अध्याय 1 — यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय · भारत और समकालीन विश्व-2 · कक्षा 10
कक्षा — 10 · विषय — इतिहास (भारत और समकालीन विश्व–2) · पृष्ठ — 3 से 28
आप कौन हैं?
आपको कैसे पता कि आप भारतीय हैं? कौन-सी चीज़ें आपको भारतीय बनाती हैं?
दो सौ साल पहले यूरोप ऐसा नहीं था
अध्याय की सबसे पहली बात
- आज हर जगह देश हैं, हर देश की अपनी सरकार, अपना झंडा और अपनी सीमा है
- लेकिन दो सौ साल पहले यूरोप में ऐसे देश थे ही नहीं
- वहाँ राजाओं के राज्य थे, जिनमें अलग-अलग भाषा बोलने वाले लोग रहते थे
- लोगों की पहचान उनके राजा से होती थी, उनके देश से नहीं
- यह अध्याय बताता है कि राजाओं के राज्य कैसे देशों में बदल गए
इसी बदलाव की भावना को राष्ट्रवाद कहते हैं
अध्याय की सबसे ज़रूरी बात
साझेपन की यह भावना अनंत काल से नहीं थी; यह संघर्षों और नेताओं तथा आम लोगों की सरगर्मियों से निर्मित हुई थी।
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 4
इसका मतलब है — राष्ट्र अपने आप नहीं बन जाते, उन्हें लोग बनाते हैं
1 | शुरुआत के दो स्रोत | सॉर्र्यू का चित्र; रेनन का प्रश्न
सॉर्र्यू का चित्र, 1848
पृष्ठ 3 — चित्र 1
- फ़्रांसीसी कलाकार फ़्रेडरिक सॉर्र्यू ने 1848 में चार चित्रों की शृंखला बनाई
- उसने ‘जनतांत्रिक और सामाजिक गणतंत्रों’ से बने संसार का सपना दिखाया
- लोग एक लंबी क़तार में स्वतंत्रता की प्रतिमा की वंदना करते हुए चल रहे हैं
- स्वतंत्रता एक महिला है — एक हाथ में ज्ञानोदय की मशाल, दूसरे में मनुष्य के अधिकारों का घोषणापत्र
- जुलूस का नेतृत्व अमेरिका और स्विट्ज़रलैंड कर रहे हैं, क्योंकि वे तब तक राष्ट्र-राज्य बन चुके थे
- ज़मीन पर निरंकुश संस्थानों के टूटे हुए अवशेष बिखरे हैं
यह चित्र एक कल्पनादर्शी (युटोपिया) है — यानी ऐसा सपना जिसका साकार होना लगभग असंभव है
राष्ट्र क्या है?
एक राष्ट्र लंबे प्रयासों, त्याग और निष्ठा का चरम बिंदु होता है… राष्ट्र एक बड़ी और व्यापक एकता है… उसका अस्तित्व रोज़ जनमत-संग्रह है।
अर्न्स्ट रेनन (1823–92), सॉर्बोन विश्वविद्यालय, 1882
रेनन के अनुसार राष्ट्र समान भाषा, नस्ल, धर्म या क्षेत्र से नहीं बनता
2 | फ़्रांसीसी क्रांति | 1789 — राष्ट्रवाद की पहली अभिव्यक्ति
फ़्रांसीसी क्रांति से क्या बदला
पृष्ठ 5
- राष्ट्रवाद की पहली स्पष्ट अभिव्यक्ति 1789 में फ़्रांसीसी क्रांति के साथ हुई
- 1789 से पहले फ़्रांस पर एक निरंकुश राजा का शासन था
- क्रांति से प्रभुसत्ता राजा के हाथ से निकलकर नागरिकों के समूह के हाथ में चली गई
- क्रांति ने घोषणा की कि अब लोगों द्वारा राष्ट्र का गठन होगा और वे ही उसकी नियति तय करेंगे
प्रभुसत्ता = सबसे ऊपर वाली ताक़त, जिसके ऊपर कोई और न हो
सामूहिक पहचान बनाने के आठ क़दम
यह सीधे 4 अंक का प्रश्न है
| क़दम | इससे क्या हुआ |
|---|---|
| पितृभूमि और नागरिक के विचार | लोगों को लगा वे एक संयुक्त समुदाय हैं |
| नया झंडा — तिरंगा | उसने राजध्वज की जगह ली |
| नेशनल एसेंबली का गठन | जनता के चुने प्रतिनिधियों की सभा बनी |
| केंद्रीय प्रशासनिक व्यवस्था | सभी नागरिकों के लिए समान क़ानून |
| आंतरिक शुल्क समाप्त, एकसमान माप-तौल | पूरे देश में व्यापार आसान |
| क्षेत्रीय बोलियाँ हतोत्साहित | पेरिस की फ़्रेंच साझा भाषा बनी |
हर क़दम ने लोगों के बीच का फ़र्क़ कम किया और एकरूपता बढ़ाई
नेपोलियन — दो अलग चेहरे
पृष्ठ 5–7
जो नुक़सान किया
- फ़्रांस में राजतंत्र वापस लाया
- वहाँ प्रजातंत्र को नष्ट कर दिया
- जीते इलाक़ों में बढ़े हुए कर
- सेंसरशिप और जबरन सैनिक भर्ती
जो फ़ायदा किया
- 1804 की नागरिक संहिता
- जन्म पर आधारित विशेषाधिकार समाप्त
- सामंती व्यवस्था खत्म; किसानों को भू-दासत्व से मुक्ति
- यातायात और संचार में सुधार
इतिहास में ज़्यादातर लोग दोनों तरफ़ होते हैं — इतिहास पढ़ने का मतलब ही दोनों तरफ़ देखना है
3 | अठारहवीं सदी का यूरोप | साम्राज्य, वर्ग और नया मध्यवर्ग
उस समय यूरोप कैसा था
पृष्ठ 8
- मध्य अठारहवीं सदी के यूरोप में आज जैसे राष्ट्र-राज्य नहीं थे
- जर्मनी, इटली और स्विट्ज़रलैंड राजशाहियों, डचियों और कैंटनों में बँटे थे
- पूर्वी और मध्य यूरोप निरंकुश राजतंत्रों के अधीन था
- वहाँ के लोग अपने आप को एक सामूहिक पहचान का भागीदार नहीं मानते थे
- वे अलग-अलग भाषाएँ बोलते थे और विभिन्न जातीय समूहों के सदस्य थे
हैब्सबर्ग साम्राज्य — टिरॉल में जर्मन, लॉम्बार्डी में इतालवी, हंगरी में मैग्यार, गालीसिया में पोलिश
सबको जोड़ने वाली एक ही चीज़
“इन तरह-तरह के समूहों को आपस में बाँधने वाला तत्व, केवल सम्राट के प्रति सबकी निष्ठा थी।”
लोग एक-दूसरे से नहीं, राजा से जुड़े हुए थे — और यही आगे चलकर बदला
समाज के तीन वर्ग
पृष्ठ 8–9
- कुलीन वर्ग — ज़मीन का मालिक, सबसे प्रभुत्वशाली, पर संख्या में छोटा; राजनीति में फ़्रेंच बोलता था
- किसान और भूदास — जनसंख्या के अधिकांश लोग; पूर्वी यूरोप में विशाल जागीरों पर भूदास खेती करते थे
- नया मध्यवर्ग — उद्योगपति, व्यापारी और सेवा क्षेत्र के लोग, जो औद्योगीकरण से पैदा हुए
- इंग्लैंड में औद्योगीकरण अठारहवीं सदी के दूसरे भाग में शुरू हुआ
“कुलीन विशेषाधिकारों की समाप्ति के बाद शिक्षित और उदारवादी मध्य वर्गों के बीच ही राष्ट्रीय एकता के विचार लोकप्रिय हुए”
4 | उदारवाद | तीन अर्थ — राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक
उदारवाद का राजनीतिक अर्थ
पृष्ठ 9 — liber = ‘आज़ाद’
- उदारवाद का मतलब था व्यक्ति के लिए आज़ादी और क़ानून के समक्ष सबकी बराबरी
- राजनीतिक रूप से यह सहमति से बनी सरकार पर ज़ोर देता था
- यह निरंकुश शासक और पादरीवर्ग के विशेषाधिकारों की समाप्ति का पक्षधर था
- यह संविधान और संसदीय प्रतिनिधि सरकार चाहता था
- उन्नीसवीं सदी के उदारवादी निजी संपत्ति के स्वामित्व पर भी बल देते थे
उदारवादी कहते थे “बदलो”, रूढ़िवादी कहते थे “बचाओ”
पर बराबरी सबके लिए नहीं थी
पृष्ठ 9 — मताधिकार की सच्चाई
| समय | वोट का अधिकार किसे |
|---|---|
| क्रांतिकारी फ़्रांस | केवल संपत्तिवान पुरुषों को |
| — | संपत्ति-विहीन पुरुष और सभी महिलाएँ वंचित |
| जैकोबिन शासन | केवल थोड़े समय के लिए सभी वयस्क पुरुषों को |
| नेपोलियन की संहिता | सीमित मताधिकार वापस; महिलाएँ पिताओं और पतियों के अधीन |
इसी कारण पूरी उन्नीसवीं सदी में महिलाओं और ग़रीब पुरुषों को अधिकारों के लिए लड़ना पड़ा
एक ही ‘ऐले’, चार अलग नाप
पृष्ठ 10 — व्यापारी की परेशानी
| शहर | एक ‘ऐले’ कपड़े की लंबाई |
|---|---|
| फ़्रैंकफ़र्ट | 54.7 सेंटीमीटर |
| मेंज़ | 55.1 सेंटीमीटर |
| न्यूरेम्बर्ग | 65.6 सेंटीमीटर |
| फ़्राईबर्ग | 53.5 सेंटीमीटर |
और 1833 में हैम्बर्ग से न्यूरेम्बर्ग जाने वाले व्यापारी को ग्यारह सीमाशुल्क नाकों से गुज़रना पड़ता था, हर बार लगभग 5% शुल्क
इसी समस्या का हल — ज़ॉल्वेराइन
प्रशा की पहल पर बना शुल्क संघ, जिसमें अधिकांश जर्मन राज्य शामिल हुए। इसने शुल्क अवरोध समाप्त किए और मुद्राओं की संख्या तीस से घटाकर दो कर दी
“एक मुक्त आर्थिक व्यवस्था ही राष्ट्रीय भावनाओं के उत्पन्न होने का एकमात्र ज़रिया है” — फ़्रेडरिख लिस्ट, 1834
5 | रूढ़िवाद और वियना संधि | 1815 — पुरानी व्यवस्था लौटाने की कोशिश
नया रूढ़िवाद
पृष्ठ 10
- रूढ़िवाद वह दर्शन है जो परंपरा, स्थापित संस्थानों और रिवाज़ों पर ज़ोर देता है
- वह तेज़ बदलावों की बजाय क्रमिक विकास को प्राथमिकता देता है
- रूढ़िवादी राजतंत्र, चर्च, सामाजिक ऊँच-नीच, संपत्ति और परिवार को बनाए रखना चाहते थे
- पर अधिकतर रूढ़िवादी क्रांति से पहले के दौर में वापसी नहीं चाहते थे
- उन्होंने जान लिया था कि आधुनिकीकरण राजतंत्र को मज़बूत बनाने में सक्षम है
पुराने रूढ़िवादी कहते थे “कुछ मत बदलो”; नए कहने लगे “थोड़ा बदलो, ताकि बाक़ी सब वैसा ही रहे”
वियना संधि, 1815 — मुख्य फ़ैसले
मेज़बान — ऑस्ट्रिया का चांसलर ड्यूक मैटरनिख
| क्षेत्र | फ़ैसला |
|---|---|
| फ़्रांस | बूबों वंश बहाल; जीते हुए इलाक़े वापस |
| फ़्रांस की सीमाओं पर | कई राज्य क़ायम, ताकि वह फिर विस्तार न कर सके |
| उत्तर में | नीदरलैंड्स का राज्य, जिसमें बेल्जियम शामिल |
| ऑस्ट्रिया को | उत्तरी इटली का नियंत्रण |
| रूस को | पोलैंड का एक हिस्सा |
| जर्मन महासंघ | नेपोलियन का बनाया 39 राज्यों वाला महासंघ बरक़रार |
सेंसरशिप और गुप्त संगठन
पृष्ठ 11–12
- 1815 की रूढ़िवादी व्यवस्थाएँ निरंकुश थीं और आलोचना बर्दाश्त नहीं करती थीं
- सरकारों ने सेंसरशिप के नियम बनाए — अख़बारों, किताबों, नाटकों और गीतों पर नियंत्रण
- इसीलिए उदारवादी राष्ट्रवादियों का मुख्य मुद्दा प्रेस की आज़ादी था
- दमन के भय से अनेक उदारवादी-राष्ट्रवादी भूमिगत हो गए
- गुप्त संगठन बने, जो क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण देते और विचारों का प्रसार करते थे
चित्र 6 में एक क्लब की दीवार पर लिखा है — “हमें कब तक सोचने दिया जाएगा?”
मैटरनिख की सबसे बड़ी चिंता
हमारी सामाजिक व्यवस्था का सबसे ख़तरनाक दुश्मन।
मैटरनिख ने ज्युसेपे मेत्सिनी के बारे में कहा
मेत्सिनी — जन्म 1805, जेनोआ; कार्बोनारी का सदस्य; ‘यंग इटली’ (मारसेई) और ‘यंग यूरोप’ (बर्न) के संस्थापक
6 | क्रांतियों का युग | 1830–1848 — और संस्कृति की भूमिका
क्रांतियों का युग
पृष्ठ 13–18
- 1821यूनान का स्वतंत्रता संग्राम आरंभ; लॉर्ड बायरन ने धन जुटाया और लड़ने भी गए
- 1824बायरन कीबुख़ार से मृत्यु
- जुलाई 1830फ़्रांस में क्रांति; बूबों राजा हटे, लुई फ़िलिप आया; बेल्जियम अलग हुआ
- 1831रूस के विरुद्धपोलिश विद्रोह, जो कुचल दिया गया
- 1832कुस्तुनतुनिया की संधि — यूनान स्वतंत्र राष्ट्र बना
- 1845सिलेसिया के बुनकरों का विद्रोह
- 1848पेरिस में क्रांति; 18 मई को फ़्रैंकफ़र्ट संसद
“जब फ़्रांस छींकता है तो बाक़ी यूरोप की सर्दी-ज़ुकाम हो जाता है” — मैटरनिख
संस्कृति ने राष्ट्र बनाने में क्या किया
पृष्ठ 13–15 — रूमानीवाद
- “राष्ट्रवाद का विकास केवल युद्धों और क्षेत्रीय विस्तार से नहीं हुआ”
- कला, काव्य, कहानियों-क़िस्सों और संगीत ने राष्ट्रवादी भावनाओं को गढ़ा
- रूमानीवाद ने तर्क और विज्ञान की जगह भावनाओं और अंतर्दृष्टि पर ज़ोर दिया
- योहान गॉटफ़्रीड — सच्ची जर्मन संस्कृति आम लोगों (das volk) में निहित है
- राष्ट्र की सच्ची आत्मा लोकगीतों, जन-काव्य और लोकनृत्यों से प्रकट होती है
यह ज़रूरी था क्योंकि अधिकांश लोग निरक्षर थे — उन तक संदेश किताब से नहीं, गीत और कहानी से पहुँच सकता था
छह साल, गाँव-गाँव, एक विचार
जैकब और विल्हेल्म ग्रिम ने छह साल तक गाँव-गाँव जाकर लोक कथाएँ इकट्ठी कीं और उनका पहला संग्रह प्रकाशित किया। बाद में उन्होंने 33 खंडों में जर्मन भाषा का शब्दकोश भी बनाया
वे इसे जर्मन राष्ट्रीय पहचान गढ़ने की व्यापक योजना का हिस्सा मानते थे
पोलैंड — जब देश मिट गया, पर पहचान बची
पृष्ठ 15 — सबसे शक्तिशाली उदाहरण
- अठारहवीं सदी के अंत में रूस, प्रशा और ऑस्ट्रिया ने पोलैंड का विभाजन कर दिया था
- “यद्यपि पोलैंड अब स्वतंत्र भू-क्षेत्र नहीं था, किंतु संगीत और भाषा के ज़रिये राष्ट्रीय भावना जीवित रखी गई”
- कैरोल कुर्पिंस्की ने पोलोनेस और माजुरका जैसे लोकनृत्यों को राष्ट्रीय प्रतीकों में बदला
- रूसी क़ब्ज़े के बाद पोलिश भाषा स्कूलों से हटाकर रूसी जबरन लादी गई
- 1831 के असफल विद्रोह के बाद लोगों ने भाषा को हथियार बनाया — चर्च और धार्मिक शिक्षा में पोलिश चलाई
- बड़ी संख्या में पादरियों और बिशपों को जेल में डाला गया और साइबेरिया भेजा गया
राष्ट्र सिर्फ़ ज़मीन नहीं होता — वह भाषा, संगीत और स्मृति में भी ज़िंदा रह सकता है
7 | 1848 | भूख की क्रांति और पढ़े-लिखों की क्रांति
भूख, कठिनाइयाँ और जन विद्रोह
पृष्ठ 15–16
- 1830 का दशक यूरोप में भारी कठिनाइयाँ लेकर आया
- जनसंख्या में ज़बरदस्त वृद्धि; नौकरी ढूँढ़ने वालों की तादाद रोज़गार से अधिक
- ग्रामीण आबादी शहरों की भीड़ से भरी ग़रीब बस्तियों में रहने लगी
- लघु उत्पादकों को इंग्लैंड से आयातित सस्ते मशीनी कपड़े से कड़ी प्रतिस्पर्धा
- जहाँ कुलीन वर्ग सत्ता में था, वहाँ कृषक सामंती शुल्कों के बोझ तले दबे थे
- 1848 में खाने-पीने की कमी और बेरोज़गारी से पेरिस के लोग सड़कों पर उतर आए
राष्ट्रवाद केवल विचारों का आंदोलन नहीं था — भूख भी लोगों को सड़कों पर लाती थी
सिलेसिया के बुनकर, 1845
काम के लिए बेताब लोगों का फ़ायदा उठा कर ठेकेदारों ने बनवाए जाने वाले माल की क़ीमतें गिरा दी हैं।
पत्रकार विल्हेम वोल्फ़
बुनकरों ने ज़्यादा मज़दूरी माँगी; ठेकेदार 24 घंटे बाद सेना बुलाकर लौटा; टकराव में ग्यारह बुनकरों को गोली मार दी गई
फ़्रैंकफ़र्ट संसद — उम्मीद और असफलता
पृष्ठ 17
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| तारीख़ और संख्या | 18 मई 1848 · 831 निर्वाचित प्रतिनिधि |
| स्थान | सेंट पॉल चर्च, फ़्रैंकफ़र्ट |
| मुख्य काम | जर्मन राष्ट्र के लिए संविधान का प्रारूप; राजा को संसद के अधीन रहना था |
| असफलता 1 | प्रशा के राजा फ़्रेडरीख विल्हेम चतुर्थ ने ताज अस्वीकार किया |
| असफलता 2 | कुलीन वर्ग और सेना का विरोध बढ़ गया |
| असफलता 3 | मध्य वर्गों ने मज़दूरों-कारीगरों की माँगों का विरोध किया और उनका समर्थन खो दिया |
अंत में सैनिकों को बुलाया गया और एसेंबली भंग होने पर मजबूर हुई
महिलाओं ने क्या किया — और क्या नहीं मिला
पृष्ठ 17–18
- महिलाओं ने अपने राजनीतिक संगठन स्थापित किए
- उन्होंने अख़बार शुरू किए
- उन्होंने राजनीतिक बैठकों और प्रदर्शनों में शिरकत की
- इसके बावजूद उन्हें एसेंबली के चुनाव में मताधिकार से वंचित रखा गया
- फ़्रैंकफ़र्ट संसद में उन्हें केवल प्रेक्षकों की हैसियत से दर्शक-दीर्घा में खड़े होने दिया गया
लुइज़े ऑटो-पीटर्स — “स्वतंत्र पुरुषों को परतंत्रता से घिरे रहना मंज़ूर नहीं होना चाहिए”
क्रांति हारी, पर बेकार नहीं गई
“रूढ़िवादी ताक़तें उदारवादी आंदोलनों को दबा पाने में कामयाब हुईं, किंतु वे पुरानी व्यवस्था बहाल नहीं कर पाईं।” इसके बाद हैब्सबर्ग क्षेत्रों और रूस में भूदासत्व और बंधुआ मज़दूरी समाप्त कर दी गई
राजाओं को समझ आ गया कि रियायतें देकर ही क्रांति और दमन का चक्र समाप्त किया जा सकता है
8 | जर्मनी और इटली का निर्माण | अब सेना और कूटनीति का दौर
जर्मनी का एकीकरण
पृष्ठ 19 — क्या सेना राष्ट्र की निर्माता हो सकती है?
- 1848मध्यवर्गीय जर्मनों नेनिर्वाचित संसद द्वारा शासित राष्ट्र-राज्य बनाना चाहा
- —यह उदारवादी पहल राजशाही और फ़ौज ने मिलकर दबा दी; जुंकरों ने भी उनका साथ दिया
- —इसके बादप्रशा ने एकीकरण का नेतृत्व सँभाला
- —ऑटो वॉन बिस्मार्क इस प्रक्रिया का जनक; उसने प्रशा की सेना और नौकरशाही की मदद ली
- सात वर्षऑस्ट्रिया, डेन्मार्क और फ़्रांस से तीन युद्धों में प्रशा को जीत
- 18 जनवरी 1871वर्साय के शीशमहल में विलियम प्रथम जर्मनी का सम्राट घोषित
1848 में जनता ने संसद से राष्ट्र बनाना चाहा और असफल रही — 1871 में सेना ने बना दिया
इटली के एकीकरण की तीन कड़ियाँ
पृष्ठ 20–22
| व्यक्ति | भूमिका |
|---|---|
| ज्युसेपे मेत्सिनी | विचार दिया — 1830 के दशक में एकीकृत गणराज्य का कार्यक्रम; ‘यंग इटली’ |
| काउंट कावूर | कूटनीति की — फ़्रांस से संधि, जिससे 1859 में ऑस्ट्रिया हारा |
| ज्युसेपे गैरीबॉल्डी | लड़ाई लड़ी — 1860 में ‘हज़ार लोगों का अभियान’; ‘रेड शर्ट्स’ की संख्या 30,000 तक पहुँची |
1861 में विक्टर इमेनुएल द्वितीय एकीकृत इटली का राजा घोषित हुआ
एक चौंकाने वाला सच
दक्षिणी इटली में जिन आम किसानों ने गैरीबॉल्डी को समर्थन दिया था, उन्होंने इटालिया के बारे में कभी सुना ही नहीं था और वे मानते थे कि ला टालिया विक्टर इमेनुएल की पत्नी थी।
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 21
‘राष्ट्र’ का विचार पहले पढ़े-लिखे वर्ग तक ही सीमित था और आम लोगों तक धीरे-धीरे पहुँचा
ब्रिटेन की अजीब दास्तान
पृष्ठ 21–22
- ब्रिटेन में राष्ट्र-राज्य का निर्माण किसी क्रांति का परिणाम नहीं था — यह एक लंबी प्रक्रिया थी
- अठारहवीं सदी के पहले ब्रितानी राष्ट्र था ही नहीं
- अंग्रेज़, वेल्श, स्कॉट और आयरिश की मुख्य पहचान नृजातीय थी
- 1688 में आंग्ल संसद ने राजतंत्र से ताक़त छीन ली
- 1707 के ऐक्ट ऑफ़ यूनियन से ‘यूनाइटेड किंगडम ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन’ बना
- स्कॉटिश हाइलैंड्स के लोगों को गेलिक भाषा बोलने या राष्ट्रीय पोशाक पहनने की मनाही थी
- 1801 में आयरलैंड को बलपूर्वक यूनाइटेड किंगडम में शामिल कर लिया गया
यहाँ राष्ट्र जनता की क्रांति से नहीं, एक राष्ट्र के दूसरों पर प्रभुत्व से बना
9 | राष्ट्र की दृश्य-कल्पना | राष्ट्र को चेहरा कैसे दें?
राजा का चित्र बन सकता है — पर ‘देश’ का चित्र कैसे बनेगा?
अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के कलाकारों ने राष्ट्र का मानवीकरण करके यह समस्या हल की
मारीआन और जर्मेनिया
पृष्ठ 23
मारीआन — फ़्रांस
- लोकप्रिय ईसाई नाम, जिसने जन-राष्ट्र के विचार को रेखांकित किया
- चिह्न — लाल टोपी, तिरंगा और कलगी
- ये स्वतंत्रता और गणतंत्र के प्रतीक हैं
- प्रतिमाएँ सार्वजनिक चौकों पर; छवि सिक्कों और डाक टिकटों पर
जर्मेनिया — जर्मनी
- जर्मन राष्ट्र का रूपक
- सिर पर बलूत पत्तियों का मुकुट
- क्योंकि जर्मन बलूत वीरता का प्रतीक है
- चित्रकार — फ़िलिप वेट (1848) और लॉरेन्ज़ क्लासेन (1860)
रूपक = जब किसी अमूर्त विचार को किसी व्यक्ति या चीज़ के ज़रिए इंगित किया जाए
जर्मेनिया के प्रतीकों के अर्थ
बॉक्स 3 — यह तालिका सीधे परीक्षा में आती है
| प्रतीक | अर्थ |
|---|---|
| टूटी हुई बेड़ियाँ | आज़ादी मिलना |
| बाज़-छाप कवच | जर्मन साम्राज्य की प्रतीक-शक्ति |
| बलूत पत्तियों का मुकुट | बहादुरी |
| तलवार | मुक़ाबले की तैयारी |
| तलवार पर लिपटी जैतून की डाली | शांति की चाह |
| काला, लाल और सुनहरा तिरंगा | 1848 के उदारवादी-राष्ट्रवादियों का झंडा |
| उगते सूर्य की किरणें | एक नए युग का सूत्रपात |
10 | राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद | जब विचार का चेहरा बदल गया
राष्ट्रवाद का बदला हुआ चेहरा
पृष्ठ 26
- उन्नीसवीं सदी की अंतिम चौथाई तक राष्ट्रवाद का वह आदर्शवादी उदारवादी-जनतांत्रिक स्वभाव नहीं रहा
- अब राष्ट्रवाद सीमित लक्ष्यों वाला संकीर्ण सिद्धांत बन गया
- राष्ट्रवादी समूह एक-दूसरे के प्रति अनुदार होते चले गए और लड़ने के लिए हमेशा तैयार रहते थे
- प्रमुख यूरोपीय शक्तियों ने अपने साम्राज्यवादी उद्देश्यों के लिए अधीन लोगों की राष्ट्रवादी आकांक्षाओं का इस्तेमाल किया
पहले वह कहता था “हम आज़ाद होना चाहते हैं” — अब कहने लगा “हम दूसरों से बड़े हैं”
बाल्कन क्षेत्र में तनाव क्यों पनपा
पृष्ठ 26 — 1871 के बाद
- क्षेत्र में गहरी भौगोलिक और जातीय भिन्नता थी; निवासी स्लाव कहलाते थे
- बाल्कन का बड़ा हिस्सा ऑटोमन साम्राज्य के नियंत्रण में था
- रूमानी राष्ट्रवाद के फैलने और ऑटोमन साम्राज्य के विघटन से स्थिति विस्फोटक हो गई
- अधीन राष्ट्रीयताएँ एक के बाद एक स्वतंत्रता की घोषणा करने लगीं
- बाल्कन राज्य एक-दूसरे से भारी ईर्ष्या करते थे और हर एक ज़्यादा इलाक़ा चाहता था
- रूस, जर्मनी, इंग्लैंड और ऑस्ट्रो-हंगरी — हर ताक़त वहाँ अपना प्रभाव बढ़ाना चाहती थी
“इससे इस इलाक़े में कई युद्ध हुए और अंततः प्रथम विश्व युद्ध हुआ”
अध्याय का अंतिम संदेश
राष्ट्रवाद के यूरोपीय विचार कहीं और नहीं दोहराए गए, क्योंकि हर जगह लोगों ने अपनी तरह का विशिष्ट राष्ट्रवाद विकसित किया।
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 27
यही विचार आगे चलकर भारत पहुँचा और साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ हथियार बना — वही अगले अध्याय का विषय है
चार तारीख़ें — बस इतना पक्का कर लीजिए
1789 क्रांति · 1815 वापसी · 1848 विस्फोट · 1871 एकीकरण
बाक़ी सब तारीख़ें इन्हीं के आगे-पीछे बैठ जाएँगी

