अध्याय 6मूल निवासियों का विस्थापन · त्वरित पुनरावृत्ति

पाठ्यपुस्तक से आगे22 मिनट

इस फ़ाइल का उपयोग कैसे करें: यहाँ दी गई हर सामग्री पाठ्यपुस्तक से बाहर की है और वेब-स्रोतों से जाँची गई है। हर बिंदु के साथ स्रोत-लिंक दिया गया है।

बोर्ड-परीक्षा में NCERT का ही अनुसरण करें। यह सामग्री कक्षा-चर्चा, प्रोजेक्ट-कार्य, प्रश्नोत्तरी और उन विद्यार्थियों के लिए है जो आगे इतिहास पढ़ना चाहते हैं।

टैग की व्याख्या: [अतिरिक्त] = NCERT के तथ्य का विस्तार · [संशोधन] = नयी शोध ने NCERT की तिथि/तथ्य को बदला · [विवाद] = विद्वानों में मतभेद, निष्कर्ष नहीं · [भारत-सेतु] = भारत/राजस्थान से जुड़ाव · [चालू] = अभी जारी शोध या प्रक्रिया


1.[संशोधन] प्रधान सिएटल का पत्र — जो हम पढ़ते हैं वह उन्होंने नहीं लिखा

यह इस अध्याय की सबसे महत्त्वपूर्ण जानकारी है, और हर शिक्षक को यह पता होनी चाहिए।

NCERT (पृ. 145) जो पाठ छापती है — “आप आकाश को, भूमि की ऊष्मा को कैसे ख़रीद या बेच सकते हैं? … धाराओं और नदियों में बहता हुआ चमकीला पानी … हमारे पुरखों का लहू है” — वह 1854 में प्रधान सिएटल के बोले गए शब्दों की प्रतिलिपि नहीं है। इसकी तीन परतें हैं:

परतक्या हुआ
1854प्रधान सिएटल ने वाशिंगटन प्रदेश के गवर्नर आइज़क स्टीवंस की यात्रा के अवसर पर लुशूतसीड (Lushootseed) भाषा में एक भाषण दिया। उस समय का कोई शब्दशः लिखित रिकॉर्ड नहीं है।
1887डॉ. हेनरी ए. स्मिथ ने सिएटल संडे स्टार (29 अक्तूबर 1887) में एक पाठ छापा, जिसे उन्होंने 33 साल पहले लिए गए अपने अधूरे नोट्स से पुनर्निर्मित बताया। यह अलंकृत विक्टोरियन अंग्रेज़ी में है।
1972पटकथा-लेखक टेड पेरी (Ted Perry) ने Home नामक एक पर्यावरण-विषयक फ़िल्म (Southern Baptist Radio and Television Commission) के लिए एक नया पाठ लिखा, जिसमें उन्होंने आधुनिक पर्यावरणवादी भाषा को स्मिथ/एरोस्मिथ संस्करण के टुकड़ों के साथ बुन दिया। निर्माता ने पेरी का नाम नहीं दिया क्योंकि उन्हें लगा कि सीधे प्रधान सिएटल के नाम से यह अधिक प्रामाणिक लगेगा।

आज दुनिया भर में जो ‘सिएटल का पत्र’ प्रसिद्ध है — और जिसका अनुवाद NCERT में है — वह मुख्यतः 1972 का पेरी-संस्करण है। पेरी ने स्वयं बाद में बार-बार सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट किया।

यह भी ध्यान दें: 1854 का भाषण राष्ट्रपति को लिखा गया पत्र नहीं था — वह एक मौखिक भाषण था। ‘पत्र’ का रूप बाद के संस्करणों में आया।

इसे कक्षा में कैसे पढ़ाएँ (बहुत ज़रूरी):

इसे ‘झूठ पकड़ना’ न बनाएँ। तीन बातें साथ रखें —

  1. NCERT में जो है, बोर्ड-उत्तर में वही लिखें। पाठ्यपुस्तक का पाठ प्रामाणिक-रूप से उद्धृत है, बस उसका इतिहास जटिल है।
  2. भाव सच्चा है, दस्तावेज़ नहीं। भूमि को पवित्र मानने और उसे बेचने की धारणा को अजूबा समझने वाली दृष्टि मूल निवासियों की वास्तविक दृष्टि थी — यह अध्याय की बाकी सामग्री (होपी कथा, ‘उपहार बनाम माल’, दारूक लोगों का वर्णन) से पुष्ट होती है।
  3. यही इतिहासकार का काम है। एक स्रोत को उसकी परतों में खोलना — 1854 का भाषण, 1887 की स्मृति, 1972 की पटकथा। इससे बड़ा स्रोत-आलोचना का सबक़ विद्यार्थी को साल भर नहीं मिलेगा।

कक्षा-प्रश्न: अगर कोई दस्तावेज़ बाद में लिखा गया, पर उसमें व्यक्त भाव सच्चा हो — तो क्या वह इतिहास का स्रोत है? किस चीज़ का स्रोत है? (उत्तर की दिशा: वह 1854 का स्रोत नहीं, 1972 के अमरीकी पर्यावरण-आंदोलन का स्रोत है — और उस रूप में बेहद कीमती है।)

स्रोत: Wikipedia — Chief Seattle’s speech · HistoryLink.org — Chief Seattle’s Speech · Snopes fact-check · University of Washington — Texts by and about Natives

2.[संशोधन] मानव आगमन की तिथियाँ — NCERT के आँकड़े अब पुराने पड़ चुके हैं

NCERT दो तिथियाँ देती है: उत्तरी अमरीका में 30,000 वर्ष पूर्व आगमन और सबसे पुरानी मानव कृति 11,000 वर्ष पुरानी; ऑस्ट्रेलिया में 40,000 वर्ष पूर्व (साथ में सावधानी — “संभवतः उससे भी पहले”)। दोनों क्षेत्रों में पिछले दशक की खोजों ने तस्वीर बदल दी है।

2.1 ऑस्ट्रेलिया — मैज्येडबीबी (Madjedbebe)

उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के मैज्येडबीबी पुरास्थल पर हुई खुदाई और तलछट की प्रकाशीय तिथि-निर्धारण (optical dating) से पता चला कि वहाँ मानव-निवास लगभग 65,000 वर्ष पहले शुरू हुआ। वहाँ मिले औज़ारों में पीसने के पत्थर, पिसी हुई गेरू, परावर्तक पदार्थ और धार वाले कुल्हाड़ी-सिर शामिल हैं — यानी एक विकसित तकनीकी परंपरा।

[विवाद] पर यह तिथि निर्विवाद नहीं है। आनुवंशिक (DNA) अध्ययन लगातार 47,000 से 51,000 वर्ष की ओर संकेत करते रहे हैं, और हाल की कुछ शोध इन दोनों को मिलाकर लगभग 60,000 वर्ष पर पहुँचती हैं। यानी पुरातत्व और आनुवंशिकी अभी पूरी तरह सहमत नहीं हैं।

NCERT का ‘40,000 साल पहले’ अब न्यूनतम अनुमान माना जाता है। पाठ्यपुस्तक की अपनी सावधानी — “संभवतः उससे भी पहले” — बिलकुल सही थी।

2.2 अमरीका — व्हाइट सैंड्स के पदचिह्न

न्यू मेक्सिको के व्हाइट सैंड्स राष्ट्रीय उद्यान में प्राचीन झील-तल पर मिले मानव पदचिह्न लगभग 21,000–23,000 वर्ष पुराने आँके गए हैं। 2025 में एरिज़ोना विश्वविद्यालय के वैंस हॉलिडे के नेतृत्व में हुए अध्ययन ने तीसरी स्वतंत्र सामग्री (पैलियो-झील ओटेरो की प्राचीन मिट्टी) से तिथि की पुष्टि की — मिट्टी 20,700 से 22,400 वर्ष पुरानी निकली।

यह ‘क्लोविस-प्रथम’ (Clovis-first) सिद्धांत को चुनौती देता है, जिसके अनुसार मनुष्य अमरीका में लगभग 13,000 वर्ष पहले पहुँचे। NCERT की “11,000 साल पुरानी तीर की नोक” ठीक इसी क्लोविस-परंपरा की है — यानी वह सबसे पुरानी ज्ञात कृति नहीं, बल्कि एक विशेष प्रकार की सबसे पुरानी कृति है।

कक्षा-प्रयोग: पूछें कि “सबसे पुरानी मानव कृति” और “अब तक मिली सबसे पुरानी मानव कृति” में क्या अंतर है। पुरातत्व में हर तिथि अगली खुदाई तक की तिथि होती है। यही बात अध्याय 1 (मेसोपोटामिया) में भी लागू होती है।

स्रोत: Nature — Human occupation of northern Australia by 65,000 years ago · ANU — 65,000 years at Madjedbebe · ScienceDaily — 23,000-year-old footprints · Live Science — Evidence is building · National Geographic — Stunning footprints

3.[विवाद] डेनियल पॉल का दावा — ‘इरोक्वइस प्रभाव थीसिस’

NCERT पृ. 147 पर डेनियल पॉल का यह तर्क देती है कि थॉमस पाइन ने “समाज का संगठन करने के लिए इंडियन्स का इस्तेमाल एक मॉडल के तौर पर किया” और मूल निवासियों ने “यूरोपीय लोगों के लंबे लोकतंत्रोन्मुखी आंदोलन के बीज बोये थे”।

यह दावा एक जीवित अकादमिक बहस का हिस्सा है, जिसे ‘इरोक्वइस प्रभाव थीसिस’ (Iroquois Influence Thesis) कहते हैं।

पक्षस्थिति
प्रबल रूप (strong version)1970 के दशक से डोनाल्ड ग्राइंडे जूनियर और ब्रूस जोहानसन ने तर्क दिया कि इरोक्वइस संघ के ‘ग्रेट लॉ ऑफ़ पीस’ ने सीधे अमरीकी संविधान को प्रभावित किया
आधिकारिक मान्यताअक्तूबर 1988 में अमरीकी कांग्रेस ने संविधान की द्विशताब्दी पर हाउस कॉनकरंट रेज़ोल्यूशन 331 पारित किया, जिसमें कहा गया कि “तेरह मूल उपनिवेशों का एक गणराज्य में संघीकरण इरोक्वइस परिसंघ द्वारा विकसित राजनीतिक व्यवस्था से प्रभावित था” और यह कि वाशिंगटन और फ्रैंकलिन इरोक्वइस छह राष्ट्रों की अवधारणाओं की बहुत प्रशंसा करते थे
आलोचकएलिज़ाबेथ टूकर (स्वयं हाउडेनोसॉनी इतिहासकार) ने पाया कि दोनों दस्तावेज़ों में बहुत कम समानता है; स्टैनफ़ोर्ड के जैक रेकोव ने बताया कि संवैधानिक बहसों के अभिलेखों में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता
दुर्बल रूप (weaker version) — जिस पर व्यापक सहमति हैइरोक्वइस उदाहरण ने संघ और परिसंघ के बारे में औपनिवेशिक सोच में योगदान दिया, पर वह अकेला स्रोत नहीं था — मैग्ना कार्टा, अंग्रेज़ी कॉमन लॉ, डच गणराज्य और प्रबोधन (Enlightenment) का राजनीतिक चिंतन भी थे

कक्षा में कैसे प्रस्तुत करें: इसे ‘सही या ग़लत’ न बनाएँ। यह दिखाइए कि एक ही तथ्य के चार अलग-अलग दावेदार हो सकते हैं — मूल निवासी विद्वान, गैर-मूलनिवासी समर्थक, संसद, और संशयवादी इतिहासकार। और यह भी कि संसद का प्रस्ताव इतिहास का प्रमाण नहीं होता — वह राजनीतिक मान्यता होती है, जो अपने आप में एक ऐतिहासिक तथ्य है।

यह PARAKH की ‘जागरूकता’ और ‘सृजनात्मकता’ दोनों कसौटियों पर बढ़िया चर्चा-सामग्री है।

स्रोत: PBS — How the Iroquois Great Law of Peace Shaped U.S. Democracy · HowStuffWorks — Was the Great Law of Peace the source? · WorldAtlas — Great Law of Peace and the US Constitution

4.[संशोधन] राष्ट्रीय क्षमायाचना दिवस — 1998 या 1999?

NCERT (पृ. 152) लिखती है: “1999 — 1820 से 1970 के दशक के बीच ‘गुम हुए’ बच्चों से माफ़ीनामे के तौर पर ‘राष्ट्रीय क्षमायाचना दिवस’ (A National Sorry Day) (26 मई)”।

26 मई की तिथि सही है, पर वर्ष अलग है। क्रम इस प्रकार है:

तिथिघटना
26 मई 1997ब्रिंगिंग देम होम (Bringing Them Home) रिपोर्ट ऑस्ट्रेलियाई संसद में प्रस्तुत की गई — ‘गुम हुई पीढ़ियों’ (Stolen Generations) पर राष्ट्रीय जाँच का परिणाम
26 मई 1998पहला राष्ट्रीय क्षमायाचना दिवस मनाया गया — रिपोर्ट प्रस्तुत होने की पहली वर्षगाँठ पर। ‘सॉरी बुक्स’ में दस लाख से अधिक हस्ताक्षर एकत्र हुए
13 फ़रवरी 2008प्रधानमंत्री केविन रड ने ऑस्ट्रेलियाई संसद की ओर से गुम हुई पीढ़ियों से औपचारिक क्षमायाचना की

यानी 26 मई की तिथि 1997 की रिपोर्ट से आती है, और पहला दिवस 1998 में मनाया गया। NCERT का ‘1999’ संभवतः इसी क्रम में एक चूक है।

कक्षा में जोड़ें: NCERT यहीं रुक जाती है, पर कहानी 2008 तक जाती है। 1998 का ‘सॉरी डे’ नागरिकों की पहल थी; 2008 की क्षमायाचना सरकार की। दस साल का यह अंतर बताता है कि जनमत पहले बदलता है, सरकार बाद में। यही 1968 के स्टैनर व्याख्यान से 1992 के माबो फ़ैसले तक की कहानी भी है।

साथ ही यह भी बताएँ कि रिपोर्ट की अधिकांश सिफ़ारिशें आज तक लागू नहीं हुई हैं — क्षमायाचना और क्षतिपूर्ति दो अलग चीज़ें हैं।

स्रोत: Reconciliation Australia — Reconciliation Timeline · SBS News — Timeline: Indigenous rights movement · Waverley Council — Days of significance

5.[अतिरिक्त] माबो फ़ैसले की बारीकियाँ

NCERT बस इतना कहती है कि 1992 में हाई कोर्ट ने टेरा न्यूलिअस को अवैध घोषित किया। कुछ विवरण जोड़ने लायक हैं:

तथ्यविवरण
पूरा नामMabo v Queensland (No. 2), 3 जून 1992
निर्णयसात में से छह न्यायाधीशों ने माना कि मेरी (Meriam) लोग मेर (Mer) द्वीप की पारंपरिक भूमि के स्वामी हैं
वादीएडी कोइकी माबो — टॉरस स्ट्रेट टापूवासी, जिनका मुक़दमा दस वर्ष चला और जिनकी फ़ैसले से पाँच महीने पहले मृत्यु हो गई
परिणामनेटिव टाइटल एक्ट 1993 — जिसने पूरे ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के लिए मूल-स्वत्व (native title) का दावा करने का ढाँचा बनाया

यह ध्यान दिलाना ज़रूरी है: माबो केस का वादी टॉरस स्ट्रेट टापूवासी था — वही समूह जिसके बारे में NCERT (पृ. 148) कहती है कि “‘ऐबॉरिजिनी’ शब्द इनके लिए इस्तेमाल नहीं होता”। यानी ऑस्ट्रेलिया के भूमि-अधिकार के इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ उस समूह से आया जिसे मुख्यधारा की शब्दावली अलग गिनती थी।

स्रोत: National Museum of Australia — Mabo decision · AIATSIS — Overturning the doctrine of terra nullius · Parliamentary Education Office — Mabo decision

6.[भारत-सेतु] ‘श्वेत ऑस्ट्रेलिया’ और भारतीय — यह अध्याय भारत का भी अध्याय है

NCERT (पृ. 150) कहती है कि 1974 तक ऑस्ट्रेलिया में यह भय था कि “दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के ‘गहरी रंगत वाले’ लोग बड़ी तादाद में ऑस्ट्रेलिया आ सकते हैं”, और इसीलिए ‘ग़ैर-गोरों’ को बाहर रखने की नीति अपनाई गई।

‘दक्षिण एशिया’ यानी भारत। यह वाक्य भारतीय विद्यार्थी के लिए सीधा है, और इसका ठोस तंत्र जानने लायक है:

तथ्यविवरण
कानूनइमिग्रेशन रेस्ट्रिक्शन एक्ट, 1901 — ऑस्ट्रेलियाई संघ बनने के उसी वर्ष पारित; यही ‘श्वेत ऑस्ट्रेलिया नीति’ का आधार बना
तरीक़ाधारा 3(अ) — ‘निषिद्ध आप्रवासी’ वह है जो किसी यूरोपीय भाषा में 50 शब्दों का श्रुतलेख (dictation test) न लिख सके
चालाकीभाषा का चुनाव आप्रवास अधिकारी के विवेक पर था — यानी अधिकारी किसी भी अवांछित व्यक्ति को ऐसी भाषा दे सकता था जो वह जानता ही न हो। इस तरह क़ानून में ‘नस्ल’ शब्द लिखे बिना नस्ली छँटनी की जा सकती थी
अंतश्रुतलेख परीक्षा 1958 में समाप्त; ‘ग़ैर-ब्रिटिश प्रवासियों को विदेशी (alien) के रूप में पंजीकृत करने’ जैसे प्रावधान 1970 के दशक की शुरुआत तक चले; रेशियल डिस्क्रिमिनेशन एक्ट 1975 ने अंतिम अवशेष हटाए

कक्षा-चर्चा का सबसे अच्छा प्रश्न: अगर क़ानून में कहीं ‘नस्ल’ शब्द नहीं लिखा, तो क्या वह नस्लवादी नहीं है?

यह प्रश्न विद्यार्थी को परोक्ष भेदभाव (indirect discrimination) की अवधारणा तक ले जाता है — और वहाँ से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 तक, जहाँ भेदभाव को उसके प्रभाव से पहचाना जाता है, केवल शब्दों से नहीं।

यह भी जोड़ें: कालक्रम चार (पृ. 130) में दर्ज है कि 1906 में महात्मा गांधी ने नस्लवादी क़ानूनों के खिलाफ़ सत्याग्रह की वकालत की — यह दक्षिण अफ़्रीका में हुआ, जो स्वयं एक आबादकार उपनिवेश था (जहाँ ‘सेटलर’ डच के लिए इस्तेमाल होता था, पृ. 136)। यानी सत्याग्रह का जन्म ठीक उसी किस्म के उपनिवेश में हुआ जिसका अध्ययन यह अध्याय करता है।

स्रोत: National Archives of Australia — Immigration Restriction Act 1901 · NAA — Immigration Restriction Act and the White Australia policy · National Museum of Australia — White Australia policy

7.[अतिरिक्त] 1967 का जनमत-संग्रह — क्रियाकलाप 4 का असली उत्तर

NCERT का क्रियाकलाप 4 पूछता है कि 1911 में नयी दिल्ली और कैनबरा को राजधानी बनाने की घोषणा के समय भारत और ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की राजनीतिक स्थितियों की तुलना और विषमता क्या थी। इसका उत्तर देने के लिए एक तथ्य चाहिए जो पाठ्यपुस्तक में नहीं है:

ऑस्ट्रेलियाई संविधान (1901) की धारा 127 यह कहती थी कि जनगणना में आदिवासी लोगों की गिनती नहीं की जाएगी।

  • 1967 के जनमत-संग्रह में लगभग 90% ऑस्ट्रेलियाई मतदाताओं ने धारा 127 हटाने और धारा 51 में संशोधन के पक्ष में मत दिया
  • इससे संघीय सरकार को आदिवासी लोगों के लिए क़ानून बनाने का अधिकार मिला और उन्हें जनगणना में शामिल किया गया

अब क्रियाकलाप 4 का उत्तर स्पष्ट है:

1911 में भारत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 26 वर्ष पुरानी थी, 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधार से सीमित प्रतिनिधित्व शुरू हो चुका था — यानी भारतीय ‘प्रजा’ थे, पर गिने जाते थे और उनकी आवाज़ का एक सीमित मंच था।

उसी 1911 में ऑस्ट्रेलिया में मूल निवासी संविधान द्वारा जनगणना से ही बाहर थे — यानी वे प्रजा भी नहीं, आँकड़े में अनुपस्थित थे।

यही उपनिवेशवाद की ‘दूसरी किस्म’ और ‘पहली किस्म’ का ठोस अंतर है (खंड-परिचय, पृ. 125)। जहाँ यूरोपीय बसे नहीं, वहाँ शासन करने के लिए स्थानीय आबादी को गिनना ज़रूरी था; जहाँ वे बस गए, वहाँ स्थानीय आबादी को मिटा देना सुविधाजनक था।

स्रोत: Racism. No Way! — Timeline 1900s · Constitutional Critique — Indigenous recognition and constitutional myths

8.[अतिरिक्त][चालू] ‘खोज का सिद्धांत’ और वेटिकन की 2023 की अस्वीकृति

NCERT बार-बार ‘खोज’ शब्द को उद्धरण-चिह्नों में रखती है, पर यह नहीं बताती कि ‘खोज’ एक क़ानूनी सिद्धांत भी था।

‘डॉक्ट्रिन ऑफ़ डिस्कवरी’ (खोज का सिद्धांत) — 15वीं सदी के कुछ पोप-आदेशों (papal bulls) पर आधारित वह धार्मिक-क़ानूनी अवधारणा, जिसका उपयोग यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों ने अफ़्रीका और अमरीका में मूल निवासियों की भूमि पर कब्ज़े और दोहन को वैध ठहराने के लिए किया। टेरा न्यूलिअस इसी परिवार की अवधारणा है।

तिथिघटना
2015कनाडा के सत्य एवं सुलह आयोग (Truth and Reconciliation Commission) ने अपनी रिपोर्ट में चर्च और कनाडाई सरकार दोनों से इस सिद्धांत को अस्वीकार करने की माँग की
जुलाई 2022पोप फ़्रांसिस की कनाडा यात्रा — आवासीय विद्यालयों (residential schools) में कैथलिक चर्च की भूमिका के लिए क्षमायाचना; इसी दौरान सिद्धांत को औपचारिक रूप से रद्द करने की माँगें उठीं
मार्च 2023वेटिकन ने औपचारिक रूप से ‘खोज के सिद्धांत’ को अस्वीकार किया — यह कहते हुए कि वे आदेश “एक विशिष्ट ऐतिहासिक काल में लिखे गए थे” और “मूल निवासियों की समान गरिमा और अधिकारों को पर्याप्त रूप से नहीं दर्शाते थे”

[विवाद] पर एक बारीकी: वेटिकन के अनुसार सिद्धांत को अस्वीकार करना और उन पोप-आदेशों को रद्द करना दो अलग बातें हैं — आदेश औपचारिक रूप से रद्द नहीं किए गए। कई मूल निवासी संगठन इसे अधूरा मानते हैं। यह प्रक्रिया अभी जारी है।

इसे अध्याय से जोड़ें: NCERT का माबो-फ़ैसला (1992) टेरा न्यूलिअस को गिराता है; वेटिकन का 2023 का वक्तव्य उसी परिवार की धार्मिक जड़ को छूता है। यानी ‘खोज’ शब्द को उद्धरण-चिह्नों में डालने की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है — वह हमारे अपने समय की घटना है।

स्रोत: National Catholic Reporter — Vatican formally repudiates Doctrine of Discovery · Al Jazeera — Vatican rejects Doctrine of Discovery · PBS NewsHour · Library of Congress Law Blog — Doctrine of Discovery

9.[अतिरिक्त] कालक्रम चार से चार तथ्य जो कक्षा में जान डाल देंगे

पाठ्यपुस्तक की कालरेखा में कुछ प्रविष्टियाँ बिना व्याख्या के गुज़र जाती हैं। इन्हें खोलने पर वे अध्याय के केंद्रीय विषय से जुड़ जाती हैं:

(क) दास-व्यापार में ‘दो तिहाई’ (पृ. 129): कालक्रम कहता है कि 1770 के दशक में लाखों अफ़्रीकियों को हर साल अटलांटिक पार भेजा जाता था, “जिनमें दो तिहाई समुद्री यात्रा के दौरान मर जाते थे”। यह इसी अध्याय के पृ. 143 से जुड़ता है — दक्षिणी बाग़ानों की गर्म जलवायु और मूल निवासी दासों की मृत्यु-दर के कारण अफ़्रीका से दास ख़रीदे गए। यानी मूल निवासियों की मौत और अफ़्रीकी दासता एक ही आर्थिक शृंखला की दो कड़ियाँ हैं।

(ख) लाइबेरिया, 1822 (पृ. 129): “स्वतंत्र दासों का देश” — यह अमरीका से मुक्त हुए अफ़्रीकी मूल के लोगों को वापस अफ़्रीका बसाने की परियोजना थी। प्रश्न उठाइए: अगर दासता खत्म हो रही थी, तो मुक्त लोगों को वापस भेजने की ज़रूरत क्यों पड़ी?

(ग) पश्चिम समोआ, 1918 (पृ. 133): “पश्चिम समोआ की एक बटा पाँच जनसंख्या इन्फ़्लूएंज़ा से समाप्त हो गई” — यह ठीक वही तंत्र है जिसे पृ. 150 “कीटाणुओं के असर” कहती है, और जिससे ऑस्ट्रेलिया में 90 फ़ीसदी मूल बाशिंदों की मृत्यु हुई। 20वीं सदी में भी।

(घ) वेटंगी की संधि, 1840 (पृ. 133): “ब्रिटिश और माओरिस ने न्यूज़ीलैंड में वेटंगी की संधि पर हस्ताक्षर किए; इसके बाद माओरिस लोगों ने अनेक विद्रोह किए (1844–88)” — यही वह समझौता-पत्र है जिसका ऑस्ट्रेलिया में अभाव पृ. 151 पर रेखांकित किया गया है। संधि होने पर भी विद्रोह हुए — यानी समझौता होना और उसका पालन होना अलग बातें हैं।

10.[भारत-सेतु] भारतीय संदर्भ में सोचने के तीन सूत्र

सावधानी: ये तुलनाएँ सोचने के औज़ार हैं, समीकरण नहीं। भारतीय जनजातीय समुदायों का इतिहास अमरीकी या ऑस्ट्रेलियाई मूल निवासियों से बहुत भिन्न है — यहाँ आबादकार-उपनिवेश नहीं बना, और जनजातीय समुदाय आज भी बड़ी संख्या में हैं। कक्षा में यह अंतर स्पष्ट किए बिना तुलना न कराएँ।

(क) ‘भूमि पर मिल्कियत’ की धारणा। अध्याय बताता है कि मूल निवासी ज़मीन पर ‘मालिकाना हक़’ की ज़रूरत महसूस नहीं करते थे, और यही उन्हें जैफ़र्सन की निगाह में ‘असभ्य’ बनाता था। भारत में औपनिवेशिक भू-राजस्व बंदोबस्तों (स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी, महलवाड़ी) ने भी सामुदायिक और प्रथागत अधिकारों को व्यक्तिगत, हस्तांतरणीय स्वामित्व में बदला। अवधारणात्मक समानता है, तंत्र भिन्न है।

(ख) ‘धरती को पढ़ना’। राजस्थान के संदर्भ में यह विशेष रूप से जीवंत है — जल-संचयन की परंपरागत प्रणालियाँ (खड़ीन, टाँका, जोहड़, नाड़ी) ठीक उसी तरह का अलिखित पारिस्थितिक ज्ञान हैं जिसे अध्याय “धरती को पढ़ सकते थे” कहता है। दोनों जगह यह ज्ञान लिखित न होने के कारण औपनिवेशिक दस्तावेज़ों में ‘अवैज्ञानिक’ दर्ज हुआ।

(ग) ‘जानवर बदला लेंगे’ और खेजड़ली। मूल निवासियों का यह भय कि ऊदबिलावों के विध्वंस का बदला जानवर लेंगे, एक पारिस्थितिक नैतिकता की अभिव्यक्ति है। राजस्थान में 1730 की खेजड़ली घटना — जहाँ अमृता देवी सहित बिश्नोई समुदाय के लोगों ने खेजड़ी के पेड़ बचाने के लिए प्राण दिए — उसी वर्ग की नैतिकता है। कालक्रम चार 1720–30 के दशक से ही शुरू होता है — यानी यह घटना ठीक उसी दशक की है जिससे यह कालरेखा आरंभ होती है।

प्रोजेक्ट-सुझाव: विद्यार्थियों से कहें कि वे अपने ज़िले की एक स्थानीय पारिस्थितिक परंपरा (जल-स्रोत, ओरण/देवबनी, वृक्ष-संरक्षण) पर आधे पृष्ठ का विवरण लिखें और बताएँ कि वह ज्ञान कहाँ दर्ज है — किताब में, या केवल लोगों की स्मृति और व्यवहार में। फिर पूछें: जो ज्ञान लिखा नहीं गया, उसका इतिहास कैसे लिखा जाए? यह अध्याय का ही केंद्रीय प्रश्न है।

11. आगे पढ़ने के लिए (विद्यार्थियों हेतु)

पुस्तक/स्रोतविषय
हेनरी रेनॉल्ड्स — Why Weren’t We Told?NCERT में उल्लिखित; ऑस्ट्रेलियाई इतिहास-लेखन की आत्म-आलोचना
डेनियल एन. पॉल — We Were Not the SavagesNCERT पृ. 147 का स्रोत; मिकमॉक (Mi’kmaq) दृष्टिकोण से कनाडा का इतिहास
ऊडगेरू नूनुक्कल की कविताएँऑस्ट्रेलिया की पहली प्रकाशित आदिवासी कवयित्री; NCERT में उनके नाम कविता है
National Museum of Australia — Defining Moments (लिंक)माबो, श्वेत ऑस्ट्रेलिया नीति आदि पर संक्षिप्त, विश्वसनीय पृष्ठ
National Museum of the American Indian (स्मिथसोनियन)NCERT पृ. 135 में उल्लिखित वही संग्रहालय, जो मूल निवासियों की देख-रेख में बना
AIATSIS (ऑस्ट्रेलिया) (लिंक)आदिवासी एवं टॉरस स्ट्रेट टापूवासी अध्ययन का राष्ट्रीय संस्थान