कक्षा 12 • राजनीति विज्ञान • स्वतंत्र भारत में राजनीति • अध्याय 5 — कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना
कक्षा — 12 · विषय — राजनीति विज्ञान (स्वतंत्र भारत में राजनीति) · पृष्ठ — 72 से 91
एक कार्टून जो पूरा अध्याय कह देता है
★पहले पृष्ठ पर आर.के. लक्ष्मण का चार-खाने वाला कार्टून है — 1 YEAR • 9 YEARS • 17 YEARS • 22 YEARS। कांग्रेस का पुराना चुनाव चिह्न था — दो बैलों की जोड़ी। हर खाने में वह जोड़ी और बिगड़ती जाती है। ★★“आज़ादी के 22 वर्ष गुजरते-गुजरते कांग्रेस किस कदर फूट का शिकार हो गई थी।” — यानी 1969।
1 | अध्याय का नक्शा | चुनौती दो तरफ़ से — बाहर और भीतर
पाठ स्वयं क्या कहता है
पृ. 72 — ‘इस अध्याय में…’
- “इस किताब के दूसरे अध्याय में आपने कांग्रेस प्रणाली के उद्भव के बारे में पढ़ा था।”
- ★“इस प्रणाली को 1960 के दशक में पहली बार चुनौती मिली।”
- “विपक्ष अब पहले की अपेक्षा कम विभाजित और कहीं ज्यादा ताकतवर था।”
- ★★“कांग्रेस को अंदरूनी चुनौतियाँ भी झेलनी पड़ीं, क्योंकि अब यह पार्टी अपने अंदर की विभिन्नता को एक साथ थामकर नहीं चल पा रही थी।”
अध्याय के चार प्रश्न
| # | प्रश्न |
|---|---|
| 1 | नेहरू के बाद राजनीति ने क्या करवट ली? |
| 2 | विपक्ष की एकता और खुद के बिखराव ने कांग्रेस के प्रभुत्व को कैसे चुनौती दी? |
| 3 | इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में एक नयी कांग्रेस किस तरह इन चुनौतियों से उबरी? |
| 4 | कैसे नयी नीतियों तथा विचारधाराओं ने कांग्रेस प्रणाली की पुनर्वापसी की? |
2 | नेहरू के बाद | उत्तराधिकार की दो परीक्षाएँ
28 मई 1964 — “The Void”
पृ. 73
- 📰 The Hindustan Times: “PRIME MINISTER NEHRU IS DEAD” • “Country stunned by sudden end” • “State mourning for twelve days”
- साथ में एक कार्टून — शीर्षक “The Void” यानी शून्य।
- ★सवाल दो थे: “नेहरू के बाद कौन?” और उससे भी गंभीर — “नेहरू के बाद आखिर इस देश में होगा क्या?”
तीन अंतर्राष्ट्रीय आशंकाएँ
| # | आशंका |
|---|---|
| 1 | “नेहरू के बाद लोकतंत्र कायम भी रह पाएगा या नहीं” |
| 2 | ! “राजनीतिक उत्तराधिकार का सवाल लोकतांत्रिक ढंग से हल नहीं कर पाएगा”; असफल हुआ तो “सेना राजनीतिक भूमिका में उतर आएगी” |
| 3 | “नया नेतृत्व बहुविध कठिनाइयों का समाधान खोज पाएगा या नहीं” |
खतरनाक दशक
★इसे ‘खतरनाक दशक’ कहा जाता है — क्योंकि गरीबी, गैर-बराबरी, सांप्रदायिक और क्षेत्रीय विभाजन के सवाल अनसुलझे थे।
पहली परीक्षा — 1964
पृ. 74
- ★“नेहरू के उत्तराधिकारी का सवाल इतनी आसानी से हल कर लिया गया कि आलोचक ठगे-से रह गए।”
- कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज ने नेताओं और सांसदों से सलाह-मशविरा किया।
- “उन्होंने पाया कि सभी लालबहादुर शास्त्री के पक्ष में हैं।”
- ★★“शास्त्री, कांग्रेस संसदीय दल के निर्विरोध नेता चुने गए और इस तरह वे देश के प्रधानमंत्री बने।”
लालबहादुर शास्त्री (1904–1966)
जीवनी-बॉक्स, पृ. 74
- भारत के दूसरे प्रधानमंत्री; 1930 से स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी।
- उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल में मंत्री; कांग्रेस के महासचिव; 1951–56 और 1957–64 में केंद्रीय मंत्री।
- ★★एक बड़ी रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेवारी लेते हुए रेलमंत्री पद से इस्तीफ़ा दिया।
- ★‘जय जवान-जय किसान’ का मशहूर नारा दिया।
शास्त्री-काल की दो चुनौतियाँ
पृ. 74 — 1964 से 1966
- चीन-युद्ध से पैदा हुई आर्थिक कठिनाइयाँ; और मानसून की असफलता से सूखा।
- ! “कई जगहों पर खाद्यान्न का गंभीर संकट आन पड़ा था।”
- फिर 1965 में पाकिस्तान से युद्ध।
- ★★इसीलिए नारा — ‘जय जवान’ यानी युद्ध का मोर्चा, ‘जय किसान’ यानी अन्न का मोर्चा।
विदेशी अख़बार का फ़ैसला
तमाम अंदेशों के बावजूद इंग्लैंड की तुलना में भारत में प्रधानमंत्री का सवाल ज्यादा शालीनता और तेज़ी के साथ हल कर लिया गया।
‘गार्जियन’ का संपादकीय — 3 जून 1964
दूसरी परीक्षा — 1966
पृ. 74–75
- ! 11 जनवरी 1966 — ताशकंद में शास्त्री का अचानक देहान्त।
- मुकाबला: मोरारजी देसाई बनाम इंदिरा गाँधी।
- “इंदिरा गाँधी के नाम पर सर्वसम्मति कायम नहीं की जा सकी।”
- ★★“कांग्रेस के सांसदों ने गुप्त मतदान किया। इंदिरा गाँधी ने मोरारजी देसाई को हरा दिया” — दो-तिहाई से अधिक मत।
लोकतंत्र की परिपक्वता
★★“प्रतिस्पर्धा के बावजूद पार्टी में सत्ता का हस्तांतरण बड़े शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया। इसे भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता के रूप में देखा गया।”
और वह गणना जो उलटी पड़ीध्यान
पृ. 75 — इस पर निशान लगाइए
- ★★“कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने संभवतया यह सोचकर उनका समर्थन किया होगा कि प्रशासनिक और राजनीतिक मामलों में खास अनुभव न होने के कारण… इंदिरा गाँधी उन पर निर्भर रहेंगी।”
- ★पूरा अध्याय इसी गणना के उलट जाने की कहानी है।
इंदिरा गाँधी (1917–1984)
जीवनी-बॉक्स, पृ. 75
- 1966–1977 और फिर 1980–1984 तक प्रधानमंत्री; 1959 में कांग्रेस अध्यक्ष; 1964–66 में शास्त्री मंत्रिमंडल में मंत्री।
- 1967, 1971 और 1980 के आम चुनावों में कांग्रेस को विजयी बनाया।
- ★‘गरीबी हटाओ’ का नारा; प्रिवी पर्स की समाप्ति; बैंकों का राष्ट्रीयकरण; आण्विक-परीक्षण; पर्यावरण-संरक्षण।
- ! 31 अक्तूबर 1984 को उनकी हत्या कर दी गई।
3 | 1967 का संदर्भ | आर्थिक संकट और जन-असंतोष
आठ कारक एक साथ
| # | कारक | # | कारक |
|---|---|---|---|
| 1 | मानसून की असफलता | 5 | विदेशी मुद्रा-भंडार में कमी |
| 2 | व्यापक सूखा | 6 | औद्योगिक उत्पादन में गिरावट |
| 3 | खेती की पैदावार में गिरावट | 7 | निर्यात में गिरावट |
| 4 | ! गंभीर खाद्य संकट | 8 | ★सैन्य खर्चे में भारी बढ़ोतरी |
और यह वाक्य अध्याय 3 से जोड़िए★
पृ. 77
- “नियोजन और आर्थिक विकास के संसाधनों को सैन्य-मद में लगाना पड़ा।”
- ★यानी अध्याय 3 (नियोजित विकास) और अध्याय 4 (युद्ध) यहाँ आकर मिलते हैं।
अवमूल्यन
! इंदिरा गाँधी की सरकार के शुरुआती फ़ैसलों में एक था रुपये का अवमूल्यन — 1 डॉलर की कीमत 5 रुपये से बढ़कर 7 रुपये। “माना गया कि यह अमरीका के दबाव में किया गया।”
सरकार की सबसे बड़ी भूलध्यान
पृ. 77 — इसे रेखांकित कीजिए
- लोग कीमतों, खाद्यान्न की कमी और बेरोजगारी को लेकर विरोध पर उतर आए; ‘बंद’ और ‘हड़ताल’ आम हो गए।
- ★★“सरकार ने इसे कानून और व्यवस्था की समस्या माना न कि जनता की बदहाली की अभिव्यक्ति।”
- ! “इससे लोगों की नाराजगी बढ़ी और जन विरोध ने ज्यादा उग्र रूप धारण किया।”
- ★यह वाक्य अध्याय 6 (आपातकाल) की भी जड़ है।
और यह भी हुआ
पृ. 77
- साम्यवादी और समाजवादी पार्टी ने व्यापक समानता के लिए संघर्ष छेड़ दिया।
- मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से अलग हुए एक समूह ने CPI (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) बनायी और सशस्त्र कृषक-विद्रोह का नेतृत्व किया।
- ! “इस अवधि में गंभीर किस्म के हिन्दू-मुस्लिम दंगे भी हुए। आज़ादी के बाद से अब तक इतने गंभीर सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए थे।”
चुनाव-कथा — राजस्थान का एक गाँव
बॉक्स, पृ. 77
- 1967 का विधानसभा चुनाव; चोमू क्षेत्र; गाँव देवीसर। कांग्रेस बनाम स्वतंत्र पार्टी।
- पुराना दबदबा शेर सिंह का; भतीजा भीम सिंह ज्यादा लोकप्रिय होने लगा। दोनों राजपूत।
- ★भीम सिंह ने “राजपूतों के अलावा गैर-राजपूत समुदायों को जोड़कर एक नया राजनीतिक समीकरण तैयार कर डाला।”
- मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया ने उसे अपने मनपसंद उम्मीदवार का समर्थन करने पर राजी कर लिया।
और उस गाँव का असली हिसाब★★
बॉक्स, पृ. 77
- भीम सिंह जानता था — “अगर कांग्रेसी उम्मीदवार जीत जाता है, तो उसका मंत्री बनना तय है और उसके मंत्री बनने का अर्थ है कि भीम सिंह मंत्री से सीधे संपर्क स्थापित कर सकता है।”
- शेर सिंह के पास स्वतंत्र पार्टी के जागीरदार उम्मीदवार का साथ देने के अलावा कोई चारा नहीं था।
- ★★“देवीसर गाँव में विधानसभा चुनाव चाचा-भतीजे की खेमेबाजी में बदल गया था।”
- ★सीख: चुनाव-चिह्न ऊपर से आते हैं; ज़मीन पर लड़ाई स्थानीय समीकरणों की होती है।
4 | गैर-कांग्रेसवाद | विपक्ष ने रणनीति खोज ली
विपक्ष का हिसाब
पृ. 78
- “कांग्रेस की विरोधी पार्टियों ने महसूस किया कि उसके वोट बँट जाने के कारण ही कांग्रेस सत्तासीन है।”
- जो दल कार्यक्रम और विचारधारा में एकदम अलग थे, वे भी एकजुट हुए — कुछ राज्यों में मोर्चा, कुछ में सीटों का तालमेल।
- “इन दलों को लगा कि इंदिरा गाँधी की अनुभवहीनता और कांग्रेस की अंदरूनी उठापटक से उन्हें अवसर हाथ लगा है।”
लोहिया का सैद्धांतिक तर्क
कांग्रेस का शासन अलोकतांत्रिक और गरीब लोगों के हितों के खिलाफ़ है, इसलिए गैर-कांग्रेसी दलों का एक साथ आना जरूरी है, ताकि गरीबों के हक में लोकतंत्र को वापस लाया जा सके।
राममनोहर लोहिया — जिन्होंने इस रणनीति को ‘गैर-कांग्रेसवाद’ नाम दिया
राममनोहर लोहिया (1910–1967)
जीवनी-बॉक्स, पृ. 78
- समाजवादी नेता एवं विचारक; स्वतंत्रता-सेनानी; कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य।
- ‘मैनकाइंड’ एवं ‘जन’ के संस्थापक संपादक; गैर-यूरोपीय समाजवादी सिद्धांत के विकास में मौलिक योगदान।
- ★गैर-कांग्रेसवाद के रणनीतिकार; पिछड़े वर्गों को आरक्षण की वकालत; अंग्रेजी का विरोध।
- “नेहरू के खिलाफ़ मोर्चा खोलने वाले नेता के रूप में चर्चित।”
सी. नटराजन अन्नादुरई (1909–1969)
जीवनी-बॉक्स, पृ. 78
- 1967 से मद्रास (तमिलनाडु) के मुख्यमंत्री; चर्चित पत्रकार, लेखक एवं वक्ता।
- जस्टिस पार्टी से संबद्ध; बाद में द्रविड़ कषगम (1934) में शामिल।
- ★1949 में द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम का बतौर राजनीतिक पार्टी गठन।
- ★हिंदी विरोधी आंदोलन का नेतृत्व; राज्यों की व्यापक स्वायत्तता के समर्थक।
एक विदेशी भविष्यवाणी
भारत में… एक सुव्यवस्थित समाज रचना को बनाए रखने का काम नागरिक सरकार के हाथों से जाता रहेगा और सेना ही फिर कानून-व्यवस्था बनाए रखने का एकमात्र विकल्प होगी… भारत को लोकतांत्रिक ढाँचे के भीतर विकसित करने का महान प्रयोग असफल हो चुका है…
नेविए मैक्सवेल — ‘इंडियाज़ डिसइंटीग्रेटिंग डेमोक्रेसी’, लंदन टाइम्स, 1967
5 | 1967 का जनादेश | ‘राजनीतिक भूकंप’
चुनाव का जनादेश
पृ. 78 — फरवरी 1967
- ★“कांग्रेस पहली बार नेहरू के बिना मतदाताओं का सामना कर रही थी।”
- “चुनाव के परिणामों से कांग्रेस को राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर गहरा धक्का लगा।”
- ★★“तत्कालीन अनेक राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने चुनाव परिणामों को ‘राजनीतिक भूकंप’ की संज्ञा दी।”
कितना बड़ा धक्का
| पहलू | परिणाम |
|---|---|
| लोकसभा | “जैसे-तैसे बहुमत तो मिल गया”, पर मतों के प्रतिशत और सीटों में भारी गिरावट |
| ★रिकॉर्ड | “अब से पहले कांग्रेस को कभी न तो इतने कम वोट मिले थे और न ही इतनी कम सीटें” |
| ! मंत्रिमंडल | “इंदिरा गाँधी के मंत्रिमंडल के आधे मंत्री चुनाव हार गए थे” |
चार दिग्गजों की हार★★
पृ. 78 — तीन ‘सिंडिकेट’ के हैं
- तमिलनाडु से कामराज
- महाराष्ट्र से एस.के. पाटिल
- पश्चिम बंगाल से अतुल्य घोष
- बिहार से के.बी. सहाय
- ★इनमें से पहले तीन ‘सिंडिकेट’ के सदस्य हैं — यानी 1967 में सिंडिकेट की व्यक्तिगत हार भी हुई।
राज्यों का हिसाब
| मद | संख्या |
|---|---|
| बहुमत नहीं मिला | सात राज्यों में |
| दलबदल के कारण सरकार नहीं बना सकी | दो अन्य राज्यों में |
| ★★कुल सत्ता गई | नौ राज्यों में |
वे नौ राज्य★
पृ. 80
- पंजाब • हरियाणा • उत्तर प्रदेश • मध्य प्रदेश • बिहार • पश्चिम बंगाल • उड़ीसा • मद्रास • केरल
- “ये राज्य देश के किसी एक भाग में कायम राज्य नहीं थे। ये राज्य पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों में थे।”
मद्रास — पहली बार★★
पृ. 80
- “मद्रास प्रांत में एक क्षेत्रीय पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता पाने में कामयाब रही।”
- “डीएमके हिंदी-विरोधी आंदोलन का नेतृत्व करके सत्ता में आई थी।”
- ★★“चुनावी इतिहास में यह पहली घटना थी जब किसी गैर-कांग्रेसी दल को किसी राज्य में पूर्ण बहुमत मिला।”
दिल्ली से हावड़ा
★“उस समय आमतौर पर कहा जाता था कि दिल्ली से हावड़ा जाने के लिए ट्रेन पर बैठो, तो यह ट्रेन अपने पूरे रास्ते में एक भी कांग्रेस-शासित राज्य से होकर नहीं गुज़रेगी।”
6 | गठबंधन और दल-बदल | दो नयी परिघटनाएँ
गठबंधन की परिघटना
पृ. 80
- “1967 के चुनावों से गठबंधन की परिघटना सामने आयी।”
- अनेक गैर-कांग्रेसी पार्टियों ने एकजुट होकर संयुक्त विधायक दल बनाया — इसीलिए इन्हें ‘संयुक्त विधायक दल की सरकार’ कहा गया।
- ★“अधिकतर मामलों में ऐसी सरकार के घटक दल विचारधारा के लिहाज से एक-दूसरे से भिन्न थे।”
दो उदाहरण
| राज्य | घटक दल |
|---|---|
| ★बिहार | एसएसपी और पीएसपी (समाजवादी) + वामपंथी सीपीआई + दक्षिणपंथी जनसंघ — एक ही सरकार में |
| पंजाब | ‘पॉपुलर यूनाइटेड फ्रंट’ — दोनों अकाली गुट (संत और मास्टर), सीपीआई, सीपीआई (एम), एसएसपी, रिपब्लिकन पार्टी और जनसंघ |
दल-बदल — परिभाषा
पृ. 81
- ★★“कोई जनप्रतिनिधि किसी खास दल के चुनाव चिह्न को लेकर चुनाव लड़े और जीत जाए और चुनाव जीतने के बाद इस दल को छोड़कर किसी दूसरे दल में शामिल हो जाए, तो इसे दल-बदल कहते हैं।”
- 1967 के बाद कांग्रेस छोड़ने वाले विधायकों ने तीन राज्यों — हरियाणा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश — में गैर-कांग्रेसी सरकारें बहाल करने में अहम भूमिका निभायी।
‘आया राम-गया राम’★★
बॉक्स, पृ. 81
- हरियाणा के एक विधायक — गया लाल।
- ★“उन्होंने एक पखवाड़े के अंदर तीन दफा अपनी पार्टी बदली।”
- कांग्रेस ➜ यूनाइटेड फ्रंट ➜ कांग्रेस ➜ और लौटने के 9 घंटों के अंदर फिर यूनाइटेड फ्रंट।
- ★★कांग्रेस नेता राव वीरेन्द्र सिंह की घोषणा: “गया राम था अब आया राम है।”
- ★“बाद के समय में दल-बदल रोकने के लिए संविधान में संशोधन किया गया।”
पर एक संतुलन भीध्यान
पृ. 81
- ★★“चुनाव के नतीजों ने साबित कर दिया था कि कांग्रेस को चुनावों में हराया जा सकता है।”
- ! “बहरहाल, अब भी कांग्रेस का कोई विकल्प नहीं था।”
- “राज्यों में बनी अधिकतर गैर-कांग्रेसी गठबंधन की सरकारें ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाईं।”
- उन्हें या तो नए सिरे से गठबंधन बनाना पड़ा अथवा राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा।
7 | इंदिरा बनाम सिंडिकेट | असली चुनौती भीतर से थी
चुनौती कहाँ से
★★“इंदिरा गाँधी को असली चुनौती विपक्ष से नहीं बल्कि खुद अपनी पार्टी के भीतर से मिली। उन्हें ‘सिंडिकेट’ से निपटना पड़ा।”
‘सिंडिकेट’ कौन था
| नेता | प्रांत |
|---|---|
| ★के. कामराज (अगुवा) | मद्रास — भूतपूर्व मुख्यमंत्री, फिर कांग्रेस अध्यक्ष |
| एस.के. पाटिल | बंबई सिटी (अब मुंबई) |
| एस. निजलिंगप्पा | मैसूर (अब कर्नाटक) |
| एन. संजीव रेड्डी | आंध्र प्रदेश |
| अतुल्य घोष | पश्चिम बंगाल |
सिंडिकेट की ताक़त
बॉक्स, पृ. 82
- “इस समूह के नेताओं का पार्टी के संगठन पर नियंत्रण था।”
- ★“लालबहादुर शास्त्री और उसके बाद इंदिरा गाँधी, दोनों ही सिंडिकेट की सहायता से प्रधानमंत्री के पद पर आरूढ़ हुए थे।”
- “इंदिरा गाँधी के पहले मंत्रिपरिषद् में इस समूह की निर्णायक भूमिका रही।”
- ! पर 1971 के बाद “भारतीय राजनीति के ये बड़े और ताकतवर नेता प्रभावहीन हो गए।”
के. कामराज (1903–1975)
जीवनी-बॉक्स, पृ. 81
- स्वतंत्रता-सेनानी और कांग्रेस के नेता; मद्रास (तमिलनाडु) के मुख्यमंत्री रहे।
- ★मद्रास प्रांत में शिक्षा का प्रसार और स्कूली बच्चों को ‘दोपहर का भोजन’ देने की योजना लागू करने के लिए प्रसिद्ध।
- ★★1963 का प्रस्ताव — सभी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता इस्तीफ़ा दें ताकि युवा कार्यकर्ता कमान सँभालें। यह ‘कामराज योजना’ कहलाया।
इंदिरा गाँधी की दो चुनौतियाँ
| # | चुनौती |
|---|---|
| 1 | “‘सिंडिकेट’ के प्रभाव से स्वतंत्र अपना मुकाम बनाने की ज़रूरत थी” |
| 2 | “कांग्रेस ने 1967 के चुनाव में जो ज़मीन खोयी थी उसे भी उन्हें हासिल करना था” |
उनकी असली चाल
★★“उन्होंने एक साधारण से सत्ता-संघर्ष को विचारधारात्मक संघर्ष में बदल दिया।” — पूरे अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य।
दस-सूत्री कार्यक्रम, मई 1967
पृ. 82 — कांग्रेस कार्यसमिति
- बैंकों पर सामाजिक नियंत्रण
- आम बीमा का राष्ट्रीयकरण
- शहरी संपदा और आय का परिसीमन
- खाद्यान्न का सरकारी वितरण; भूमि सुधार
- ग्रामीण गरीबों को आवासीय भूखंड
- ! “सिंडिकेट के नेताओं ने औपचारिक तौर पर स्वीकृति दे दी, लेकिन इसे लेकर उनके मन में गहरे संदेह थे।”
8 | 1969 | राष्ट्रपति चुनाव और कांग्रेस की टूट
दो जनप्रिय घोषणाएँ
पृ. 84
- ★★चौदह अग्रणी बैंकों का राष्ट्रीयकरण।
- ★★भूतपूर्व राजा-महाराजाओं के विशेषाधिकार यानी ‘प्रिवी पर्स’ की समाप्ति।
- ! उस वक्त मोरारजी देसाई उपप्रधानमंत्री और वित्तमंत्री थे; इन्हीं दो मुद्दों पर गहरे मतभेद उभरे और “मोरारजी ने सरकार से किनारा कर लिया।”
राष्ट्रपति चुनाव, 1969
- कारणराष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन की मृत्यु से पद खाली हुआ
- सिंडिकेटतत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष एन. संजीव रेड्डी को आधिकारिक उम्मीदवार बनवाया — इंदिरा गाँधी की असहमति के बावजूद
- इंदिरा★उपराष्ट्रपति वी.वी. गिरि को स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में नामांकन भरने का बढ़ावा दिया
- टकरावअध्यक्ष निजलिंगप्पा का ‘व्हिप’ बनाम इंदिरा गाँधी का “अंतरात्मा की आवाज़ पर वोट”
- परिणाम★★वी.वी. गिरि विजयी — स्वतंत्र उम्मीदवार ने आधिकारिक उम्मीदवार को हराया
वी.वी. गिरि (1894–1980)
जीवनी-बॉक्स, पृ. 83
- 1969 से 1974 तक भारत के राष्ट्रपति; कांग्रेस नेता एवं आंध्र प्रदेश के मज़दूर नेता।
- सिलोन (श्रीलंका) में भारतीय उच्चायुक्त; केंद्रीय श्रम मंत्री; उ.प्र., केरल और मैसूर के राज्यपाल।
- उपराष्ट्रपति (1967–69); ज़ाकिर हुसैन के निधन के बाद कार्यकारी राष्ट्रपति।
- ★इस्तीफ़ा देकर स्वतंत्र प्रत्याशी बने और इंदिरा गाँधी के समर्थन से विजयी।
कार्टून — लक्ष्मण, 21 अगस्त 1969
पृ. 83
- वी.वी. गिरि एक विजयी मुक्केबाज़ के रूप में, गले में माला।
- सिंडिकेट के प्रतीक के रूप में निजलिंगप्पा को घुटने टेकते दिखाया गया है।
- ★★पाठ का प्रश्न: “इस कार्टून में इंदिरा गाँधी को मुक्केबाज़ी वाला दस्ताना पहने क्यों दिखाया गया है?”
- ★संकेत: जीत गिरि की नहीं, परदे के पीछे से लड़ रही इंदिरा गाँधी की थी।
विभाजन — नवंबर 1969
| खेमा | नाम | दूसरा नाम |
|---|---|---|
| सिंडिकेट की अगुवाई | कांग्रेस (ऑर्गनाइजेशन) — कांग्रेस (ओ) | ‘पुरानी कांग्रेस’ |
| इंदिरा गाँधी की अगुवाई | कांग्रेस (रिक्विजिनिस्ट) — कांग्रेस (आर) | ‘नयी कांग्रेस’ |
और उन्होंने इसे क्या नाम दिया
पृ. 84–86
- “कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को अपनी पार्टी से निष्कासित कर दिया।”
- “पार्टी से निष्कासित प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने कहा कि उनकी पार्टी ही असली कांग्रेस है।”
- ★★“इंदिरा गाँधी ने पार्टी की इस टूट को विचारधाराओं की लड़ाई के रूप में पेश किया — ‘समाजवादी’ और ‘पुरातनपंथी’ तथा गरीबों के हिमायती और अमीरों के तरफ़दार के बीच की लड़ाई।”
निष्कासन की चिट्ठी
इतिहास लोकतंत्र की त्रासदी के ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जब जनसमर्थन की लहर के बूते… सत्तासीन हुआ नेता राजनीतिक आत्ममोह का शिकार हो जाता है और चरित्रहीन चाटुकार दरबारियों की बातों में जीने लगता है…
एस. निजलिंगप्पा — इंदिरा गाँधी को लिखी चिट्ठी, 11 नवंबर 1969
‘प्रिवी पर्स’ की समाप्ति
बॉक्स, पृ. 84
- रियासतों के विलय से पहले शासक परिवारों को निजी संपदा और विशेष भत्ते का आश्वासन दिया गया था — इसी को ‘प्रिवी पर्स’ कहा गया।
- ★“ये वंशानुगत विशेषाधिकार भारतीय संविधान में वर्णित समानता और सामाजिक-आर्थिक न्याय के सिद्धांतों से मेल नहीं खाते थे।”
- नेहरू ने कई दफे असंतोष जताया था; मोरारजी देसाई इसकी समाप्ति को “रियासतों के साथ विश्वासघात” मानते थे।
और वह रास्ता जो अंततः मिला★★
बॉक्स, पृ. 84
- ! 1970 में संविधान संशोधन का प्रयास — राज्यसभा में मंजूरी नहीं मिली।
- ! फिर अध्यादेश — पर उसे सर्वोच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया।
- ★★इंदिरा गाँधी ने इसे 1971 के चुनावों का बड़ा मुद्दा बनाया और भारी जन-समर्थन मिला।
- ★1971 की जीत के बाद संविधान में संशोधन हुआ और कानूनी अड़चनें खत्म हो गईं।
- ★★सीख: नीति संसद में हारी, अदालत में हारी — और चुनाव में जीत गई।
9 | 1971 | “इंदिरा हटाओ” बनाम “गरीबी हटाओ”
साहसिक फ़ैसला
पृ. 86
- टूट के बाद सरकार अल्पमत में आ गई; डीएमके और सीपीआई समेत कुछ दलों के मुद्दा-आधारित समर्थन से टिकी रही।
- सरकार ने “सचेत रूप से अपनी छवि को समाजवादी रंग में पेश किया”; भूमि-सुधार के क्रियान्वयन का ज़बरदस्त अभियान।
- ★★दिसंबर 1970 में लोकसभा भंग करने की सिफ़ारिश — “यह भी एक आश्चर्यजनक और साहसिक कदम था।”
- पाँचवें आम चुनाव — फ़रवरी 1971।
मुकाबला
| पक्ष | घटक |
|---|---|
| ‘ग्रैंड अलायंस’ | एसएसपी • पीएसपी • भारतीय जनसंघ • स्वतंत्र पार्टी • भारतीय क्रांतिदल |
| शासक दल | कांग्रेस (आर) + भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) |
कागज़ पर इंदिरा गाँधी कमज़ोर थीं
पृ. 86
- “नयी कांग्रेस एक जर्जर होती हुई पार्टी का हिस्सा भर थी।”
- ! “हर किसी को विश्वास था कि कांग्रेस पार्टी की असली सांगठनिक ताकत कांग्रेस (ओ) के नियंत्रण में है।”
पर एक चीज़ उनके पास थी
★★“नयी कांग्रेस के पास एक मुद्दा था; एक अजेंडा और कार्यक्रम था। ‘ग्रैंड अलायंस’ के पास कोई सुसंगत राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था।”
दो नारे, दो राजनीतियाँ
| विपक्ष | इंदिरा गाँधी |
|---|---|
| ! “इंदिरा हटाओ” | ★★“गरीबी हटाओ” |
| नकारात्मक — एक व्यक्ति के बारे में | सकारात्मक — जनता के बारे में |
| कोई कार्यक्रम नहीं | सार्वजनिक क्षेत्र की संवृद्धि, भू-परिसीमन, असमानता की समाप्ति, प्रिवी पर्स की समाप्ति |
‘गरीबी हटाओ’ का लक्ष्य-वर्ग
पृ. 86
- भूमिहीन किसान • दलित और आदिवासी • अल्पसंख्यक • महिलाएँ • बेरोज़गार नौजवान
- ★“‘गरीबी हटाओ’ का नारा और इससे जुड़ा हुआ कार्यक्रम इंदिरा गाँधी की राजनीतिक रणनीति थी।”
- इसके सहारे वे “देशव्यापी राजनीतिक समर्थन की बुनियाद तैयार करना चाहती थीं।”
1971 के परिणाम — ये आँकड़े याद रखिए
| दल / गठबंधन | सीटें | वोट |
|---|---|---|
| ★★कांग्रेस (आर) + सीपीआई | 375 | 48.4% |
| ★अकेले कांग्रेस (आर) | 352 | 44% |
| ! कांग्रेस (ओ) | 16 | इंदिरा गाँधी की पार्टी के वोटों का लगभग एक-चौथाई |
| ! ‘ग्रैंड अलायंस’ | 60 से भी कम | — |
और उसके बाद
पृ. 87–88
- ★“उतनी कांग्रेस पिछले चार आम चुनावों में कभी हासिल न कर सकी थी।”
- ★★“इंदिरा गाँधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने अपने दावे को साबित कर दिया कि वही ‘असली कांग्रेस’ है।”
- 1971 का बांग्लादेश युद्ध — “इन घटनाओं से इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता में चार चाँद लग गए।”
- 1972 के राज्य विधानसभा चुनावों में व्यापक सफलता; “कांग्रेस अब लगभग सभी राज्यों में सत्ता में थी।”
- ★“महज चार साल की अवधि में इंदिरा गाँधी ने… चुनौतियों को धूल चटा दी थी।”
10 | निष्कर्ष | पुनर्स्थापन हुआ — पर किसका?
नयी कांग्रेस की पाँच विशेषताएँ
| # | विशेषता |
|---|---|
| 1 | लोकप्रियता वही, “लेकिन यह अलग किस्म की पार्टी थी” |
| 2 | ★★“पूर्णतया अपने सर्वोच्च नेता की लोकप्रियता पर आश्रित” |
| 3 | ! “सांगठनिक ढाँचा भी अपेक्षाकृत कमजोर” |
| 4 | ★★“भीतर कई गुट नहीं थे” — यानी विभिन्न मतों को साथ लेकर चलने वाली पार्टी नहीं रही |
| 5 | जीत के लिए गरीब, महिला, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों पर ज्यादा निर्भर |
अध्याय का उत्तर
★★“इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस प्रणाली को पुनर्स्थापित ज़रूर किया, लेकिन कांग्रेस-प्रणाली की प्रकृति को बदलकर।”
और जो चीज़ खो गई★★
पृ. 89 — यह सबसे गहरा अनुच्छेद है
- “कांग्रेस प्रणाली के भीतर हर तनाव और संघर्ष को पचा लेने की क्षमता थी।”
- ! “नयी कांग्रेस ज्यादा लोकप्रिय होने के बावजूद इस क्षमता से हीन थी।”
- !★“जनता की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति की लोकतांत्रिक ज़मीन छोटी पड़ती गई।”
- “विकास और आर्थिक बदहाली के मुद्दों पर जनाक्रोश तथा लामबंदी लगातार बढ़ती रही।”
- ★★और यहीं से अगला अध्याय शुरू होता है — “देश के संवैधानिक लोकतंत्र के अस्तित्व पर ही खतरा मँडराने लगा था।”
पाठ का अपना प्रश्न
यह तो कुछ ऐसा ही है कि कोई मकान की बुनियाद और छत बदल दे फिर भी कहे कि मकान वही है। पुरानी और नयी कांग्रेस में कौन-सी चीज़ समान थी?
पाठ्यपुस्तक का हाशिया-प्रश्न, पृ. 89
फ़िल्म — ‘ज़ंजीर’ (1973)
सिने-संसार, पृ. 89
- निर्देशक: प्रकाश मेहरा। पटकथा: सलीम खान-जावेद अख्तर। अभिनय: अमिताभ बच्चन, अजित, जया भादुड़ी, प्राण।
- “इस फ़िल्म में नैतिक मूल्यों के पतन और उससे उपजी कुंठा को बहुत प्रभावशाली ढंग से दिखाया गया है।”
- ★★“‘ज़ंजीर’ के साथ सातवें दशक में एक नए तरह के गुस्सैल नौजवान नायक का जन्म हुआ।”
- ★1973 में परदे पर गुस्सा, 1974 में सड़कों पर आंदोलन — एक ही निराशा की दो अभिव्यक्तियाँ।
11 | प्रश्नावली की कुंजी | दस मिनट में तैयारी
पृ. 90
- प्रश्न 1 का सही उत्तर: ✓ (क) — “कांग्रेस लोकसभा के चुनाव में विजयी रही, लेकिन कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव वह हार गई।”
- प्रश्न 4 का सही उत्तर: ✓ (क) — “इसका गठन गैर-कम्युनिस्ट और गैर-कांग्रेसी दलों ने किया था।”
- ! (ख) गलत है क्योंकि पाठ कहता है “‘ग्रैंड अलायंस’ के पास कोई सुसंगत राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था।”
प्रश्न 2 — मेल कीजिए
| पद | ✓ मेल |
|---|---|
| (क) सिंडिकेट | (iv) कांग्रेस के भीतर ताकतवर और प्रभावशाली नेताओं का एक समूह |
| (ख) दल-बदल | (i) निर्वाचित प्रतिनिधि का जीतने के बाद दूसरे दल में चले जाना |
| (ग) नारा | (ii) लोगों का ध्यान आकर्षित करने वाला एक मनभावन मुहावरा |
| (घ) गैर-कांग्रेसवाद | (iii) कांग्रेस और इसकी नीतियों के खिलाफ़ अलग-अलग विचारधाराओं की पार्टियों का एकजुट होना |
प्रश्न 3 — नारे और नेता
| नारा | नेता |
|---|---|
| जय जवान, जय किसान | लालबहादुर शास्त्री |
| इंदिरा हटाओ! | ‘ग्रैंड अलायंस’ के विपक्षी दल |
| गरीबी हटाओ! | इंदिरा गाँधी |
प्रश्न 6 — 1967 की हार के कारण
(क) से (ङ) में से कौन-कौन स्वीकार्य
- ✓ (क) करिश्माई नेता का अभाव — “कांग्रेस पहली बार नेहरू के बिना मतदाताओं का सामना कर रही थी।”
- ✓ (ग) क्षेत्रीय, जातीय और सांप्रदायिक समूहों की लामबंदी — डीएमके का हिंदी-विरोधी आंदोलन इसका प्रमाण।
- ✓ (घ) गैर-कांग्रेसी दलों के बीच एकजुटता — यही ‘गैर-कांग्रेसवाद’ है।
- ✓ (ङ) पार्टी के अंदर मतभेद — इंदिरा बनाम सिंडिकेट।
- ! (ख) ‘पार्टी के भीतर टूट’ — औपचारिक टूट 1969 में हुई, 1967 से पहले नहीं। इसलिए यह कारण नहीं माना जा सकता।
प्रश्न 7 — 1970 के दशक में लोकप्रियता के कारण
पाँच बिंदु
- ‘गरीबी हटाओ’ का सकारात्मक कार्यक्रम और वंचित तबकों में समर्थन-आधार।
- 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण और ‘प्रिवी पर्स’ की समाप्ति।
- भूमि सुधार और भू-परिसीमन के कानून।
- ★1971 के बांग्लादेश युद्ध में जीत — “विपक्ष के नेताओं तक ने उसके राज्यकौशल की प्रशंसा की।”
- छवि: “गरीबों और वंचितों के रक्षक और एक मज़बूत राष्ट्रवादी नेता”।
प्रश्न 9 — कांग्रेस 1969 में किन मसलों पर टूटी
चार कड़ियाँ क्रम से
- सत्ता-संघर्ष: सिंडिकेट का नियंत्रण बनाम इंदिरा गाँधी की स्वतंत्रता।
- विचारधारा: दस-सूत्री कार्यक्रम को लेकर सिंडिकेट के “गहरे संदेह”।
- ★नीतियाँ: 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स की समाप्ति — इन्हीं पर मोरारजी देसाई सरकार से बाहर हुए।
- ★★निर्णायक मोड़: 1969 का राष्ट्रपति चुनाव — ‘व्हिप’ बनाम ‘अंतरात्मा की आवाज़’, और गिरि की जीत।
प्रश्न 10 — कविराज का अवतरण
तीनों उपप्रश्नों की दिशा
- (क) अंतर: नेहरू के समय कांग्रेस “संघीय, लोकतांत्रिक और विचारधाराओं के समाहार का मंच” थी; इंदिरा गाँधी ने उसे “अत्यंत केंद्रीकृत और अलोकतांत्रिक पार्टी संगठन” में बदल दिया।
- (ख) ‘मर गई’ क्यों: ★क्योंकि वह चुनाव जीतती रही पर एक जीवित संगठन नहीं रही — “नारे उछाले गए, लेकिन उसी के अनुकूल नीतियाँ नहीं बनीं।” पाठ भी कहता है कि उसका सांगठनिक ढाँचा कमज़ोर हो गया।
- (ग) दूसरी पार्टियों पर असर: ★विपक्ष भी नेता-केंद्रित और नारा-केंद्रित होता गया; गठबंधन और दल-बदल स्थायी परिघटना बन गए।
12 | पुनरावृत्ति | बारह तिथियाँ, एक कहानी
पूरा अध्याय एक नज़र में
- 1963‘कामराज योजना’ का प्रस्ताव
- 1964★मई — नेहरू की मृत्यु; शास्त्री निर्विरोध प्रधानमंत्री बने
- 1965पाकिस्तान से युद्ध; ‘जय जवान-जय किसान’
- 1966! 11 जनवरी — ताशकंद में शास्त्री का निधन; गुप्त मतदान में इंदिरा गाँधी विजयी; रुपये का अवमूल्यन
- 1967★★फरवरी — चौथे आम चुनाव, ‘राजनीतिक भूकंप’; कांग्रेस 9 राज्यों में सत्ता से बाहर
- 1967मई — कांग्रेस कार्यसमिति का दस-सूत्री कार्यक्रम; ‘आया राम-गया राम’
- 1969★ज़ाकिर हुसैन की मृत्यु; राष्ट्रपति चुनाव में वी.वी. गिरि विजयी
- 1969★14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण; प्रिवी पर्स समाप्ति की घोषणा; मोरारजी देसाई सरकार से बाहर
- 1969★★11 नवंबर — निष्कासन; नवंबर तक कांग्रेस (ओ) और कांग्रेस (आर)
- 1970! प्रिवी पर्स संशोधन राज्यसभा में विफल; अध्यादेश निरस्त; दिसंबर में लोकसभा भंग
- 1971★★फरवरी — पाँचवें आम चुनाव: 375 सीटें, 48.4% वोट; कांग्रेस (ओ) को 16
- 1972★राज्य विधानसभा चुनावों में व्यापक सफलता — दबदबा पुनर्स्थापित
अंतिम बात
★★कांग्रेस लौटी, पर वही कांग्रेस नहीं थी — ताक़त बढ़ी और असहमति को पचाने की क्षमता घट गई। और उसी से अगला संकट जन्मा।

