डीप डाइव
ISRO और उसके रॉकेट
थुम्बा से 1963 में उड़े पहले रॉकेट से लेकर 30 अक्टूबर 2026 की रात उड़े GSLV-F18 तक: ISRO के रॉकेट कैसे बने, कैसे उड़ते हैं, और उपग्रहों को किस कक्षा में पहुँचाते हैं। हर टॉपिक में कुछ चलाकर देखिए।

इस डीप डाइव के बड़े सवाल
- रॉकेट हवा के बिना अंतरिक्ष में कैसे चलता है, और उसमें कई चरण क्यों होते हैं?
- PSLV, GSLV और LVM3 में क्या फ़र्क़ है?
- GSLV-F18 की उड़ान में एक-एक करके क्या हुआ, और NVS-03 आगे क्या करेगा?
- NavIC जगह कैसे बताता है, और उसे कम से कम चार उपग्रह क्यों चाहिए?
- भारत के बड़े रॉकेट श्रीहरिकोटा से ही क्यों उड़ते हैं?
आपकी प्रगति सिर्फ़ इसी ब्राउज़र में रहती है। कहीं भेजी नहीं जाती।
1शुरुआत: थुम्बा से SLV-3 तक
1962: INCOSPAR से शुरुआत
1962 में परमाणु ऊर्जा विभाग (Department of Atomic Energy) के अधीन INCOSPAR नाम की समिति बनी। ISRO की कहानी यहीं से शुरू होती है।
1963: थुम्बा से पहला रॉकेट
21 नवंबर 1963 को थुम्बा के रॉकेट केंद्र (TERLS) से पहला रॉकेट उड़ा। यह नाइकी-अपाची (Nike-Apache) था, दो चरणों वाला एक साउंडिंग रॉकेट (sounding rocket), यानी ऐसा रॉकेट जो ऊपर जाकर माप लेता है और फिर नीचे आ जाता है, कक्षा में नहीं जाता।
1969: ISRO बना
15 अगस्त 1969 को INCOSPAR की जगह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) बना। जून 1972 में अंतरिक्ष आयोग (Space Commission) और अंतरिक्ष विभाग (Department of Space) बने, और सितंबर 1972 में ISRO इस विभाग के अधीन आ गया।
1975: पहला उपग्रह आर्यभट
भारत का पहला उपग्रह आर्यभट (Aryabhata) 19 अप्रैल 1975 को सोवियत संघ (USSR) के रॉकेट से अंतरिक्ष में गया। इसका वज़न 360 kg था। उपग्रह भारत का था, पर रॉकेट दूसरे देश का।
श्रीहरिकोटा का केंद्र
रॉकेट छोड़ने के केंद्र के लिए 1969 में आंध्र प्रदेश का श्रीहरिकोटा द्वीप चुना गया। 9 अक्टूबर 1971 को वहाँ से रोहिणी-125 नाम का साउंडिंग रॉकेट उड़ा और केंद्र काम करने लगा। 5 सितंबर 2002 को इसका नाम ISRO के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सतीश धवन के नाम पर सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र SHAR (SDSC SHAR) रखा गया।
1980: SLV-3 ने रोहिणी को कक्षा में पहुँचाया
अपना रॉकेट बनाने की पहली कोशिश SLV-3 थी। अगस्त 1979 की इसकी पहली उड़ान पूरी तरह सफल नहीं रही। 18 जुलाई 1980 को SLV-3 ने श्रीहरिकोटा से रोहिणी (RS-1) उपग्रह कक्षा में पहुँचा दिया, और भारत अंतरिक्ष तक पहुँच रखने वाले देशों (space-faring nations) के ख़ास समूह का छठा सदस्य बन गया। SLV-3 परियोजना के निदेशक (Project Director) डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम थे।
| कब | क्या हुआ |
|---|---|
| 1962 | परमाणु ऊर्जा विभाग के अधीन INCOSPAR बनी |
| 21 नवंबर 1963 | थुम्बा से पहला रॉकेट, नाइकी-अपाची |
| 1969 | श्रीहरिकोटा को रॉकेट केंद्र के लिए चुना गया |
| 15 अगस्त 1969 | ISRO बना |
| 9 अक्टूबर 1971 | श्रीहरिकोटा से पहला रॉकेट, रोहिणी-125 |
| जून 1972 | अंतरिक्ष आयोग और अंतरिक्ष विभाग बने (सितंबर 1972 में ISRO इस विभाग के अधीन) |
| 19 अप्रैल 1975 | पहला भारतीय उपग्रह आर्यभट, सोवियत संघ के रॉकेट से |
| 18 जुलाई 1980 | SLV-3 ने रोहिणी (RS-1) उपग्रह कक्षा में पहुँचाया |
| 20 सितंबर 1993 | PSLV की पहली उड़ान (सफल नहीं); पहली सफल उड़ान अक्टूबर 1994 में |
| 18 अप्रैल 2001 | GSLV की पहली उड़ान |
| 5 सितंबर 2002 | श्रीहरिकोटा केंद्र का नाम सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र SHAR |
| 22 अक्टूबर 2008 | चंद्रयान-1, PSLV-C11 से |
| 5 जनवरी 2014 | GSLV-D5: भारत में बने क्रायोजेनिक चरण के साथ GSLV की सफल उड़ान |
| 24 सितंबर 2014 | मंगलयान (Mars Orbiter Mission) मंगल की कक्षा में |
| 15 फ़रवरी 2017 | PSLV-C37: एक उड़ान में 104 उपग्रह |
| 5 जून 2017 | LVM3 की पहली कक्षीय उड़ान (LVM3-D1, GSAT-19) |
| 23 अगस्त 2023 | चंद्रयान-3 चाँद पर धीरे से उतरा (soft landing) |
| 16 जनवरी 2025 | SpaDeX: अंतरिक्ष में दो यानों की डॉकिंग |
| 30 अक्टूबर 2026 | GSLV-F18 ने NVS-03 को GTO में पहुँचाया |
सोचिए
आर्यभट 1975 में दूसरे देश के रॉकेट से गया, पर 1980 में भारत ने अपने रॉकेट से उपग्रह भेजा। अपना रॉकेट होना इतना ज़रूरी क्यों है?
जवाब देखिए
जिसके पास अपना रॉकेट है, वह अपने उपग्रह अपनी ज़रूरत और अपने समय पर भेज सकता है; उसे किसी दूसरे देश की हाँ का इंतज़ार नहीं करना पड़ता। इसीलिए 18 जुलाई 1980 की SLV-3 उड़ान भारत के लिए बड़ा पड़ाव है। आगे क्रायोजेनिक इंजन की कहानी में यही बात फिर दिखेगी।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1ISRO कब बना?
1962 में परमाणु ऊर्जा विभाग के अधीन INCOSPAR बनी थी। 15 अगस्त 1969 को उसकी जगह ISRO बना। 1975 में आर्यभट उपग्रह गया।
2भारत का पहला उपग्रह आर्यभट किस रॉकेट से अंतरिक्ष में गया?
आर्यभट 19 अप्रैल 1975 को सोवियत संघ के रॉकेट से गया। भारत के अपने रॉकेट SLV-3 ने 18 जुलाई 1980 को रोहिणी उपग्रह कक्षा में पहुँचाया।
3SLV-3 परियोजना के निदेशक कौन थे?
डॉ. कलाम SLV-3 के परियोजना निदेशक थे। प्रो. सतीश धवन ISRO के अध्यक्ष रहे; 2002 में श्रीहरिकोटा केंद्र का नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया।
2रॉकेट उड़ता कैसे है?
गुब्बारे से समझिए: प्रणोद
एक गुब्बारा फुलाकर छोड़िए: हवा पीछे निकलती है और गुब्बारा आगे भागता है। रॉकेट भी यही करता है। इंजन में ईंधन जलकर बहुत गर्म गैस बनती है, जो तेज़ी से नीचे की ओर निकलती है; बदले में रॉकेट ऊपर धकेला जाता है। यह न्यूटन का तीसरा नियम है: हर क्रिया की बराबर और उलटी प्रतिक्रिया होती है। इस धक्के को प्रणोद (thrust) कहते हैं।
हवा के बिना भी चलता है
रॉकेट को धकेलने के लिए बाहर की हवा नहीं चाहिए। गैस रॉकेट ख़ुद पीछे फेंकता है, इसलिए वह निर्वात (vacuum) में भी चलता है। ईंधन जलाने के लिए ज़रूरी ऑक्सीकारक (oxidiser) भी वह अपने साथ ले जाता है। ईंधन और ऑक्सीकारक को मिलाकर नोदक (propellant) कहते हैं।
कक्षा में टिकने की चाल
सिर्फ़ ऊपर जाना काफ़ी नहीं। कक्षा में टिके रहने के लिए उपग्रह को पृथ्वी के चारों ओर बग़ल की दिशा में बहुत तेज़ दौड़ना पड़ता है। 200 से 400 km ऊँचाई पर यह कक्षीय चाल (orbital speed) लगभग 7.8 km हर सेकंड है, यानी लगभग 28,000 km प्रति घंटा। इतनी तेज़ी से वह गिरता तो रहता है, पर पृथ्वी की गोलाई के साथ-साथ, इसलिए ज़मीन तक नहीं पहुँचता।
रॉकेट में चरण क्यों होते हैं
रॉकेट का ज़्यादातर वज़न उसका नोदक होता है। नोदक जलता जाता है तो ख़ाली टंकियाँ बेकार बोझ बन जाती हैं। इसलिए रॉकेट कई चरणों (stages) में बनता है: एक चरण का नोदक ख़त्म हुआ, तो उसकी ख़ाली टंकी और इंजन अलग होकर गिर जाते हैं, और बचा हुआ, हल्का रॉकेट आगे बढ़ता है।
रॉकेट समीकरण
हर चरण कितनी चाल जोड़ेगा, यह त्सियोल्कोव्स्की (Tsiolkovsky) के रॉकेट समीकरण से निकलता है: Δv = ve × ln(m0 / mf)। यहाँ ve निकलती गैस की चाल है, m0 चरण जलने से पहले का कुल द्रव्यमान और mf जलने के बाद का। जितना ज़्यादा बोझ गिरेगा, mf उतना छोटा और चाल उतनी ज़्यादा।
चलाइएखिलौना रॉकेट के चरण: 3D चित्र
मान लीजिए रॉकेट 100 टन का है, ऊपर 1 टन का उपग्रह है, और गैस 3 km/s से निकलती है। ये खिलौने के आँकड़े हैं, किसी असली रॉकेट के नहीं। एक, दो या तीन चरण चुनिए, नोदक का हिस्सा बदलिए और "चलाइए" दबाइए: ख़ाली चरण एक-एक करके गिरते हैं। असली रॉकेट को हवा के घर्षण और पृथ्वी के खिंचाव (gravity) से भी लड़ना पड़ता है, इसलिए असल ज़रूरत 7.8 km/s से काफ़ी ज़्यादा होती है।
3D figure: Colorfigures (April Zhu), MIT licence.
तीन तरह के नोदक
ठोस (solid)
HTPB नाम का ठोस नोदक। GSLV का S139 कोर, LVM3 के दोनों S200 बूस्टर, PSLV का तीसरा चरण (PS3) और SSLV के तीनों ठोस चरण इसी से चलते हैं।
द्रव (liquid)
ऐसे द्रव जिन्हें साधारण तापमान पर टंकी में रखा जा सकता है। GSLV के चारों L40H स्ट्रैप-ऑन और दूसरा चरण GS2 (विकास इंजन) UH25 ईंधन और N2O4 ऑक्सीकारक से चलते हैं। PSLV का दूसरा चरण (PS2, विकास इंजन) UDMH + N2O4 लेता है, और चौथा चरण (PS4) MMH + MON।
क्रायोजेनिक (cryogenic)
द्रव हाइड्रोजन (LH2) और द्रव ऑक्सीजन (LOX)। हाइड्रोजन −253 °C पर और ऑक्सीजन −183 °C पर उबलती है, इसलिए टंकियों को बहुत ठंडा और अच्छी तरह ढका रखना पड़ता है। हाइड्रोजन बहुत हल्की है, इसलिए उसकी टंकी बड़ी होती है। इन तीनों में यह हर किलो नोदक पर सबसे ज़्यादा धक्का देता है, पर बनाना और सँभालना सबसे कठिन है। GSLV का ऊपरी चरण (CUS) और LVM3 का C25 चरण क्रायोजेनिक हैं।
सोचिए
खिलौना रॉकेट में चरण बढ़ाने से चाल बढ़ी। तो क्यों न दस चरण बना दें?
जवाब देखिए
हर नया चरण चाल थोड़ी ही और बढ़ाता है; फ़ायदा घटता जाता है। साथ में हर चरण के लिए अलग इंजन, जोड़ और अलग करने का तंत्र चाहिए, जो ख़ुद वज़न है, और हर अलगाव एक और जगह है जहाँ कुछ गड़बड़ हो सकती है। इसीलिए ISRO के रॉकेटों में तीन से पाँच चरण हैं (अगला टॉपिक देखिए)।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1रॉकेट अंतरिक्ष के निर्वात में भी कैसे चल पाता है?
यह न्यूटन का तीसरा नियम है। धकेलने के लिए बाहर की हवा नहीं चाहिए, और ऑक्सीकारक भी रॉकेट साथ ले जाता है।
2200 से 400 km ऊँचाई पर कक्षा में टिकने के लिए लगभग कितनी चाल चाहिए?
लगभग 7.8 km हर सेकंड, यानी लगभग 28,000 km प्रति घंटा।
3रॉकेट कई चरणों में क्यों बनाए जाते हैं?
ख़ाली टंकी बेकार बोझ है। उसे गिराने से mf छोटा होता है और अगला चरण ज़्यादा चाल जोड़ पाता है।
3ISRO का रॉकेट परिवार
एक पैमाने पर छह रॉकेट
नीचे ISRO के छह रॉकेट एक ही पैमाने पर खड़े हैं, पास में 1.7 मीटर का एक आदमी है। किसी रॉकेट को चुनिए: उसका पूरा परिचय नीचे आ जाएगा। नीचे की पट्टियाँ उड़ान के समय का द्रव्यमान (lift-off mass) दिखाती हैं, क्योंकि सिर्फ़ ऊँचाई देखकर ताक़त का अंदाज़ा नहीं होता।
SLV-3 और ASLV
SLV-3 और ASLV छोटे रॉकेट थे, जिनके सारे चरण ठोस नोदक वाले थे। ASLV की चार उड़ानों में 1987 और 1988 वाली सफल नहीं हुईं; 1992 और मई 1994 वाली सफल रहीं।
PSLV: चार चरण, कई रूप
PSLV चार चरणों वाला रॉकेट है: ठोस, द्रव, ठोस, द्रव। ज़रूरत के हिसाब से इसके अलग रूप हैं: XL में 6 स्ट्रैप-ऑन, QL में 4, DL में 2, और CA में एक भी नहीं। PSLV ने चंद्रयान-1, मंगलयान, आदित्य-L1 और एक उड़ान में 104 उपग्रह भेजे। PSLV-C62 (12 जनवरी 2026) तक इसकी 64 उड़ानें हुईं। 1993 (PSLV-D1), 31 अगस्त 2017 (PSLV-C39) और 18 मई 2025 (PSLV-C61) की उड़ानें सफल नहीं रहीं। PSLV-C62 में तीसरे चरण (PS3) के आख़िर में गड़बड़ी (anomaly) आई। फ़रवरी 2026 में एक राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति इसकी वजह की जाँच कर रही थी।
GSLV, LVM3 और SSLV
GSLV भू-तुल्यकाली स्थानांतरण कक्षा (GTO) तक 2,250 kg ले जा सकता है। इसकी 20 उड़ानें GSLV-F18 तक हुई हैं; 2006 (F02), 2010 (D3 और F06) और 2021 (F10) की उड़ानें सफल नहीं रहीं। LVM3 सबसे भारी है: दो बड़े ठोस S200 बूस्टर, बीच में द्रव L110 चरण (दो विकास इंजन) और ऊपर क्रायोजेनिक C25। LVM3-M6 (24 दिसंबर 2025) तक इसकी 9 उड़ानें हुईं और कोई भी असफल दर्ज नहीं है। SSLV इनमें सबसे नया है (पहली उड़ान 7 अगस्त 2022); यह लगभग 500 kg का उपग्रह 500 km की कक्षा तक ले जाता है।
आगे की योजना: NGLV
आगे की योजना: अगली पीढ़ी के रॉकेट NGLV (Next Generation Launch Vehicle) के विकास को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सितंबर 2024 में मंज़ूरी दी। लक्ष्य है निम्न कक्षा (LEO) तक 30 टन तक ले जाना, और इसका पहला चरण दोबारा इस्तेमाल हो सके (reusable)। योजना में तीन विकास उड़ानें, 96 महीने और 8,240 करोड़ रुपये हैं। NGLV अभी बना नहीं है, इसलिए यहाँ उसे नहीं खींचा है।
चलाइएछह रॉकेट, एक पैमाना: 3D चित्र
ऊँचाई पैमाने पर है (खंभे का हर निशान 10 m, साथ में 1.7 m का आदमी); चौड़ाई सिर्फ़ अंदाज़े से खींची है। ज़मीन पर पट्टियाँ उड़ान के समय का द्रव्यमान दिखाती हैं। रॉकेट का बटन दबाइए; उँगली या माउस से खींचकर घुमाइए।
3D figure: Colorfigures (April Zhu), MIT licence.
सोचिए
GSLV इन छह में सबसे लंबा है, फिर भी भारी उपग्रह LVM3 से क्यों भेजे जाते हैं?
जवाब देखिए
ताक़त ऊँचाई से नहीं नापी जाती। LVM3 उड़ान के समय लगभग 640 टन का है, GSLV लगभग 420 टन का। LVM3 GTO तक लगभग 4,000 kg ले जा सकता है, जबकि GSLV लगभग 2,250 kg। नीचे वाली द्रव्यमान की पट्टियाँ यही दिखाती हैं।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1GSLV के चारों स्ट्रैप-ऑन किस तरह के हैं?
GSLV के पहले चरण में बीच का S139 ठोस है और चारों ओर के चार L40H स्ट्रैप-ऑन द्रव हैं।
2इन छह में उड़ान के समय सबसे भारी रॉकेट कौन-सा है?
LVM3 लगभग 640 टन का है, GSLV लगभग 420 टन और PSLV-XL लगभग 320 टन। ऊँचाई में GSLV सबसे लंबा है (51.73 m), पर भार में LVM3 आगे है।
3NGLV के बारे में क्या सही है?
NGLV अगली पीढ़ी का रॉकेट है, जिसके विकास को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सितंबर 2024 में मंज़ूरी दी। यह अभी योजना है।
4उपग्रह किस कक्षा में?
ऊँची कक्षा, धीमा चक्कर
उपग्रह कितनी ऊँचाई पर और किस दिशा में घूमेगा, यह उसके काम से तय होता है। एक नियम याद रखिए: कक्षा जितनी ऊँची, चक्कर उतना धीमा और लंबा।
निम्न भू-कक्षा (LEO)
निम्न भू-कक्षा (LEO, Low Earth Orbit) कुछ सौ km ऊपर होती है। 400 km पर उपग्रह लगभग 92 मिनट में पृथ्वी का एक चक्कर लगा लेता है। नीचे के चित्र में देखिए, यह कक्षा पृथ्वी से लगभग चिपकी हुई दिखती है।
ध्रुवीय और सूर्य-तुल्यकाली कक्षा
ध्रुवीय उपग्रह (polar satellite) लगभग ध्रुवों के ऊपर से गुज़रते हैं। सूर्य-तुल्यकाली ध्रुवीय कक्षा (sun-synchronous polar orbit, SSPO) में उपग्रह हर जगह के ऊपर से रोज़ एक ही स्थानीय समय पर निकलता है। PSLV 600 km की ऐसी कक्षा तक 1,750 kg ले जा सकता है।
भू-स्थिर और भू-तुल्यकाली
भू-स्थिर (geostationary) कक्षा भूमध्य रेखा के ठीक ऊपर 35,786 km की ऊँचाई पर है। वहाँ उपग्रह ठीक उतने समय में चक्कर लगाता है जितने में पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, यानी एक नाक्षत्र दिवस (sidereal day), लगभग 23 घंटे 56 मिनट। इसलिए ज़मीन से वह आसमान में एक जगह टिका दिखता है। जिस उपग्रह का चक्कर इतने ही समय का हो, वह भू-तुल्यकाली उपग्रह (geosynchronous satellite) है; अगर उसकी कक्षा भूमध्य रेखा से झुकी हो, तो ज़मीन पर उसका रास्ता 8 के आकार का बनता है।
पहले GTO में
वहाँ तक रॉकेट सीधे नहीं ले जाता। वह उपग्रह को पहले भू-तुल्यकाली स्थानांतरण कक्षा (geosynchronous transfer orbit, GTO) में छोड़ता है: एक लंबा अंडाकार रास्ता, जिसका पृथ्वी के पास वाला सिरा उपभू (perigee) और सबसे दूर वाला सिरा अपभू (apogee) कहलाता है। GSLV-F18 के लिए योजना थी: उपभू 170 km, अपभू 37,023 km, और भूमध्य रेखा से झुकाव (inclination) 20.75°।
चलाइएपाँच कक्षाएँ: 3D चित्र
पृथ्वी और सारी कक्षाएँ एक ही पैमाने पर हैं। कक्षा का बटन दबाकर उसे छुपाइए या दिखाइए; उँगली या माउस से खींचकर चित्र घुमाइए।
3D figure: Colorfigures (April Zhu), MIT licence.
सोचिए
भू-स्थिर उपग्रह लगभग 3 km/s से दौड़ रहा है। फिर भी ज़मीन से वह आसमान में एक जगह टिका क्यों दिखता है?
जवाब देखिए
क्योंकि पृथ्वी भी उसी दिशा में और ठीक उतने ही समय में एक चक्कर लगाती है: लगभग 23 घंटे 56 मिनट। उपग्रह और ज़मीन साथ-साथ घूमते हैं, इसलिए ज़मीन से देखने पर वह एक जगह खड़ा लगता है। इसीलिए छत की डिश एक बार सही दिशा में लगा दी, तो बार-बार घुमानी नहीं पड़ती।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1भू-स्थिर उपग्रह भूमध्य रेखा से कितनी ऊँचाई पर होता है?
35,786 km पर एक चक्कर ठीक एक नाक्षत्र दिवस (लगभग 23 घंटे 56 मिनट) का होता है।
2GTO क्या है?
GTO का उपभू पृथ्वी के पास और अपभू भू-स्थिर ऊँचाई के आसपास होता है। GSLV-F18 के लिए योजना 170 × 37,023 km की थी।
3ऊँची कक्षा वाला उपग्रह नीची कक्षा वाले की तुलना में...
400 km पर एक चक्कर लगभग 92 मिनट का है, और 35,786 km पर लगभग 23 घंटे 56 मिनट का।
5क्रायोजेनिक इंजन की कहानी
अपना क्रायोजेनिक चरण: CUSP
GSLV का सबसे ऊपरी चरण क्रायोजेनिक है। शुरू की GSLV उड़ानों में यह चरण रूस से ख़रीदा गया था। ISRO की क्रायोजेनिक ऊपरी चरण परियोजना (Cryogenic Upper Stage Project, CUSP) का मक़सद था कि ऐसा चरण भारत में ही बने और रूस से ख़रीदे गए चरण की जगह ले।
1992 की पाबंदियाँ
रूस से क्रायोजेनिक इंजन की तकनीक लेने के सौदे पर 1992 में अमेरिका ने पाबंदियाँ लगाईं। ISRO ने रूस से ख़रीदे चरण की जगह अपना क्रायोजेनिक चरण बनाने की परियोजना चलाई।
2010: दो असफल उड़ानें
भारत में बने क्रायोजेनिक चरण के साथ GSLV की पहली उड़ान GSLV-D3 थी, 15 अप्रैल 2010 को, GSAT-4 उपग्रह के साथ। यह सफल नहीं हुई: क्रायोजेनिक इंजन एक सेकंड से ज़्यादा जल नहीं पाया, क्योंकि उसका ईंधन बूस्टर टर्बो पंप (Fuel Booster Turbo Pump) असामान्य रूप से रुक गया। 25 दिसंबर 2010 को GSLV-F06 भी असफल रही, जिसमें रूसी क्रायोजेनिक चरण था।
2014: GSLV-D5 सफल
5 जनवरी 2014 को GSLV-D5 ने श्रीहरिकोटा के दूसरे लॉन्च पैड से GSAT-14 उपग्रह पहुँचा दिया। यह GSLV की आठवीं उड़ान थी। उड़ान सफल रही, और इसमें भारत में बना क्रायोजेनिक चरण था।
CE-7.5 से CE-20 तक
GSLV का क्रायोजेनिक इंजन CE-7.5 लगभग 7.5 टन का प्रणोद देता है। बड़े रॉकेट LVM3 के लिए भारत ने उससे कहीं ताक़तवर CE-20 इंजन बनाया, लगभग 19 से 20 टन प्रणोद वाला। 16 जुलाई 2015 को महेंद्रगिरि के ISRO प्रणोदन परिसर (ISRO Propulsion Complex) में CE-20 को 800 सेकंड तक लगातार जलाकर परखा गया। 5 जून 2017 को LVM3 ने अपनी पहली कक्षीय उड़ान (LVM3-D1) में GSAT-19 पहुँचाया।
क्रायोजेनिक कठिन क्यों है?
बहुत ठंडा
हाइड्रोजन −253 °C और ऑक्सीजन −183 °C से ऊपर गैस बन जाती है। टंकी, पाइप और पंप इतनी ठंड में भी ठीक चलने चाहिए।
बहुत हल्की हाइड्रोजन
द्रव हाइड्रोजन बहुत हल्की है, इसलिए उतने ही किलो के लिए बड़ी टंकी चाहिए।
पर सबसे ज़्यादा धक्का
हर किलो नोदक पर यह ठोस और साधारण द्रव से ज़्यादा धक्का देता है। ऊपरी चरण में यही चाहिए, जहाँ हर किलो बचाना कीमती है।
सोचिए
जब चरण रूस से ख़रीदा जा सकता था, तो भारत ने पहली उड़ान (GSLV-D3) असफल होने के बाद भी अपना इंजन बनाने की ज़िद क्यों की?
जवाब देखिए
ख़रीदी हुई चीज़ पर बेचने वाले की और दुनिया की राजनीति की मर्ज़ी चलती है। अपना इंजन होने से भारत जब चाहे और जितने चाहे GSLV बना सकता है। आगे चलकर LVM3 का उससे बड़ा CE-20 इंजन भी भारत में ही बना।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1GSLV-D3 (15 अप्रैल 2010) की उड़ान सफल क्यों नहीं हुई?
ईंधन बूस्टर टर्बो पंप असामान्य रूप से रुक गया, और इंजन एक सेकंड से ज़्यादा जल नहीं सका।
2भारत में बने क्रायोजेनिक चरण के साथ GSLV की सफल उड़ान कौन-सी थी?
GSLV-D5 ने 5 जनवरी 2014 को GSAT-14 पहुँचाया। GSLV-D3 असफल रही, और GSLV-F06 में रूसी चरण था।
3क्रायोजेनिक नोदक को इतना ठंडा क्यों रखना पड़ता है?
द्रव बने रहने के लिए हाइड्रोजन को −253 °C और ऑक्सीजन को −183 °C से नीचे रखना पड़ता है।
6ख़बर: GSLV-F18 ने NVS-03 पहुँचाया
30 अक्टूबर 2026 की रात
30 अक्टूबर 2026 की रात श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड से GSLV-F18 रॉकेट उड़ा। इसने NavIC का नया उपग्रह NVS-03 भू-तुल्यकाली स्थानांतरण कक्षा (GTO) में पहुँचा दिया। उपग्रह तय कक्षा (intended orbit) में पहुँच गया। NVS-03 में भारत में बनी परमाणु घड़ी के साथ ख़रीदी गई (procured) परमाणु घड़ियाँ भी हैं, और यह L5 और S बैंड के साथ L1 बैंड में भी संकेत भेजता है।
20वीं GSLV, 107वाँ प्रक्षेपण
यह GSLV की 20वीं उड़ान थी और श्रीहरिकोटा से ISRO का 107वाँ प्रक्षेपण। 2026 में यह ISRO का तीसरा प्रक्षेपण था; इससे पहले 12 जनवरी को PSLV-C62 और 4 सितंबर को GSLV-F17 (EOS-05 उपग्रह के साथ) उड़े थे।
GSLV-F18 की बनावट
GSLV-F18 लगभग 50 मीटर ऊँचा था और उड़ते समय लगभग 420 टन का। इसके तीन चरण हैं। पहला चरण (GS1): बीच में ठोस S139 कोर (20.1 m लंबा, 138.2 टन नोदक) और उसके चारों ओर चार द्रव L40H स्ट्रैप-ऑन (हर एक 19.6 m लंबा; चारों में मिलाकर 170.6 टन नोदक)। दूसरा चरण (GS2): विकास इंजन वाला द्रव चरण (42.1 टन नोदक)। तीसरा चरण: क्रायोजेनिक CUS15 (14.4 टन द्रव हाइड्रोजन और द्रव ऑक्सीजन)। सबसे ऊपर 3.4 मीटर का धातु का कवच (payload fairing), जिसके भीतर लगभग 2,250 kg का उपग्रह था।
लगभग 19 मिनट की उड़ान
ऐसी GSLV उड़ान में लॉन्च से उपग्रह के अलग होने तक लगभग 19 मिनट लगते हैं: 29 मई 2023 को GSLV-F12 ने NVS-01 को लगभग 19 मिनट की उड़ान के बाद छोड़ा था। नीचे के एनिमेशन में उड़ान के नौ पड़ाव उसी क्रम में हैं जिसमें वे आते हैं।
चलाइएGSLV-F18 का 3D चित्र
बटन क्रम से दबाइए; उँगली या माउस से खींचकर रॉकेट को घुमाइए। "अंदर देखिए" से हर चरण का नोदक (propellant) दिखता है।
3D figure: Colorfigures (April Zhu), MIT licence.
उपग्रह छूटने के बाद
योजना की कक्षा
GTO: उपभू 170 km, अपभू 37,023 km, झुकाव 20.75°। यह योजना के आँकड़े हैं।
अगला क़दम
अब NVS-03 अपना इंजन अपभू के पास कई बार जलाकर कक्षा ऊँची और गोल करेगा, ताकि भू-तुल्यकाली कक्षा में पहुँचे। यह आगे होना है।
NVS-02 का सबक (2025)
29 जनवरी 2025 को GSLV-F15 ने NVS-02 को GTO में पहुँचा दिया था; यह श्रीहरिकोटा से 100वाँ प्रक्षेपण था। पर उपग्रह की कक्षा अंडाकार से गोल नहीं की जा सकी। कक्षा ऊँची करने वाले इंजन की ऑक्सीकारक लाइन के पायरो वाल्व (pyro valve) तक चालू करने का संकेत (drive signal) नहीं पहुँचा; इसका सबसे संभावित कारण एक कनेक्टर का संपर्क था। इसके सुधार CMS-03 उपग्रह (LVM3-M5, 2 नवंबर 2025) में लागू किए गए। सबक: GTO तक पहुँचना आधा रास्ता है; बाक़ी चढ़ाई उपग्रह को ख़ुद करनी होती है।
चलाइएGTO से गोल कक्षा तक: 3D चित्र
पृथ्वी और दोनों कक्षाएँ पैमाने पर हैं। उपभू के पास उपग्रह तेज़ दौड़ता है, अपभू के पास धीमा। "कक्षा ऊँची कीजिए" अगला क़दम दिखाता है, और "NVS-02 (2025)" दिखाता है कि उसके साथ क्या हुआ।
3D figure: Colorfigures (April Zhu), MIT licence.
सोचिए
रॉकेट सीधा ऊपर क्यों नहीं जाता? उड़ान का रास्ता पूर्व की ओर क्यों झुकता जाता है?
जवाब देखिए
कक्षा में टिकने के लिए ऊँचाई से ज़्यादा ज़रूरी बग़ल की चाल है, लगभग 7.8 km/s या उससे ज़्यादा। इसलिए रॉकेट घनी हवा से निकलते ही झुकता जाता है और अपनी ज़्यादातर ताक़त पूर्व की ओर चाल बढ़ाने में लगाता है। पूर्व की ओर जाने से पृथ्वी के घूमने की चाल भी मुफ़्त मिलती है; इसकी बात श्रीहरिकोटा वाले टॉपिक में है।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1GSLV-F18 ने NVS-03 को कहाँ छोड़ा?
रॉकेट ने उपग्रह को GTO में छोड़ा। आगे उपग्रह अपने इंजन से कक्षा ऊँची और गोल करेगा।
2GSLV-F18 की उड़ान में सबसे लंबा कौन-सा चरण जलता है?
क्रायोजेनिक चरण दस मिनट से ज़्यादा जलता है; S139 लगभग 100 सेकंड और GS2 लगभग 150 सेकंड।
3NVS-02 (2025) से क्या सबक मिला?
GSLV-F15 ने NVS-02 को GTO में पहुँचा दिया था। गड़बड़ आगे हुई: कक्षा ऊँची करने वाले इंजन के वाल्व तक संकेत नहीं पहुँचा।
8श्रीहरिकोटा ही क्यों?
श्रीहरिकोटा ही क्यों
श्रीहरिकोटा आंध्र प्रदेश के SPSR नेल्लोर ज़िले में तकली के आकार (spindle-shaped) का एक द्वीप है। इसके पश्चिम में पुलिकट झील और बकिंघम नहर हैं, और पूर्व में बंगाल की खाड़ी। SDSC SHAR इसके कारण गिनाता है: देश का पूर्वी तट, आबादी से दूर; अलग-अलग मिशनों के लिए लॉन्च की दिशाओं का अच्छा गलियारा (launch azimuth corridor); भूमध्य रेखा से नज़दीकी, जिससे पूर्व की ओर लॉन्च को फ़ायदा होता है; और सुरक्षा के लिए बड़ा ख़ाली इलाक़ा।
पृथ्वी के घूमने का फ़ायदा
भूमध्य रेखा से नज़दीकी क्यों मायने रखती है? पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है। भूमध्य रेखा पर ज़मीन लगभग 465 मीटर प्रति सेकंड से पूर्व की ओर चलती है; ध्रुवों की ओर यह चाल घटती जाती है (465 × cos अक्षांश)। श्रीहरिकोटा (लगभग 13.7° उत्तर) पर यह लगभग 452 m/s है। पूर्व की ओर छोड़ा गया रॉकेट यह चाल शुरू से ही मुफ़्त पा लेता है।
पूर्व में समुद्र
पूर्व की ओर सीधे समुद्र है, इसलिए उड़ान का रास्ता समुद्र के ऊपर से जाता है, और ख़र्च हुए चरण पानी में गिरते हैं।
दो लॉन्च पैड
यहाँ दो लॉन्च पैड हैं। पहले लॉन्च पैड से पहली उड़ान 20 सितंबर 1993 को हुई (PSLV)। दूसरा लॉन्च पैड 2005 में चालू हुआ; उससे पहली उड़ान 5 मई 2005 को PSLV ने Cartosat-1 उपग्रह के साथ भरी। GSLV-F18 भी दूसरे लॉन्च पैड से ही उड़ा।
आगे की योजना: तीसरा पैड, नया केंद्र
आगे की योजना: तीसरे लॉन्च पैड (Third Launch Pad) को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 16 जनवरी 2025 को मंज़ूरी दी, 3,984.86 करोड़ रुपये के साथ; इसे 48 महीनों में बनाने का लक्ष्य है। तमिलनाडु के कुलसेकरपट्टिनम में SSLV के लिए नए लॉन्च केंद्र की आधारशिला प्रधानमंत्री ने 28 फ़रवरी 2024 को रखी।
चलाइएपृथ्वी का घूमना: 3D चित्र
अक्षांश चुनिए और ज़मीन की पूर्व की ओर चाल देखिए: भूमध्य रेखा पर सबसे ज़्यादा, ध्रुवों की ओर कम। साथ में देखिए कि पूर्व या पश्चिम की ओर छोड़े रॉकेट को कितनी चाल ख़ुद जोड़नी पड़ती है (मोटा हिसाब)। खींचकर पृथ्वी को घुमाइए।
3D figure: Colorfigures (April Zhu), MIT licence.
सोचिए
अगर भारत का बड़ा लॉन्च केंद्र पश्चिमी तट पर होता, तो पूर्व की ओर रॉकेट छोड़ने में क्या दिक़्क़त आती?
जवाब देखिए
पूर्व की ओर जाते रॉकेट का रास्ता पूरे देश के ऊपर से गुज़रता, और ख़र्च हुए चरण आबादी वाले इलाक़ों में गिर सकते थे। श्रीहरिकोटा से पूर्व की ओर सीधे बंगाल की खाड़ी है, इसलिए वहाँ से पूर्व की ओर छोड़ना सुरक्षित है और पृथ्वी के घूमने का धक्का भी मिलता है।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1GSLV जैसे रॉकेट श्रीहरिकोटा से पूर्व की ओर क्यों छोड़े जाते हैं?
पृथ्वी पश्चिम से पूर्व घूमती है, और श्रीहरिकोटा के पूर्व में बंगाल की खाड़ी है।
2ज़मीन की घूमने की चाल सबसे ज़्यादा कहाँ होती है?
भूमध्य रेखा पर लगभग 465 m/s; ध्रुवों की ओर यह घटते-घटते शून्य हो जाती है।
3श्रीहरिकोटा के तीसरे लॉन्च पैड के बारे में क्या सही है?
1993 से पहला लॉन्च पैड चल रहा है। तीसरे को 16 जनवरी 2025 को मंज़ूरी मिली; यह अभी योजना है।
9बड़े मिशन
ISRO के रॉकेटों ने ये बड़े मिशन भेजे। हर कार्ड में रॉकेट का नाम और तारीख़ है।
चंद्रयान-1
PSLV-C11 से, 22 अक्टूबर 2008 को चाँद की ओर भेजा गया।
मंगलयान (Mars Orbiter Mission)
PSLV-C25 से, 5 नवंबर 2013 को; भारत का पहला अंतर-ग्रहीय (interplanetary) मिशन। 24 सितंबर 2014 को मंगल की कक्षा में पहुँचा, और ISRO मंगल की कक्षा तक सफलता से यान भेजने वाली चौथी अंतरिक्ष एजेंसी बनी।
एक उड़ान, 104 उपग्रह
PSLV-C37 ने 15 फ़रवरी 2017 को एक साथ 104 उपग्रह भेजे: 714 kg का Cartosat-2 श्रृंखला का उपग्रह और 103 साथी उपग्रह, कुल 1,378 kg।
चंद्रयान-3
LVM3-M4 से, 14 जुलाई 2023 को दोपहर 2:35 बजे, श्रीहरिकोटा के दूसरे लॉन्च पैड से। 23 अगस्त 2023 को चाँद पर धीरे से उतरा (soft landing)।
आदित्य-L1
PSLV-C57 से, 2 सितंबर 2023 को। 6 जनवरी 2024 को सूर्य-पृथ्वी के L1 बिंदु के चारों ओर हेलो कक्षा (halo orbit) में पहुँचा।
SpaDeX
PSLV-C60 से, 30 दिसंबर 2024 को। 16 जनवरी 2025 को अंतरिक्ष में दो यान जुड़ गए (docking); ऐसा करने वाला भारत दुनिया का चौथा देश बना।
NISAR
NASA के साथ मिलकर बना उपग्रह, GSLV-F16 से, 30 जुलाई 2025 को भेजा गया।
TV-D1 (गगनयान की तैयारी)
21 अक्टूबर 2023 को यात्रियों को बचाने वाला तंत्र (crew escape system) परखा गया; यात्री-कक्ष (crew module) लगभग 17 km ऊपर तक गया।
सोचिए
PSLV-C37 के 104 उपग्रहों का कुल वज़न 1,378 kg था, यानी GSLV-F18 के अकेले NVS-03 (लगभग 2,250 kg) से भी कम। फिर उस उड़ान की इतनी चर्चा क्यों हुई?
जवाब देखिए
ख़ास बात भार नहीं, गिनती थी: एक ही उड़ान में 104 अलग-अलग उपग्रह, जिनमें हर एक को रॉकेट से अलग करके छोड़ना था। इनमें 714 kg का एक बड़ा उपग्रह था और 103 छोटे साथी। भारी बोझ ऊँची कक्षा तक ले जाने के लिए GSLV या LVM3 चाहिए; बहुत सारे छोटे उपग्रहों के लिए PSLV काफ़ी है।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1मंगलयान (Mars Orbiter Mission) किस रॉकेट से गया?
PSLV-C25 ने 5 नवंबर 2013 को मंगलयान भेजा।
2चंद्रयान-3 चाँद पर कब उतरा?
14 जुलाई 2023 को लॉन्च हुआ, और 23 अगस्त 2023 को चाँद पर उतरा। 22 अक्टूबर 2008 चंद्रयान-1 की तारीख़ है।
3SpaDeX मिशन में क्या हुआ?
16 जनवरी 2025 को डॉकिंग पूरी हुई; ऐसा करने वाला भारत चौथा देश बना।
10आगे की योजनाएँ
गगनयान: अब तक के परीक्षण
गगनयान भारत का अंतरिक्ष में इंसान भेजने का कार्यक्रम है। इसकी तैयारी के कई परीक्षण हो चुके हैं: TV-D1 (21 अक्टूबर 2023) में यात्रियों को बचाने वाला तंत्र परखा गया, और IADT-01 व IADT-02 (Integrated Air Drop Test) में नकली यात्री-कक्ष गिराकर उसे धीमा करने वाले तंत्र (deceleration system) को परखा गया। अगले परीक्षण TV-D2 का काम चल रहा है।
योजना: G1 और उसके बाद की उड़ानें
योजना: पहली बिना-यात्री उड़ान G1, जिसमें व्योममित्र (Vyommitra) नाम का आधा-मानव जैसा रोबोट (half-humanoid) जाएगा, का लक्ष्य 2026 की चौथी तिमाही है। उसके बाद दो और बिना-यात्री उड़ानों का लक्ष्य 2027 तक है, और फिर पहली यात्री उड़ान।
भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन
भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (Bharatiya Antariksh Station, BAS): सितंबर 2024 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इसके पहले मॉड्यूल BAS-1 को मंज़ूरी दी। आठ मिशनों के लिए 20,193 करोड़ रुपये मंज़ूर हुए, और इन्हें दिसंबर 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य है। पूरे स्टेशन में पाँच मॉड्यूल होंगे और उसे 2035 तक चालू करने की योजना है। आगे का सपना (vision): 2040 तक चाँद पर भारतीय यात्री मिशन।
बाक़ी योजनाएँ
इनके साथ बाक़ी योजनाएँ भी याद रखिए: NGLV रॉकेट (मंज़ूरी सितंबर 2024), श्रीहरिकोटा का तीसरा लॉन्च पैड (मंज़ूरी 16 जनवरी 2025), कुलसेकरपट्टिनम का SSLV केंद्र, और NavIC के NVS-04 और NVS-05 उपग्रह।
सोचिए
किसी ख़बर में लक्ष्य, योजना या मंज़ूरी मिली लिखा हो, तो उसे हो गया क्यों नहीं मानना चाहिए?
जवाब देखिए
मंज़ूरी का मतलब है पैसा और काम शुरू करने की हाँ, नतीजा नहीं। लक्ष्य की तारीख़ आगे खिसक भी सकती है। गगनयान की पहली बिना-यात्री उड़ान, BAS, NGLV और तीसरा लॉन्च पैड, सब अभी योजना में हैं। हो गया तभी कहिए जब काम पूरा होने की ख़बर हो, जैसे TV-D1 (21 अक्टूबर 2023) या SpaDeX की डॉकिंग (16 जनवरी 2025)।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1गगनयान G1 के बारे में क्या सही है?
G1 में व्योममित्र रोबोट जाएगा, कोई यात्री नहीं। यह अभी लक्ष्य है।
2भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS) के बारे में क्या सही है?
BAS-1 को सितंबर 2024 में मंज़ूरी मिली। पाँच मॉड्यूल वाला स्टेशन 2035 तक चालू करने की योजना है।
3TV-D1 (21 अक्टूबर 2023) में क्या परखा गया?
यात्री-कक्ष लगभग 17 km तक गया और बचाव तंत्र परखा गया।
11आख़िरी जाँच
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1GSLV-F18 का ऊपरी चरण CUS15 किस नोदक से चलता है?
CUS15 क्रायोजेनिक चरण है। HTPB S139 में है, और UH25 + N2O4 L40H और GS2 में।
2भारत के अपने रॉकेट ने पहली बार उपग्रह कक्षा में कब पहुँचाया?
आर्यभट सोवियत संघ के रॉकेट से गया था। 1979 की SLV-3 उड़ान पूरी तरह सफल नहीं रही; 18 जुलाई 1980 को SLV-3 ने रोहिणी पहुँचाया।
3GTO से गोल भू-तुल्यकाली कक्षा तक उपग्रह को कौन ले जाता है?
उपग्रह अपभू के पास अपना इंजन कई बार जलाता है। NVS-02 में यही इंजन चालू नहीं हो सका था।
4NavIC किस इलाक़े के लिए बना है?
NavIC का सेवा क्षेत्र भारत और उसके आसपास 1,500 km तक है।
5श्रीहरिकोटा (लगभग 13.7° उत्तर) पर ज़मीन लगभग किस चाल से पूर्व की ओर चलती है?
465 × cos 13.7° ≈ 452 m/s।
6इनमें से कौन-सा अभी योजना है?
डॉकिंग (2025) और चंद्रयान-3 की लैंडिंग (2023) हो चुकी हैं। BAS 2035 तक चालू करने की योजना है।
सारे पड़ाव पूरे! अब आप ISRO के रॉकेट, कक्षाएँ और NavIC की ख़बर अपने शब्दों में समझा सकते हैं।
शब्द
- प्रणोद (thrust)
- निकलती गैस के बदले रॉकेट को मिलने वाला धक्का।
- नोदक (propellant)
- ईंधन और उसे जलाने वाला ऑक्सीकारक, दोनों मिलाकर।
- चरण (stage)
- रॉकेट का वह हिस्सा जिसका अपना इंजन और नोदक है; ख़ाली होने पर अलग होकर गिर जाता है।
- स्ट्रैप-ऑन (strap-on)
- मुख्य रॉकेट के बग़ल में बँधे छोटे रॉकेट, जो उड़ान के शुरू में अतिरिक्त धक्का देते हैं।
- कवच (payload fairing)
- उपग्रह को घनी हवा से बचाने वाला सिर का खोल; हवा पतली होने पर अलग हो जाता है।
- क्रायोजेनिक (cryogenic)
- बहुत कम तापमान पर द्रव बनाए गए नोदक: द्रव हाइड्रोजन और द्रव ऑक्सीजन।
- कक्षीय चाल (orbital speed)
- कक्षा में टिके रहने के लिए ज़रूरी चाल; 200 से 400 km पर लगभग 7.8 km/s।
- पलायन चाल (escape speed)
- वह चाल जिस पर कोई चीज़ पृथ्वी का खिंचाव छोड़कर हमेशा के लिए दूर निकल जाए; यह कक्षीय चाल से ज़्यादा है।
- निम्न भू-कक्षा (LEO)
- पृथ्वी से कुछ सौ km ऊपर की कक्षा।
- ध्रुवीय उपग्रह (polar satellite)
- लगभग ध्रुवों के ऊपर से गुज़रने वाला उपग्रह।
- भू-स्थिर (geostationary)
- भूमध्य रेखा के ऊपर 35,786 km की कक्षा, जहाँ उपग्रह ज़मीन से एक जगह टिका दिखता है।
- भू-तुल्यकाली उपग्रह (geosynchronous satellite)
- जिसका चक्कर पृथ्वी के घूमने जितना, लगभग 23 घंटे 56 मिनट, का हो।
- GTO (geosynchronous transfer orbit)
- भू-तुल्यकाली स्थानांतरण कक्षा: लंबी अंडाकार कक्षा, जिससे उपग्रह अपने इंजन से भू-तुल्यकाली कक्षा तक जाता है।
- उपभू और अपभू (perigee, apogee)
- अंडाकार कक्षा में पृथ्वी के सबसे पास और सबसे दूर के बिंदु।
- झुकाव (inclination)
- कक्षा का भूमध्य रेखा के तल से कोण।
- परमाणु घड़ी (atomic clock)
- परमाणुओं के कंपन से समय नापने वाली बहुत सटीक घड़ी; NavIC की दूरियाँ इसी पर टिकी हैं।
- PNT
- जगह, चाल और समय (Position, Navigation, Timing) की सेवा।
- झुकी हुई भू-तुल्यकाली कक्षा (IGSO)
- भूमध्य रेखा से झुकी वह कक्षा जिसमें एक चक्कर पृथ्वी के एक चक्कर जितने समय में पूरा होता है; ज़मीन से उपग्रह 8 के आकार में उत्तर-दक्षिण झूलता दिखता है।
- SBAS (satellite based augmentation system)
- उपग्रहों की मदद से GPS जैसे तंत्र के संकेत सुधारने वाला तंत्र। भारत का SBAS GAGAN है।
- GNSS
- उपग्रह से जगह बताने वाले तंत्रों का साझा नाम, जैसे GPS, NavIC और Galileo।
स्रोत
- ISRO: GSLV-F18/NVS-03 मिशन
- ISRO: प्रक्षेपणों की सूची
- ISRO: GSLV-F12/NVS-01
- ISRO: NVS-02 की कक्षा में स्थिति
- ISRO: शुरुआत (Genesis)
- VSSC: शुरुआत (Genesis)
- ISRO: परिचय (Profile)
- ISRO: आर्यभट
- ISRO: SLV-3
- राष्ट्रपति भवन: डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
- ISRO: ASLV
- ISRO: PSLV
- ISRO: GSLV
- ISRO: LVM3
- ISRO: SSLV
- PIB: NGLV को मंज़ूरी (18 सितंबर 2024)
- ISRO: क्रायोजेनिक इंजन
- US सरकार का पाठ (FAS): 1992 की पाबंदियाँ
- ISRO: GSLV-D3/GSAT-4
- PIB: GSLV-D3 का कारण (31 जुलाई 2014)
- ISRO: GSLV-D5/GSAT-14
- PIB: CE-20 इंजन का परीक्षण (20 जुलाई 2015)
- ISRO: NavIC (IRNSS) कार्यक्रम
- ISRO: IRNSS-1F
- PIB: NavIC पर लोकसभा उत्तर (29 जुलाई 2026)
- SDSC SHAR: परिचय
- ISRO: लॉन्च सेवाएँ और पैड
- ISRO: तीसरे लॉन्च पैड को मंज़ूरी
- ISRO: मंगलयान
- ISRO: एक उड़ान में 104 उपग्रह
- ISRO: चंद्रयान-3
- ISRO: आदित्य-L1
- PIB: SpaDeX डॉकिंग
- PIB: TV-D1 (21 अक्टूबर 2023)
- PIB: गगनयान और BAS की स्थिति (6 अगस्त 2026)
- PIB: BAS-1 को मंज़ूरी (18 सितंबर 2024)
- ISRO: उपग्रह-दिशा सेवाएँ (NavIC, GAGAN)
- PIB: IRNSS-1A की घड़ियाँ और IRNSS-1I (19 जुलाई 2018)
- ISRO: PSLV-C33/IRNSS-1G और NavIC नाम (28 अप्रैल 2016)
- ISRO: GSLV-F12/NVS-01 पुस्तिका
- ISRO: NVS-02
- ISRO: PSLV-C39/IRNSS-1H पुस्तिका
- PIB: NavIC का हाल और योजना (25 मार्च 2026)
- PIB: NavIC उपग्रह और रेलगाड़ियाँ (23 जुलाई 2025)
- PIB: NavIC से आपदा की चेतावनी (21 अगस्त 2025)
- PIB: NavIC ट्रैकर और 3GPP (20 नवंबर 2019)
- GPS.gov: GPS के उपग्रह
- QZSS (जापान): परिचय
- ISRO: NavIC संकेतों का ICD (L5, S)
- ISRO: NavIC संकेतों का ICD (L1)
