अध्याय 5यात्रियों के नज़रिए

पाठ्यपुस्तक से आगे36 मिनट

यह दस्तावेज़ क्यों? NCERT को कभी-कभी पंक्तियों के बीच पढ़ना पड़ता है। यहाँ वे तथ्य, संदर्भ और अवधारणाएँ दी गई हैं जो पाठ्यपुस्तक में नहीं हैं, पर जिन्हें जानकर शिक्षक कक्षा में गहराई और आत्मविश्वास ला सकता है।

तैयारी की तिथि: 1 अगस्त 2026 (भाग 6 — ‘ताज़ा घटनाक्रम’ इसी तिथि तक अद्यतन)

🏷 टैग-प्रणाली (Tag Legend)ध्यान

टैगअर्थकक्षा में उपयोग
🔷 [विस्तार]NCERT में जो संकेत मात्र है, उसका पूरा रूपसीधे पढ़ाया जा सकता है
🔶 [अतिरिक्त तथ्य]NCERT में बिलकुल नहीं — पर प्रामाणिक व सत्यापितरोचकता व गहराई के लिए
🔺 [संकल्पना-विस्तार]स्नातक/स्नातकोत्तर स्तर की अवधारणाकेवल शिक्षक हेतु या उन्नत विद्यार्थियों हेतु
🟢 [आज का संदर्भ]अतीत का वर्तमान से जोड़कक्षा-रुचि जगाने के लिए उत्कृष्ट
⚖️ [विद्वत्-बहस]जहाँ विद्वानों में मतभेद हैसंतुलित भाषा आवश्यक
! [सावधानी]जहाँ ग़लत समझ का जोखिम हैपढ़ाने से पहले पढ़ें

! महत्त्वपूर्ण नियम: परीक्षा का उत्तर NCERT से ही लिखा जाना चाहिए। यह सामग्री समझ बढ़ाने के लिए है, उत्तर बदलने के लिए नहीं। जहाँ यह उत्तर में सहायक हो, वहाँ [उत्तर-उपयोगी] लिखा है।

भाग 1 — अल-बिरूनी : NCERT से आगे

🔷 [विस्तार] 1.1 पूरा नाम और उसका अर्थ

NCERT की काल-रेखा में नाम है — “मोहम्मद इब्न अहमद अबू रेहान अल बिरूनी”।

भागअर्थ
अबू रेहान‘रेहान का पिता’ — अरबी कुन्या (उपनाम)
मुहम्मद इब्न अहमद‘अहमद का पुत्र मुहम्मद’ — पिता का नाम
★अल-बिरूनी‘बीरून’ = फ़ारसी में ‘बाहर’ — अर्थात् “बाहरी इलाके/उपनगर का रहने वाला”

★★कक्षा-सूत्र (अत्यंत प्रभावी): “जिस व्यक्ति का नाम ही ‘बाहर वाला’ था, वही भारत का सबसे सूक्ष्म बाहरी प्रेक्षक बना।” यह संयोग कक्षा में बताइए — विद्यार्थी इसे कभी नहीं भूलते।

🔶 [अतिरिक्त तथ्य] 1.2 किताब-उल-हिन्द का मूल अरबी शीर्षक

NCERT केवल ‘किताब-उल-हिन्द’ कहती है। इसका पूरा अरबी शीर्षक कुछ इस अर्थ का है —

“तहक़ीक़ मा लिल-हिंद…” — अर्थात् “भारत के विषय में जो कहा जाता है, उसका सत्यापन”

★इस शीर्षक में ही उसकी पूरी पद्धति छिपी है:

शब्दनिहितार्थ
तहक़ीक़ (सत्यापन)वह सुनी हुई बात दोहरा नहीं रहा — जाँच रहा है
“जो कहा जाता है”अर्थात् पहले से प्रचलित धारणाएँ मौजूद थीं

[उत्तर-उपयोगी] यह तथ्य 📦 साइड-बॉक्स ‘ईश्वर ही जानता है!’ से सीधे जुड़ता है — जहाँ वह 216,432 वर्ष पुरानी लकड़ी की मूर्ति की कथा पर भौतिक तर्क से संदेह करता है। “सत्यापन” उसके ग्रंथ के नाम में भी है और विधि में भी।

🔶 [अतिरिक्त तथ्य] 1.3 अल-बिरूनी की अन्य कृतियाँ

NCERT केवल किताब-उल-हिन्द की चर्चा करती है। पर अल-बिरूनी एक बहुविध विद्वान था —

क्षेत्रकार्य
खगोल-विज्ञानअल-क़ानून अल-मसऊदी — ग़ज़नी के सुल्तान मसऊद को समर्पित एक विशाल खगोलीय ग्रंथ
कालक्रम-विज्ञानप्राचीन जातियों के पंचांगों व युग-गणनाओं की तुलनात्मक कृति
★भूगोल/गणितपृथ्वी की त्रिज्या की गणना — पंजाब क्षेत्र में एक पर्वत की ऊँचाई और क्षितिज के अवनमन कोण से (यह नंदना दुर्ग के पास किया माना जाता है)
रत्न-विज्ञानखनिजों व रत्नों के आपेक्षिक घनत्व की माप
औषधिऔषधीय पदार्थों पर ग्रंथ

★★कक्षा-बिंदु: “उसने भारत में केवल समाज नहीं देखा — उसने यहाँ पृथ्वी नापने की कोशिश भी की।” यही उसकी ‘ज्यामितीय संरचना’ का असली कारण है — NCERT का “गणित की ओर झुकाव” वाला वाक्य इसी पृष्ठभूमि से आता है। [उत्तर-उपयोगी] प्रश्न 1 (किताब-उल-हिन्द पर लेख) में यह वाक्य जोड़ा जा सकता है: “अल-बिरूनी केवल इतिहासकार नहीं, खगोलशास्त्री, गणितज्ञ तथा भूगोलवेत्ता भी था — और यही बहुविध विद्वत्ता उसकी लेखन-शैली में दिखाई देती है।”

🔶 [अतिरिक्त तथ्य] 1.4 किताब-उल-हिन्द यूरोप तक कैसे पहुँचा?

NCERT कहती है — “1500 ई. से पहले भारत में अल-बिरूनी को कुछ ही लोगों ने पढ़ा होगा।” पर आगे क्या हुआ?

  • उन्नीसवीं शताब्दी में जर्मन प्राच्यविद् एडवर्ड सखाऊ (Edward Sachau) ने इसका अंग्रेज़ी अनुवाद ‘अल्बरूनीज़ इंडिया’ नाम से प्रकाशित किया (1888) — और तभी यह ग्रंथ आधुनिक विद्वानों की पहुँच में आया।

★★यह तथ्य अध्याय के एक केंद्रीय बिंदु को और मज़बूत करता है: बर्नियर की कृति 1670-71 में छपी और पाँच वर्षों में चार भाषाओं में अनूदित हुई। अल-बिरूनी की कृति लगभग 850 वर्ष बाद अंग्रेज़ी में उपलब्ध हुई। कक्षा-सूत्र: “बर्नियर को पाँच साल लगे, अल-बिरूनी को आठ सौ पचास।”

⚖ [विद्वत्-बहस] 1.5 अल-बिरूनी — सहानुभूतिपूर्ण प्रेक्षक या फिर भी बाहरी?ध्यान

पक्षतर्क
सहानुभूतिपूर्णउसने संस्कृत सीखी; ब्राह्मण मित्र बनाए; यूक्लिड का संस्कृत में अनुवाद किया; अपवित्रता की अवधारणा अस्वीकार की; संस्कृत को “अरबी भाषा की तरह ही” समृद्ध माना
फिर भी सीमितउसका ज्ञान एक ही वर्ग के ग्रंथों से आया; वह पूरे भारत में नहीं घूमा (“उसका यात्रा-कार्यक्रम स्पष्ट नहीं है”, मुख्यत: पंजाब व उत्तर भारत); सामान्य जन, स्त्रियाँ, कारीगर — उसके विवरण में लगभग अनुपस्थित

★संतुलित निष्कर्ष (कक्षा में यही कहिए): “अल-बिरूनी अपने युग के मानकों से असाधारण रूप से निष्पक्ष था — पर वह अपने स्रोतों की सीमा से बाहर नहीं जा सका। निष्पक्षता और सर्वज्ञता दो अलग चीज़ें हैं।”

भाग 2 — इब्न बतूता : NCERT से आगे

🔷 [विस्तार] 2.1रिह़ला का पूरा शीर्षक — और उसमें छिपा उद्देश्य

NCERT कहती है कि उसका वृत्तांत “रिह़ला” कहलाता है। ‘रिह़ला’ अरबी में एक साहित्यिक विधा का नाम है — ‘यात्रा-वृत्तांत’।

इस विशेष कृति का औपचारिक शीर्षक कुछ इस अर्थ का है —

“शहरों के अजूबों और यात्रा के आश्चर्यों पर विचार करने वालों के लिए एक उपहार”

★★शीर्षक में ही स्रोत 3 का प्रमाण है! शीर्षक के दो शब्द — ‘अजूबे’ (ग़राइब) और ‘आश्चर्य’ (अजाइब) — ठीक वही हैं जो इब्न जुज़ई की प्रस्तावना कहती है: “असाधारण विवरण… असाधारण चीज़ों के बारे में बताया”। [उत्तर-उपयोगी] प्रश्न 7 (क्या रिह़ला शहरी जीवन की सही जानकारी देता है?) में यह जोड़ा जा सकता है: “स्वयं ग्रंथ का शीर्षक ही ‘अजूबों’ और ‘आश्चर्यों’ की बात करता है — अर्थात् चयन का पूर्वाग्रह शीर्षक में ही घोषित है।”

🔶 [अतिरिक्त तथ्य] 2.2 इब्न जुज़ई और मोरक्को का शासक

NCERT कहती है — “स्थानीय शासक ने निर्देश दिए कि उसकी कहानियों को दर्ज किया जाए”, और इब्न जुज़ई को “नियुक्त किया गया था”। पर वह शासक कौन था?

  • वह मोरक्को (मरीनिद वंश) का सुल्तान था, जिसके दरबार में इब्न बतूता 1354 में लौटने के बाद पहुँचा
  • इब्न जुज़ई एक अंदलुसी (स्पेनी-अरब) साहित्यकार व सचिव थे — अर्थात् वे केवल लिपिक नहीं, एक कुशल लेखक थे

★★इसका पद्धतिगत महत्त्व अत्यंत बड़ा है: जब एक कुशल साहित्यकार किसी की बात लिखता है, तो वह उसे साहित्यिक रूप भी देता है — शब्द चुनता है, क्रम बदलता है, अलंकार जोड़ता है। अत: रिह़ला में तीन आवाज़ें हैं: (1) इब्न बतूता का अनुभव • (2) इब्न जुज़ई की भाषा • (3) सुल्तान की अपेक्षा। कक्षा-सूत्र: “रिह़ला में तीन लोग बोल रहे हैं — यात्री, लेखक और राजा।”

🔶 [अतिरिक्त तथ्य] 2.3 मार्को पोलो के साथ एक असाधारण समानता★

NCERT कहती है — “चीन के विषय में उसके वृत्तांत की तुलना मार्को पोलो के वृत्तांत से की जाती है।” पर तुलना का एक और बिंदु है जो NCERT नहीं बताती —

इब्न बतूतामार्को पोलो
स्वयं लिखा?❌ नहीं❌ नहीं
किसने लिखा?इब्न जुज़ईरुस्तिकेल्लो (Rustichello) — एक कथा-लेखक
परिस्थितिराजा के आदेश परजेनोआ के कारागार में साथी बंदी को

★★यह समानता कक्षा में बहुत प्रभावी है: “मध्यकाल के दो सबसे प्रसिद्ध यात्रा-वृत्तांत — और दोनों में से कोई भी यात्री ने स्वयं नहीं लिखा।” निष्कर्ष: “यात्रा करना एक काम है, उसे दर्ज करना दूसरा — और दूसरा काम प्राय: किसी और ने किया।”

🔶 [अतिरिक्त तथ्य] 2.4 रिह़ला यूरोप तक कैसे पहुँचा?

  • 1830 के दशक में फ्रांस के अल्जीरिया-विजय के बाद रिह़ला की कई अरबी पांडुलिपियाँ यूरोप पहुँचीं
  • उन्नीसवीं सदी के मध्य में फ्रांसीसी विद्वानों देफ़्रेमरी (Defrémery) व सांगिनेत्ती (Sanguinetti) ने अरबी मूल पाठ + फ्रांसीसी अनुवाद प्रकाशित किया — यही आज भी मानक संस्करण माना जाता है
  • बीसवीं सदी में एच.ए.आर. गिब्ब ने विस्तृत अंग्रेज़ी अनुवाद किया (NCERT की पठन-सूची में यही है — गिब्ब, संपा., 1993)

! [सावधानी] ध्यान दीजिए — रिह़ला भी उपनिवेशवाद के रास्ते से यूरोप पहुँचा। 🧭 भाग-1, अध्याय 4 से जोड़: वहाँ अमरावती की मूर्तियाँ औपनिवेशिक अधिकारियों के माध्यम से मद्रास व लंदन पहुँची थीं। वही प्रक्रिया, अलग सामग्री।

🔶 [अतिरिक्त तथ्य] 2.5 यात्रा का पैमाना

इब्न बतूता ने अपने जीवन में लगभग 1,17,000 किलोमीटर (कुछ अनुमानों में इससे भी अधिक) की यात्रा की — यह मार्को पोलो से कहीं अधिक मानी जाती है।

⚖️ [विद्वत्-बहस] यह आँकड़ा अनुमान है, गणना नहीं। कुछ विद्वान यह भी मानते हैं कि इब्न बतूता ने कुछ स्थानों का वर्णन सुनी-सुनाई बातों के आधार पर किया होगा (विशेषकर चीन के कुछ भाग)। कक्षा में इसे “अनुमानत:” कहकर ही प्रस्तुत कीजिए।

🔶 [अतिरिक्त तथ्य] 2.6 ‘देहली’ वास्तव में एक नहीं, कई शहर थे★

NCERT का स्रोत 8 दिल्ली को “बड़े क्षेत्र में फैला घनी जनसंख्या वाला शहर” बताता है और अट्ठाईस द्वार गिनाता है। यह विवरण तभी समझ आता है जब यह जाना जाए कि —

चौदहवीं सदी की ‘देहली’ वास्तव में कई बसे हुए नगरों का समूह थी, जिनमें प्रमुख थे —

नगरनिर्माता/काल
पुरानी देहली (क़िला राय पिथौरा/महरौली क्षेत्र)सबसे प्राचीन
सीरीअलाउद्दीन ख़लजी
★तुग़लक़ाबादग़यासुद्दीन तुग़लक़ (1321 के आसपास)
जहाँपनाहमुहम्मद बिन तुग़लक़ — जिसने इब्न बतूता को क़ाज़ी नियुक्त किया

★★यह तथ्य चित्र 5.8 (तुग़लक़ाबाद का मेहराब) को अर्थ देता है। कक्षा-प्रश्न: “अट्ठाईस द्वार वाला शहर कितना बड़ा रहा होगा? और आज दिल्ली में उनमें से कितने बचे हैं?” 🟢 [आज का संदर्भ] आज दिल्ली में इनमें से बहुत कम द्वार बचे हैं — यह परिरक्षण-पूर्वाग्रह का एक और उदाहरण है।

🔶 [अतिरिक्त तथ्य] 2.7 ‘टका’ क्या था?

NCERT कहती है — मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने नसीरुद्दीन को “एक लाख टके (मुद्रा) तथा दो सौ दास” दिए।

  • टका (तनका) दिल्ली सल्तनत का मानक चाँदी का सिक्का था
  • ★यही शब्द आज भी जीवित है — बांग्लादेश की मुद्रा ‘टका’ और भारत में प्रचलित मुहावरा “टका-सा जवाब”, “टके की बात”

🟢 [आज का संदर्भ] “सात सौ साल पुराना सिक्का आज भी एक देश की मुद्रा का नाम है।” — यह विद्यार्थियों को बहुत रोचक लगता है।

🔺 [संकल्पना-विस्तार] 2.8 नारियल की रस्सी से सिली नावें — एक विश्व-तकनीक★★

यह अध्याय का सर्वाधिक अनदेखा तकनीकी तथ्य है। स्रोत 6 में इब्न बतूता कहता है —

“लोहे की कीलों के प्रयोग के बजाय इनसे जहाज़ को सिलते हैं।”

यह क्या है? यह ‘सिली हुई नाव’ (sewn boat / stitched ship) परंपरा है — जिसमें लकड़ी के तख़्तों को कीलों से नहीं, नारियल की जटा (coir) की रस्सी से सीकर जोड़ा जाता था, और जोड़ों को प्राकृतिक राल/लेप से बंद किया जाता था।

इसके लाभ (और यही कारण है कि यह हिंद महासागर में इतनी लोकप्रिय थी):

लाभक्यों
लचीलापनतेज़ लहरों में पतवार टूटती नहीं, झुकती है
मरम्मत सरलरस्सी खोलकर तख़्ता बदला जा सकता है — दूरस्थ तट पर भी
कच्चा माल स्थानीयनारियल तटीय क्षेत्रों में सर्वत्र उपलब्ध
लोहे की बचतजहाँ लोहा महँगा या दुर्लभ था

★मार्को पोलो ने भी ऐसी नावों का उल्लेख किया था — पर उसने उन्हें असुरक्षित माना। इब्न बतूता ने उन्हें केवल दर्ज किया, निंदा नहीं की। ★★यह अंतर स्वयं अध्याय की थीसिस का प्रमाण है — दो यात्री, एक ही तकनीक, दो अलग प्रतिक्रियाएँ।

🟢 [आज का संदर्भ] यह परंपरा 2025-26 में फिर जीवित हुई है — देखिए भाग 6.1।

भाग 3 — बर्नियर : NCERT से आगे

🔶 [अतिरिक्त तथ्य] 3.1 बर्नियर का दार्शनिक प्रशिक्षण

NCERT उसे “चिकित्सक, राजनीतिक दार्शनिक तथा इतिहासकार” कहती है। पर उसका दार्शनिक प्रशिक्षण कहाँ से आया?

  • बर्नियर फ्रांसीसी दार्शनिक पिएर गासेंदी (Pierre Gassendi) का शिष्य था — जो सत्रहवीं सदी के प्रमुख प्रयोगवादी/अनुभववादी चिंतकों में थे और देकार्त (Descartes) के आलोचक माने जाते हैं
  • बर्नियर ने बाद में गासेंदी के दर्शन का संक्षेपण/प्रचार भी किया

★★इसका महत्त्व: यह बताता है कि बर्नियर के लिए प्रेक्षण (observation) केवल जिज्ञासा नहीं, एक दार्शनिक पद्धति थी। इसीलिए NCERT उसके “गहन प्रेक्षण, आलोचनात्मक अंतर्दृष्टि तथा गहन चिंतन” की प्रशंसा करती है। ! पर विडंबना यह है कि यही प्रशिक्षण उसे पूर्व-निर्धारित निष्कर्ष से नहीं बचा सका — क्योंकि उसका उद्देश्य प्रेक्षण नहीं, यूरोप को परामर्श देना था।

🔶 [अतिरिक्त तथ्य] 3.2 दानिशमंद ख़ान — केवल ‘आर्मीनियाई अमीर’ नहीं

NCERT कहती है कि बर्नियर “मुग़ल दरबार के एक आर्मीनियाई अमीर दानिशमंद ख़ान के साथ एक बुद्धिजीवी तथा वैज्ञानिक के रूप में” जुड़ा।

  • ‘दानिशमंद’ फ़ारसी शब्द है जिसका अर्थ ही है — ‘ज्ञानी’, ‘विद्वान’
  • वे यूरोपीय विज्ञान व दर्शन में गहरी रुचि रखते थे, और बर्नियर उनके लिए यूरोपीय विचारों का अनुवादक व व्याख्याता का काम करता था

★★यह तथ्य अध्याय की एक बड़ी विडंबना खोलता है: बर्नियर जिस दरबार को ‘निरंकुश’ और ‘अपविकसित’ बता रहा था, उसी दरबार का एक अमीर उससे यूरोपीय दर्शन सीख रहा था। कक्षा-सूत्र: “जिस समाज को उसने ‘जड़’ कहा, वहीं उसका संरक्षक नया ज्ञान माँग रहा था।” [उत्तर-उपयोगी] प्रश्न 8 (ग्रामीण समाज का पुनर्निर्माण) या प्रश्न 3 (शहरी केंद्र) में यह जोड़ा जा सकता है — यह उसके “निश्चेष्ट” वाले दावे का एक और खंडन है।

🔶 [अतिरिक्त तथ्य] 3.3 उसकी कृति का मूल फ्रांसीसी शीर्षक

बर्नियर की कृति का मूल फ्रांसीसी शीर्षक मुग़ल राज्यों की ‘अंतिम क्रांति’ (उत्तराधिकार-युद्ध) के इतिहास से संबंधित था — अर्थात् उसका ग्रंथ मूलत: शाहजहाँ के पुत्रों के उत्तराधिकार-संघर्ष (दारा शिकोह, औरंगज़ेब आदि) का विवरण था, जिसमें भारत का सामाजिक-आर्थिक वर्णन जुड़ा हुआ था।

★यह क्यों महत्त्वपूर्ण है? क्योंकि यह बताता है कि उसका मूल विषय राजनीति था, समाज नहीं। समाज-वर्णन उसके राजनीतिक तर्क का साधन था। ! [सावधानी] अंग्रेज़ी शीर्षक ‘ट्रैवल्स इन द मुग़ल एम्पायर’ बाद के अंग्रेज़ी संस्करणों का है। NCERT इसी नाम का प्रयोग करती है — परीक्षा में यही लिखिए।

⚖ [विद्वत्-बहस] 3.4 ‘निजी भूस्वामित्व’ की बहस — आधुनिक शोध क्या कहता है?ध्यान★★

NCERT कहती है — “एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह इंगित नहीं करता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था।” यह वाक्य आधुनिक शोध का निष्कर्ष है। उसकी पृष्ठभूमि यह है —

पक्षतर्क
यूरोपीय यात्रियों का पक्ष (17वीं सदी)राजा सारी भूमि का स्वामी; कोई निजी संपत्ति नहीं
★आधुनिक शोध का पक्षमुग़ल भारत में भूमि पर अनेक प्रकार के अधिकार साथ-साथ मौजूद थे — ज़मींदारी अधिकार, किसानों के वंशानुगत जोत-अधिकार, तथा भूमि की क्रय-विक्रय के प्रमाण भी मिलते हैं। राज्य कर लेता था, स्वामित्व नहीं रखता था

★NCERT का “राजत्व का पारिश्रमिक” (अबुल फ़ज़्ल) वाला उद्धरण इसी शोध-परंपरा से आता है। 🔺 [संकल्पना-विस्तार] मुग़ल कृषि-व्यवस्था पर मानक आधुनिक अध्ययनों में इरफ़ान हबीब की ‘द एग्रेरियन सिस्टम ऑफ़ मुग़ल इंडिया’ (प्रथम संस्करण 1963) का स्थान केंद्रीय है — इसी परंपरा के शोध ने ‘राज्य ही एकमात्र स्वामी’ की धारणा को व्यवस्थित रूप से चुनौती दी।

! [सावधानी] कक्षा में यह अवश्य कहिए: “यह कहना कि बर्नियर ग़लत था — इसका अर्थ यह नहीं कि किसानों पर अत्याचार नहीं होता था। अत्याचार होता था; पर उसका कारण ‘राजकीय भूस्वामित्व’ नहीं, बल्कि राजस्व की ऊँची माँग और स्थानीय शक्ति-संबंध थे।” ★यह भेद अत्यंत महत्त्वपूर्ण है — इसे उत्तर में लिखने पर उच्च अंक मिलते हैं।

🔺 [संकल्पना-विस्तार] 3.5 ‘प्राच्य निरंकुशवाद’ से ‘प्राच्यवाद’ तक — विचार की पूरी यात्रा

NCERT बर्नियर → मॉन्टेस्क्यू → मार्क्स तक की शृंखला देती है। इस शृंखला की एक चौथी कड़ी भी है —

क्रमकौनकालक्या कहा
1बर्नियर17वीं सदीनिजी भूस्वामित्व का अभाव → सर्वनाश
2मॉन्टेस्क्यू18वीं सदीप्राच्य निरंकुशवाद — पूर्व में शासक का निर्बाध प्रभुत्व
3कार्ल मार्क्स19वीं सदीएशियाई उत्पादन शैली — “एक निष्क्रिय प्रणाली”
4★बीसवीं सदी की आलोचना1978 के बादएडवर्ड सईद की कृति ‘ओरिएंटलिज़्म’ — यह तर्क कि ‘पूर्व’ की यह पूरी छवि स्वयं पश्चिम द्वारा गढ़ी गई थी, और वह ज्ञान तथा शक्ति के संबंध से जुड़ी थी

★★इस चौथी कड़ी को जोड़ने पर अध्याय पूरा हो जाता है: 17वीं सदी: एक यात्री ने देखा → 18वीं-19वीं सदी: सिद्धांत बना → 20वीं सदी: सिद्धांत की आलोचना हुई

! [सावधानी] यह स्नातक/स्नातकोत्तर स्तर की सामग्री है। कक्षा XII में इसे केवल एक वाक्य में रखिए: “बीसवीं सदी में विद्वानों ने यह प्रश्न उठाया कि ‘पूर्व’ की यह पूरी छवि कहीं पश्चिम की अपनी गढ़ी हुई तो नहीं थी।” 📌 शिक्षक-नोट: यह ठीक वही प्रश्न है जो भाग-1, अध्याय 4 §11.1 पूछता है — “परिचित चीज़ों के आधार पर अपरिचित चीज़ों को समझने का पैमाना तैयार करना”। NCERT ने बीज बो दिया है; यहाँ उसका पेड़ है।

भाग 4 — अन्य यात्रियों का विस्तृत परिचय (काल-रेखा को जीवंत कीजिए)

★NCERT की काल-रेखा में बारह नाम हैं, पर अधिकांश केवल नाम रह जाते हैं। यहाँ प्रत्येक का एक-पंक्ति परिचय दिया गया है — कक्षा में यह तालिका बहुत उपयोगी है।

यात्रीदेशकृति/पहचान🔶 अतिरिक्त तथ्य
मार्को पोलोइटली (वेनिस)द ट्रैवल्स ऑफ़ मार्को पोलोजेनोआ के कारागार में साथी बंदी रुस्तिकेल्लो को लिखवाया
★अब्दुर रज़्ज़ाक समरक़ंदीसमरक़ंदतैमूरी शासक का राजदूतउसकी कृति का शीर्षक ‘दो शुभ नक्षत्रों का उदय तथा दो समुद्रों का संगम’ के अर्थ का है — यह विजयनगर (अध्याय 7) का प्रमुख स्रोत है
अफ़ानासी निकितिनरूस (त्वेर)व्यापारीउसकी कृति का शीर्षक ‘तीन समुद्रों के पार यात्रा’ के अर्थ का है — रूसी साहित्य के आरंभिक यात्रा-वृत्तांतों में गिनी जाती है
दुआर्ते बरबोसापुर्तगालबुक ऑफ़ दुआर्ते बरबोसामालाबार तट के समाज व व्यापार का विस्तृत विवरण; मैगलन के विश्व-परिक्रमा अभियान से भी जुड़े रहे
सयदी अली रेइसतुर्की (ऑटोमन)नौसेनापति (एडमिरल)उनकी कृति का शीर्षक ‘देशों का दर्पण’ के अर्थ का है — वे समुद्री तूफ़ान के कारण गुजरात पहुँचे और स्थलमार्ग से वापस लौटे
अंतोनियो मानसेरेतेस्पेनजेसुइट पादरीअकबर के दरबार में रहे; उनका लैटिन विवरण अकबर-कालीन दरबार का महत्त्वपूर्ण स्रोत है
महमूद वली बलख़ीबल्ख़फ़ारसी यात्रा-वृत्तांतNCERT बताती है — “कुछ समय के लिए संन्यासी भी बन गया था”
पीटर मुंडीइंग्लैंडट्रैवल्स ऑफ़ पीटर मुंडीईस्ट इंडिया कंपनी से जुड़े; सूरत, आगरा व पटना के विवरण
★ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियरफ्रांसजौहरी; ट्रैवल्स इन इंडियाछह बार भारत आए; हीरों व रत्नों के व्यापार के अद्वितीय विवरण — चित्र 5.7 में भारतीय पोशाक में
मनूकी (निकोलाओ मनूकी)इटलीस्टोरिया दो मोगोर“कभी भी यूरोप वापस नहीं गए और भारत में ही बस गए”; तोपची व चिकित्सक के रूप में कार्य किया
फ्रांसिस्को पेलसर्टनीदरलैंड (डच)डच कंपनी का अधिकारी, आगरा मेंउनका विवरण जहाँगीर-कालीन भारत पर एक प्रमुख स्रोत है (NCERT के ‘व्यापक ग़रीबी’ बॉक्स का स्रोत)
रॉबर्टो नोबिलीइटली/पुर्तगाली मिशनजेसुइट, मदुरै में“भारतीय ग्रंथों को यूरोपीय भाषाओं में अनुवादित” किया; संस्कृत व तमिल सीखी

🔶 [अतिरिक्त तथ्य] 4.1 भारतीय यात्री जो यूरोप गए★★

NCERT का साइड-बॉक्स कहता है — “1750 के बाद, जब शेख़ इतिसमुदीन तथा मिर्ज़ा अबु तालिब जैसे भारतीयों ने यूरोप की यात्रा की…” पर वे कौन थे?

नामकबकृति
शेख़ इतिसामुद्दीनअठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में इंग्लैंड गएफ़ारसी में यात्रा-वृत्तांत — जिसका शीर्षक ‘विलायत का अद्भुत वृत्तांत’ के अर्थ का है
★मिर्ज़ा अबू तालिब ख़ानअठारहवीं सदी के अंत–उन्नीसवीं सदी के आरंभ में इंग्लैंड, आयरलैंड, फ्रांस व अन्यफ़ारसी में विस्तृत वृत्तांत (NCERT की पठन-सूची में — मुशीरुल हसन, संपा., ‘वेस्टवर्ड बाउंड’, 2005)

★★यह अध्याय के अंतिम अनुच्छेद का सीधा उत्तर है: “उपमहाद्वीप के पुरुषों (और संभवत: महिलाओं) के अनुभव और प्रेक्षण अपेक्षाकृत अज्ञात हैं…” — वे पूर्णत: अज्ञात नहीं हैं; वे कम पढ़े गए हैं। और यही अंतर महत्त्वपूर्ण है।

★कक्षा-प्रयोग (उत्कृष्ट): “अब उलटा सोचिए — एक भारतीय अठारहवीं सदी के लंदन में। उसे वहाँ क्या ‘अजीब’ लगा होगा?” विद्यार्थियों से कल्पित सूची बनवाइए — फिर बताइए कि अबू तालिब ने वास्तव में यूरोपीय खान-पान, स्त्री-पुरुष संबंध, धार्मिक व्यवहार व राजनीतिक संस्थाओं पर टिप्पणी की थी। यह गतिविधि अध्याय की पूरी थीसिस को पलटकर दिखा देती है।

भाग 5 — संकल्पनात्मक विस्तार (शिक्षक हेतु)

🔺 5.1 यात्रा-वृत्तांत को स्रोत के रूप में पढ़ने के छह प्रश्न

★यह ढाँचा किसी भी यात्रा-वृत्तांत पर लागू होता है — विद्यार्थियों को यही सिखाइए।

#प्रश्नअध्याय से उदाहरण
1लेखक कौन था? (वर्ग, धर्म, व्यवसाय)बर्नियर — दरबारी चिकित्सक व यूरोपीय बुद्धिजीवी
2वह क्यों आया?अल-बिरूनी — विवशता; इब्न बतूता — जिज्ञासा; बर्नियर — अवसर
3★उसने किसके लिए लिखा?अल-बिरूनी — सीमांत क्षेत्रों के लोग; इब्न बतूता — शासक व अरबी पाठक; बर्नियर — लुई XIV व यूरोपीय मंत्री
4★किसने लिखा/लिखवाया?रिह़ला — इब्न जुज़ई ने, राजा के आदेश पर
5वह किन लोगों के बीच रहा?तीनों — दरबार, अमीर वर्ग व विद्वान; सामान्य जन नहीं
6★उसने क्या नहीं लिखा?स्त्री-श्रम, सामान्य दैनिक जीवन, गाँव का भीतरी संगठन

★★प्रश्न 6 सबसे कठिन और सबसे महत्त्वपूर्ण है — क्योंकि ‘क्या नहीं है’ को खोजना ‘क्या है’ को पढ़ने से कठिन होता है। 🧭 भाग-1 से जोड़: यह ठीक वही ‘मौन का साक्ष्य’ है जो अध्याय 1, 3 व 4 में मिला था।

🔺 5.2 ‘अजनबी की दृष्टि’ — एक समाजशास्त्रीय अवधारणा★

समाजशास्त्र में यह एक स्थापित विचार है कि ‘अजनबी’ (stranger) की स्थिति एक विशिष्ट प्रेक्षण-स्थिति होती है — वह समूह के भीतर भी है और बाहर भी, और इसीलिए वह वह देख पाता है जो भीतर वाला नहीं देखता।

★NCERT की पहली ही पंक्तियाँ इसी विचार का व्यावहारिक रूप हैं: “पूरी तरह से भिन्न सामाजिक तथा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आने के कारण ये लेखक दैनिक गतिविधियों तथा प्रथाओं के प्रति अधिक सावधान रहते थे।”

★★पर इसका उलटा भी सत्य है (और यही अध्याय की गहराई है): अजनबी ‘देखता’ अधिक है, पर ‘समझता’ कम। वह असामान्य पकड़ लेता है, पर अर्थ चूक जाता है। कक्षा-सूत्र: “बाहर वाला ज़्यादा देखता है, अंदर वाला ज़्यादा समझता है — इतिहास को दोनों चाहिए।”

🔺 5.3 सूचना-तंत्र और राज्य-शक्ति

स्रोत 10 (डाक-व्यवस्था) और स्रोत 15 (गुप्तचर दासियाँ) को साथ पढ़ने पर एक बड़ा निष्कर्ष निकलता है —

तंत्रकार्य
उलुक व दावासूचना का तीव्र परिवहन — 50 दिन की दूरी 5 दिन में
दासियाँ (स्रोत 15)सूचना का संग्रह — अमीरों की मुख़बिरी, घरों तक पहुँच
सराय व विश्राम गृहव्यापार व आवागमन का आधारभूत ढाँचा

★★निष्कर्ष: “दिल्ली सल्तनत का राज्य केवल सेना पर नहीं, सूचना पर भी टिका था।” 🟢 [आज का संदर्भ] “आज भी कोई सरकार बिना सूचना-तंत्र के नहीं चलती — बस माध्यम बदल गए हैं।” [उत्तर-उपयोगी] प्रश्न 7 में यह जोड़ा जा सकता है — यह इब्न बतूता के वृत्तांत की प्रशासनिक-इतिहास संबंधी उपयोगिता दर्शाता है।

🔺 5.4 ‘क़ाज़ी’ का पद — इब्न बतूता की नियुक्ति क्यों संभव हुई?★

एक विदेशी को दिल्ली का न्यायाधीश कैसे नियुक्त किया जा सकता था? इसका उत्तर स्वयं NCERT में है —

  • इब्न बतूता का परिवार “इस्लामी कानून अथवा शरिया पर अपनी विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध” था
  • उसने “कम उम्र में ही शास्त्ररूढ़ शिक्षा हासिल की”

★★इसका बड़ा निहितार्थ: मध्यकाल में शरिया-विद्या एक अंतर्राष्ट्रीय योग्यता थी — मोरक्को में प्राप्त शिक्षा दिल्ली और मालद्वीप दोनों में मान्य थी। कक्षा-सूत्र: “यह चौदहवीं सदी की ‘अंतर्राष्ट्रीय डिग्री’ थी।” यह NCERT के इस कथन को ठोस रूप देता है कि “पूरा उपमहाद्वीप एक ऐसे वैश्विक संचार तंत्र का हिस्सा बन चुका था।”

भाग 6 — 🟢 ताज़ा घटनाक्रम (Recent Developments)

(1 अगस्त 2026 तक अद्यतन)

★यह भाग क्यों? इतिहास ‘ख़त्म हुई बात’ नहीं है। जिन विषयों को यह अध्याय छूता है — सिली हुई नावें, तुग़लक़ाबाद, दौलताबाद, यात्रा-वृत्तांतों का शोध — उन सब पर अभी, इसी समय काम चल रहा है। यह बात कक्षा में बताने से विद्यार्थी को इतिहास जीवित लगता है।

🌊 6.1 इब्न बतूता की ‘सिली हुई नाव’ फिर समुद्र में उतरी — INSV कौंडिन्य★★

यह इस अध्याय से जुड़ा सबसे रोमांचक समकालीन घटनाक्रम है। इसे कक्षा में अवश्य बताइए।

क्या हुआ?

भारतीय नौसेना ने संस्कृति मंत्रालय तथा एक निजी संस्था के साथ त्रिपक्षीय समझौते के अंतर्गत एक पारंपरिक ‘सिली हुई’ पाल-नौका बनवाई, जिसका नाम रखा गया — आई.एन.एस.वी. कौंडिन्य (INSV Kaundinya)।

पहलूविवरण
निर्माण-विधिलकड़ी के तख़्ते लोहे की कीलों से नहीं, नारियल की जटा (coir) की रस्सी से सीकर जोड़े गए; जोड़ प्राकृतिक राल/लेप से बंद किए गए
★प्रेरणा-स्रोतअजंता की गुफ़ाओं के चित्रों में अंकित लगभग पाँचवीं शताब्दी की नौका
कारीगरकेरल के पारंपरिक नौका-निर्माता शिल्पी
★प्रथम विदेशी यात्रा29 दिसंबर 2025 — पोरबंदर (गुजरात) से प्रस्थान
★गंतव्य व पहुँच14 जनवरी 2026 — मस्कट (ओमान), लगभग 18 दिन की यात्रा के बाद

🔗 अध्याय 5 से इसका सीधा संबंध — तीन स्तरों पर

स्तरजोड़
1. तकनीकस्रोत 6 में इब्न बतूता ठीक यही तकनीक दर्ज करता है — “लोहे की कीलों के प्रयोग के बजाय इनसे जहाज़ को सिलते हैं”। छह सौ नब्बे वर्ष बाद वही तकनीक फिर से समुद्र में है।
2. मार्गकौंडिन्य गुजरात → ओमान गई। इब्न बतूता भारत आने से पहले “ओमान” के तटीय बंदरगाहों की यात्रा कर चुका था (§2.1)। यह वही प्राचीन अरब सागर-मार्ग है।
3. साक्ष्य-प्रकारनौका अजंता के चित्र से बनी — अर्थात् दृश्य साक्ष्य से तकनीकी पुनर्निर्माण। 🧭 भाग-1, अध्याय 4 की ‘पाठ-प्रतिमा सहसंबंध’ विधि यहाँ व्यवहार में दिख रही है

★★कक्षा-प्रयोग (सर्वोत्तम): पहले स्रोत 6 पढ़वाइए — “लोहे की कीलों के प्रयोग के बजाय इनसे जहाज़ को सिलते हैं।” फिर पूछिए: “क्या यह सचमुच संभव है? क्या रस्सी से सिली नाव समुद्र पार कर सकती है?” कुछ विद्यार्थी संदेह करेंगे। तब बताइए कि जनवरी 2026 में ऐसी ही एक नाव 18 दिन में ओमान पहुँची है।

★शिक्षण-मूल्य: “आज के प्रयोग ने सात सौ साल पुराने स्रोत को सही सिद्ध कर दिया।” यह विद्यार्थी को स्रोत की विश्वसनीयता का जीवंत पाठ देता है — और इतिहास को प्रयोग-योग्य बना देता है।

📌 कौंडिन्य नाम क्यों? यह नाम भारतीय समुद्री परंपरा से जुड़ी उस स्मृति की ओर संकेत करता है जिसमें भारत से दक्षिण-पूर्व एशिया तक समुद्री संपर्क रहा — जो इब्न बतूता के ‘सुमात्रा होकर चीन’ मार्ग से भी मेल खाता है।

🏰 6.2 दौलताबाद (देवगिरि) दुर्ग — अग्निकांड और आपदा-प्रबंधन योजना

क्या हुआ?

  • अप्रैल 2025 में महाराष्ट्र के देवगिरि/दौलताबाद दुर्ग क्षेत्र में बड़ी आग लगी, जिससे दुर्ग-परिसर की वनस्पति व पारिस्थितिकी को क्षति पहुँची
  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने क्षति-आकलन, सफ़ाई अभियान तथा अग्नि-रोधी उपाय आरंभ किए — जिनमें फ़ायरलाइन बनाना और एक आपदा-प्रबंधन योजना शामिल है (नवंबर 2025 तक की रिपोर्टों के अनुसार)

🔗 अध्याय 5 से संबंध

इब्न बतूता ने दौलताबाद के विषय में लिखा था कि वह “कम नहीं था और आकार में दिल्ली को चुनौती देता था”, और वहीं तारावबाद (स्रोत 9) का संगीत-बाज़ार था।

★★कक्षा-प्रश्न (उत्कृष्ट): “जिस शहर को चौदहवीं सदी में दिल्ली की बराबरी का कहा गया, उसकी रक्षा आज हम कैसे कर रहे हैं?” 🧭 भाग-1, अध्याय 4 से जोड़: वहाँ साँची बनाम अमरावती का सबक था — “हर स्तूप का अपना इतिहास है… साथ-साथ इनकी खोज का भी इतिहास है।” संरक्षण एक चालू निर्णय है, एक बार का काम नहीं।

🧱 6.3 तुग़लक़ाबाद दुर्ग — अतिक्रमण, सुरक्षा और संरक्षण

क्या हुआ?

  • तुग़लक़ाबाद दुर्ग (ग़यासुद्दीन तुग़लक़ द्वारा लगभग 1321 में निर्मित) में अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया, न्यायालयीन निगरानी तथा सुरक्षा-कर्मियों की संख्या बढ़ाने से संबंधित घटनाक्रम हाल के वर्षों में चर्चा में रहे हैं
  • ASI द्वारा अनधिकृत प्रवेश, तोड़-फोड़ तथा आगंतुक-सुरक्षा की चुनौतियों पर कार्रवाई की जा रही है

🔗 अध्याय 5 से संबंध

चित्र 5.8 का कैप्शन ही है — “तुग़लक़ाबाद, दिल्ली का एक मेहराब”, और चित्र 5.9 “बस्ती की किलेबंदी की दीवार का एक हिस्सा”। स्रोत 8 में इब्न बतूता प्राचीर की चौड़ाई (ग्यारह हाथ), निर्माण-सामग्री (नीचे पत्थर, ऊपर ईंट) और अट्ठाईस द्वारों का विवरण देता है।

★कक्षा-प्रयोग: चित्र 5.8 व 5.9 दिखाकर कहिए — “यह वही दीवार है जिसका वर्णन आपने अभी स्रोत 8 में पढ़ा। और आज भी इसे बचाने की लड़ाई चल रही है।”

📚 6.4 शोध की दुनिया में — यात्रा-वृत्तांतों पर नया काम (2025–26)

क्षेत्रक्या हो रहा हैअध्याय से जोड़
★रिह़ला की पांडुलिपि-परंपरा2025 में विद्वानों ने रिह़ला की विभिन्न पांडुलिपियों — उनकी उत्पत्ति, आपसी भिन्नताओं और ऐतिहासिक संदर्भ — पर काम आरंभ किया है, यह समझने के लिए कि पाठ समय के साथ कैसे बदलास्रोत 3 — यदि रिह़ला श्रुतलेखन से बना और फिर हस्तलिपियों में फैला, तो हर प्रति में अंतर संभव है। यह पद्धतिगत रूप से बहुत महत्त्वपूर्ण है
अल-बिरूनी की पद्धति2025 में प्रकाशित शोध में किताब-उल-हिन्द की धर्म, जाति व संस्कृति संबंधी सामग्री तथा उसकी तुलनात्मक-धार्मिक पद्धति (अनुभवाश्रित प्रेक्षण + भाषाशास्त्रीय सटीकता + सांस्कृतिक सहानुभूति) पर बल दिया गया है§4.1–4.2 — यह NCERT के “अवरोध” वाले खंड और अपवित्रता-अस्वीकृति के तर्क को और मज़बूत करता है
भारतीय समुद्री परंपरासंस्कृति मंत्रालय व नौसेना की परियोजनाओं के अंतर्गत पारंपरिक नौका-निर्माण का पुनरुद्धार (भाग 6.1)स्रोत 6 — नारियल की रस्सी से सिली नावें

! [सावधानी] ये चालू शोध हैं, अंतिम निष्कर्ष नहीं। कक्षा में इन्हें “विद्वान इस पर काम कर रहे हैं” कहकर प्रस्तुत कीजिए, “यह सिद्ध हो गया है” कहकर नहीं।

🟢 6.5 आज के ‘यात्रा-वृत्तांत’ — कक्षा-चर्चा के लिए

★यह चर्चा अध्याय के अंत में कीजिए — यह सबसे प्रभावी समापन है।

तबआज
रिह़ला — राजा के आदेश पर श्रुतलेखनव्लॉग/यात्रा-वीडियो — दर्शक-संख्या के लिए बनाया गया
‘असाधारण’ पर बल (स्रोत 3)‘वायरल’ होने योग्य पर बल
हस्तलिपि से प्रसारइंटरनेट से तुरंत विश्वव्यापी प्रसार
पाठक — शासक व विद्वान वर्गदर्शक — कोई भी, कहीं भी
छवि-निर्माण: बर्नियर की कृति ने यूरोप की भारत-छवि गढ़ीछवि-निर्माण: आज भी कुछ वीडियो पूरे देश की छवि गढ़ देते हैं

★★चर्चा-प्रश्न (कक्षा के लिए सर्वोत्तम): “आज कोई विदेशी यात्री भारत आकर वीडियो बनाता है — वह क्या दिखाता है और क्या छोड़ देता है? क्या यह भी ‘असाधारण का चयन’ है?” “और यदि सात सौ साल बाद कोई इतिहासकार उन्हीं वीडियो से हमारा समाज समझे — तो उसे कौन-सी सावधानियाँ बरतनी होंगी?”

★यह प्रश्न अध्याय की पूरी पद्धति को विद्यार्थी के अपने समय में उतार देता है। यही सर्वोत्तम शिक्षण है।

भाग 7 — शिक्षक के लिए त्वरित संदर्भ-सूची

7.1 इस दस्तावेज़ के दस सर्वाधिक उपयोगी बिंदु

#बिंदुकहाँ
1‘अल-बिरूनी’ का अर्थ ही ‘बाहर वाला’1.1
2किताब-उल-हिन्द का अर्थ — ‘भारत के विषय में जो कहा जाता है उसका सत्यापन’1.2
3अल-बिरूनी ने पृथ्वी की त्रिज्या नापी — ‘गणित की ओर झुकाव’ का ठोस प्रमाण1.3
4रिह़ला के शीर्षक में ही ‘अजूबे’ व ‘आश्चर्य’ — स्रोत 3 का प्रमाण2.1
5★रिह़ला और मार्को पोलो — दोनों लिखवाए गए, स्वयं नहीं लिखे2.3
6‘देहली’ कई नगरों का समूह थी — 28 द्वार का अर्थ2.6
7★★सिली हुई नाव — और INSV कौंडिन्य (जनवरी 2026)2.8, 6.1
8दानिशमंद ख़ान बर्नियर से यूरोपीय दर्शन सीख रहे थे3.2
9भूस्वामित्व की बहस — ‘बर्नियर ग़लत था’ ≠ ‘अत्याचार नहीं होता था’3.4
10★भारतीय यात्री यूरोप गए — अबू तालिब व इतिसामुद्दीन4.1

7.2 कक्षा-नीति — इस दस्तावेज़ के लिएध्यान

क्रमनियम
1परीक्षा-उत्तर NCERT से ही लिखवाइए। यह सामग्री समझ के लिए है
2[उत्तर-उपयोगी] चिह्नित बिंदु ही उत्तर में जोड़े जा सकते हैं — वे भी एक-दो वाक्य में
3🔺 चिह्नित सामग्री स्नातक/स्नातकोत्तर स्तर की है — कक्षा में सरल एक वाक्य में ही लाइए
4⚖️ चिह्नित बहसों में दोनों पक्ष रखिए; निर्णय विद्यार्थी पर छोड़िए
5भाग 6 (ताज़ा घटनाक्रम) की तिथियाँ बताते समय “1 अगस्त 2026 तक की जानकारी के अनुसार” कहना उचित रहेगा

📖 संदर्भ (Sources)

ताज़ा घटनाक्रम (भाग 6) के लिए:

मूल स्रोतों व मानक अध्ययनों के लिए — NCERT की अपनी पठन-सूची (पृ. 139) देखिए, विशेषकर गिब्ब (संपा.), दि ट्रैवेल्स ऑफ़ इब्न बतूता तथा मुशीरुल हसन (संपा.), वेस्टवर्ड बाउंड: ट्रैवेल्स ऑफ़ मिर्ज़ा अबू तालिब।