अध्याय 11 • महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन • कक्षा XII
कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-3)
सोचिए…
यह अध्याय बताता है — वह मुट्ठी इतनी भारी कैसे बनी। और यह भी — इतिहास उस आदमी को कैसे पढ़ता है।
कहानी यहाँ से शुरू
जनवरी — गाँधी की भारत-वापसी। दो दशक विदेश में — अधिकांश दक्षिण अफ्रीका में, जहाँ वकील से नेता बने।
नेता और इतिहास — अध्याय की कुंजी
- गैरीबाल्डी, वाशिंगटन, हो ची मिन्ह — हर राष्ट्र-निर्माण की अपनी महानायक-कथा
- पर NCERT का पहला ही पाठ: महान व्यक्ति “स्वयं भी इतिहास द्वारा बनाया जाता है”
- इतिहासकार चंद्रन देवनेसन: “दक्षिण अफ्रीका ने ही ‘महात्मा’ बनाया”
- दक्षिण अफ्रीका में — पहली बार सत्याग्रह; धर्म-सौहार्द; जाति-भेदभाव पर चेतावनी
गाँधी-पूजा नहीं — गाँधी-निर्माण की पड़ताल
1 | अनूठा नेता बनने की ओर | 1915-1922 : BHU से चौरी-चौरा तक
1915 का राजनीतिक मंच
- स्वदेशी आंदोलन (1905-07) से उभरे उग्र-राष्ट्रवादी — ‘लाल, बाल, पाल’
- उदारवादी धारा: गोपाल कृष्ण गोखले (गाँधी के मान्य राजनीतिक परामर्शदाता) व मोहम्मद अली जिन्ना
- गोखले की सलाह — एक वर्ष ब्रिटिश भारत की यात्रा: पहले भूमि और लोगों को जानो
बोलने से पहले — देखो और सुनो
हमारी मुक्ति केवल किसानों के माध्यम से ही हो सकती है। न वकील, न डॉक्टर, न ही ज़मींदार इसे सुरक्षित रख सकते हैं।
महात्मा गाँधी — बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का उद्घाटन, फरवरी 1916
BHU-भाषण का दोहरा अर्थ
- मंच पर दानदाता राजा-रईस — और गाँधी ने उन्हीं की उपस्थिति में विशिष्ट वर्ग को आड़े हाथों लिया
- तथ्य का उद्घाटन: तब का राष्ट्रवाद वकीलों-डॉक्टरों-ज़मींदारों का था
- मंशा की उद्घोषणा: गाँधी राष्ट्रवाद को सम्पूर्ण भारतीय जनता का प्रतिनिधि बनाना चाहते थे
- दिसंबर 1916, लखनऊ कांग्रेस: चंपारन का किसान मिला — पहला मैदान मिल गया
घोषणा से प्रयोग तक
तीन स्थानिक संघर्ष (1917-18)
कहाँ-कब
- चंपारन 1917 — बिहार, नील-बाग़ान
- अहमदाबाद 1918 — मिल-मज़दूर
- खेड़ा 1918 — फ़सल चौपट किसान
क्या माँगा
- काश्तकारी की सुरक्षा + फ़सल-चयन की आज़ादी
- काम की बेहतर स्थितियाँ
- लगान-माफ़ी
तीनों स्थानिक — पर इन्हीं से गाँधी ग़रीब जनता से जुड़े
रॉलेट से जलियाँवाला (1919)
- रॉलेट एक्ट: युद्धकालीन प्रेस-प्रतिबंध व बिना जाँच कारावास जारी — देशव्यापी विरोध का आह्वान
- पंजाब में सबसे तीखा ग़ुस्सा — युद्ध-सेवा के बदले ‘ईनाम’ की जगह दमन
- अप्रैल 1919, अमृतसर — जलियाँवाला बाग़: ब्रिगेडियर के हुक्म से सभा पर गोली — 400+ शहीद
- रॉलेट सत्याग्रह से गाँधी सच्चे राष्ट्रीय नेता बने
स्थानिक नेता → राष्ट्रीय नेता
असहयोग + खिलाफ़त
- कार्यक्रम: स्कूल-कॉलेज-न्यायालय का बहिष्कार; कर-बंदी — अंग्रेज़ों से “ऐच्छिक संबंधों का परित्याग”
- दावा: ठीक से पालन हो तो एक वर्ष में स्वराज
- खिलाफ़त (1919-20) से हाथ मिलाया — मुहम्मद अली-शौकत अली; हिंदू-मुस्लिम संयुक्त धारा
- 1921: 396 हड़तालें, 6 लाख श्रमिक, 70 लाख कार्यदिवस; देहात में वन-अवहेलना (आंध्र), कर-बंदी (अवध), बेगार-इनकार (कुमाऊँ)
“1857 के बाद पहली बार राज की नींव हिली”
जनता के अपने तरीक़े
- किसानों-श्रमिकों ने आंदोलन को अपने हितों के मुहावरे में अपनाया
- कभी-कभी स्थानीय नेतृत्व की अवज्ञा करके भी — जनता निष्क्रिय अनुयायी नहीं थी
- लुई फिशर (अमरीकी जीवनी-लेखक): असहयोग = “शांति से नकारात्मक, प्रभाव से सकारात्मक… स्वशासन का प्रशिक्षण”
नेता आंदोलन देता है — अर्थ जनता गढ़ती है
चौरी-चौरा और मुक़दमा
- फरवरी 1922: भीड़ ने थाने पर आक्रमण कर आग लगाई — पुलिसकर्मी मारे गए
- हिंसा से क्षुब्ध गाँधी ने आंदोलन तत्काल वापस लिया — चरम पर पहुँचा आंदोलन रोक दिया
- मार्च 1922: राजद्रोह में गिरफ़्तार; जज ब्रूमफील्ड ने “महान देशभक्त और नेता” कहते हुए 6 वर्ष की सज़ा दी
साधन-शुद्धता लक्ष्य से बड़ी
2 | जन-नेता ‘महात्मा’ कैसे बना | धोती, चरखा और अफ़वाहों का संसार
धोती और चरखा — प्रतीकों की राजनीति
- अन्य नेता — पश्चिमी सूट या भारतीय बंदगला; गाँधी — साधारण धोती
- प्रतिदिन कुछ समय चरखा — मानसिक बनाम शारीरिक श्रम की जाति-आधारित दीवार पर चोट
- जाति से व्यापारी, पेशे से वकील — पर वेशभूषा-जीवनशैली से श्रमिकों जैसे
संदेश शब्दों से पहले शरीर बोलता था
मेरी आपत्ति ‘मशीन के प्रति सनक’ को लेकर है, मशीन को लेकर नहीं… मैं धन का केंद्रीकरण कुछ हाथों में नहीं, सभी के हाथों में करना चाहता हूँ।
महात्मा गाँधी — यंग इंडिया (13-11-1924); स्रोत 1
अफ़वाहों में ‘महात्मा’ — शाहिद अमीन का अध्ययन
- पूर्वी उ.प्र. (गोरखपुर): फरवरी 1921 — नूनखार, देवरिया, चौरी-चौरा, कुसुम्ही के स्टेशनों पर 15-20 हज़ार की भीड़ें
- अफ़वाहें: गाँधी की आलोचना करने वालों पर विपदा — कड़ाहा टूटा, गेहूँ तिल बने; ‘भेनी’ (दान) की होड़
- किसानों के लिए गाँधी — ‘गाँधी बाबा’, ‘गाँधी महाराज’, ‘महात्मा’ — दुर्दशा से मुक्ति दिलाने वाला उद्धारक
- सीख: ‘महात्मा’-छवि जन-कल्पना की रचना भी थी — केवल प्रचार नहीं
स्रोत 2 — सबाल्टर्न इतिहास पाठ्यपुस्तक में
संगठन: करिश्मे के पीछे की मेहनत
- रजवाड़ों में प्रजा मंडल; कांग्रेस-संदेश मातृभाषा में; प्रांतीय समितियाँ भाषाई आधार पर
- व्यापारी-उद्योगपति भी साथ — जी.डी. बिड़ला का खुला समर्थन
- विरोधाभास: गरीब किसान + धनी उद्योगपति — कारण “भिन्न और संभवत: परस्पर विरोधी”
- 1917-22 के अनुयायी: पटेल, नेहरू, राजगोपालाचारी, आज़ाद, बोस, सरोजिनी नायडू…
- 1924 की रिहाई के बाद: खादी + छुआछूत-उन्मूलन — “राजनीतिक जितने, उतने ही समाज सुधारक”
करिश्मा + संगठन + कल्पना = महात्मा
3 | नमक सत्याग्रह | एक मुट्ठी नमक बनाम साम्राज्य
पूर्ण स्वराज और पहला स्वतंत्रता दिवस
- 1928: साइमन कमीशन-विरोध; बारदोली सत्याग्रह को आशीर्वाद
- दिसंबर 1929, लाहौर: नेहरू की अध्यक्षता — ‘पूर्ण स्वराज’ की उद्घोषणा
- 26 जनवरी 1930: देशभर में पहला ‘स्वतंत्रता दिवस’ — प्रतिज्ञा: स्वतंत्रता का “अहरणीय अधिकार”; दमनकारी सरकार को बदलने-समाप्त करने का अधिकार
लक्ष्य अब सन्दिग्ध नहीं — पूर्ण स्वतंत्रता
नमक ही क्यों? — ‘कुशल समझदारी’
- हर घर की अपरिहार्य वस्तु — पर घरेलू निर्माण भी वर्जित; ख़रीद महँगी दुकानों से
- राज्य का एकाधिपत्य — बहुत अलोकप्रिय; कर कभी-कभी मूल्य का 14 गुना
- गाँधी की गिनती (स्रोत 3): नमक-एकाधिकार = ‘चौतरफा अभिशाप’ — ग्राम-उद्योग छीना, प्रकृति-संपदा नष्ट, ख़र्च बढ़ाया, भूखों से 1000%+ उगाही
- वाइसराय इर्विन को पूर्व-सूचना दी — इर्विन महत्त्व समझ न पाए
सबसे साधारण वस्तु = सबसे बड़ा प्रतीक
क़दम-क़दम बढ़ता कारवाँ
साबरमती से दांडी — 12 मार्च 1930 को प्रस्थान, तीन हफ़्तों की पदयात्रा; 6 अप्रैल को समुद्र-जल से नमक बनाकर क़ानून भंग।
जब एक पूरा राष्ट्र उठ खड़ा होता है और सीना तानकर चलने लगता है, तब उसे नेता की ज़रूरत नहीं रह जाती।
महात्मा गाँधी — दांडी, 5 अप्रैल 1930 (स्रोत 4)
आंदोलन देशव्यापी — और जेलें भरीं
- जगह-जगह नमक-क़ानून भंग; वन-क़ानूनों की अवहेलना; कर-बंदी
- ~60,000 गिरफ़्तारियाँ — स्वयं गाँधी भी
- रास्ते के गाँव वसना में सवर्णों से: “अछूतों की सेवा-प्रायश्चित करो… हिंदू-मुसलमान-पारसी-सिख की एकजुटता — ये स्वराज की सीढ़ियाँ हैं”
- अमरीकी पत्रिका टाइम: पहले “तकुए जैसे शरीर” का मज़ाक — हफ़्ते भर में ‘साधु’ और ‘राजनेता’ का सम्मान
उपहास → सम्मान — एक सप्ताह में
नमक-यात्रा के तीन ऐतिहासिक महत्त्व
- 1. विश्व की नज़र: यूरोपीय-अमरीकी प्रेस की व्यापक कवरेज — गाँधी विश्व-मंच पर
- 2. महिलाओं की पहली बड़ी भागीदारी: समाजवादी कमलादेवी चट्टोपाध्याय की सलाह — हज़ारों स्त्रियाँ आंदोलन-गिरफ़्तारी में
- 3. राज की नश्वरता का अहसास: अंग्रेज़ों ने समझा — राज हमेशा नहीं चलेगा; भारतीयों को सत्ता में हिस्सा देना होगा
एक यात्रा — तीन संरचनात्मक परिणाम
गोलमेज़ सम्मेलन — ‘कांग्रेस किसकी?’
- RTC-1 (नवंबर 1930): प्रमुख नेता अनुपस्थित — निरर्थक
- गाँधी-इर्विन समझौता (1931): आंदोलन वापस + क़ैदी रिहा + तटीय नमक-निर्माण की छूट; आलोचना — राजनीतिक स्वतंत्रता का आश्वासन नहीं
- RTC-2 (1931): कांग्रेस के ‘सम्पूर्ण भारत’-दावे की तीन चुनौतियाँ — मुस्लिम लीग, राजे-रजवाड़े, डॉ. अम्बेडकर
लंदन में सवाल — प्रतिनिधित्व का
गाँधी बनाम अम्बेडकर — पृथक निर्वाचिका (स्रोत 5-6)
गाँधी की चिंता
- पृथक्करण से ‘अस्पृश्यों’ की “दासता स्थायी”
- कलंक और गहरा होगा
- असली हल — अस्पृश्यता का विनाश
अम्बेडकर का तर्क
- दमित वर्ग का एकमात्र रास्ता — “राजनीतिक सत्ता में हिस्सा”
- केवल सामाजिक सुधार की प्रतीक्षा असुरक्षित
- संरचनात्मक सुरक्षा चाहिए
दोनों का लक्ष्य एक — रास्ते टकराते हैं; NCERT दोनों को स्रोत-स्वर देती है
1935-1937 : संविधान की सीढ़ी
- 1935 का गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट: सीमित प्रातिनिधिक शासन का आश्वासन
- 1937: सीमित मताधिकार पर पहले चुनाव — 11 में से 8 प्रांतों में कांग्रेस के ‘प्रधानमंत्री’ (गवर्नर की देखरेख में)
- विलिंग्डन का निजी ख़त: “अगर गाँधी न होता तो यह दुनिया वाकई बहुत ख़ूबसूरत होती…” — झुँझलाहट स्वयं गाँधी-प्रभाव का प्रमाण
आंदोलन से चुनावी वैधता तक
4 | भारत छोड़ो से विभाजन तक | 1939-1947
युद्ध और टूटती वार्ताएँ
- सितंबर 1939: WW2 — गाँधी-नेहरू दोनों हिटलर-नात्सी विरोधी; शर्त — युद्धोत्तर स्वतंत्रता के बदले सहयोग
- सरकार ने ठुकराया → अक्टूबर 1939: कांग्रेस-मंत्रिमंडलों का इस्तीफ़ा
- मार्च 1940: लीग का प्रस्ताव — मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों को स्वायत्तता; अब संघर्ष ‘तीन धुरियों’ में
- 1942 क्रिप्स-वार्ता विफल — रक्षा-सदस्य की माँग पर
चर्चिल: “साम्राज्य टुकड़े-टुकड़े करने नहीं आया”
भारत छोड़ो (अगस्त 1942)
- “अंग्रेज़ों भारत छोड़ो” — गाँधी सहित नेतृत्व फ़ौरन गिरफ़्तार
- फिर भी “सही मायने में जनांदोलन” — युवा, समाजवादी (जयप्रकाश नारायण), लाखों सामान्य-जन
- प्रतिसरकारें: सतारा (1943-46: सेवा दल-तूफ़ान दल, जन-अदालतें, कुनबी-दलित समर्थन) व मेदिनीपुर
- इसी दौर में लीग को पंजाब-सिंध में पहचान मिली — जहाँ पहले वजूद नहीं था
नेतृत्वहीन — फिर भी विराट
1946-47 : ध्रुवीकरण से विभाजन
- 1946 चुनाव: सामान्य सीटें — कांग्रेस; मुस्लिम सीटें — लीग → “ध्रुवीकरण पूरा”
- कैबिनेट मिशन (1946) की संघीय योजना विफल
- 16 अगस्त 1946 — ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’: कलकत्ता से शुरू ख़ूनी संघर्ष → बंगाल-बिहार-संयुक्त प्रांत-पंजाब
- फरवरी 1947: माउंटबेटन → अंतिम घोषणा — स्वतंत्रता + विभाजन; 15 अगस्त 1947
आज़ादी आई — पर बँटवारे के साथ
5 | अंतिम वीरतापूर्ण दिन | कलकत्ता का उपवास से 30 जनवरी तक
15 अगस्त 1947 — गाँधी कहाँ थे?
- दिल्ली के उत्सव से दूर — कलकत्ता में; न कार्यक्रम, न झंडा
- 24 घंटे का उपवास — स्वतंत्रता “अकल्पनीय कीमत” पर: राष्ट्र विभाजित, हिंदू-मुसलमान एक-दूसरे की गर्दन पर
- उसी दिन दिल्ली में संविधान सभा के अध्यक्ष ने उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ कहकर बैठक शुरू की
- गाँधी-नेहरू के आग्रह पर कांग्रेस का अल्पसंख्यक-अधिकार प्रस्ताव: भारत होगा “लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र”
विजय-दिवस पर उपवास — यही गाँधी थे
“उनके जीवन का श्रेष्ठतम क्षण”
- विद्वानों की दृष्टि में स्वतंत्रता के बाद के महीने — सत्ता-विहीन गाँधी की नैतिक पराकाष्ठा
- बंगाल में शांति-स्थापना → दिल्ली में हिंदू-मुसलमान-सिख सद्भाव का प्रयास
- सभाओं में क़ुरान की आयतों पर शरणार्थियों की आपत्ति — गाँधी अडिग
- 20 जनवरी 1948: हमला — अविचलित; 26 जनवरी: “बुरी घड़ी बीत चुकी है” की आशा
सबसे अँधेरे समय में सबसे उजला काम
धर्मांधता ने मारा — भाईचारे में विश्वास को
दैनिक प्रार्थना सभा में हत्या — हत्यारा नाथूराम गोडसे। श्रद्धांजलियाँ: जॉर्ज ऑरवेल, एलबर्ट आइंस्टीन; टाइम ने तुलना की — अब्राहम लिंकन के बलिदान से।
6 | गाँधी को कैसे जानें? | इतिहासकार के चार झरोखे
स्रोत-चौकड़ी
| स्रोत | क्या देता है | सावधानी | | भाषण | सार्वजनिक विचार | श्रोता के लिए गढ़ा गया | | निजी पत्र | गुस्सा-पीड़ा, आशा-हताशा की झलक | प्रकाशन-आशंका भाषा तय करती; गाँधी ‘हरिजन’ में पत्र छापते भी थे | | आत्मकथा | स्मृति से लिखा स्व-इतिहास | “अपनी तस्वीर गढ़ने का तरीक़ा” — चुप्पियाँ पढ़ो | | सरकारी ख़ुफ़िया रिपोर्टें | प्रशासनिक नज़र का ब्योरा | जो ‘आला अधिकारी मानना चाहते थे’ वही झलकता | | अख़बार | घटनाओं का समकालीन लेखा | प्रकाशक के पूर्वाग्रह; लंदन बनाम राष्ट्रवादी रिपोर्टिंग भिन्न |
पाक्षिक रिपोर्टें — डरा हुआ आत्म-विश्वास
- गृह विभाग की पंद्रह-दिवसीय गोपनीय रिपोर्टें — दावा: नमक-यात्रा के प्रति “कोई उत्साह नहीं”
- पर वही रिपोर्टें दर्ज करतीं — भीड़ें, श्रद्धा, “महिलाओं की संख्या बढ़ती जा रही है”
- स्रोत 7 (1936 के पत्र): प्रसाद-नेहरू-गाँधी — निजी पत्रों में कांग्रेस का आंतरिक इतिहास; बापू का नेहरू को — अध्यक्षता का “काँटों का ताज… उतारना मत”
स्रोत झूठ नहीं बोलता — स्थिति से बोलता है
गाँधी-युग एक नज़र में
- 1915जनवरी — भारत-वापसी
- 1916फरवरी — BHU-भाषण
- 1917-18चंपारन; खेड़ा-अहमदाबाद
- 1919रॉलेट सत्याग्रह; जलियाँवाला (अप्रैल)
- 1921असहयोग-खिलाफ़त चरम
- 1922फरवरी — चौरी-चौरा; आंदोलन वापस
- 1929दिसंबर — लाहौर: पूर्ण स्वराज
- 193026 जनवरी — स्वतंत्रता दिवस; 12 मार्च — दांडी-प्रस्थान
- 1931गाँधी-इर्विन; RTC-2
- 1935-37एक्ट; चुनाव — 8/11 प्रांत
- 1942अगस्त — भारत छोड़ो
- 194616 अगस्त — प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस
- 194715 अगस्त — स्वतंत्रता-विभाजन; गाँधी कलकत्ता में
- 194830 जनवरी — शहादत
समग्र दृष्टि — पाँच सूत्र
- निर्माण: महात्मा जन्मा नहीं — दक्षिण अफ्रीका, संगठन और जन-कल्पना ने गढ़ा
- जनतंत्रीकरण: BHU की घोषणा → धोती-चरखा → विशिष्ट-वर्गीय राष्ट्रवाद जन-राष्ट्रवाद बना
- प्रतीक: नमक-चरखा-उपवास — साधारण वस्तुओं की असाधारण राजनीति
- प्रतिनिधित्व: RTC की तीन चुनौतियाँ → ध्रुवीकरण → विभाजन — अनसुलझा प्रश्न
- विधि: भाषण-पत्र-आत्मकथा-रिपोर्ट-अख़बार — हर स्रोत स्थिति से बोलता है
याद रहे — “स्वयं भी इतिहास द्वारा बनाया जाता है”
अभ्यास की तैयारी
- मानचित्र: दांडी-मार्ग (साबरमती → वसना → दांडी) — अभ्यास 10
- उद्धरण कंठस्थ: “किसानों के माध्यम से…”, “स्वराज की सीढ़ियाँ”, “नेता की ज़रूरत नहीं”, “काँटों का ताज”, “तस्वीर गढ़ना”
- आँकड़े: 396 हड़तालें • 60,000 गिरफ़्तारियाँ • 8/11 प्रांत • 14-गुना कर
- तिथियाँ: 12 मार्च 1930 • 26 जनवरी 1930 • 16 अगस्त 1946 • 30 जनवरी 1948
अगला अध्याय — विभाजन को समझना

