अध्याय 5 — उपभोक्ता अधिकार · आर्थिक विकास की समझ · कक्षा 10
कक्षा — 10 · विषय — अर्थशास्त्र (आर्थिक विकास की समझ) · पृष्ठ — 74 से 89
अपने घर की कोई एक बात बताओ जब लगा कि दुकानदार ने ठीक नहीं किया।
और यह अध्याय बाक़ी चार से अलग क्यों है
पिछले चार अध्यायों में तुम देखने वाले थे — विकास देखा, क्षेत्रक देखे, मुद्रा देखी, वैश्वीकरण देखा
★इस अध्याय में तुम ख़ुद पात्र हो — क्योंकि तुम पहले ही दिन से एक उपभोक्ता हो।
किताब का अपना निर्देश
“नये उपभोक्ताओं को वास्तविकता से परिचित कराने और उपभोक्ता आंदोलन में भाग लेने हेतु उन्हें प्रोत्साहित करने की ज़रूरत है — नये उपभोक्ताओं को उपभोक्ता के रूप में सावधान और जानकार नागरिक बनना है।”
शिक्षक के लिए निर्देश, पृष्ठ 74
1 | बाज़ार में उपभोक्ता
हम बाज़ार में दो रूपों में होते हैं
पृष्ठ 75
- “बाज़ार में हमारी भागीदारी उत्पादक और उपभोक्ता दोनों रूपों में होती है”
- उत्पादक के रूप में — कृषि, उद्योग या सेवा जैसे क्षेत्रों में (यह अध्याय 2 था)
- उपभोक्ता के रूप में — “जब वे अपनी आवश्यकतानुसार वस्तुओं या सेवाओं को ख़रीदते हैं”
★अध्याय 2 में आदमी का उत्पादक वाला चेहरा देखा था। आज दूसरा चेहरा — और यह चेहरा सबका है।
नियमों की ज़रूरत का असली कारण★★
“अकेला उपभोक्ता प्राय: स्वयं को कमज़ोर स्थिति में पाता है। ख़रीदी गयी वस्तु या सेवा के बारे में जब भी कोई शिकायत होती है, तो विक्रेता सारा उत्तरदायित्व क्रेता पर डालने का प्रयास करता है।”
★और उसका घिसा-पिटा जवाब — “आपने जो ख़रीदा है अगर वह पसंद नहीं है तो कहीं और जाइए।” — “मानो, बिक्री हो जाने के बाद विक्रेता की कोई ज़िम्मेदारी नहीं रह जाती।”
शोषण के तरीक़े★
पृष्ठ 75-76
| # | तरीक़ा |
|---|---|
| 1 | “दुकानदार उचित वज़न से कम वज़न तौलते हैं” |
| 2 | “उन शुल्कों को जोड़ देते हैं, जिनका वर्णन पहले न किया गया हो” |
| 3 | “मिलावटी/दोषपूर्ण वस्तुएँ बेची जाती हैं” |
| 4 | “मीडिया और अन्य स्रोतों से ग़लत सूचना देते हैं” |
| 5 | उपभोक्ता “बिखरे हुए”, उत्पादक “थोड़े और शक्तिशाली” |
और बड़ी कंपनियों का शोषण ज़्यादा ख़तरनाक हैध्यान
“अधिक पूँजीवाली, शक्तिशाली और समृद्ध कंपनियाँ विभिन्न प्रकार से चालाकीपूर्वक बाज़ार को प्रभावित कर सकती हैं। उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए वे समय-समय पर मीडिया और अन्य स्रोतों से ग़लत सूचना देते हैं।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 76
किताब के दो असली उदाहरण★★
शिशु दूध पाउडर
- कंपनी ने दावा किया — “माता के दूध से हमारा उत्पाद बेहतर है”
- “सर्वाधिक वैज्ञानिक उत्पाद के रूप में… पूरे विश्व में कई वर्षों तक बेचा”
- ★“कई वर्षों के लगातार संघर्ष के बाद कंपनी को यह स्वीकार करना पड़ा कि वह झूठे दावे करती आ रही थी।”
सिगरेट
- यह मनवाने के लिए कि “उनका उत्पाद कैंसर का कारण हो सकता है”…
- …”न्यायालय में लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी”
- निष्कर्ष — “अत: उपभोक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नियम और विनियमों की आवश्यकता है।”
दोनों में एक बात साझा है
“सच अपने आप बाहर नहीं आया। किसी ने वर्षों लड़कर उसे बाहर निकाला।”
और वह “कोई” — उपभोक्ता आंदोलन था
2 | उपभोक्ता आंदोलन
पहले क्या हालत थी
“बाज़ार में उपभोक्ता को शोषण से बचाने के लिए कोई क़ानूनी व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी… वह उस ब्रांड उत्पाद को ख़रीदना बंद कर देता था… यह मान लिया जाता था कि उपभोक्ता की ज़िम्मेदारी है कि वह एक वस्तु या सेवा को ख़रीदते वक़्त सावधानी बरते।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 77
पहले उपभोक्ता के पास एक ही हथियार था — ख़रीदना बंद कर देना। क्या यह काफ़ी था?
तीन कारण क्यों काफ़ी नहीं था
- जो पैसा और नुक़सान हो चुका, वह वापस नहीं आता
- अकेले के बंद करने से कंपनी को फ़र्क़ नहीं पड़ता — उपभोक्ता “बिखरे हुए” हैं
- अगर पूरे बाज़ार में वही चीज़ हो, तो “कहीं और जाना” संभव ही नहीं
★इसीलिए आंदोलन ने “वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी विक्रेताओं पर भी डाल दिया।”
आंदोलन का सफ़र★★
- 1960 का दशकखाद्य कमी, जमाखोरी, कालाबाजारी, मिलावट → व्यवस्थित रूप में आंदोलन का उदय
- 1970 का दशकआलेख-लेखन, प्रदर्शनी; उपभोक्ता दल — राशन दुकानें और सड़क परिवहन पर नज़र
- 1985संयुक्त राष्ट्र ने उपभोक्ता सुरक्षा के दिशा-निर्देश अपनाए
- 1986★COPRA — उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम (24 दिसंबर)
- 2005RTI — सूचना पाने का अधिकार
- 2019COPRA में संशोधन
गड़बड़ी से बचने का सूत्र
“1985 दुनिया की तारीख़ है — संयुक्त राष्ट्र की। 1986 भारत की तारीख़ है — COPRA की।”
पहले दुनिया, फिर भारत।
उपभोक्ता इंटरनेशनल
पृष्ठ 78
| बात | विवरण |
|---|---|
| 1985 | संयुक्त राष्ट्र ने उपभोक्ता सुरक्षा के दिशा-निर्देश अपनाए |
| यह क्या था | “अपनी सरकारों को मजबूर करने हेतु ‘उपभोक्ता की वकालत करने वाले समूह’ के लिए, एक हथियार” |
| महत्त्व | “अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह उपभोक्ता आंदोलन का आधार बना” |
| ★आज | “100 से भी अधिक देशों के 200 संस्थाओं का एक संरक्षक संस्था” |
और भारत में — 1986★★
“1986 में भारत सरकार द्वारा एक बड़ा कदम उठाया गया। यह उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम, 1986 क़ानून का बनना था, जो COPRA के नाम से प्रसिद्ध है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 78
24 दिसंबर 1986 को संसद ने इसे पारित किया — इसीलिए 24 दिसंबर = राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस
3 | छह अधिकार
याद रखने का सूत्र★★
“सु-सू-च-नि-प्र-शि”
सुरक्षा · सूचना · चयन · निवारण · प्रतिनिधित्व · शिक्षा
पहले तीन — ख़रीदते समय क्या हक़ है। अगले तीन — ग़लत हो जाने पर क्या हक़ है।
अधिकार 1 — सुरक्षा का अधिकार
“हमें वस्तुओं के बाज़ारीकरण और सेवाओं की प्राप्ति के ख़िलाफ़ सुरक्षित रहने का अधिकार होता है, क्योंकि ये जीवन और संपत्ति के लिए ख़तरनाक होते हैं।”
उदाहरण — प्रेशर कुकर का सेफ़्टी वॉल्व, “जो यदि ख़राब हो तो भयंकर दुर्घटना का कारण हो सकता है”
रेजी का कष्ट★★
- कौनरेजी मैथ्यू — कक्षा 9 का एक स्वस्थ लड़का, केरल
- क्यों भर्तीनिजी चिकित्सालय में टॉन्सिल निकलवाने के लिए
- क्या हुआअनुचित बेहोशी → दिमाग़ी असामान्यता → जीवन भर के लिए अपंग
- पहला क़दमपिता ने राज्य समिति में 5,00,000 के मुआवजे का दावा किया
- !पहला झटकाराज्य समिति ने ख़ारिज किया — “सबूत पर्याप्त नहीं है”
- ★दूसरा क़दमराष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण समिति में पुन: अपील
- नतीजाअस्पताल चिकित्सा में लापरवाही का दोषी पाया गया, हर्ज़ाने का निर्देश
अगर रेजी के पिता पहली हार पर रुक जाते, तो क्या होता?
रेजी की कहानी का असली सबक़★★
“हार जाने का मतलब रास्ता ख़त्म हो जाना नहीं है। ऊपर की अदालत खुली है।”
! और एक बात जो परीक्षा में आती है — रेजी का मामला ‘सामान’ का नहीं, ‘सेवा’ का है। यानी COPRA सेवाओं पर भी लागू होता है।
अधिकार 2 — सूचना का अधिकार
उपभोक्ता को “जिन वस्तुओं और सेवाओं को ख़रीदता है, उसके बारे में उसे सूचना पाने का अधिकार है” — और तब वह “शिकायत कर सकता है, मुआवजा पाने या वस्तु बदलने की माँग कर सकता है”
पैकेट पर क्या-क्या होना चाहिए★
पृष्ठ 80
| # | जानकारी |
|---|---|
| 1 | अवयव |
| 2 | मूल्य |
| 3 | बैच संख्या |
| 4 | निर्माण की तारीख़ |
| 5 | ख़राब होने की अंतिम तिथि |
| 6 | वस्तु बनाने वाले का पता |
| + | दवा पर — उचित प्रयोग के निर्देश और ख़तरों की जानकारी; वस्त्र पर — धुलाई संबंधी निर्देश |
यह नियम क्यों बना
“यदि वस्तु ख़राब होने की अंतिम समय-सीमा उस पर नहीं छपी है, तब विनिर्माता दुकानदार पर आरोप लगा देगा और अपनी ज़िम्मेदारी नहीं मानेगा।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 80
और — “यदि लोग अंतिम तिथि समाप्त हो गई दवाओं को बेचते हैं, तो उनके ख़िलाफ़ कार्यवाही की जा सकती है।”
MRP — यह पंक्ति सोने की है★★
“उपभोक्ता, विक्रेता से अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) से कम दाम पर वस्तु देने के लिए मोल-भाव कर सकते हैं।”
★★“MRP सबसे ऊँची क़ीमत है — तय क़ीमत नहीं।”
RTI — सूचना पाने का अधिकार
अक्टूबर 2005
- ”…जो अपने नागरिकों को सरकारी विभागों के कार्य-कलापों की सभी सूचनाएँ पाने के अधिकार को सुनिश्चित करता है”
- अमृता — इंजीनियरिंग स्नातक; इंटरव्यू के बाद रिज़ल्ट नहीं मिला, कर्मचारियों ने जवाब देने से इनकार किया
- ★RTI के बाद — “न केवल रिज़ल्ट में देरी के कारणों के बारे में सूचित किया गया बल्कि उसको नियुक्ति के लिए बुलावे का पत्र मिल गया”
फ़र्क़ याद रखिए — पैकेट वाली सूचना दुकानदार से; RTI वाली सूचना सरकारी दफ़्तर से।
अधिकार 3 — चयन का अधिकार
“किसी भी उपभोक्ता को… चाहे वह किसी भी आयु या लिंग का हो… उसको सेवा प्राप्त करते हुए हमेशा चुनने का अधिकार होगा।”
उल्लंघन के दो उदाहरण — दंतमंजन तभी मिलेगा जब ब्रश भी लोगे · गैस कनेक्शन के साथ चूल्हा लेने का दबाव
अबिरामी — “पैसे लौटाए गए”★
- क्या कियादिल्ली के कोचिंग संस्थान के दो वर्षीय पाठ्यक्रम में नामांकन
- कितना दियापूरे दो वर्ष के अध्ययन के लिए करीब 61,020 रुपये
- समस्यापढ़ाई का स्तर ठीक नहीं; पाठ्यक्रम छोड़ा, पर पैसे लौटाने से मना
- जिला आयोग28,000 लौटाने का आदेश — “छात्रा को चुनने का अधिकार है”
- !संस्थानराज्य आयोग में अपील की
- ★राज्य आयोगबेकार की अपील पर 25,000 का दंड + 7,000 मुआवजा और याचिका खर्च
- और सबके लिएकोई भी शिक्षा संस्थान पूरे साल की फ़ीस एडवांस में नहीं ले सकता
अबिरामी को 28,000 मिले — पर 25,000 का दंड उसे नहीं मिला। फिर वह क्यों लगाया गया?
इसका उत्तर पूरे अध्याय का सबक़ है★★
वह दंड इसलिए लगा ताकि आगे कोई संस्थान सिर्फ़ छात्र को थकाने के लिए बेकार की अपील न करे
★“कुछ फ़ैसले एक आदमी के लिए नहीं, सबके लिए होते हैं।”
अधिकार 4 — क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार
“यदि एक उपभोक्ता को कोई क्षति पहुँचाई जाती है, तो क्षति की मात्रा के आधार पर उसे क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार होता है।”
★और सबसे बड़ी बात — उपभोक्ता शिकायत दर्ज करा सकता है “स्वयं किसी वकील के साथ अथवा वकील की सेवा के बिना”
श्री प्रकाश की नौ सीढ़ियाँ★★
- 1बेटी के लिए मनीऑर्डर भेजने पोस्ट-ऑफ़िस गए
- 2पता चला कि रुपये बेटी को नहीं मिले
- 3पोस्ट-ऑफ़िस में मनीऑर्डर के बारे में पूछताछ की
- 4! संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया
- 5★क्षेत्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद् में सलाह ली
- 6उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में मुक़दमा दर्ज; अदालत ने दूसरे पक्ष को नोटिस भेजा
- 7★आयोग में स्वयं बहस की — वकील के बिना
- 8जज ने दस्तावेजों का सत्यापन किया और दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं
- 9फ़ैसला सुनाया गया
इन नौ में सबसे ज़रूरी दो
सीढ़ी 5 — पहले परिषद् में सलाह, सीधे अदालत नहीं
सीढ़ी 7 — ख़ुद बहस की, वकील नहीं किया
★“यह रास्ता आम आदमी के लिए बना है।”
अधिकार 5 — प्रतिनिधित्व का अधिकार
उपभोक्ता संरक्षण परिषदें “मार्गदर्शन करती हैं कि कैसे उपभोक्ता अदालत में मुकदमा दर्ज कराएँ” और “बहुत से अवसरों पर ये इन आयोगों में व्यक्ति विशेष (उपभोक्ता) का प्रतिनिधित्व भी करते हैं”
और सबसे पास वाली संस्था — निवासी कल्याण संघ: “यदि उनके किसी सदस्य के साथ कोई अनुचित व्यावसायिक कार्रवाई होती है, तो उनकी तरफ़ से संस्था मामले को देखती है।”
त्रिस्तरीय न्यायिक तंत्र★★
पृष्ठ 84 — यह तालिका शब्दश: याद कीजिए
| स्तर | दावों की सीमा |
|---|---|
| जिला आयोग | 1 करोड़ तक |
| राज्य आयोग | 1 करोड़ से 10 करोड़ तक |
| राष्ट्रीय आयोग | 10 करोड़ से ऊपर |
★सूत्र — “एक — दस — ऊपर”
और अपील का रास्ता★
“यदि कोई मुक़दमा जिला स्तर के आयोग में ख़ारिज कर दिया जाता है, तो उपभोक्ता राज्य स्तर के आयोग में और उसके बाद राष्ट्रीय स्तर के आयोग में भी अपील कर सकता है।”
★यही तो रेजी के पिता ने किया था।
अधिकार 6 — उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार
पृष्ठ 85 का अभ्यास इसे छठे अधिकार के रूप में गिनता है
- “एक जागरूक उपभोक्ता बनने के लिए निपुणता और ज्ञान प्राप्त करने की ज़रूरत होती है”
- “तब हम अच्छे और बुरे में फ़र्क करने तथा श्रेष्ठ चुनाव करने में सक्षम होंगे”
★यह अध्याय पढ़ना ही तुम्हारे छठे अधिकार का इस्तेमाल है।
4 | मानक चिह्न
चार चिह्न जो हर बच्चे को पहचानने चाहिए★
पृष्ठ 85
| चिह्न | किस पर |
|---|---|
| आई.एस.आई. (ISI) | औद्योगिक उत्पाद — भारतीय मानक ब्यूरो |
| एगमार्क | कृषि उत्पाद — अनाज और खाद्य तेल |
| हॉलमार्क | आभूषण |
| फूड फ़ोर्टिफ़िकेशन (+F) | खाद्य पदार्थ में मुख्य पोषक तत्वों को मिलाना |
“ये शब्दचिह्न (लोगो) और प्रमाणक चिह्न उन्हें अच्छी गुणवत्ता सुनिश्चित कराने में मदद करते हैं।”
पर किताब यहाँ बहुत ईमानदार हैध्यान
“यद्यपि ये संगठन बहुत से उत्पादों के लिए गुणवत्ता का मानदंड विकसित करते हैं, लेकिन सभी उत्पादकों का इन मानदण्डों का पालन करना ज़रूरी नहीं होता।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 85
★पर इन चार पर अनिवार्य है — क्योंकि ये “सुरक्षा और स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं या बड़े पैमाने पर उपयोग होते हैं” — एल.पी.जी. सिलिंडर्स · खाद्य रंग एवं उसमें प्रयुक्त सामग्री · सीमेंट · बोतलबंद पेयजल
5 | आंदोलन की समीक्षा
दोनों कॉलम — यही पूरी समीक्षा है★★
पृष्ठ 86-87
| ✓ जो मिला | ! जो रह गया |
|---|---|
| COPRA 1986 और 2019 का संशोधन | “केवल 50-60 ही… पूर्ण संगठित और मान्यता प्राप्त हैं” |
| त्रिस्तरीय तंत्र — “भारत उन देशों में से एक है, जहाँ… विशिष्ट न्यायालय हैं” | प्रक्रिया “जटिल, ख़र्चीली और समय साध्य”; वकील का सहारा |
| 2000 से अधिक उपभोक्ता संगठन | ★“रसीद नहीं दी जाती… प्रमाण जुटाना आसान नहीं होता” |
| ऑनलाइन शिकायत और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग | “35 वर्ष बाद भी… उपभोक्ता ज्ञान बहुत धीरे-धीरे फैल रहा है” |
| 24 दिसंबर — राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस | “नियमों और विनियमों का प्राय: पालन नहीं होता” |
COPRA 2019 का संशोधन★
क्या जुड़ा
- “अब इंटरनेट के माध्यम से ख़रीद भी शामिल है”
- सेवा प्रदाता और निर्माता को भी ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा
- “यहाँ तक कि जेल भी हो सकती है”
और क्या
- आयोग के बाहर तटस्थ मध्यस्थ की सहायता से निपटारा
- यह अब तीनों स्तरों पर प्रोत्साहित
- ★सोचिए — 1986 में ऑनलाइन ख़रीदारी थी ही नहीं। इसीलिए जोड़ना पड़ा।
और किताब की सबसे सच्ची बातध्यान
“कोपरा के अधिनियम के 35 वर्ष बाद भी भारत में उपभोक्ता ज्ञान बहुत धीरे-धीरे फैल रहा है।”
“इस प्रकार, बाज़ारों के कार्य करने के लिए नियमों और विनियमों का प्राय: पालन नहीं होता।”
पर किताब यहीं नहीं रुकती★★
“फिर भी, उपभोक्ताओं को अपनी भूमिका और अपना महत्त्व समझने की ज़रूरत है… उपभोक्ताओं की सक्रिय भागीदारी से ही उपभोक्ता आंदोलन प्रभावी हो सकता है।”
“इसके लिए स्वैच्छिक प्रयास और सबकी साझेदारी से युक्त संघर्ष की ज़रूरत है।”
6 | दोहराइए
चार नाम — यही पूरा अध्याय हैं
नाम याद, तो उत्तर तैयार
| नाम | अधिकार | सबक़ |
|---|---|---|
| रेजी | सुरक्षा | “हार जाने का मतलब रास्ता ख़त्म होना नहीं है” |
| अमृता | सूचना (RTI) | “पूछने का हक़ भी एक अधिकार है” |
| अबिरामी | चयन | “कुछ फ़ैसले सबके लिए होते हैं” |
| प्रकाश | निवारण | “यह रास्ता आम आदमी के लिए बना है” |
तीन सूत्र — पूरी परीक्षा बच जाएगी
यही रट लीजिए
| सूत्र | किसके लिए |
|---|---|
| सु-सू-च-नि-प्र-शि | छह अधिकार |
| एक — दस — ऊपर | जिला · राज्य · राष्ट्रीय आयोग |
| 1985 दुनिया की, 1986 भारत की | UN दिशा-निर्देश बनाम COPRA |
जहाँ बच्चे मार खाते हैंध्यान
इन्हें पहले से ठीक कर लीजिए
| ग़लती | सही बात |
|---|---|
| “COPRA केवल सामान पर लागू” | ग़लत — रेजी, अबिरामी, प्रकाश — तीनों सेवा के मामले हैं |
| “MRP तय क़ीमत है” | ग़लत — कम पर मोल-भाव किया जा सकता है |
| “प्रक्रिया सरल और शीघ्र है” | ग़लत — “जटिल, ख़र्चीली और समय साध्य” |
| “बड़े नुक़सान पर ही आयोग जाएँ” | ग़लत — प्रकाश का मामला ₹6,000 का था |
| समीक्षा में एक तरफ़ लिखना | दोनों कॉलम चाहिए |
और अंत में — दो वाक्य जो ज़िंदगी भर काम आएँगे★★
“MRP सबसे ऊँची क़ीमत है — तय क़ीमत नहीं।” “रसीद नहीं तो सबूत नहीं। सबूत नहीं तो अधिकार नहीं।”
★अध्याय की मूल बात — “अधिकार क़ानून की किताब में लिखा होना काफ़ी नहीं है। जब तक उपभोक्ता जागरूक न हो, वह अधिकार काग़ज़ पर ही पड़ा रहता है।”
और यह किताब का आख़िरी अध्याय है
अध्याय 1 में पूछा — विकास क्या है। अध्याय 2 में देखा — लोग काम कहाँ करते हैं। अध्याय 3 में देखा — पैसा और कर्ज़ कैसे चलते हैं। अध्याय 4 में देखा — दुनिया कैसे जुड़ गई। ★और अध्याय 5 में देखा — इस पूरे बाज़ार में तुम्हारा अपना हक़ क्या है।
पहले चार अध्यायों में तुम दर्शक थे — इस आख़िरी अध्याय में तुम खिलाड़ी हो

