अध्याय 5 — खनिज तथा ऊर्जा संसाधन · समकालीन भारत-2 (भूगोल) · कक्षा 10
कक्षा — 10 · विषय — भूगोल (समकालीन भारत–2) · पृष्ठ — 42 से 57
आज सुबह तुमने ब्रश किया? तो बताओ — तुमने कितने खनिज छुए?
उत्तर — आठ
“चॉक, कैल्शियम कार्बोनेट, फ़्लोराइड, टाइटेनियम ऑक्साइड, अभ्रक, सिलिका, पेट्रोलियम, प्लास्टिक — यह सब तुम्हारी टूथपेस्ट की ट्यूब और ब्रश में है”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 42 का बॉक्स
यानी यह अध्याय स्कूल में नहीं, तुम्हारे बाथरूम में शुरू हुआ था
और एक और चौंकाने वाला आँकड़ा
हमारे कुल पौष्टिक उपभोग का केवल 0.3 प्रतिशत ही खनिज है। परंतु इनके बिना हम बाक़ी 99.7 प्रतिशत भोज्य पदार्थों का उपयोग करने में असमर्थ होंगे
नमक थाली में चुटकी भर होता है — पर उसके बिना पूरी थाली बेस्वाद। छोटी चीज़, बड़ा काम
ध्यान रखिए — यह एक अध्याय नहीं, दो अध्याय हैं
पृष्ठ 42 से 50 तक — खनिज। पृष्ठ 50 से 56 तक — ऊर्जा संसाधन। दोनों को अलग-अलग पढ़िए, वरना गड्डमड्ड हो जाएँगे
1 | खनिज | परिभाषा, वर्ग और उत्पत्ति
खनिज क्या है
पृष्ठ 42
- “भू-वैज्ञानिकों के अनुसार खनिज एक प्राकृतिक रूप से विद्यमान समरूप तत्त्व है जिसकी एक निश्चित आंतरिक संरचना है”
- खनिज प्रकृति में अनेक रूपों में पाए जाते हैं — कठोर हीरे से लेकर नरम चूने तक
- अब तक 2000 से अधिक खनिजों की पहचान की जा चुकी है
- “एक खनिज विशेष जो निश्चित तत्त्वों का योग है, उन तत्त्वों का निर्माण उस समय के भौतिक व रासायनिक परिस्थितियों का परिणाम है”
इसीलिए खनिजों में विविध रंग, कठोरता, चमक, घनत्व और क्रिस्टल पाए जाते हैं
खनिजों का वर्गीकरण — चित्र 5.1
पृष्ठ 43
| वर्ग | उपवर्ग | उदाहरण |
|---|---|---|
| धात्विक | लौह धातु | लौह अयस्क, मैंगनीज़, निकल, कोबाल्ट |
| अलौह | ताँबा, सीसा, जस्ता, बॉक्साइट | |
| बहुमूल्य | सोना, चाँदी, प्लेटिनम | |
| अधात्विक | — | अभ्रक, नमक, पोटाश, सल्फर, चूना पत्थर, संगमरमर, बलुआ पत्थर |
| ऊर्जा खनिज | — | कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस |
तीन वर्ग याद रखिए — और लौह का मतलब सिर्फ़ इतना कि उसमें लोहे का अंश हो
खनिज और अयस्क — यह अंतर परीक्षा में आता है
खनिज (Mineral)
- प्राकृतिक रूप से विद्यमान समरूप तत्त्व
- निश्चित आंतरिक संरचना
- ज़मीन में जैसा है, वैसा
अयस्क (Ore)
- खनिज में अन्य अवयवों या तत्त्वों का मिश्रण या संचयन
- “खनन का आर्थिक महत्त्व तभी होता है जब अयस्क में खनिजों का संचयन पर्याप्त मात्रा में हो”
- यानी जिसे निकालना फ़ायदे का सौदा हो
एक वाक्य में — खनिज ज़मीन में है; अयस्क वह है जिसे निकालना फ़ायदेमंद हो
खनिज कहाँ और कैसे मिलते हैं — पाँच तरीक़े
पृष्ठ 43–44
| कहाँ | कैसे बनते हैं | कौन-से खनिज |
|---|---|---|
| आग्नेय व कायांतरित चट्टानें | दरारों, जोड़ों, भ्रंशों व विदरों में — तरल/गैसीय अवस्था में ऊपर उठकर ठंडे होकर जम जाते हैं | जस्ता, ताँबा, जिंक, सीसा |
| अवसादी चट्टानें (परतें) | क्षैतिज परतों में निक्षेपण, संचयन व जमाव; लंबी अवधि तक ऊष्मा व दबाव | कोयला, कुछ लौह अयस्क |
| वाष्पीकरण (शुष्क प्रदेश) | पानी उड़ जाने पर बचे हुए तत्त्व जम जाते हैं | जिप्सम, पोटाश, नमक, सोडियम |
| धरातलीय चट्टानों का अपघटन | घुलनशील तत्त्व बह जाते हैं, अयस्क युक्त अवशेष रह जाता है | बॉक्साइट |
| प्लेसर निक्षेप | घाटी तल व पहाड़ी आधार की रेत में जलोढ़ जमाव — जो जल से घर्षित नहीं होते | सोना, चाँदी, टिन, प्लेटिनम |
छोटे जमाव को शिरा (vein), बड़े को परत (lode) कहते हैं — “शिरा पतली, परत मोटी”
और महासागर भी खनिजों का भंडार है
“महासागरीय जल में विशाल मात्रा में खनिज पाए जाते हैं परंतु इनमें से अधिकतर का सार्थक निष्कर्षण संभव नहीं है। नमक, मैगनीशियम तथा ब्रोमाइन अधिकांशत: महासागरीय जल से प्राप्त किए जाते हैं। महासागरीय तली मैंगनीज़ ग्रंथिकाओं (nodules) में धनी है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 44
यानी खनिज मिलना और खनिज निकाल पाना — दो अलग बातें हैं
2 | वितरण और खनन | कहाँ है, कहाँ नहीं
भारत में खनिजों का असमान वितरण
पृष्ठ 44
- “भारत अच्छे और विविध प्रकार के खनिज संसाधनों में सौभाग्यशाली है, यद्यपि इनका वितरण असमान है”
- प्रायद्वीपीय चट्टानों में — कोयला, धात्विक खनिज, अभ्रक और अनेक अधात्विक खनिज
- गुजरात और असम की तलछटी चट्टानों में — अधिकांश खनिज तेल निक्षेप
- ★“प्रायद्वीपीय शैल क्रम के साथ राजस्थान में अनेक अलौह खनिज पाए जाते हैं”
- उत्तरी भारत के विस्तृत जलोढ़ मैदान — आर्थिक महत्त्व के खनिजों से लगभग विहीन
कारण सीधा है — खनिज पुरानी कठोर चट्टानों में बनते हैं, नदियों की लाई नई नरम मिट्टी में नहीं
रैट होल खनन — अध्याय की सबसे मानवीय पंक्ति
मेघालय के जोवाई व चेरापूँजी में कोयले का खनन परिवार के सदस्यों द्वारा एक लंबी संकीर्ण सुरंग के रूप में किया जाता है, जिसे रैट होल खनन कहते हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने इन क्रियाकलापों को अवैध घोषित किया है
यह संभव इसलिए है क्योंकि उत्तर-पूर्वी भारत के जनजातीय क्षेत्रों में खनिजों का स्वामित्व व्यक्तियों और समुदायों के पास है — कंपनियों के पास नहीं
सुरंग इतनी संकरी होती है कि आदमी सिर्फ़ रेंगकर घुस सके — इसीलिए नाम पड़ा ‘चूहे का बिल’
3 | लौह अयस्क | अध्याय की रीढ़
दो प्रकार के लौह अयस्क — यह अंतर ज़रूर आता है
मैग्नेटाइट
- सर्वोत्तम प्रकार का लौह अयस्क
- लोहांश — लगभग 70 प्रतिशत
- “इसमें सर्वश्रेष्ठ चुंबकीय गुण होते हैं”
- विद्युत उद्योगों में विशेष उपयोगी
हेमेटाइट
- सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण औद्योगिक लौह अयस्क
- लोहांश — 50 से 60 प्रतिशत
- “जिसका अधिकतम मात्रा में उपभोग हुआ है”
- यानी ज़्यादा मिलता है, इसीलिए ज़्यादा चलता है
याद रखने का तरीक़ा — “मैग्नेट ज़्यादा खींचता है, इसलिए मैग्नेटाइट में ज़्यादा लोहा”
लौह अयस्क की चार पेटियाँ — और उनके पत्तन
पृष्ठ 46–47
| पेटी | प्रमुख खदानें | निर्यात पत्तन |
|---|---|---|
| ओडिशा-झारखंड | बादाम पहाड़ (मयूरभंज, केंदुझर) · गुआ और नोआमुंडी (सिंहभूम) | पारादीप |
| दुर्ग-बस्तर-चंद्रपुर | बेलाडिला (बस्तर, छत्तीसगढ़) — अति उत्तम हेमेटाइट, 14 जमाव | विशाखापट्टनम् → जापान व दक्षिण कोरिया |
| बल्लारि-चित्रदुर्ग-चिक्कमंगलूरु-तुमकूरु | कुद्रेमुख — शत् प्रतिशत निर्यात इकाई; अयस्क कर्दम (slurry) रूप में पाइपलाइन से | मंगलूरु के निकट |
| महाराष्ट्र-गोआ | लोहा उत्तम प्रकार का नहीं, तथापि दक्षता से दोहन | मरमागाओ |
तीन पत्तन याद रखने का सूत्र — “बे-वि · कु-मं · गो-म”
97 प्रतिशत — चार राज्यों से
2018-19 में भारत में लौह अयस्क का 97 प्रतिशत उत्पादन केवल चार राज्यों से हुआ — ओडिशा, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और झारखंड
और लौह खनिज धात्विक खनिजों के कुल उत्पादन मूल्य के तीन-चौथाई भाग का योगदान करते हैं
नाम के पीछे की कहानी
कन्नड़ भाषा में ‘कुद्रे’ का अर्थ है घोड़ा — पहाड़ी का आकार घोड़े के मुँह जैसा है। और ‘बेलाडिला’ नाम इसलिए पड़ा क्योंकि वहाँ की पहाड़ियाँ बैल के डील (hump) से मिलती-जुलती हैं
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 47
भूगोल के नाम आसमान से नहीं आते — वे वहीं के लोगों की आँखों से आते हैं
4 | अन्य खनिज | मैंगनीज़ से चूना पत्थर तक
मैंगनीज़ — इस्पात का साथी
मैंगनीज़ मुख्य रूप से इस्पात के विनिर्माण में प्रयोग किया जाता है — एक टन इस्पात बनाने में लगभग 10 किग्रा. मैंगनीज़ की आवश्यकता होती है
इसका उपयोग ब्लीचिंग पाउडर, कीटनाशक दवाएँ और पेंट बनाने में भी होता है
मैंगनीज़ — उत्पादक राज्य (चित्र 5.3)
पृष्ठ 47
| राज्य | प्रतिशत |
|---|---|
| मध्य प्रदेश | 33 |
| महाराष्ट्र | 27 |
| ओडिशा | 16 |
| अन्य | शेष |
पहले तीन राज्य मिलकर लगभग 76 प्रतिशत — यानी उत्पादन तीन राज्यों में केंद्रित है
ताँबा — कम है, पर बिना उसके बिजली नहीं
पृष्ठ 48
- “भारत में ताँबे के भंडार व उत्पादन क्रांतिक रूप से न्यून हैं”
- गुण — घातवर्ध्य (malleable), तन्य और ताप सुचालक
- उपयोग — बिजली के तार बनाने, इलैक्ट्रोनिक्स और रसायन उद्योगों में
- मध्य प्रदेश की बालाघाट खदानें — देश का लगभग 52 प्रतिशत ताँबा
- झारखंड का सिंहभूम ज़िला भी मुख्य उत्पादक
- ★“राजस्थान की खेतड़ी खदानें भी ताँबे के लिए प्रसिद्ध थीं”
‘थीं’ शब्द पर ध्यान दीजिए — किताब ने जान-बूझकर भूतकाल लिखा है
बॉक्साइट — और वह धातु जो हवाई जहाज़ बनाती है
पृष्ठ 48
- “एल्यूमिनियम एक महत्त्वपूर्ण धातु है क्योंकि यह लोहे जैसी शक्ति के साथ-साथ अत्यधिक हल्का एवं सुचालक भी होता है”
- “इसमें अत्यधिक घातवर्ध्यता (malleability) भी पाई जाती है”
- “यह सबसे अधिक बॉक्साइट नामक अयस्क से प्राप्त किया जाता है”
- निक्षेपों की रचना — एल्यूमिनियम सीलिकेटों से समृद्ध चट्टानों के विघटन से
- भारत में मुख्य क्षेत्र — अमरकंटक पठार, मैकाल पहाड़ियाँ, बिलासपुर-कटनी
इसीलिए हवाई जहाज़ लोहे का नहीं बनता — ताक़त वही, वज़न बहुत कम
बॉक्साइट — अकेला ओडिशा दो-तिहाई
चित्र 5.5 के अनुसार ओडिशा भारत का सबसे बड़ा बॉक्साइट उत्पादक राज्य है — अकेला 65 प्रतिशत। सबसे महत्त्वपूर्ण निक्षेप कोरापुट ज़िले में पंचपतमाली
सोचिए — यदि किसी कारण ओडिशा में खनन रुक जाए तो? एक जगह पर इतनी निर्भरता ख़तरनाक है
अभ्रक — जिसकी हज़ार परतें कुछ सेंटीमीटर में
पृष्ठ 48–49
- “अभ्रक प्लेटों अथवा पत्रण क्रम में पाया जाता है, इसका चादरों में विपाटन (split) आसानी से हो सकता है”
- “अभ्रक की एक हज़ार परतें कुछ सेंटीमीटर ऊँचाई में समाहित हो सकती हैं”
- रंग — पारदर्शी, काला, हरा, लाल, पीला अथवा भूरा
- “इसकी सर्वोच्च परावैद्युत शक्ति, ऊर्जा ह्रास का निम्न गुणांक, विंसवाहन के गुण और उच्च वोल्टेज की प्रतिरोधिता के कारण”
- यह विद्युत व इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों में अपरिहार्य खनिजों में से एक है
पेटियाँ — कोडरमा-गया-हजारीबाग (अग्रणी) · ★अजमेर (राजस्थान) · नेल्लोर (आंध्र प्रदेश)
चूना पत्थर — और यहाँ राजस्थान पूरे भारत में पहला है★
चूना पत्थर सीमेंट उद्योग का आधारभूत कच्चा माल है और लौह-प्रगलन की भट्टियों के लिए अनिवार्य है। चित्र 5.7 के अनुसार राजस्थान 22 प्रतिशत के साथ देश में प्रथम स्थान पर है — उसके बाद आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश (13-13%)
तुम्हारे घर की हर बोरी सीमेंट में अपने ही राज्य का पत्थर है
तीन प्रतिशत जो रटने ही हैं — “33-65-22”
- 33%मैंगनीज़ — मध्य प्रदेश
- 65%बॉक्साइट — ओडिशा
- 22%चूना पत्थर —★राजस्थान (प्रथम)
5 | खनन के ख़तरे और संरक्षण | ‘घातक उद्योग’
किताब ने ख़ुद इसे यह नाम दिया है
“खनन को ‘घातक उद्योग’ (Killer Industry) बनने से रोकने के लिए दृढ़ सुरक्षा विनियम और पर्यावरणीय क़ानूनों का क्रियांवयन अनिवार्य है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 49
सोचिए — कोई पाठ्यपुस्तक किसी उद्योग को यह नाम कब देती होगी?
खनन के जोखिम
पृष्ठ 49
- श्रमिक लगातार धूल व हानिकारक धुएँ में साँस लेते हुए फेफड़ों संबंधी बीमारियों के शिकार हो जाते हैं
- खदानों की छतों का गिरना, जलप्लावित होना और कोयले की खदानों में आग लगना — ये ख़तरे स्थाई हैं
- खदान क्षेत्रों में जल स्रोत संदूषित हो जाते हैं
- अवशिष्ट पदार्थों के खत्ता लगाने से भूमि व मिट्टी का अवक्षय
- सरिताओं और नदियों का प्रदूषण बढ़ता है
तीन शब्द याद रखिए — धूल · छत · पानी
और इसीलिए संरक्षण ज़रूरी है
“खनन योग्य निक्षेप की कुल राशि असार्थक अंश है, अर्थात् भू-पर्पटी का केवल एक प्रतिशत।” और “जिन खनिज संसाधनों के निर्माण व सांद्रण में लाखों वर्ष लगे हैं, हम उनका शीघ्रता से उपभोग कर रहे हैं”
पूरी पृथ्वी एक सेब है — और हम जिस हिस्से से खनिज निकाल सकते हैं वह छिलके का भी एक प्रतिशत है
संरक्षण के उपाय
पृष्ठ 50
- खनिज संसाधन सीमित तथा अनवीकरण योग्य हैं
- “पुनर्भरण की दर उपभोग की दर की तुलना में अपरिमित रूप से थोड़ी है”
- अयस्कों के सतत् उत्खनन से लागत बढ़ती है, क्योंकि गहराई बढ़ने के साथ गुणवत्ता घटती है
- इसलिए — निम्न कोटि के अयस्कों को कम लागत पर प्रयोग करने की उन्नत प्रौद्योगिकियाँ
- और — धातुओं का पुन: चक्रण · रद्दी धातुओं का प्रयोग · अन्य प्रतिस्थापनों का उपयोग
यहाँ खनिज वाला भाग समाप्त। अब से नया विषय — ऊर्जा
6 | ऊर्जा संसाधन | परंपरागत और गैर-परंपरागत
ऊर्जा के दो वर्ग
परंपरागत साधन
- लकड़ी, उपले
- कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस
- विद्युत — जल विद्युत और ताप विद्युत, दोनों
- अधिकतर जीवाश्मी ईंधन — सीमित और प्रदूषणकारी
गैर-परंपरागत साधन
- सौर, पवन
- ज्वारीय, भू-तापीय
- बायोगैस, परमाणु ऊर्जा
- नवीकरणीय — और भारत धूप, जल व जीवभार में समृद्ध
ध्यान — परमाणु ऊर्जा ग़ैर-परंपरागत में आती है, बच्चे अक्सर उलटा लिख देते हैं
लकड़ी और उपले — अब भी सबसे बड़ा साधन
“ग्रामीण भारत में लकड़ी और उपलों का उपयोग बहुतायत में किया जाता है, और अनुमानत: ग्रामीण घरों में आवश्यक ऊर्जा का 70 प्रतिशत से अधिक इन्हीं से प्राप्त होता है। घटते वन क्षेत्र के कारण… उपलों का उपभोग भी हतोत्साहित किया जा रहा है, क्योंकि इससे सर्वाधिक मूल्यवान खाद्य का उपभोग होता है जिसे कृषि में प्रयोग किया जा सकता है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 50
यानी उपला जलाना केवल धुएँ की बात नहीं — वह खेत की खाद जला देना है
कोयले के चार प्रकार — गंदे से अच्छे की ओर
- पीटदलदलों में क्षय होते पादपों से — कम कार्बन, उच्च नमी, निम्न ताप क्षमता
- लिग्नाइटनिम्न कोटि का भूरा कोयला, मुलायम व नमीयुक्त — तमिलनाडु के नैवेली में, विद्युत उत्पादन हेतु
- बिटुमिनसगहराई में दबा व उच्च तापमान से प्रभावित — वाणिज्यिक प्रयोग में सर्वाधिक लोकप्रिय; धातुशोधन में
- एंथ्रेसाइटसर्वोत्तम गुण वाला कठोर कोयला
कोयले के दो युग — यह उलट मत दीजिए
गोंडवाना
- आयु — 200 लाख वर्ष से कुछ अधिक
- धातुशोधन कोयला
- दामोदर घाटी (पश्चिमी बंगाल व झारखंड) — झरिया, रानीगंज, बोकारो
- साथ ही गोदावरी, महानदी, सोन व वर्धा नदी घाटियाँ
टरशियरी
- आयु — लगभग 55 लाख वर्ष
- अपेक्षाकृत नया
- उत्तर-पूर्वी राज्य
- मेघालय, असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड
“गोंडवाना नाम बड़ा — संख्या भी बड़ी”
और यह पंक्ति समझ ली तो पूरा औद्योगिक भूगोल समझ आ गया
“यह ध्यान रखना चाहिए कि कोयला स्थूल पदार्थ है, जिसका प्रयोग करने पर भार घटता है क्योंकि यह राख में परिवर्तित हो जाता है। इसलिए भारी उद्योग तथा ताप विद्युत गृह कोयला क्षेत्रों अथवा उनके निकट ही स्थापित किये जाते हैं।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 51
यानी कोयला उद्योग के पास नहीं आता — उद्योग कोयले के पास जाता है
पेट्रोलियम — और वह भूगर्भिक जाल
पृष्ठ 51–52
- “पेट्रोलियम ताप व प्रकाश के लिए ईंधन, मशीनों के लिए स्नेहक तथा अनेक विनिर्माण उद्योगों के लिए कच्चा माल भी प्रदान करता है”
- भारत में अधिकांश पेट्रोलियम टरशियरी युग की शैल संरचनाओं के अपनति व भ्रंश ट्रैप में
- तेल धारक परत — संरंध्र चूना पत्थर या बालुपत्थर, जिसमें से तेल प्रवाहित हो सके
- “मध्यवर्ती असरंध्र परतें तेल को ऊपर उठने व नीचे रिसने से रोकती हैं”
- “प्राकृतिक गैस हल्की होने के कारण खनिज तेल के ऊपर पाई जाती है”
क्षेत्र — मुम्बई हाई (63%) · गुजरात (18%) · असम (16%) · प्रमुख — अंकलेश्वर, और डिगबोई, नहरकटिया, मोरन-हुगरीजन
प्राकृतिक गैस — दस गुना बढ़ा जाल
गेल द्वारा निर्मित पहली 1,700 किलोमीटर लंबी हजीरा-विजयपुर-जगदीशपुर (एच.वी.जे.) पाइपलाइन ने मुंबई हाई और बसीन गैस क्षेत्रों को उर्वरक, बिजली और औद्योगिक परिसरों से जोड़ा। आज भारत का गैस जाल 18500 किलोमीटर है — और जल्द 34000 किलोमीटर से अधिक होगा
सी.एन.जी. — परिवहन ईंधन; पी.एन.जी. — घरों में खाना पकाने का ईंधन
विद्युत के दो रास्ते
जल विद्युत
- प्रवाही जल से उत्पन्न
- नवीकरणीय — पानी ख़त्म नहीं होता
- बाँध बनाकर, गिरते जल से टरबाइन
- भाखड़ा नांगल · दामोदर घाटी कारपोरेशन · कोपिली हाइडल
ताप विद्युत
- कोयला, पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस जलाकर
- अनवीकरणीय जीवाश्मी ईंधन पर निर्भर
- इसीलिए संयंत्र कोयला क्षेत्रों के पास
- प्रदूषण का बड़ा कारण
“विद्युत का प्रति व्यक्ति उपभोग विकास का सूचकांक माना जाता है”
7 | गैर-परंपरागत ऊर्जा | भविष्य की ओर
यह क्यों ज़रूरी हो गया
“गैस व तेल की बढ़ती क़ीमतों तथा इनकी संभाव्य कमी ने भविष्य में ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा के प्रति अनिश्चितताएँ उत्पन्न कर दी हैं, जिसके राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि पर गंभीर प्रभाव पड़ते हैं। इसके अतिरिक्त जीवाश्मी ईंधनों का प्रयोग गंभीर पर्यावरणीय समस्याएँ भी उत्पन्न करता है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 53
सौभाग्य से — भारत धूप, जल तथा जीवभार साधनों में समृद्ध है
छह गैर-परंपरागत साधन — एक तालिका में
पृष्ठ 53–56
| साधन | कैसे | कहाँ |
|---|---|---|
| परमाणु | अणुओं की संरचना बदलने से ऊष्मा | ★यूरेनियम-थोरियम — झारखंड व राजस्थान की अरावली; थोरियम केरल की मोनाजाइट रेत में |
| सौर | फोटोवोल्टाइक प्रौद्योगिकी — धूप सीधे विद्युत में | भारत उष्ण-कटिबंधीय देश — असीम संभावनाएँ; ग्रामीण व सुदूर क्षेत्रों में तेज़ी से लोकप्रिय |
| पवन | हवा से टरबाइन | नागरकोइल से मदुरै (विशालतम पेटी) · आंध्र, कर्नाटक, गुजरात, केरल, महाराष्ट्र, लक्षद्वीप · ★जैसलमेर |
| बायोगैस | जैविक पदार्थों का अपघटन | ग्रामीण भारत में ‘गोबर गैस प्लांट’ — ऊर्जा और उन्नत उर्वरक, दोनों |
| ज्वारीय | खाड़ी पर बाढ़ द्वार वाला बाँध; ज्वार के पानी से टरबाइन | खम्भात की खाड़ी · कच्छ की खाड़ी · सुंदर वन (गंगा डेल्टा) |
| भू-तापीय | भूमिगत जल चट्टानों की ऊष्मा से भाप बनकर टरबाइन चलाता है | पार्वती घाटी (मणिकरण, हिमाचल) · पूगा घाटी (लद्दाख) |
छह साधन, छह तरीक़े — पर सबकी एक ही ख़ूबी: ये ख़त्म नहीं होते
और यहाँ किताब एक नाम नहीं लेती — पर हमें लेना चाहिए★
किताब कहती है “भारत एक उष्ण-कटिबंधीय देश है, यहाँ सौर ऊर्जा के दोहन की असीम संभावनाएँ हैं” — पर किसी राज्य का नाम नहीं लेती। सच यह है कि सौर ऊर्जा में राजस्थान पूरे भारत में पहले स्थान पर है — देश की लगभग 27 प्रतिशत सौर क्षमता अकेले राजस्थान में
भड़ला सौर उद्यान, जोधपुर — 14,000 एकड़ थार मरुस्थल में, 2,245 मेगावाट, लगभग एक करोड़ सौर पैनल, 13 लाख से अधिक घरों को बिजली
और यह अध्याय 1 से जुड़ जाता है
“संसाधन प्रकृति का उपहार नहीं, मानवीय क्रियाओं का परिणाम हैं।”
यही वाक्य तुमने अध्याय 1 में पढ़ा था
जिस रेत को हम बंजर कहते थे, आज वही भारत की सबसे बड़ी बिजली-फ़ैक्टरी है
8 | ऊर्जा संरक्षण | अध्याय का अंत
और आख़िरी सच
“आर्थिक विकास के लिए ऊर्जा एक आधारभूत आवश्यकता है… सतत् पोषणीय ऊर्जा के दो आधार हैं — ऊर्जा संरक्षण की प्रोन्नति और नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों का बढ़ता प्रयोग। वर्तमान में भारत विश्व के अल्पतम ऊर्जादक्ष देशों में गिना जाता है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 56
यह आख़िरी वाक्य चुभने वाला है — और चुभना ही चाहिए
एक जागरूक नागरिक क्या कर सकता है
पृष्ठ 56
- निजी वाहन की अपेक्षा सार्वजनिक वाहन का उपयोग
- जब प्रयोग न हो रही हो तो बिजली बंद करना
- विद्युत बचत करने वाले उपकरणों का प्रयोग
- ग़ैर-पारंपरिक ऊर्जा साधनों का प्रयोग
चार काम — और चारों आज से शुरू हो सकते हैं
और यही इस पूरे अध्याय की आत्मा है
“ऊर्जा की बचत ही ऊर्जा उत्पादन है।”
यानी पंखा बंद करना भी बिजली बनाना है
राजस्थान इस अध्याय में आठ बार आता है★
RBSE के लिए यह सूची अलग से याद कीजिए
| # | कहाँ | क्या |
|---|---|---|
| 1 | वितरण | अनेक अलौह खनिज |
| 2 | ताँबा | खेतड़ी खदानें |
| 3 | अभ्रक | अजमेर के आस पास |
| 4 | ★चूना पत्थर | 22% — भारत में प्रथम |
| 5 | परमाणु ऊर्जा | अरावली — यूरेनियम, थोरियम |
| 6 | मानचित्र पृ. 53 | रावतभाटा संयंत्र |
| 7 | पवन ऊर्जा | जैसलमेर |
| 8 | मानचित्र पृ. 46 | बेवर — अभ्रक |
इस अध्याय में जिस पन्ने पर राजस्थान आए, वहाँ पेंसिल से एक तारा बना दीजिए — पूरे अध्याय में आठ तारे बनेंगे
जाते-जाते — छह सूत्र जो सब कुछ बाँध देते हैं
- पी-लि-बि-एँकोयले का क्रम — पीट, लिग्नाइट, बिटुमिनस, एंथ्रेसाइट
- मैग्नेट = ज़्यादामैग्नेटाइट 70%, हेमेटाइट 50–60%
- बे-वि · कु-मं · गो-मबेलाडिला→विशाखापट्टनम्, कुद्रेमुख→मंगलूरु, गोआ→मरमागाओ
- 33-65-22मैंगनीज़ म.प्र. · बॉक्साइट ओडिशा · चूना पत्थर★राजस्थान
- 200 और 55गोंडवाना लाख वर्ष · टरशियरी लाख वर्ष
- पूर्व-पश्चिम-दक्षिणकोयला पूर्व · तेल पश्चिम व पूर्वोत्तर · पवन दक्षिण व पश्चिम

