज्ञात कर सकते हैं?”
सीख — वन्य जीवन को ख़तरा सिर्फ़ शिकार से नहीं, प्रदूषण और आवास के बिगड़ने से भी है
4 | समुदाय और वन संरक्षण | अध्याय का दिल
सबसे पहले यह समझिए
“वन संरक्षण की नीतियाँ हमारे देश में कोई नई बात नहीं है। हम आमतौर पर इस बात से अनजान हैं कि वन हमारे देश में कुछ मानव प्रजातियों के आवास भी हैं।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 16
और वे लोग वन इसलिए बचाते हैं — “क्योंकि इसी से ही दीर्घकाल में उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती है।” यानी यह भावना नहीं, ज़रूरत है
राजस्थान के दो उदाहरण — ये आपके अपने राज्य के हैं
सरिस्का बाघ रिज़र्व
- राजस्थान के गाँवों के लोग वन्य जीव रक्षण अधिनियम के तहत संघर्षरत हैं
- वे वहाँ से खनन कार्य बंद करवाना चाहते हैं
- कई क्षेत्रों में लोग सरकार का हस्तक्षेप भी स्वीकार नहीं कर रहे
भैरोंदेव डाकव ‘सोंचुरी’
- राजस्थान के अलवर ज़िले में
- 5 गाँवों के लोगों ने 1,200 हेक्टेयर वन भूमि को सोंचुरी घोषित किया
- इसके अपने ही नियम क़ानून हैं
- जो शिकार वर्जित करते हैं और बाहरी लोगों की घुसपैठ से वन्य जीवन बचाते हैं
तीनों तथ्य एक साथ लिखिए — अलवर ज़िला · 5 गाँव · 1,200 हेक्टेयर। यह RBSE की परीक्षा में सोने जैसा उत्तर है
पवित्र पेड़ों के झुरमट — विविध और दुर्लभ जातियों की संपत्ति
पृष्ठ 16
- “प्रकृति की पूजा सदियों पुराना जनजातीय विश्वास है, जिसका आधार प्रकृति के हर रूप की रक्षा करना है”
- “इन्हीं विश्वासों ने विभिन्न वनों को मूल एवं कौमार्य रूप में बचाकर रखा है”
- इन्हें पवित्र पेड़ों के झुरमट (देवी-देवताओं के वन) कहते हैं
- “वनों के इन बड़े भागों में स्थानीय लोग ही घुसते हैं तथा न ही किसी और को छेड़छाड़ करने देते”
यानी यहाँ न बाड़ है, न वन-रक्षक — फिर भी जंगल बचा हुआ है
कौन-सी जनजाति किस पेड़ की पूजा करती है
पृष्ठ 16 — यह तालिका अनिवार्य है
| कौन | कहाँ | किस पेड़ की पूजा |
|---|---|---|
| मुंडा और संथाल जनजातियाँ | छोटानागपुर क्षेत्र | महुआ और कदंब |
| ओडिशा और बिहार की जनजातियाँ | ओडिशा और बिहार | शादी के दौरान इमली और आम |
| हममें से बहुत से व्यक्ति | पूरे भारत में | पीपल और वटवृक्ष |
याद रखने का तरीक़ा — मुंडा-संथाल = महुआ-कदंब · ओडिशा-बिहार = इमली-आम · हम सब = पीपल-वटवृक्ष
और बिश्नोई — जहाँ हिरण बेख़ौफ़ घूमते हैं
“राजस्थान में बिश्नोई गाँवों के आस पास आप काले हिरण, चिंकारा, नीलगाय और मोरों के झुंड देख सकते हैं जो वहाँ के समुदाय का अभिन्न हिस्सा हैं और कोई उनको नुकसान नहीं पहुँचाता।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 17
ध्यान दीजिए — यहाँ सरकार का नाम नहीं है। समुदाय ने उन्हें अपना मान लिया, और यही सबसे मज़बूत सुरक्षा है
तीन जन-आंदोलन
चिपको आंदोलन — हिमालय
- कई क्षेत्रों में वन कटाई रोकने में कामयाब रहा
- और यह भी दिखाया कि स्थानीय पौधों की जातियों को प्रयोग करके सामुदायिक वनीकरण अभियान सफल बनाया जा सकता है
- दोनों उपलब्धियाँ लिखिए — केवल पहली लिखने पर आधे अंक कटते हैं
बीज बचाओ आंदोलन और नवदानय — टिहरी
- टिहरी में किसानों ने दिखाया कि…
- …रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग के बिना भी विविध फसल उत्पादन द्वारा आर्थिक रूप से व्यवहार्य कृषि उत्पादन संभव है
- इससे परिस्थिकी कृषि के नए तरीक़ों का विकास व्यापक हुआ
दोनों आंदोलनों में एक बात समान है — दोनों समुदाय ने शुरू किए, सरकार ने नहीं
संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) — सबसे व्यावहारिक व्यवस्था
पृष्ठ 17
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| क्या करता है | क्षरित वनों के प्रबंध और पुनर्निर्माण में स्थानीय समुदायों की भूमिका उजागर करता है |
| औपचारिक शुरुआत | 1988 में |
| किस राज्य ने | ओडिशा ने पहला प्रस्ताव पास किया |
| संस्थाएँ कहाँ बनती हैं | गाँव के स्तर पर — जहाँ ग्रामीण और वन विभाग के अधिकारी संयुक्त रूप से काम करते हैं |
| समुदाय को क्या मिलता है | गैर-इमारती वन उत्पादों के हक़दार होते हैं तथा इमारती लकड़ी के लाभ में भागीदार होते हैं |
JFM एक वाक्य में — “जंगल बचाओ, और उसका फ़ायदा भी लो।” यही इसे ‘सिर्फ़ क़ानून’ से अलग बनाता है
अध्याय का निष्कर्ष — यह हर बड़े उत्तर में लिखिए
“स्थानीय समुदायों को हर जगह प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में शामिल करना चाहिए। परंतु स्थानीय समुदायों को फैसले लेने की प्रक्रिया में मुख्य भूमिका में आने में अभी देर है। अत: वे ही विकास क्रियाएँ मान्य होनी चाहिए जो जनमानस पर केंद्रित हों, पर्यावरण हितैषी हो और आर्थिक रूप से प्रतिफलित हों।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 17
तीन शर्तें अलग-अलग याद कीजिए — जनमानस पर केंद्रित · पर्यावरण हितैषी · आर्थिक रूप से प्रतिफलित
5 | समापन | पूरे अध्याय की एक तालिका
एक नज़र में पूरा अध्याय
आख़िरी दिन के लिए
| भाग | मुख्य बात एक वाक्य में |
|---|---|
| जैव विविधता | भारत में विश्व की 8 प्रतिशत (लगभग 16 लाख) जैव उपजातियाँ पाई जाती हैं |
| संरक्षण क्यों | पारिस्थितिकी विविधता, जल-वायु-मृदा और जीन विविधता बनी रहती है |
| 1972 का अधिनियम | आवास रक्षण · रक्षित जातियों की सूची · शिकार प्रतिबंधन · व्यापार पर रोक |
| बाघ परियोजना | 1973 में शुरू; बाघ 55,000 से 1,827 रह गए थे; भारत-नेपाल में दुनिया के दो-तिहाई बाघ |
| वनों के तीन प्रकार | आरक्षित (सर्वाधिक मूल्यवान) · रक्षित (और नष्ट होने से बचाना) · अवर्गीकृत (बाक़ी सब) |
| राज्यवार वितरण | म.प्र. में स्थायी वन 75%; राजस्थान रक्षित वनों में; पूर्वोत्तर और गुजरात में अवर्गीकृत |
| समुदाय के प्रयास | सरिस्का · भैरोंदेव डाकव सोंचुरी · बिश्नोई · पवित्र झुरमट |
| जन-आंदोलन | चिपको (हिमालय) · बीज बचाओ और नवदानय (टिहरी) |
| संयुक्त वन प्रबंधन | 1988, ओडिशा ने पहला प्रस्ताव पास किया |
और सिर्फ़ तीन वर्ष अनिवार्य हैं
- 1972भारतीय वन्यजीवन (रक्षण) अधिनियम लागू हुआ
- 1973बाघ 1,827 पाए गए और प्रोजेक्ट टाईगर शुरू हुआ
- 1980 और 1986तितलियाँ, पतंगे, भृंग और एक ड्रैगनफ्लाई सूची में जुड़े
- 1988ओडिशा ने संयुक्त वन प्रबंधन का पहला प्रस्ताव पास किया
- 1991पौधों की 6 जातियाँ पहली बार संरक्षित सूची में
बाक़ी सब इन्हीं के आसपास टँग जाएगा
और राजस्थान इस अध्याय में चार बार आता है
RBSE की परीक्षा के लिए अनिवार्य
| कहाँ | क्या |
|---|---|
| बाघ परियोजना की सूची | सरिस्का वन्य जीव पशुविहार |
| वनों का वितरण | राजस्थान रक्षित वनों वाली सूची में |
| समुदाय और संरक्षण | सरिस्का में खनन-विरोधी संघर्ष; अलवर की भैरोंदेव डाकव सोंचुरी |
| रीति-रिवाज | बिश्नोई गाँव — काला हिरण, चिंकारा, नीलगाय और मोर |
हर बार रुककर सोचिए — “यह अपने राज्य की बात है”
और अध्याय का अंत — गौतम बुद्ध के शब्दों में
“पेड़ एक विशेष असीमित दयालु और उदारपूर्ण जीवधारी हैं जो अपने सतत् पोषण के लिए कोई माँग नहीं करता और दानशीलतापूर्वक अपने जीवन की क्रियाओं को भेंट करता है। यह सभी की रक्षा करता है और स्वयं पर कुल्हाड़ी चलाने वाले विनाशक को भी छाया प्रदान करता है।”
गौतम बुद्ध (487 ई.पू.) · पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 17
अध्याय जिस लोकगीत से शुरू हुआ था, उसी भाव पर ख़त्म होता है — बीच के क़ानून और आँकड़े साधन हैं; असली बात प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता है

