← पाठ पर लौटिएPDF डाउनलोड कीजिए

कक्षा 12 · इतिहास

यात्रियों के नज़रिए

अध्याय 5

भरत चौधरी और वनिता कुमारी ने बनाया · marushala.com

→ या Space: अगली · ←: पिछली · Home / End: पहली / आख़िरी · F: पूरी स्क्रीन · B: स्क्रीन ख़ाली · Esc: पूरी स्क्रीन से बाहर। टच स्क्रीन पर दाईं ओर छुइए तो अगली स्लाइड, बाईं ओर छुइए तो पिछली।

अध्याय 5 — यात्रियों के नज़रिए | कक्षा XII इतिहास | भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-2

कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-2)

आपके घर में रोज़ क्या होता है, जो आप कभी डायरी में नहीं लिखेंगे?

  • अब सोचिए — विदेश से आया कोई मेहमान वही बात नोट कर सकता है
  • यही इस पूरे अध्याय की कुंजी है

अध्याय का मूल तर्क

NCERT, पृष्ठ 116

पूरी तरह से भिन्न सामाजिक तथा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आने के कारण ये लेखक दैनिक गतिविधियों तथा प्रथाओं के प्रति अधिक सावधान रहते थे। देशज लेखकों के लिए ये सभी विषय सामान्य थे जो वृत्तांतों में दर्ज करने योग्य नहीं थे।

नज़रिये में यही भिन्नता ही यात्रा-वृत्तांतों को अधिक रोचक बनाती है।

1 | नज़रिया, यात्रा और स्रोत | यात्रा के कारण; वृत्तांतों के प्रकार; तीन यात्री; अध्याय की संरचना

शीर्षक को ध्यान से पढ़िए

अध्याय किस पर है?

  • “यात्रियों के नज़रिए” — मुख्य शब्द ‘नज़रिया’ है, ‘यात्रा’ नहीं
  • उपशीर्षक — “समाज के बारे में उनकी समझ”
  • प्रश्न यह नहीं कि “भारत कैसा था?”
    • प्रश्न यह है — “इन यात्रियों को भारत कैसा लगा — और वे वैसा क्यों देख पाए?”

सूत्र — जो स्थानीय के लिए साधारण है, वही बाहरी के लिए उल्लेखनीय है

लोगों ने यात्राएँ क्यों कीं?

अध्याय की पहली पंक्ति

  • कार्य की तलाश में
  • प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए
  • व्यापारियों, सैनिकों, पुरोहितों तथा तीर्थयात्रियों के रूप में
  • साहस की भावना से प्रेरित होकर
  • अध्याय के तीन यात्री — तीन अलग कारण
    • अल-बिरूनी — विवशता (बंधक)
    • इब्न बतूता — जिज्ञासा
    • बर्नियर — अवसर की तलाश

वृत्तांतों के चार प्रकार

प्रकारविषयउदाहरण
दरबारीदरबार की गतिविधियाँबर्नियर (आंशिक)
धार्मिकधार्मिक विषयतीर्थयात्रियों के वृत्तांत
स्थापत्यइमारतें व स्मारकअब्दुर रज़्ज़ाक — विजयनगर
प्रशासनिकसाम्राज्य के भीतर भ्रमणमुग़ल अधिकारी

यात्री का अर्थ केवल विदेशी नहीं — अपने ही देश में भ्रमण करता अधिकारी भी यात्री है

अध्याय का सबसे बड़ा मौन

पहले ही पृष्ठ की स्वीकारोक्ति

  • “दुर्भाग्य से हमारे पास महिलाओं द्वारा छोड़े गए वृत्तांत लगभग न के बराबर हैं”
    • “हालाँकि हम यह जानते हैं कि वे भी यात्राएँ करती थीं”
  • अंतिम पृष्ठ पर यह फिर दोहराया गया है
  • काल-रेखा में भी एक भी महिला यात्री नहीं

यह वही ‘मौन का साक्ष्य’ है जो भाग-1 के अध्याय 1, 3 और 4 में मिला था

तीन यात्री — परिचय-कार्ड

अल-बिरूनीइब्न बतूताबर्नियर
कहाँ सेख़्वारिज़्म (उज़्बेकिस्तान)तैंजियर (मोरक्को)फ्रांस
काल973–10481304–771620–88
कृतिकिताब-उल-हिन्दरिह़लाट्रैवल्स इन द मुग़ल एम्पायर
भाषाअरबीअरबीफ्रांसीसी

तीनों में से कोई भी किसी भारतीय भाषा में नहीं लिखता — उनके पाठक भारत से बाहर थे

अध्याय की छिपी हुई संरचना

चक्रखंडप्रश्न
पहला चक्र§1, §2, §3ये कौन थे?
दूसरा चक्र§4, §5, §6इन्होंने कैसे देखा?
समापन§7इन्होंने किसे नहीं देखा?

क्रम भी वही — अल-बिरूनी (§1→§4), इब्न बतूता (§2→§5), बर्नियर (§3→§6)

2 | अल-बिरूनी तथा किताब-उल-हिन्द | ख़्वारिज़्म से पंजाब; अनुवाद का पुल; अस्सी अध्यायों का ग्रंथ; ‘हिंदू’ शब्द का इतिहास

ख़्वारिज़्म से ग़ज़नी तक

§1.1 — जीवन

  • जन्म सन् 973, ख़्वारिज़्म — “शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र”
  • भाषाएँ — सीरियाई, फ़ारसी, हिब्रू तथा संस्कृत
    • यूनानी नहीं जानता था — पर अरबी अनुवादों से प्लेटो आदि से पूरी तरह परिचित
  • 1017 ई. — सुल्तान महमूद का ख़्वारिज़्म पर आक्रमण
    • विद्वान व कवि ग़ज़नी ले जाए गए
  • “वह बंधक के रूप में ग़ज़नी आया था”
    • पर सत्तर वर्ष की आयु में मृत्यु तक शेष जीवन वहीं बिताया

जो व्यक्ति स्वेच्छा से नहीं आया, उसी ने सबसे सहानुभूतिपूर्ण ग्रंथ लिखा

भारत के प्रति रुचि — तीन कारण

§1.1

  • पूर्ववर्ती अनुवाद-परंपरा
    • “आठवीं शताब्दी से ही संस्कृत में रचित खगोल-विज्ञान, गणित और चिकित्सा संबंधी कार्यों का अरबी में अनुवाद होने लगा था”
  • राजनीतिक संपर्क
    • पंजाब के ग़ज़नवी साम्राज्य में आने से “आपसी विश्वास और समझ का वातावरण”
  • व्यक्तिगत अध्ययन
    • “ब्राह्मण पुरोहितों तथा विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताए”

यात्रा-कार्यक्रम स्पष्ट नहीं — मुख्यत: पंजाब व उत्तर भारत

अनुवाद — एक दोतरफ़ा पुल

साइड-बॉक्स, पृष्ठ 116

संस्कृत → अरबी

  • पतंजलि का व्याकरण पर ग्रंथ
  • अन्य संस्कृत कृतियाँ
  • दंतकथाओं से खगोल-विज्ञान तक

यूनानी → संस्कृत

  • यूक्लिड (यूनानी गणितज्ञ) के कार्य
  • “अपने ब्राह्मण मित्रों के लिए”
  • अर्थात् ज्ञान केवल आया नहीं — गया भी

अल-बिरूनी केवल भारत को समझने नहीं आया — वह भारत को कुछ देकर भी गया

किताब-उल-हिन्द

§1.2

  • भाषा अरबी — “भाषा सरल और स्पष्ट”
  • अस्सी (80) अध्याय
  • विषय — धर्म और दर्शन, त्योहार, खगोल-विज्ञान, कीमिया, रीति-रिवाज, प्रथाएँ
    • सामाजिक जीवन, भार-तौल, मापन विधियाँ, मूर्तिकला, कानून, मापतंत्र विज्ञान
  • “मापतंत्र विज्ञान मापने के विज्ञान से संबंध रखता है”

अस्सी अध्यायों की एक ही संरचना

प्रश्न → वर्णन → तुलना

“लगभग ज्यामितीय संरचना, जो अपनी स्पष्टता तथा पूर्वानुमेयता के लिए उल्लेखनीय है” — कारण: अल-बिरूनी का गणित की ओर झुकाव

किसके लिए लिखा गया?

स्रोत 1 — अल-बिरूनी के उद्देश्य

  • “उन लोगों के लिए सहायक जो उनसे (हिंदुओं) धार्मिक विषयों पर चर्चा करना चाहते हैं”
  • “और ऐसे लोगों के लिए एक सूचना का संग्रह जो उनके साथ संबद्ध होना चाहते हैं”
  • पाठक — उपमहाद्वीप के सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले लोग
  • “1500 ई. से पहले भारत में कुछ ही लोगों ने पढ़ा होगा, भारत से बाहर कई अन्य लोगों ने”

किताब भारत के बारे में थी — पर भारत के लिए नहीं

‘हिंदू’ शब्द कहाँ से आया?

पहले भूगोल, बहुत बाद में धर्म

फ़ारसी (सिंधु के पूर्व का क्षेत्र) → अरबी (अल-हिंद, हिंदी) → तुर्क (हिंदू, हिंदुस्तान, हिंदवी)

नाम स्वयं एक इतिहास रखता है

साइड-बॉक्स ‘हिंदू’, पृष्ठ 117

इनमें से कोई भी शब्द लोगों की धार्मिक पहचान का द्योतक नहीं था। इस शब्द का धार्मिक संदर्भ में प्रयोग बहुत बाद की बात है।

तुलना कीजिए — ‘पुरोहित-राजा’ (अ.1) • ‘म्लेच्छ’ (अ.3) • ‘हीनयान’ (अ.4)

3 | इब्न बतूता का रिह़ला | बाईस वर्ष का यात्री; दिल्ली का क़ाज़ी; एक ग्रंथ जो लिखवाया गया

घोंसले से निकलता पक्षी

स्रोत 2 — रिह़ला

मैं अकेला ही निकल पड़ा, बिना किसी साथी यात्री… या कारवाँ के… अपने घर को ऐसे ही छोड़ दिया जैसे पक्षी अपने घोंसलों को छोड़ देते हैं… उस समय मेरी उम्र बाईस वर्ष थी।

वह 1354 में लौटा — यात्रा आरंभ करने के लगभग तीस वर्ष बाद

एक आरंभिक विश्व-यात्री

§2.1

  • जन्म तैंजियर, मोरक्को — परिवार शरिया (इस्लामी कानून) का विशेषज्ञ
  • “कम उम्र में ही शास्त्ररूढ़ शिक्षा हासिल की”
  • मूल भेद अल-बिरूनी से:
    • “अपनी श्रेणी के अन्य सदस्यों के विपरीत, इब्न बतूता पुस्तकों के स्थान पर यात्राओं से अर्जित अनुभव को ज्ञान का अधिक महत्त्वपूर्ण स्रोत मानता था”

एक ने पुस्तकालय में भारत को खोजा, दूसरे ने सड़क पर

इब्न बतूता की यात्रा

  1. 1332-33 से पहलेमक्का, सीरिया, इराक, फ़ारस, यमन, ओमान, पूर्वी अफ़्रीका
  2. 1333स्थलमार्ग से सिंध; फिर मुल्तान व उच्छ होकर दिल्ली
  3. दिल्लीमुहम्मद बिन तुग़लक़ ने क़ाज़ी नियुक्त किया — बाद में कारागार, फिर पुनर्स्थापन
  4. 1342मंगोल शासक के पास सुल्तान के दूत के रूप में चीन जाने का आदेश
  5. आगेमालाबार → मालद्वीप (18 माह क़ाज़ी) → श्रीलंका → बंगाल व असम
  6. फिरसुमात्रा होकर चीनी बंदरगाह ज़ायतुन (क्वानझू) → बीजिंग
  7. 1354घर वापसी — लगभग तीस वर्ष बाद

यात्रा में कितना समय लगता था?

मार्गदिन
मुल्तान → दिल्ली40
सिंध → दिल्लीलगभग 50
दौलताबाद → दिल्ली40
ग्वालियर → दिल्ली10

इन आँकड़ों को याद रखिए — डाक-व्यवस्था वाली स्लाइड पर इनकी ज़रूरत पड़ेगी

यात्रा के ख़तरे

§2.1

  • “यह विश्व-यात्री चौदहवीं शताब्दी में यात्राएँ कर रहा था, जब आज की तुलना में यात्रा करना अधिक कठिन तथा जोखिम भरा कार्य था”
  • डाकू — “इब्न बतूता ने कई बार डाकुओं के समूहों द्वारा किए गए आक्रमण झेले”
    • मुल्तान से दिल्ली के मार्ग में उसके कारवाँ पर आक्रमण
    • “कई साथी यात्रियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा; जो जीवित बचे… बुरी तरह घायल”
  • बीमारी व एकाकीपन — साइड-बॉक्स ‘एकाकी यात्री’
    • ज्वर में “पगड़ी के कपड़े को ज़ीन से बाँध लिया”
    • “अपने एकाकीपन से मैं इतना उदास हुआ कि… बहुत रोया”

रिह़ला किसने लिखा?

  • इब्न बतूता ने स्वयं नहीं
  • और यह तथ्य पूरे वृत्तांत को पढ़ने का ढंग बदल देता है

एक ग्रंथ जो आदेश पर लिखवाया गया

स्रोत 3 — इब्न जुज़ई की प्रस्तावना

(राजा के द्वारा) एक शालीन निर्देश दिया गया कि वे अपनी यात्रा में देखे गए शहरों का… वृत्तांत लिखवाएँ… उन्होंने कई प्रकार के असाधारण विवरण जिनके प्रतिपादन से लाभप्रद उपदेश मिलते हैं, दिए तथा असाधारण चीज़ों के बारे में बताया।

इब्न जुज़ई — जिसे श्रुतलेखों को लिखने के लिए नियुक्त किया गया था

स्रोत 3 से पाँच निष्कर्ष

अध्याय का सबसे महत्त्वपूर्ण पद्धतिगत सूत्र

  • रिह़ला श्रुतलेखन से बना — इब्न जुज़ई ने लिखा
  • यह राजकीय आदेश पर बना
  • विषय-सूची पहले से तय थी — शहर, रोचक घटनाएँ, शासक, साहित्यकार, संत
  • उद्देश्य दोहरा — मनोरंजन तथा “लाभप्रद उपदेश”
  • ‘असाधारण’ पर सचेत बल

जिस वृत्तांत का उद्देश्य ही ‘असाधारण’ बताना हो, उसमें ‘साधारण’ का अभाव होगा

4 | बर्नियर : एक विशिष्ट चिकित्सक | यूरोपीय यात्रियों का आगमन; बारह वर्ष; मुद्रण की शक्ति

यूरोपीय यात्रियों का आगमन

§3

  • लगभग 1500 ई. — पुर्तगालियों का आगमन
    • रॉबर्टो नोबिली — भारतीय ग्रंथों का यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद
    • दुआर्ते बरबोसा — दक्षिण भारत के व्यापार व समाज का विस्तृत विवरण
  • 1600 ई. के बाद — डच, अंग्रेज़ तथा फ्रांसीसी यात्रियों की संख्या बढ़ी
    • ज्यौं-बैप्टिस्ट तैवर्नियर — फ्रांसीसी जौहरी, छह बार भारत आया
    • मनूकी — इतालवी चिकित्सक, “कभी भी यूरोप वापस नहीं गए और भारत में ही बस गए”

फ्रांस्वा बर्नियर

§3

  • चिकित्सक + राजनीतिक दार्शनिक + इतिहासकार — इसीलिए ‘विशिष्ट’
  • भारत में 1656 से 1668 तक — बारह वर्ष
  • पहले दारा शिकोह (शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र) के चिकित्सक
  • फिर दानिशमंद ख़ान (आर्मीनियाई अमीर) के साथ बुद्धिजीवी तथा वैज्ञानिक
  • कृति — ट्रैवल्स इन द मुग़ल एम्पायर

किसके लिए लिखा?

§3.1 — यह प्रश्न सब कुछ बदल देता है

  • प्रमुख कृति फ्रांस के शासक लुई XIV को समर्पित
  • अन्य कार्य “प्रभावशाली आधिकारियों और मंत्रियों को पत्रों के रूप में”
  • “लगभग प्रत्येक दृष्टांत में बर्नियर ने भारत की स्थिति को यूरोप में हुए विकास की तुलना में दयनीय बताया”
  • NCERT स्वयं चेतावनी देती है:
    • “उसका आकलन हमेशा सटीक नहीं था”

बर्नियर की किताब भारत के बारे में है — पर भारत के लिए नहीं

हस्तलिपि बनाम मुद्रण

§3.1 — क्यों बर्नियर की बात दूर तक गई

अल-बिरूनी व इब्न बतूता

  • प्रसार हस्तलिपियों के रूप में
  • “1800 से पहले सामान्यत: प्रकाशित नहीं होते थे”
  • पहुँच सीमित

बर्नियर

  • 1670-71 में फ्रांस में प्रकाशित
  • पाँच वर्षों में अंग्रेज़ी, डच, जर्मन, इतालवी में अनूदित
  • फ्रांसीसी में 8 बार, अंग्रेज़ी में 3 बार पुनर्मुद्रण

किसका विचार फैलेगा — यह गुणवत्ता से कम, तकनीक से अधिक तय होता है

5 | एक अपरिचित संसार की समझ | अल-बिरूनी के तीन अवरोध; जाति-व्यवस्था; अपवित्रता का खंडन

अल-बिरूनी के तीन अवरोध

भाषा • धर्म-प्रथा • अभिमान

“उसने कई ‘अवरोधों’ की चर्चा की है जो उसके अनुसार समझ में बाधक थे” — §4.1

तीनों अवरोध विस्तार से

§4.1

  • भाषा — “संस्कृत, अरबी और फ़ारसी से इतनी भिन्न थी कि विचारों और सिद्धांतों को एक भाषा से दूसरी में अनुवादित करना आसान नहीं था”
  • धार्मिक अवस्था और प्रथा में भिन्नता
  • अभिमान
    • पहले दो बाहरी हैं — तीसरा भीतरी
    • और वह दोनों पक्षों पर लागू होता है

संस्कृत के विषय में उसका प्रेक्षण — “अरबी भाषा की तरह ही, इस भाषा की पहुँच बहुत विस्तृत है”

पर एक अवरोध वह स्वयं पार नहीं कर सका

§4.1 — अध्याय की सबसे सुंदर विडंबना

  • “यहाँ रोचक बात यह है कि इन समस्याओं की जानकारी होने पर भी, अल-बिरूनी लगभग पूरी तरह से ब्राह्मणों द्वारा रचित कृतियों पर आश्रित रहा”
  • उसने अंश उद्धृत किए — वेदों, पुराणों, भगवद्गीता, पतंजलि की कृतियों तथा मनुस्मृति से
  • ये ग्रंथ एक ही वर्ग के दृष्टिकोण से लिखे थे — और आदर्श नियम बताते थे, वास्तविक जीवन नहीं

जो व्यक्ति अवरोधों की सूची बनाता है, वही एक अवरोध पार नहीं कर पाता

यात्री हर बात पर विश्वास नहीं करते थे

साइड-बॉक्स ‘ईश्वर ही जानता है!’

फिर लकड़ी इतने लंबे समय तक अस्तित्व में कैसे रही होगी, विशेष रूप से ऐसे स्थान पर जहाँ हवा और मिट्टी काफ़ी आर्द्र होती है? ईश्वर ही जानता है!

216,432 वर्षों तक बची लकड़ी की मूर्ति की कथा सुनकर अल-बिरूनी की प्रतिक्रिया

जाति व्यवस्था — उसकी विधि

§4.2

  • विधि — “अन्य समुदायों में प्रतिरूपों की खोज के माध्यम से”
  • प्राचीन फ़ारस के चार सामाजिक वर्ग:
    • घुड़सवार और शासक वर्ग
    • भिक्षु, आनुष्ठानिक पुरोहित तथा चिकित्सक
    • खगोल शास्त्री तथा अन्य वैज्ञानिक
    • कृषक तथा शिल्पकार
  • उसका उद्देश्य: “ये सामाजिक वर्ग केवल भारत तक ही सीमित नहीं थे”

ध्यान दीजिए — वह भारत को अनोखा नहीं, तुलनीय बताना चाहता है

और फिर उसने एक मान्यता अस्वीकार कर दी

अपवित्रता

“जाति व्यवस्था में सन्निहित अपवित्रता की अवधारणा प्रकृति के नियमों के विरुद्ध थी” — §4.2

प्रकृति से लिया गया तर्क

§4.2 — अध्याय का सबसे शक्तिशाली बौद्धिक क्षण

  • “हर वह वस्तु जो अपवित्र हो जाती है, अपनी पवित्रता की मूल स्थिति को पुन: प्राप्त करने का प्रयास करती है और सफल होती है”
  • “सूर्य हवा को स्वच्छ करता है”
  • “और समुद्र में नमक पानी को गंदा होने से बचाता है”
  • “यदि ऐसा नहीं होता तो पृथ्वी पर जीवन असंभव होता”

उसने धार्मिक तर्क नहीं दिया — प्राकृतिक-वैज्ञानिक तर्क दिया

स्रोत 5 का अंतिम वाक्य

वर्ण व्यवस्था — पर ध्यान अंत पर दीजिए

अंतिम दो वर्गों के बीच अधिक अंतर नहीं है। लेकिन इन वर्गों के बीच भिन्नता होने पर भी ये एक साथ एक ही शहरों और गाँवों में रहते हैं, समान घरों और आवासों में मिल-जुल कर।

यह ग्रंथ से नहीं आया — यह प्रत्यक्ष प्रेक्षण है

आदर्श बनाम व्यवहार

§4.2 का समापन

  • “अल-बिरूनी का विवरण उसके नियामक संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन से पूरी तरह प्रभावित था”
    • “इन ग्रंथों में ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से… नियमों का प्रतिपादन किया गया था”
  • “लेकिन वास्तविक जीवन में यह व्यवस्था इतनी भी कड़ी नहीं थी”
  • अंत्यज — शाब्दिक अर्थ ‘व्यवस्था से परे’
    • उनसे “किसानों और ज़मींदारों के लिए सस्ता श्रम” अपेक्षित था
    • “हालाँकि ये अकसर सामाजिक प्रताड़ना का शिकार होते थे, फिर भी इन्हें आर्थिक तंत्र में शामिल किया जाता था”

सामाजिक रूप से बहिष्कृत, पर आर्थिक रूप से अनिवार्य

6 | इब्न बतूता तथा अनजाने को जानने की उत्कंठा | नारियल और पान; भारतीय शहर; डाक की एक अनूठी प्रणाली

चौदहवीं सदी का वैश्विक संचार तंत्र

§5

  • “पूरा उपमहाद्वीप एक ऐसे वैश्विक संचार तंत्र का हिस्सा बन चुका था जो पूर्व में चीन से लेकर पश्चिम में उत्तर-पश्चिमी अफ़्रीका तथा यूरोप तक फैला हुआ था”
  • शहरी केंद्रों की विश्ववादी संस्कृति
    • “जहाँ अरबी, फ़ारसी, तुर्की तथा अन्य भाषाएँ बोलने वाले लोग विचारों, सूचनाओं तथा उपाख्यानों का आदान-प्रदान करते थे”
  • रिह़ला में कहानियाँ — धर्मनिष्ठ लोगों की, राजाओं की, और सामान्य पुरुषों व महिलाओं की
  • पर चयन का नियम:
    • “जो भी कुछ अपरिचित था उसे विशेष रूप से रेखांकित किया जाता था”

एक ऐसी चीज़ का वर्णन कीजिए जिसे पाठक ने कभी देखा ही नहीं

  • कोई चित्र नहीं बना सकते
  • वह उसे कभी चख भी नहीं पाएगा
  • इब्न बतूता को यही करना था — नारियल और पान के साथ

नारियल — चार सीढ़ियों का वर्णन

सीढ़ीविधिपाठ से
1परिचित से तुलना“हू-बहू खजूर के वृक्ष जैसे दिखते हैं”
2अंतर स्पष्ट करना“सिवाय एक अपवाद के”
3मानव-शरीर से सादृश्यदो आँखें, एक मुख, मस्तिष्क, बाल
4उपयोगिता बतानारस्सी; जहाज़ की सिलाई; बर्तनों की रस्सी

सीढ़ी 4 सबसे महत्त्वपूर्ण है — यह कौतुक नहीं, तकनीकी साक्ष्य है

लोहे की कीलों के बिना बना जहाज़

स्रोत 6 — नारियल

वे इससे रस्सी बनाते हैं। लोहे की कीलों के प्रयोग के बजाय इनसे जहाज़ को सिलते हैं।

यह हिंद महासागर की ‘सिली हुई नाव’ परंपरा का प्रत्यक्ष प्रमाण है

पान — नकारात्मक परिभाषा की कला

स्रोत 7

  • “पान एक ऐसा वृक्ष है जिसे अंगूर-लता की तरह ही उगाया जाता है”
  • “पान का कोई फल नहीं होता और इसे केवल इसकी पत्तियों के लिए ही उगाया जाता है”
  • सुपारी — “यह जायफल जैसी ही होती है”
  • फिर पूरी प्रक्रिया — तोड़ना, मुँह में रखना, चबाना, पान के साथ चबाना

वह स्वाद नहीं बताता — प्रक्रिया बताता है, क्योंकि पाठक इसे कभी चखेगा नहीं

देहली — स्रोत 8

पहलूविवरण
प्राचीरचौड़ाई ग्यारह हाथ (एक हाथ ≈ 20 इंच)
निर्माण-सामग्रीनिचला भाग पत्थर, ऊपरी भाग ईंट
द्वारअट्ठाईस — सबसे विशाल बदायूँ दरवाज़ा
मांडवी दरवाज़ाभीतर अनाज मंडी
गुल दरवाज़ाबगल में फलों का बगीचा
क़ब्रगाहगुंबद व मेहराब; चमेली व जंगली गुलाब सभी मौसमों में

“एक हाथ लगभग 20 इंच के बराबर” — वह मापन-इकाई का भी अनुवाद कर देता है

बाज़ार — केवल आर्थिक स्थान नहीं

§5.2

  • “बाज़ार मात्र आर्थिक विनिमय के स्थान ही नहीं थे बल्कि ये सामाजिक तथा आर्थिक गतिविधियों के केंद्र भी थे”
  • “अधिकांश बाज़ारों में एक मस्जिद तथा एक मंदिर होता था”
  • “कुछ में तो नर्तकों, संगीतकारों तथा गायकों के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए स्थान भी चिह्नित थे”

मध्यकालीन बाज़ार मंडी, उपासना-स्थल और मंच — तीनों एक साथ था

तारावबाद — संगीत का बाज़ार

स्रोत 9 — दौलताबाद

गायिकाएँ एक के बाद एक झुंडों में उनके समक्ष आकर सूर्यास्त का गीत गाती और नाचती हैं… हिंदू शासकों में से एक… जब भी बाज़ार से गुज़रता था, गुंबद में उतर कर आता था और गायिकाएँ उसके समक्ष गान प्रस्तुत करती थीं। यहाँ तक कि कई मुस्लिम शासक भी ऐसा ही करते थे।

प्रत्येक गुरुवार सुबह का आयोजन — एक साझा सांस्कृतिक परंपरा

भारतीय शहर व अर्थव्यवस्था

§5.2

  • शहर “व्यापक अवसरों से भरपूर” — उनके लिए जिनके पास इच्छा, साधन तथा कौशल था
  • दिल्ली — “भारत में सबसे बड़ा”; दौलताबाद “आकार में दिल्ली को चुनौती देता था”
  • मिट्टी का उपजाऊपन → “किसानों के लिए वर्ष में दो फ़सलें उगाना संभव”
  • “उपमहाद्वीप व्यापार तथा वाणिज्य के अंतर एशियाई तंत्रों से भली-भाँति जुड़ा हुआ था”
  • वस्त्र — सूती कपड़ा, महीन मलमल, रेशम, ज़री तथा साटन
    • “महीन मलमल की कई क़िस्में इतनी महँगी थीं कि उन्हें अमीर वर्ग के तथा बहुत धनाढ्य लोग ही पहन सकते थे”

डाक की एक अनूठी प्रणाली

स्रोत 10

उलुक — अश्व डाक

  • हर चार मील पर राजकीय घोड़े
  • राजकीय अश्वशालाओं से संचालित

दावा — पैदल डाक

  • प्रति मील तीन अवस्थान = एक-तिहाई मील
  • हर तीन मील पर गाँव, बाहर तीन मंडप
  • दो हाथ लंबी छड़, ऊपर ताँबे की घंटियाँ

“यह पैदल डाक व्यवस्था अश्व डाक व्यवस्था से अधिक तीव्र होती है”

पैदल डाक तेज़ क्यों थी?

रिले का सिद्धांत

  • संदेशवाहक एक हाथ में पत्र, दूसरे में घंटी वाली छड़ लेकर दौड़ता है
  • “जब मंडप में बैठे लोग घंटियों की आवाज़ सुनते हैं तो वे तैयार हो जाते हैं”
  • अगला व्यक्ति पत्र लेकर अगले दावा तक दौड़ता है
  • तीन कारण:
    • धावक हर एक-तिहाई मील पर बदलता है — कोई थकता नहीं
    • घंटी के पूर्व-संकेत से प्रतीक्षा-समय शून्य
    • घोड़े को विश्राम व चारा चाहिए, धावक को नहीं

प्रयोग — ख़ुरासान के फलों का परिवहन भी इसी से होता था

यात्री बनाम सूचना

50 दिन बनाम 5 दिन

सिंध से दिल्ली — यात्री को पचास दिन, गुप्तचरों की ख़बर को मात्र पाँच दिन

एक ही यात्री, दो विपरीत प्रतिक्रियाएँ

साइड-बॉक्स ‘एक विचित्र देश?’ — अब्दुर रज़्ज़ाक

कालीकट में जो देखा उसे प्रशंसनीय नहीं माना — “यहाँ ऐसे लोग बसे हुए थे जिनकी कल्पना मैंने कभी भी नहीं की थी।” इन लोगों को उसने एक ‘विचित्र देश’ बताया। … पर मंगलौर में — “मैंने एक ऐसा पूजा-स्थल देखा जो पूरे विश्व में अतुलनीय है… इस शिल्प और कारीगरी के क्या कहने!”

प्रतिक्रिया वस्तु पर उतनी निर्भर नहीं करती, जितनी यात्री की अपनी अपेक्षा पर

7 | बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्व | द्वि-विपरीतता; भूस्वामित्व का प्रश्न; एक आत्म-खंडन

दो यात्री, दो लक्ष्य

§6 की पहली पंक्तियाँ

  • “जहाँ इब्न बतूता ने हर उस चीज़ का वर्णन करने का निश्चय किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक किया”
  • “वहीं बर्नियर… भिन्नता को उजागर करने के प्रति अधिक चिंतित था, विशेष रूप से वे स्थितियाँ जिन्हें उसने अवसादकारी पाया”
  • उसका वास्तविक उद्देश्य:
    • “उसका विचार नीति-निर्माताओं तथा बुद्धिजीवी वर्ग को प्रभावित करने का था”

! शीर्षक में ‘अपविकसित’ उद्धरण-चिह्नों में है — यह बर्नियर का आरोप है, NCERT का मत नहीं

द्वि-विपरीतता — तीन सीढ़ियाँ

भिन्नता → विपरीत → पदानुक्रम

“भारत को यूरोप के प्रतिलोम के रूप में दिखाया गया… जिससे भारत, पश्चिमी दुनिया को निम्न कोटि का प्रतीत हो”

भूस्वामित्व का प्रश्न

§6.1 — बर्नियर की तर्क-शृंखला

  • दावा: “भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव”; “सम्राट सारी भूमि का स्वामी”
  • भूधारक बच्चों को भूमि नहीं दे सकते थे
  • अत: दूरगामी निवेश के प्रति उदासीन
  • अत: “बेहतर” भूधारकों के वर्ग का उदय रुका — जैसा पश्चिमी यूरोप में हुआ
  • परिणाम — कृषि का विनाश, किसानों का उत्पीड़न, सभी वर्गों के जीवन-स्तर में पतन
    • “सिवाय शासक वर्ग के”

उसका प्रसिद्ध वाक्य — “भारत में मध्य की स्थिति के लोग नहीं हैं”

यूरोप के लिए एक चेतावनी

स्रोत 12

उनके राज्य इस प्रकार अच्छी तरह से जुते और बसे हुए, इतनी अच्छी तरह से निर्मित, इतने समृद्ध… नहीं रह जाएँगे जैसा कि हम उन्हें देखते हैं। … वे जल्द ही रेगिस्तान तथा निर्जन स्थानों के, भिखारियों तथा क्रूर लोगों के राजा बनकर रह जाएँगे।

पूरा वाक्य भविष्य-काल में है — और यूरोप के बारे में, भारत के बारे में नहीं

बर्नियर की भूल — और उसका सुधार

§6.1 — NCERT का खंडन

बर्नियर की समझ

  • यह लगान है
  • अत: राजा = भूमि का स्वामी
  • अत: निजी संपत्ति नहीं

वास्तविकता

  • यह उपज पर लगने वाला कर था
  • अबुल फ़ज़्ल: “राजत्व का पारिश्रमिक”
  • “एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह इंगित नहीं करता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था”

भूल का कारण — “क्योंकि भूमि राजस्व की माँग अकसर बहुत अधिक होती थी”

एक भूल जो सिद्धांत बन गई

  1. 17वीं सदीबर्नियर — भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव
  2. 18वीं सदीमॉन्टेस्क्यू — ‘प्राच्य निरंकुशवाद’ का सिद्धांत
  3. 19वीं सदीकार्ल मार्क्स — ‘एशियाई उत्पादन शैली’; “एक निष्क्रिय प्रणाली”
  4. आजNCERT — “ग्रामीण समाज का यह चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था”

वास्तविक ग्रामीण समाज

§6.1 का समापन — “मध्य वर्ग नहीं” का खंडन

  • “ग्रामीण समाज में चारित्रिक रूप से बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद था”
  • बड़े ज़मींदार — “जो भूमि पर उच्चाधिकारों का उपभोग करते थे”
  • बड़ा किसान — “जो किराए के श्रम का प्रयोग करता था और माल उत्पादन में संलग्न रहता था”
  • छोटे किसान — “जो मुश्किल से ही निर्वहन लायक उत्पादन कर पाते थे”
  • “अस्पृश्य” भूमिविहीन श्रमिक (बलाहार)

चार स्तर, दो नहीं — “मध्य की स्थिति के लोग” वास्तव में थे

एक ही लेखक, दो विपरीत चित्र

स्रोत 11 बनाम स्रोत 13

स्रोत 11 — ग़रीब किसान

  • “रेतीली भूमियाँ या बंजर पर्वत”
  • “आबादी भी कम है”
  • “खेती अच्छी नहीं है”
  • किसान “गाँव छोड़कर चले जाते हैं”

स्रोत 13 — भिन्न परिदृश्य

  • “अधिकांश भाग अत्यधिक उपजाऊ”
  • “जनसंख्या पर्याप्त है”
  • “भूमि पर खेती अच्छी होती है”
  • “सोना और चाँदी भारत में आकर कुछ हद तक खो जाता है”

“उसके विवरण कभी-कभी एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं”

राजकीय कारख़ाने — तथ्य सही, निष्कर्ष पूर्वाग्रही

स्रोत 14

  • “संभवत: बर्नियर एकमात्र ऐसा इतिहासकार है जो राजकीय कारख़ानों की कार्यप्रणाली का विस्तृत विवरण प्रदान करता है”
  • छह कक्ष — कसीदाकार • सुनार • चित्रकार • रोगन लगाने वाले • बढ़ई-ख़रादी-दर्जी-जूते बनाने वाले • रेशम-ज़री-मलमल के कारीगर
  • शिल्पकार “हर रोज़ सुबह आते हैं… पूरे दिन कार्यरत रहते हैं”
  • पर उसका निष्कर्ष: “इसी निश्चेष्ट नियमित ढंग से उनका समय बीतता जाता है”

यदि वे रोज़ सुबह से शाम काम करते हैं, तो ‘निश्चेष्ट’ कैसे?

और एक आँकड़ा जो सब बदल देता है

नगरों में 15% जनसंख्या

“यह औसतन उसी समय पश्चिमी यूरोप की नगरीय जनसंख्या के अनुपात से अधिक था” — §6

‘शिविर नगर’ का खंडन

§6 का समापन

  • बर्नियर — नगर “अपने अस्तित्व और बने रहने के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर”
  • NCERT: “बर्नियर एक अतिसरलीकृत चित्रण प्रस्तुत कर रहा था”
  • वास्तव में सभी प्रकार के नगर थे — उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र, तीर्थ स्थान
  • व्यापारी संगठन — महाजन → मुखिया सेठ → अहमदाबाद में नगर सेठ
  • व्यावसायिक वर्ग — हकीम/वैद्य, पंडित/मुल्ला, वकील, चित्रकार, वास्तुविद, संगीतकार, सुलेखक

“कई अन्य… आम लोगों की सेवा द्वारा जीवनयापन करते थे” — सब राज्य पर आश्रित नहीं थे

8 | महिलाएँ : दासियाँ, सती तथा श्रमिक | दो चेतावनियाँ; दास प्रथा; और एक निर्णायक मोड़

पहले दो चेतावनियाँ

§7 की आरंभिक पंक्तियाँ

  • “जिन यात्रियों ने अपने लिखित वृत्तांत छोड़े वे सामान्यतया पुरुष थे”
    • अत: स्त्री-जीवन का विवरण बाहर से, पुरुष-दृष्टि से आया है
  • “कभी-कभी वे सामाजिक पक्षपात को ‘सामान्य’ परिस्थिति मान लेते थे”
    • जो अन्याय था, उसे वे रीति-रिवाज मानकर बिना प्रश्न के दर्ज कर देते थे

दूसरी चेतावनी अधिक गहरी है — तटस्थता स्वयं एक समस्या हो सकती है

दास प्रथा — इब्न बतूता का साक्ष्य

§7

  • “बाज़ारों में दास किसी भी अन्य वस्तु की तरह खुले आम बेचे जाते थे”
  • सिंध — सुल्तान के लिए “घोड़े, ऊँट तथा दास” ख़रीदे
  • मुल्तान — गवर्नर को “किशमिश के बादाम के साथ एक दास और घोड़ा”
  • दिल्ली — नसीरुद्दीन को “एक लाख टके तथा दो सौ दास”
  • “दासों की क़ीमत… बहुत कम होती थी और अधिकांश परिवार… कम से कम एक या दो तो रखते ही थे”

दासों को घोड़ों और बादाम के साथ एक ही सूची में गिना गया — भाषा स्वयं एक साक्ष्य है

दासियाँ और राजकीय गुप्तचरी

स्रोत 15

यह सम्राट की आदत है… हर बड़े या छोटे अमीर के साथ अपने दासों में से एक को रखने की जो उसके अमीरों की मुख़बिरी करता है। वह महिला सफाई कर्मचारियों को भी नियुक्त करता है जो बिना बताए घर में दाख़िल हो जाती हैं… अधिकांश दासियों को हमलों और अभियानों के दौरान बलपूर्वक प्राप्त किया जाता था।

दास-प्रथा श्रम, कौशल और निगरानी — तीनों से जुड़ी थी

सती प्रथा — बर्नियर ने इसे क्यों चुना?

§7

  • “महिलाओं से किया जाने वाला बर्ताव अकसर पश्चिमी तथा पूर्वी समाजों के बीच भिन्नता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक माना जाता था”
  • “इसलिए यह आश्चर्यजनक बात नहीं है कि बर्नियर ने सती प्रथा को विस्तृत विवरण के लिए चुना”
  • उसका अपना प्रेक्षण: “हालाँकि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, अन्य को मरने के लिए बाध्य किया जाता था”
  • स्रोत 16 — लाहौर; बारह वर्ष से अधिक नहीं; “अनिच्छुक पीड़िता”; “जबरन… हाथ और पैर बाँध दिए ताकि वह भाग न जाए”

यात्री वही चुनता है जो उसके तर्क को सबसे अधिक सिद्ध करे

पर स्त्री-जीवन केवल सती नहीं था

कृषि • उत्पादन • व्यापार • अदालत

“लेकिन महिलाओं का जीवन सती प्रथा के अलावा कई और चीज़ों के चारों ओर घूमता था” — §7

महिलाओं की वास्तविक भूमिका

§7 का निर्णायक मोड़

  • “उनका श्रम कृषि तथा कृषि के अलावा होने वाले उत्पादन, दोनों में महत्त्वपूर्ण था”
  • “व्यापारिक परिवारों से आने वाली महिलाएँ व्यापारिक गतिविधियों में हिस्सा लेती थीं”
  • “यहाँ तक कि कभी-कभी वाणिज्यिक विवादों को अदालत के सामने भी ले जाती थीं”
  • “अत: यह असंभाव्य लगता है कि महिलाओं को उनके घरों के ख़ास स्थानों तक परिसीमित कर रखा जाता था”

यात्रियों ने सती देखी, पर बाज़ार में काम करती स्त्री नहीं देखी

सामान्य महिला श्रमिकों ने इन यात्रियों का ध्यान क्यों नहीं खींचा?

  • संकेत — ‘असाधारण’ का नियम
  • संकेत — तीनों किन लोगों के बीच रहे?
  • संकेत — तीनों का लिंग क्या था?

चार कारण

चर्चा-प्रश्न का उत्तर

  • ‘असाधारण’ का नियम — खेत में काम करती स्त्री हर देश में थी, इसलिए ‘लिखने योग्य’ नहीं लगी
  • यात्रियों का सामाजिक दायरा — दरबार, अमीर वर्ग और विद्वान
    • बर्नियर दारा शिकोह व दानिशमंद ख़ान के साथ; इब्न बतूता क़ाज़ी; अल-बिरूनी ब्राह्मण विद्वानों के साथ
  • लेखक पुरुष थे — स्त्री-जगत तक पहुँच सीमित
  • तुलनात्मक ढाँचा — उन्हें वह चाहिए था जो पूर्व-पश्चिम भेद दिखाए

श्रम में भेद कम था — सती में अधिक; इसलिए सती दर्ज हुई

9 | संश्लेषण | तीनों की तुलना; काल-रेखा; और एक अधूरा प्रश्न

तीनों यात्री — अंतिम तुलना

आधारअल-बिरूनीइब्न बतूताबर्नियर
आने का कारणबंधक (विवशता)जिज्ञासा व साहसअवसर की तलाश
ज्ञान का स्रोतग्रंथअनुभवप्रेक्षण + यूरोपीय तुलना
मूल दृष्टिसमझने कीआश्चर्य कीआलोचना की
पाठकसीमांत क्षेत्रों के लोगशासक व अरबी पाठकयूरोपीय नीति-निर्माता
मुख्य सीमाब्राह्मणीय ग्रंथों पर निर्भरता‘असाधारण’ पर बलद्वि-विपरीतता का ढाँचा

तीनों को एक पंक्ति में याद रखिए

पढ़कर • घूमकर • तुलना करके

अल-बिरूनी ने पढ़कर समझा • इब्न बतूता ने घूमकर देखा • बर्नियर ने तुलना करके आँका

काल-रेखा को पढ़ने के तीन तरीके

पृष्ठ 137 — “कुछ यात्री जिन्होंने वृत्तांत छोड़े”

  • भौगोलिक बदलाव
    • 10वीं-15वीं सदी — मध्य व पश्चिम एशिया (उज़्बेकिस्तान, मोरक्को, समरक़ंद, तुर्की, बल्ख़)
    • 16वीं सदी से — यूरोप (पुर्तगाल, स्पेन, इंग्लैंड, फ्रांस)
  • भाषिक बदलाव — अरबी → फ़ारसी → यूरोपीय भाषाएँ
  • तकनीकी बदलाव — हस्तलिपि → मुद्रण

और दो सीमाएँ — इसमें एक भी महिला यात्री नहीं, और एक भी भारतीय यात्री नहीं

अध्याय के दस सूत्र-वाक्य

#सूत्र
1जो स्थानीय के लिए साधारण है, वही बाहरी के लिए उल्लेखनीय है
2अल-बिरूनी ने पढ़कर समझा • इब्न बतूता ने घूमकर देखा • बर्नियर ने तुलना करके आँका
3जिस वृत्तांत का उद्देश्य ही ‘असाधारण’ हो, उसमें ‘साधारण’ का अभाव होगा
4नाम पहले भूगोल का था — धर्म का बहुत बाद में बना
5जो अवरोधों की सूची बनाता है, वही एक अवरोध पार नहीं कर पाता
6भिन्नता देखना ग़लत नहीं; भिन्नता को ऊँच-नीच बना देना ग़लत है
7उसने राशि देखी, प्रकृति नहीं समझी
8एक भूल जब छप जाती है, तो वह सिद्धांत बन जाती है
9तथ्य सही, निष्कर्ष पूर्वाग्रही
10यात्रियों ने सती देखी, पर बाज़ार में काम करती स्त्री नहीं देखी

अध्याय का अंतिम प्रश्न

पृष्ठ 136 — समापन अनुच्छेद

साथ ही उपमहाद्वीप के पुरुषों (और संभवत: महिलाओं) के अनुभव और प्रेक्षण अपेक्षाकृत अज्ञात हैं जिन्होंने समुद्रों और पर्वतों को पार किया… उन्होंने क्या देखा और सुना? … उम्मीद है कि इन पर आने वाले वर्षों में इतिहासकार योजनापूर्ण तरीके से ध्यान केंद्रित करेंगे।

इतिहास एक पूरा उत्तर नहीं — एक चालू काम है

और अंत में

हमने सुना कि बाहर वाले ने भारत को कैसा देखा

अब यह जानना बाक़ी है कि भारतीय ने बाहर की दुनिया को कैसा देखा

जो पढ़ाते हैं, वही लिखते और जाँचते हैं

इसे बनाने वाले

  • भरत चौधरीभरत चौधरीव्याख्यातारा.उ.मा.वि. जेठान्तरी · ब्लॉक समदड़ी, जिला बालोतरा
  • वनिता कुमारीवनिता कुमारीव्याख्यातारा.उ.मा.वि. रामसीन मूंगड़ा · ब्लॉक एवं जिला बालोतरा

MaruShalamarushala.comनिःशुल्क · बिना लॉगिन · हिन्दी और अंग्रेज़ी