अध्याय 3 — मुद्रा और साख · आर्थिक विकास की समझ · कक्षा 10
कक्षा — 10 · विषय — अर्थशास्त्र (आर्थिक विकास की समझ) · पृष्ठ — 39 से 53
पाँच बच्चे, पाँच चीज़ें — और बिना पैसे के सबको अपनी मनचाही चीज़ चाहिए। दो मिनट का समय है।
इसी उलझन का एक नाम है
आवश्यकताओं का दोहरा संयोग — “अर्थात् दोनों पक्ष एक दूसरे से चीज़ें ख़रीदने और बेचने पर सहमति रखते हों।”
“एक व्यक्ति जो वस्तु बेचने की इच्छा रखता है, वही वस्तु दूसरा व्यक्ति ख़रीदने की भी इच्छा रखता हो।”
जूता निर्माता का उदाहरण
“ज़रा सोचिए कि जूता निर्माता यदि बिना मुद्रा का इस्तेमाल किए जूते का सीधे गेहूँ से विनिमय करता तो उसे कितनी कठिनाई होती। उसे गेहूँ उगाने वाले ऐसे किसान को खोजना पड़ता जो न केवल गेहूँ बेचना चाहता हो, बल्कि साथ में जूते भी ख़रीदना चाहता हो।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 39
वस्तु विनिमय प्रणाली, जहाँ मुद्रा के बिना विनिमय होता है, वहाँ दोहरा संयोग अनिवार्य विशिष्टता है
और मुद्रा इस पूरी उलझन को ख़त्म कर देती है
“मुद्रा महत्त्वपूर्ण मध्यवर्ती भूमिका प्रदान करके आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की ज़रूरत को ख़त्म कर देती है… उसे केवल अपने जूते के लिए ख़रीददार ढूँढ़ना है।”
★“चूँकि मुद्रा विनिमय प्रक्रिया में मध्यस्थता का काम करती है, इसे विनिमय का माध्यम कहा जाता है।”
ध्यान रखिए — यह अध्याय दो हिस्सों का है। पहले चार पन्ने मुद्रा के, पर असली अध्याय पृष्ठ 43 से शुरू होता है — साख से।
1 | मुद्रा के आधुनिक रूप
मुद्रा का सफ़र
- प्रारंभिक कालभारतीय अनाज और पशु मुद्रा के रूप में
- उसके बादसोना, चाँदी और ताँबे जैसी धातुओं के सिक्के — चलन पिछली सदी तक
- आधुनिककरेंसी — काग़ज़ के नोट और सिक्के
पर एक अजीब बात
“आधुनिक मुद्रा बहुमूल्य धातुओं जैसे सोना-चाँदी और ताँबे के बने सिक्कों से नहीं बनी है। अनाज और पशुओं की तरह ये रोज़मर्रा की चीज़ें भी नहीं हैं। आधुनिक मुद्रा का इस प्रकार का अपना कोई इस्तेमाल नहीं है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 40
तो फिर इसे विनिमय का माध्यम क्यों स्वीकार किया जाता है?
उत्तर — चार क़ानूनी कड़ियाँ★★
पृष्ठ 40
| # | कारण |
|---|---|
| 1 | “इसे विनिमय का माध्यम इसलिए स्वीकार किया जाता है, क्योंकि किसी देश की सरकार इसे प्राधिकृत करती है।” |
| 2 | “भारत में भारतीय रिज़र्व बैंक केंद्रीय सरकार की तरफ़ से करेंसी नोट जारी करता है।” |
| 3 | “भारतीय क़ानून के अनुसार, किसी व्यक्ति या संस्था को मुद्रा जारी करने की इजाज़त नहीं है।” |
| 4 | “भारत में कोई व्यक्ति क़ानूनी तौर पर रुपयों में अदायगी को अस्वीकार नहीं कर सकता।” |
★10 रुपये का नोट निकालकर पढ़िए — “मैं धारक को दस रुपये अदा करने का वचन देता हूँ” और नीचे RBI गवर्नर के हस्ताक्षर। नोट काग़ज़ का टुकड़ा है — क़ीमत उस वचन में है।
बैंकों में निक्षेप
पृष्ठ 40
- “हर महीने के आख़िर में वेतन वाले मज़दूरों के पास अतिरिक्त नकद होता है… वे इसे बैंकों में अपने नाम से खाता खोलकर जमा कर देते हैं”
- “बैंक ये जमा स्वीकार करते हैं और इस पर सूद भी देते हैं”
- तीन फ़ायदे — धन सुरक्षित रहता है · सूद मिलता है · आवश्यकता के अनुसार निकालने की सुविधा
★“चूँकि बैंक खातों में जमा धन को माँग के ज़रिए निकाला जा सकता है, इसलिए इस जमा को ‘माँग जमा’ कहा जाता है।”
चैक से भुगतान — बिना नकद के
- 1जूता निर्माता एम. सलीम को चमड़ा आपूर्तिकर्ता को भुगतान करना है
- 2वह एक विशेष रकम का चैक लिखता है — यानी अपने बैंक को यह रकम देने का आदेश
- 3चमड़ा आपूर्तिकर्ता वह चैक अपने बैंक खाते में जमा कर देता है
- 4धन एक बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में कुछ दिनों में अंतरित हो जाता है
- 5“यह लेन-देन बिना नकद की अदायगी के पूरा हो जाता है”
★इसीलिए — “चूँकि माँग जमाओं को करेंसी के साथ-साथ व्यापक स्तर पर भुगतान का माध्यम स्वीकार किया जाता है, इसलिए आधुनिक अर्थव्यवस्था में इसे भी मुद्रा समझा जाता है।”
2 | बैंक करते क्या हैं?
मान लो बैंक में ₹100 जमा हुए★
“आजकल भारत में बैंक जमा का केवल 15 प्रतिशत हिस्सा नकद के रूप में अपने पास रखते हैं।” — यानी ₹15 तिजोरी में, ₹85 कर्ज़ पर बाहर
क्यों? — “क्योंकि किसी एक विशेष दिन में, केवल कुछ जमाकर्ता ही नकद निकालने के लिए आते हैं, इसलिए बैंक का काम इतने नकद से आराम से चल जाता है।”
बैंक की असली भूमिका — मध्यस्थता★★
जमाकर्ता (बाईं ओर)
- लोग जमा करते हैं
- लोग धन निकालते हैं और ब्याज पाते हैं
- इनके पास अतिरिक्त राशि है
कर्ज़दार (दाईं ओर)
- लोग ऋण लेते हैं
- लोग ऋण लौटाते हैं और ब्याज देते हैं
- इन्हें राशि की ज़रूरत है
★“बैंक जिनके पास अतिरिक्त राशि है (जमाकर्ता) एवं जिन्हें राशि की ज़रूरत है (कर्ज़दार) के बीच मध्यस्थता का काम करते हैं”; और “कर्ज़दारों से लिए गए ब्याज और जमाकर्ताओं को दिये गये ब्याज के बीच का अंतर बैंकों की आय का प्रमुख स्रोत है।”
किताब का सवाल — “अगर सभी जमाकर्ता एक ही समय में अपनी धन राशि की माँग करने बैंक पहुँच जाएँ तो क्या होगा?”
3 | साख की दो स्थितियाँ | अध्याय का दिल
पहले ऋण की परिभाषा
“ऋण (उधार) से हमारा तात्पर्य एक सहमति से है जहाँ साहूकार कर्ज़दार को धन, वस्तुएँ या सेवाएँ मुहैया कराता है और बदले में भविष्य में कर्ज़दार से भुगतान करने का वादा लेता है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 43
अब दो कहानियाँ — एक ही चीज़, दो बिल्कुल अलग नतीजे
सलीम और स्वप्ना★★
सलीम — त्यौहार का मौसम
- 3000 जोड़ी जूतों का ऑर्डर, एक महीने में पूरा करना है
- चाहिए — अतिरिक्त मज़दूर और कच्चा माल
- दो स्रोतों से ऋण — चमड़ा व्यापारी (बाद में भुगतान) और बड़ा व्यापारी (अग्रिम भुगतान)
- नतीजा — जूते पहुँचाए, अच्छा-ख़ासा लाभ, उधार भी चुका दिया
स्वप्ना की समस्या
- 3 एकड़ ज़मीन पर मूँगफली; खेती के ख़र्चों के लिए साहूकार से ऋण
- कीटनाशकों के हमले से फसल बर्बाद; महँगी दवाइयों से भी फ़र्क़ नहीं पड़ा
- कर्ज़ साल के अंदर बड़ी रकम बन गया; अगले साल दुबारा उधार
- नतीजा — कर्ज़ चुकाने के लिए ज़मीन का कुछ हिस्सा बेचना पड़ा
सलीम — “ऋण एक महत्त्वपूर्ण तथा सकारात्मक भूमिका अदा करता है”; स्वप्ना — “ऋण ने… उसकी स्थिति बदतर कर दी”
और इसी का नाम है — कर्ज़-जाल★★
“इसे आम भाषा में कर्ज़-जाल कहा जाता है। इस मामले में ऋण कर्ज़दार को ऐसी परिस्थिति में धकेल देता है, जहाँ से बाहर निकलना काफ़ी कष्टदायक होता है।”
और स्वप्ना की गलती क्या थी? — कोई नहीं। कीड़े लग गए। और कर्ज़ को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता।
इसलिए अध्याय का केंद्रीय वाक्य यह है★★
“एक स्थिति में ऋण आय बढ़ाने में सहयोग करता है… दूसरी स्थिति में, फसल बर्बाद होने के कारण ऋण व्यक्ति को अपने जाल में फँसा देता है। ऋण उपयोगी होगा या नहीं, यह परिस्थिति के ख़तरों और हानि होने पर प्राप्त सहयोग की संभावना पर निर्भर करता है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 44
यानी — ऋण अपने आप में न अच्छा है न बुरा।
स्वप्ना की स्थिति को जोखिम भरा बनाने वाले तीन कारण
पृष्ठ 44 का प्रश्न
| कारण | क्यों |
|---|---|
| कीटनाशक दवाइयाँ | महँगी हैं, और फिर भी फसल नहीं बची |
| साहूकार की भूमिका | ऊँची ब्याज दर — कर्ज़ साल भर में बड़ी रकम बन गया |
| मौसम | खेती मुख्यत: मौसम पर निर्भर है, और “उधार की अदायगी मुख्यत: फसल की कमाई पर निर्भर है” |
4 | ऋण की शर्तें | और असली दीवार
ऋण की चार शर्तें
“ब्याज दर, समर्थक ऋणाधार, आवश्यक कागज़ात और भुगतान के तरीक़ों को सम्मिलित रूप से ऋण की शर्तें कहा जाता है।”
“ऋण की शर्तों में एक ऋण व्यवस्था से दूसरी ऋण व्यवस्था में काफी फ़र्क़ आ जाता है”
और इनमें सबसे निर्णायक — समर्थक ऋणाधार★★
“समर्थक ऋणाधार ऐसी संपत्ति है, जिसका मालिक कर्ज़दार है (जैसे कि भूमि, इमारत, गाड़ी, पशु, बैंकों में पूँजी) और इसका इस्तेमाल वह उधारदाता को गारंटी देने के रूप में करता है, जब तक कि ऋण का भुगतान नहीं हो जाता। यदि कर्ज़दार उधार वापस नहीं कर पाता, तो उधारदाता को भुगतान प्राप्ति के लिए संपत्ति या समर्थक ऋणाधार बेचने का अधिकार होता है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 44
★अब सोचिए — और जिसके पास इनमें से कुछ भी न हो, वह क्या करे? — यही सवाल पूरे अध्याय को आगे ले जाता है
मेघा का आवास ऋण — एक उदाहरण
पृष्ठ 45
| विवरण | उत्तर |
|---|---|
| ऋण राशि | 5 लाख रुपये |
| ऋण-अवधि | 10 साल |
| आवश्यक कागज़ात | नौकरी और वेतन संबंधी रिकार्ड |
| ब्याज दर | 12 प्रतिशत वार्षिक |
| अदायगी का स्वरूप | मासिक किस्तें |
| समर्थक ऋणाधार | घर के सभी कागज़ — कर्ज़ चुकाने पर वापस |
5 | सोनपुर गाँव | चार लोग, चार अलग दुनिया
15 नवम्बर 2019 — रोहित और रंजन की रिपोर्ट★★
पृष्ठ 46–47
| कौन | ज़मीन | किससे ऋण | ब्याज |
|---|---|---|---|
| अरुण (मध्यम किसान) | 7 एकड़ | बैंक | 8.5% वार्षिक |
| श्यामल (छोटा किसान) | 1.5 एकड़ | पहले महाजन, अब व्यापारी | 5% मासिक (60% वार्षिक) → 3% मासिक |
| रमा (भूमिहीन मज़दूर) | कुछ नहीं | भूस्वामी-नियोक्ता | 5% मासिक (60% वार्षिक) |
| कृषक सहकारी समिति | — | 2300 किसान सदस्य | सदस्यों की जमा को ऋणाधार मानकर बैंक से बड़ा ऋण |
★कोई नियम दिख रहा है? — “जिसके पास जितनी ज़्यादा ज़मीन, उसे उतना सस्ता ऋण।”
अब गणना कीजिए — ₹10,000 पर एक साल का ब्याज★
अरुण (8.5%) — ₹850 · श्यामल (36%) — ₹3,600 · रमा (60%) — ₹6,000
अंतर ₹5,150 का है। और फ़र्क़ सिर्फ़ इतना कि अरुण के पास सात एकड़ ज़मीन है।
और श्यामल के साथ एक और चाल
“ऋण पर ब्याज के अलावा व्यापारी किसानों से वादा लेता है कि वह अपनी फसल उसी को बेचेगा… फसल की क़ीमतें फसल काटते समय कम होती हैं इसलिए वह किसानों से कम क़ीमत पर फसल ख़रीदकर और बाद में क़ीमत बढ़ने पर बेचकर भारी मुनाफा कमाता है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 46
यानी — ब्याज भी लिया, और फसल भी सस्ते में ले ली।
और रमा? — “यद्यपि भूस्वामी उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करता, फिर भी वह लगातार काम करती है ताकि आवश्यकता पड़ने पर उसे ऋण मिल सके।”
6 | औपचारिक और अनौपचारिक साख
दो वर्ग — और सबसे बड़ा फ़र्क़
औपचारिक क्षेत्रक ऋण
- बैंक और सहकारी समितियाँ
- भारतीय रिज़र्व बैंक नज़र रखता है
- ब्याज दरें कम
अनौपचारिक क्षेत्रक ऋण
- नियम-क़ायदे से वसूली
- साहूकार, व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार, दोस्त
- “देखरेख करने वाली कोई संस्था नहीं है”
- “वे ऐच्छिक दरों पर ऋण दे सकते हैं”
- ! “उन्हें नाजायज़ तरीक़ों से अपने पैसे वापस लेने से रोकने वाला कोई नहीं है।”
आलेख 1 — ग्रामीण भारत में ऋण के स्रोत, 2019
पृष्ठ 48
| स्रोत | % | वर्ग |
|---|---|---|
| व्यावसायिक बैंक | 51 | औपचारिक |
| साहूकार | 23 | अनौपचारिक |
| सहकारी समितियाँ / बैंक | 10 | औपचारिक |
| रिश्तेदार एवं मित्र | 7 | अनौपचारिक |
| अन्य औपचारिक एजेंसियाँ | 5 | औपचारिक |
| अन्य अनौपचारिक एजेंसियाँ | 3 | अनौपचारिक |
| ज़मींदार | 1 | अनौपचारिक |
जोड़िए — औपचारिक 66%, अनौपचारिक 34%। और ध्यान दीजिए — अकेला साहूकार 23 प्रतिशत है
भारतीय रिज़र्व बैंक के तीन काम★
पृष्ठ 48
| # | काम |
|---|---|
| 1 | नज़र रखता है कि बैंक वास्तव में नकद शेष बनाए हुए हैं |
| 2 | कि बैंक “केवल लाभ अर्जित करने वाले व्यवसायियों और व्यापारियों को ही ऋण मुहैया नहीं करा रहे, बल्कि छोटे किसानों, छोटे उद्योगों, छोटे कर्ज़दारों इत्यादि को भी ऋण दे रहे हैं” |
| 3 | समय-समय पर बैंकों को बताना पड़ता है कि “वे कितना और किनको ऋण दे रहे हैं और उसकी ब्याज की दरें क्या हैं” |
आलेख 2 — किसे क्या मिलता है★★
पृष्ठ 49 · शहरी परिवारों द्वारा लिए गए कुल ऋण
| परिवार | औपचारिक स्रोत | अनौपचारिक स्रोत |
|---|---|---|
| गरीब | 46% | 54% |
| कम संपत्ति वाले | 62% | 38% |
| समृद्ध | 73% | 27% |
| अमीर | 83% | 17% |
★“अमीर परिवार औपचारिक ऋणदाताओं से सस्ता ऋण ले रहे हैं, जबकि गरीब परिवारों को कर्ज़ के लिए बहुत सारा पैसा देना पड़ता है।”
और यही इस अध्याय का सबसे बड़ा विरोधाभास है★★
जिसे पैसे की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, उसे सबसे महँगा कर्ज़ मिलता है — और जिसे सबसे कम ज़रूरत है, उसे सबसे सस्ता।
“औपचारिक स्रोत अभी भी ग्रामीण परिवारों की कुल ऋण ज़रूरतों का केवल 50 प्रतिशत पूरा कर पाता है”; इसलिए “यह ज़रूरी है कि औपचारिक ऋण का अधिक समान वितरण हो, ताकि गरीब परिवार भी सस्ते ऋण का फ़ायदा उठा सकें।”
7 | निर्धनों के स्वयं सहायता समूह
पहले समस्या
“जैसा कि हमने मेघा के मामले में देखा, बैंक से कर्ज़ लेने के लिए ऋणाधार और विशेष कागज़ातों की ज़रूरत पड़ती है। ऋणाधार की अनुपलब्धता एक प्रमुख कारण है, जिससे गरीब बैंकों से ऋण नहीं ले पाते।… लेकिन, महाजन ब्याज की दरें बहुत ऊँची रखते हैं, लेन-देन की लिखा पढ़ी भी पूरी नहीं करते और निर्धन कर्ज़दारों को तंग करते हैं।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 50
तो निकलने का रास्ता क्या है?
स्वयं सहायता समूह की बनावट
पृष्ठ 50–51
| बात | विवरण |
|---|---|
| सदस्य | एक-दूसरे के पड़ोसी 15-20 सदस्य, विशेषकर महिलाएँ |
| बचत | नियमित रूप से मिलते और बचत करते हैं; प्रति व्यक्ति ₹25 से ₹100 या अधिक |
| छोटे कर्ज़ | समूह से ही; ब्याज साहूकार से कम |
| बैंक से ऋण | एक या दो वर्षों की नियमित बचत के बाद; ऋण समूह के नाम पर |
| किन कामों के लिए | गिरवी ज़मीन छुड़वाने · कार्यशील पूँजी (बीज, खाद, बाँस, कपड़े) · घर बनाने · सिलाई मशीन, हथकरघा, पशु |
| निर्णय कौन लेता है | समूह के सदस्य स्वयं — ऋण का लक्ष्य, रकम, ब्याज दर, वापसी की अवधि |
और यही इसका जादू है★★
“एक भी सदस्य अगर ऋण वापस नहीं लौटाता तो समूह के अन्य सदस्य इस मामले को गंभीरता से लेते हैं। इसी कारण, बैंक निर्धन महिलाओं को ऋण देने के लिए तैयार हो जाते हैं जब वे अपने को स्वयं सहायता समूहों में संगठित कर लेती हैं, यद्यपि उनके पास कोई ऋणाधार नहीं होता।”
एक वाक्य में — यहाँ ज़मीन की जगह भरोसा गिरवी रखा जाता है।
और लाभ केवल आर्थिक नहीं है
“इससे न केवल महिलाएँ आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो जाती हैं, बल्कि समूह की नियमित बैठकों के ज़रिए लोगों को एक आम मंच मिलता है, जहाँ वह तरह-तरह के सामाजिक विषयों जैसे — स्वास्थ्य, पोषण और घरेलू हिंसा इत्यादि पर आपस में चर्चा कर पाती हैं।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 51
बांग्लादेश का ग्रामीण बैंक
पृष्ठ 52
| बात | आँकड़ा |
|---|---|
| शुरुआत | 1970 में, एक छोटे पैमाने से |
| 2018 में | 9 लाख सदस्य, 81,600 गाँवों में |
| कौन | “ऋण लेने वाली ज़्यादातर महिलाएँ… समाज के गरीब तबके से” |
| क्या साबित हुआ | “न केवल गरीब महिलाएँ भरोसेमंद कर्ज़दार हैं, बल्कि वे विभिन्न तरह की छोटी आय वाली गतिविधियों को सफलतापूर्वक शुरू करने और चला सकने में सक्षम हैं।” |
प्रो. मोहम्मद युनूस★
“अगर गरीब लोगों को सही और उचित शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराया जा सकता है, तो लाखों छोटे लोग अपनी लाखों छोटी-छोटी गतिविधियों के जरिए विकास का सबसे बड़ा चमत्कार कर सकते हैं।”
ग्रामीण बैंक के संस्थापक; 2006 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार
सोचिए — नोबेल अर्थशास्त्र का नहीं, शांति का मिला था। क्यों?
8 | समापन
जाते-जाते — पाँच सूत्र
- दोहरा संयोग = दोनों को दोनों चाहिएवस्तु विनिमय की मूल समस्या
- 15 नकद, 85 कर्ज़बैंक का असली काम
- सलीम बनाम स्वप्नाऋण की दो स्थितियाँ
- ब्याज · ऋणाधार · कागज़ · अदायगीऋण की चार शर्तें
- 83 बनाम 46अमीर बनाम गरीब — औपचारिक ऋण का हिस्सा
और अध्याय का अंतिम संदेश
“सस्ता और सामर्थ्य के अनुकूल कर्ज़ देश के विकास के लिए अति आवश्यक है।”
और इसके साथ वह वाक्य जो कभी नहीं भूलना — “ऋण उपयोगी होगा या नहीं, यह परिस्थिति के ख़तरों और हानि होने पर प्राप्त सहयोग की संभावना पर निर्भर करता है।”

