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कक्षा 6 · सामाजिक विज्ञान

भारतीय सभ्यता का प्रारंभ

समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे · अध्याय 6

भरत चौधरी और वनिता कुमारी ने बनाया · marushala.com

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कक्षा 6 • सामाजिक विज्ञान • समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे • अध्याय 6 — भारतीय सभ्यता का प्रारंभ

कक्षा — 6 · विषय — सामाजिक विज्ञान (समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे) · पृष्ठ — 85 से 104

साढ़े चार हज़ार साल पहले, इस ज़मीन पर नगर बसे थे

सीधी सड़कें, हर घर में स्नानागार, सड़कों के नीचे नालियाँ, और विदेशों तक जाता व्यापार और उनका लिखा हुआ आज भी कोई नहीं पढ़ सका

अध्याय का आरंभ — बी.बी. लाल

भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता… वास्तव में कई मायनों में एक अनूठी सभ्यता थी… जहाँ धनवान और निर्धन के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं है… हड़प्पा के सामाजिक परिदृश्य में शोषण नहीं, बल्कि आपसी सामंजस्य दिखाई देता है।

पृ. 85

अध्याय के तीन महत्वपूर्ण प्रश्न

पृ. 85

  • सभ्यता क्या है?
  • भारतीय उपमहाद्वीप की आरंभिक सभ्यता कौन-सी थी?
  • उसकी मुख्य उपलब्धियाँ क्या थीं?

ये तीन प्रश्न ही पूरे अध्याय का ढाँचा हैं — पहले परिभाषा, फिर पहचान, फिर उपलब्धियाँ।

1 | सभ्यता क्या है | सात विशेषताएँ

सभ्यता का अर्थ

पृ. 86

  • अध्याय 4 में हमने देखा — मनुष्य एक स्थान पर रहने लगा, कृषि करने लगा।
  • उसने कुछ तकनीकें विकसित कीं — भवन निर्माण, धातु विज्ञान, यातायात साधन।
  • और इस प्रकार वह सभ्यता की ओर उन्मुख हुआ।
  • ‘सभ्यता’ शब्द का प्रयोग सामान्यत: मानव समाज के उन्नत चरण के लिए किया जाता है।

धातु विज्ञान = धातु निष्कर्षण, शुद्धिकरण, मिश्रण की तकनीकें और धातु के गुणों का वैज्ञानिक अध्ययन।

एक ‘सभ्यता’ में कम से कम सात विशेषताएँ होनी चाहिए

पृ. 86

सभ्यता की सात विशेषताएँ

#विशेषता
1शासन और प्रशासन का कोई रूप
2नगरीकरण — नगर योजना, विकास और प्रबंधन
3विभिन्न प्रकार के शिल्प — कच्चा माल और तैयार माल
4व्यापार — आंतरिक और बाहरी
5लेखन का कोई रूप
6जीवन और विश्व के बारे में सांस्कृतिक विचार
7कृषि उत्पादकता — गाँव और नगर, दोनों के लिए

यह सूची याद करने की नहीं, लगाने की है★

  • पूरा अध्याय इन्हीं सात पर टिका है।
  • हम आगे एक-एक करके देखेंगे कि हड़प्पा में इनके क्या प्रमाण मिले।
  • और एक विशेषता का ख़ाना अंत तक अधूरा रह जाएगा।

कौन-सा? यह अध्याय के अंत में पता चलेगा — तब तक ध्यान रखिए।

आइए विचार करें — कौन-सी मूलभूत है?

पृ. 86

  • इनमें से आप किसे मूलभूत विशेषता मानते हैं — ऐसी, जो अन्य सभी के विकास के लिए अनिवार्य है?

इसका कोई एक सही उत्तर नहीं है। कारण बताना ज़रूरी है, उत्तर नहीं।

2 | सभ्यता कब और कहाँ | समय-रेखा

विश्व में सभ्यताओं का आरंभ

पृ. 87

  • विश्व के विभिन्न भागों में अलग-अलग समय पर सभ्यताओं का आरंभ हुआ।
  • मेसोपोटामिया (आधुनिक इराक और सीरिया) — वहाँ लगभग 6,000 वर्ष पहले सभ्यता का आरंभ हुआ।
  • इसके कुछ शताब्दियों के बाद प्राचीन मिस्र की सभ्यता का आरंभ हुआ।
  • अब हम केवल भारतीय उपमहाद्वीप और उसके उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र पर दृष्टि डालेंगे।

चित्र 6.2 — समय-रेखा

तिथिक्या
लगभग 6,000 वर्ष पहलेमेसोपोटामिया में सभ्यता का आरंभ
3100 सा.सं.पू.मिस्र की सभ्यता का आरंभ
2600–1900 सा.सं.पू.सिंधु-सरस्वती सभ्यता का काल

3 | गाँव से नगर | भूगोल, तिथियाँ, नाम

पहले भूगोल

पृ. 88

  • पंजाब (आज भारत और पाकिस्तान में विभाजित) और सिंध (अब पाकिस्तान में) के विशाल मैदान।
  • इन्हें सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियाँ सिंचित करती हैं।
  • सिंधु ने इन मैदानों को उपजाऊ और कृषि के अनुकूल बनाया।
  • इनकी पूर्व दिशा में कुछ सहस्राब्दियों पहले सरस्वती नदी बहती थी — हिमालय की तलहटी से हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात तक।

सहायक नदी = वह नदी जो किसी बड़ी नदी में मिलती है। यमुना गंगा की सहायक नदी है।

दो तिथियाँ, दो छलाँगें

पृ. 88

गाँव से नगर, नगर से महानगर

तिथिक्या हुआ
3500 सा.सं.पू. सेगाँव, नगरों में परिवर्तित हो गए
लगभग 2600 सा.सं.पू.नगर, महानगरों में परिवर्तित हो गए

दूसरी छलाँग का कारण पुस्तक स्वयं बताती है — बढ़ता व्यापार और अन्य विनिमय।

इस सभ्यता के तीन नाम

पृ. 88

  • सिंधु सभ्यता
  • हड़प्पा सभ्यता
  • सिंधु-सरस्वती सभ्यता
  • पुस्तक कहती है कि वह इन तीनों नामों का प्रयोग करेगी।

इसके निवासियों को हड़प्पाई या हड़प्पावासी कहते हैं। यह विश्व की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है।

नाम ‘हड़प्पाई’ क्यों पड़ा★

पृ. 88

  • लगभग एक शताब्दी पहले, 1920–21 में हड़प्पा इस सभ्यता से संबंधित पहला उत्खनित नगर था।
  • हड़प्पा आज के पाकिस्तान के पंजाब में है।
  • इस विकास प्रक्रिया को ‘भारत का पहला नगरीकरण’ भी कहा जाता है।

! एक और तिथि आगे आएगी — 1924, जब हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो की खोज हुई। दोनों अलग हैं।

दो तिथियाँ जो आपस में गड्डमड्ड होती हैंध्यान

तिथिकिसकी
1920–21हड़प्पा — पहला उत्खनित नगर
1924हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो की खोज

4 | मानचित्र | पाँच बड़े नगर

चित्र 6.3 — सभ्यता का विस्तार

पृ. 89

  • पुस्तक कहती है: पर्वत शृंखलाओं द्वारा बनी प्राकृतिक सीमाओं को देखिए।
  • पर्वत: हिंदुकुश · हिमालय · सुलैमान श्रेणी · अरावली श्रेणी
  • नदियाँ: सिंधु · झेलम · चिनाब · रावी · सतलुज · ब्यास · सरस्वती · बनास · यमुना · गंगा

यही प्राकृतिक सीमाएँ हमने अध्याय 5 में पढ़ी थीं — विष्णु पुराण और तमिल कविता में।

मानचित्र के पाँच बड़े नगर

नगरआज कहाँ
हड़प्पापंजाब (पाकिस्तान)
मोहनजो-दड़ोसिंध (पाकिस्तान)
गँवेरीवालाचोलिस्तान मरुस्थल (पाकिस्तान)
राखीगढ़ीहरियाणा
धौलावीरागुजरात

मानचित्र की अन्य बस्तियाँ

पृ. 89

  • कालीबंगा (राजस्थान) · लोथल (गुजरात) · बनावली, भिर्राना, फरमाना (हरियाणा)
  • चन्हुदड़ो · बालाकोट · नागेश्वर · खिरसरा · बगासरा · नागवाड़ा
  • रूपनगर · मांडा · मुसा खेल · डाबरकोट · लखनजो-दड़ो · करनपुरा · शोर्तुगई

मानचित्र पर पुरास्थलों की सघनता स्पष्ट दिखती है।

सरस्वती नदी★

पृ. 90

  • सरस्वती को आज भारत में घग्गर और पाकिस्तान में हाकरा कहते हैं — इसलिए घग्गर-हाकरा भी।
  • इसके किनारे भी अनेक पुरास्थल मिले हैं।
  • आज यह एक मौसमी नदी है, जो मात्र वर्षा ऋतु के दौरान बहती है।
  • इसका वर्णन सबसे पहले प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में मिलता है — एक देवी के रूप में भी, और पर्वत से समुद्र तक बहने वाली नदी के रूप में भी।

बाद के ग्रंथों में इस नदी के सूखने और अंतत: लुप्त हो जाने का वर्णन मिलता है। — इसे अध्याय के अंत तक याद रखिए।

सरस्वती की द्रोणी में क्या मिला

पृ. 90–91

  • दो महानगर — राखीगढ़ी और गँवेरीवाला
  • छोटे नगर — फरमाना (हरियाणा), कालीबंगा (राजस्थान)
  • अन्य नगर — भिर्राना और बनावली (हरियाणा)

5 | नगर-योजना | सुनियोजित नगर

खोज का क्रम

पृ. 90

  • हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो — इस सभ्यता के सबसे पहले दो नगर, खोज 1924 में।
  • सिंधु के मैदानों में बहुत से पुरास्थल मिले — इसीलिए आरंभ में इसे ‘सिंधु घाटी की सभ्यता’ कहा गया।
  • बाद में मिले — धौलावीरा (गुजरात), राखीगढ़ी (हरियाणा), गँवेरीवाला (चोलिस्तान), और सैकड़ों छोटे स्थल जैसे लोथल (गुजरात)।

“इस प्रकार की खोजें आज भी जारी हैं।”

पर पुस्तक ‘घाटी’ शब्द का प्रयोग नहीं करती★

पृ. 91

‘घाटी’ शब्द क्यों छोड़ा गया

पृ. 91

  • “अब हम जानते हैं कि यह सभ्यता सिंधु क्षेत्र से बहुत आगे तक फैली हुई थी।”
  • इसका प्रमाण मानचित्र है — धौलावीरा गुजरात में, राखीगढ़ी हरियाणा में, लोथल गुजरात में।

यह वही आदत है जो अध्याय 5 में दिखी थी — प्रचलित नाम को प्रमाण के आधार पर छोड़ देना।

नगर कैसे बनाए गए

पृ. 91

  • अधिकांश नगर सुनियोजित योजना के अंतर्गत निर्मित किए गए थे।
  • चौड़ी सड़कें, जो सामान्यत: चारों दिशाओं की ओर उन्मुख होती थीं।
  • अधिकांश नगरों के चारों ओर किलेबंदी मिलती है।
  • नगर के दो विशिष्ट भाग — ‘ऊपरी नगर’ (संभवत: अभिजात वर्ग) और ‘निचला नगर’ (साधारण लोग)।

किलेबंदी = सुरक्षा हेतु बस्ती के चारों ओर बनाई गई विशाल दीवार। अभिजात वर्ग = शासक, अधिकारी, प्रशासक, प्राय: पुरोहित।

भवन और घर

पृ. 91

  • कुछ बड़े भवन सामूहिक उद्देश्यों के लिए — जैसे गोदाम, जहाँ परिवहन की वस्तुएँ रखी जाती थीं।
  • सड़कों और गलियों में विभिन्न आकारों के निजी घर।
  • ★बड़े और छोटे घरों के निर्माण की गुणवत्ता एक समान मिलती है।
  • भवनों के निर्माण में सामान्यत: ईंटों का प्रयोग।

यही बी.बी. लाल के उद्धरण का प्रमाण है — “धनवान और निर्धन के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं है।”

धौलावीरा — अपवाद वाला नगर★

पृ. 92

  • धौलावीरा में तीन अलग-अलग क्षेत्र थे, न कि अन्य नगरों की तरह दो क्षेत्र।
  • इस नगर में अधिकांश भवनों की नींव पत्थरों से बनाई गई थी — ईंटों से नहीं।

धौलावीरा इस अध्याय में बार-बार लौटता है — जलाशय, दर्पण, छैनी, खेल-बोर्ड, और अध्याय का पहला चित्र।

महास्नानागार — मोहनजो-दड़ो★

पृ. 91

  • आकार: 12 × 7 मीटर।
  • सबसे ऊपर की ईंटों पर जल रोधक सामग्री — प्राकृतिक बिटुमेन (डामर) की परत।
  • चारों ओर छोटे-छोटे कमरे; उनमें से एक कमरे के अंदर कुआँ मिला है।
  • पानी खाली करने के लिए कोने में एक नाली।
  • इसे स्वच्छ पानी से समय-समय पर भरा जाता था।

महास्नानागार किसलिए बना? — तीन व्याख्याएँ★

व्याख्यास्थिति
सार्वजनिक स्नान के लिए! अब स्वीकार्य नहीं
केवल राजसी परिवार के लिएविचाराधीन
धार्मिक कार्यों के लिएविचाराधीन

पहली व्याख्या क्यों छोड़ी गई

पृ. 93

  • “क्योंकि यह पाया गया है कि इस नगर के अधिकांश घरों में स्नानागार बने हुए थे।”
  • यदि हर घर में स्नानागार था, तो सार्वजनिक स्नान के लिए इतना बड़ा कुंड क्यों बनाते?

यह प्रमाण के आधार पर एक व्याख्या को छोड़ना है — कारण अवश्य याद रखिए, केवल तीन नाम नहीं।

और हमारे पास कोई और स्रोत नहीं है★

पृ. 93

पुस्तक की अपनी चेतावनी

पृ. 93

  • “ध्यान दीजिए कि इस विषय में हमारे पास इतिहास के अन्य स्रोत नहीं हैं —
  • न कोई शिलालेख,
  • न कोई ग्रंथ,
  • और न ही किसी यात्री का विवरण।”

इसीलिए इस अध्याय में बार-बार ‘संभवत:’, ‘रहा होगा’ और ‘प्रतीत होता है’ आते हैं। यह कमज़ोरी नहीं — यही ईमानदार इतिहास है।

6 | जल प्रबंधन | नालियाँ, कुएँ, जलाशय

हड़प्पावासी और जल

पृ. 94

  • हड़प्पावासी जल प्रबंधन और स्वच्छता को बहुत महत्व देते थे।
  • उनके घरों में स्नान के लिए अलग स्नानागार हुआ करते थे।
  • ये नगर जल-निकास प्रणाली से जुड़े हुए थे, जो साधारणत: सड़कों के नीचे होती थीं।
  • उनमें अपशिष्ट जल बहता था।

चित्र 6.7 — लोथल (गुजरात) में जल-निकास प्रणाली।

पानी कहाँ से आता था

पृ. 95

  • मोहनजो-दड़ो में लोग ईंटों से बनाए कुओं से पानी निकाला करते थे।
  • अन्य क्षेत्रों में तालाब, पास के झरनों अथवा मानव निर्मित जलाशयों से पानी लेते होंगे।

जलाशय = विशाल प्राकृतिक या कृत्रिम स्थान, जहाँ जल का भंडारण किया जाता है।

धौलावीरा के जलाशय★

पृ. 95

  • धौलावीरा में (गुजरात में कच्छ के रन में) 73 मीटर लंबा सबसे बड़ा जलाशय मिला है।
  • वहाँ पत्थरों और यहाँ तक कि चट्टान को काटकर कम से कम छह विशाल जलाशयों का निर्माण किया गया था।
  • इनमें से अधिकांश को कुशल जल संचयन और वितरण के लिए भूमिगत नालियों से जोड़ा गया था।

! चित्र 6.8 का जलाशय 33 मीटर लंबा है — वह चट्टान काटकर बनाया गया जलाशय है, सबसे बड़ा नहीं।

73 और 33 — दो अलग जलाशयध्यान

मापकौन-सा
73 मीटरधौलावीरा का सबसे बड़ा जलाशय
33 मीटरचित्र 6.8 वाला, चट्टान काटकर बनाया गया

आइए विचार करें — इससे प्रशासन का क्या पता चलता है?★

पृ. 96

  • इतने बड़े जलाशयों के लिए आवश्यक श्रमिकों की बड़ी संख्या के बारे में सोचिए।
  • उनके कार्य को सुनियोजित करने के लिए निश्चित निर्देश किसने दिए होंगे?
  • उन्हें मजदूरी का भुगतान कैसे किया गया होगा? (संकेत — उस समय मुद्रा का प्रचलन नहीं था।)
  • समय-समय पर सफाई के लिए क्या कोई स्थानीय प्राधिकारी थे?

यही सभ्यता की विशेषता #1 — शासन और प्रशासन — का प्रमाण है। पुस्तक जोड़ती है: “पुरातत्ववेत्ता भी इन प्रश्नों के उत्तर पर सहमत नहीं होते!”

7 | भोजन और कृषि | हड़प्पावासी क्या खाते थे

बस्तियाँ नदियों के किनारे क्यों

पृ. 96

  • यह केवल जल स्रोतों तक आसान पहुँच के लिए नहीं था।
  • कृषि की दृष्टि से भी यह एक औचित्यपूर्ण विकल्प रहा होगा —
  • क्योंकि नदियाँ अपने आस-पास की भूमि को उपजाऊ बनाती हैं।

हड़प्पावासियों की फ़सलें

प्रकारफ़सलें
अनाजजौ · गेहूँ · कुछ मोटे अनाज · बाजरा · कभी-कभी धान
अन्यदलहन · अनेक किस्म की सब्जियाँ
★रेशाकपास — यूरेशिया में उगाने वाले वे सर्वप्रथम थे

कपास और हल

पृ. 96

  • यूरेशिया में कपास उगाने में भी वे सर्वप्रथम थे, जिसका उपयोग वे कपड़ा बुनने में किया करते थे।
  • उन्होंने हल सहित खेती के कई उपकरण बनाए।
  • ★इनमें से कुछ का उपयोग आधुनिक समय में भी किसानों द्वारा किया जाता है।

दलहन = वह फ़सल-श्रेणी जिसमें सेम, मटर के दाने और दालें आती हैं। चित्र 6.9 — मिट्टी से निर्मित हल का लघु प्रतिरूप (बनावली, हरियाणा)।

गाँव नगरों को जिलाते थे

पृ. 97

  • यह गहन कृषि गतिविधि सैकड़ों छोटे ग्रामीण स्थलों अथवा गाँवों द्वारा संचालित की जाती थी।
  • ★“अभी की तरह तब भी ग्रामीण क्षेत्रों से पर्याप्त कृषि उपज प्रतिदिन उपलब्ध होने पर ही नगर जीवित रह सकते थे।”

यही सभ्यता की विशेषता #7 — कृषि उत्पादकता — का प्रमाण है।

माँस, मछली और बर्तनों का राज़

पृ. 97

  • उन्होंने माँस के सेवन के लिए अनेक पशुओं को पाला; मछलियों के लिए नदियों और समुद्रों पर निर्भर थे।
  • प्रमाण: खुदाई में मिली पशुओं की हड्डियाँ और मत्स्य जीवाश्म।
  • मिट्टी के पात्रों की वैज्ञानिक जाँच से पता चला कि उनमें क्या पकता था।

बर्तनों में मिले अवशेष★

प्रकारक्या मिला
प्रत्याशितदुग्ध उत्पाद
अप्रत्याशितहल्दी · अदरक · केले

“स्पष्ट है कि उनके भोजन में बहुत विविधता थी।” — हल्दी और अदरक चार हज़ार साल से हमारी रसोई में हैं।

8 | सक्रिय व्यापार | ईरान से ओमान तक

व्यापार किसके साथ

पृ. 97

  • न केवल अपनी सभ्यता के भीतर — आस-पास या बहुत दूर के अन्य नगरों में,
  • बल्कि भारत के भीतर और बाहर की अन्य सभ्यताओं और संस्कृतियों के साथ भी।
  • निर्यात: आभूषण · लकड़ी · दैनिक उपयोग की वस्तुएँ · संभवत: सोना एवं कपास · कुछ खाद्य वस्तुएँ

आयात के बारे में पुस्तक कहती है — “यह स्पष्ट नहीं है… संभवत: यह तांबा हो सकता है।”

और इसके दो पक्के सबूत हैं★

पृ. 98

व्यापार के दो भौतिक प्रमाण

वस्तुकहाँ मिली
कार्नेलियन मनके (गुजरात के पत्थर से)सूसा — वर्तमान ईरान
हाथी दाँत का कंघा (लगभग 7 सेमी., हड़प्पा का)ओमान का तट

ये केवल तस्वीरें नहीं — ये सिद्ध करते हैं कि सामान यहाँ से वहाँ तक पहुँचा।

कार्नेलियन और शंख

पृ. 97

  • उनके सर्वाधिक प्रिय आभूषण कार्नेलियन के मोती थे — अधिकतर गुजरात में पाए जाने वाले लाल रंग के अल्प मूल्यवान पत्थर।
  • हड़प्पा के कारीगरों ने उनमें छेद करने की तकनीक भी विकसित की थी, ताकि धागा डाला जा सके।
  • उन्होंने शंखों से बहुत सुंदर चूड़ियाँ भी बनाईं।
  • ★चूँकि शंख का खोल सख़्त होता है, अत: उन चूड़ियों को बनाने के लिए परिष्कृत तकनीक की आवश्यकता भी होती होगी।

यही सभ्यता की विशेषता #3 — विभिन्न प्रकार के शिल्प — का प्रमाण है।

तांबा और कांस्य

पृ. 98

  • हड़प्पावासी मुलायम धातु तांबे की कलाकारी में कुशल थे।
  • तांबे में टिन मिलाने पर कांस्य धातु बन जाती है, जो तांबे की तुलना में कठोर होती है।
  • हड़प्पावासियों ने उपकरण तथा बर्तन बनाने में कांसे का उपयोग किया।

सूत्र याद रखिए — तांबा + टिन = कांस्य, और कांस्य अधिक कठोर होता है।

भारत की प्रथम गहन समुद्री गतिविधि★

पृ. 98

  • उन्होंने स्थल मार्ग एवं नदियों का उपयोग किया, और अधिक दूरवर्ती गंतव्यों के लिए समुद्री रास्तों का।
  • “यह भारत की प्रथम गहन समुद्री गतिविधि थी।”
  • गुजरात और सिंध के तटवर्ती क्षेत्रों में कई हड़प्पाई बस्तियाँ स्थित हैं।

लोथल का विशाल बेसिन

पृ. 98

  • गुजरात की एक लघु बस्ती लोथल में आश्चर्यजनक रूप से 217 मीटर लंबाई और 36 मीटर चौड़ाई का एक विशाल बेसिन मिला है।
  • “इसकी लंबाई फुटबॉल के दो मैदानों से थोड़ी अधिक है।”
  • इस बेसिन में बंदरगाह जैसी संरचना अवश्य रही होगी, जिससे नावों के माध्यम से आयात-निर्यात होता होगा।

! ध्यान दीजिए — लोथल एक ‘लघु बस्ती’ है, बड़ा नगर नहीं। फिर भी वहाँ यह विशाल बेसिन है।

मुहरें — और वह पहेली जो आज तक अनसुलझी है★

पृ. 98–99

  • व्यापक व्यापार में ज़रूरी था कि व्यापारी अपने सामान को और एक-दूसरे को पहचानें!
  • खुदाई में हज़ारों की संख्या में छोटी मुहरें मिलीं — मुख्य उपयोग यही रहा होगा।
  • ये मुलायम पत्थर स्टीऐटाइट की बनी थीं, जिन्हें गरम कर कठोर बनाया जाता था; माप केवल कुछ सेंटीमीटर।
  • इन पर जानवरों के चित्र हैं, और लेखन प्रणाली के कुछ संकेत भी।

पर वह लेखन आज तक कोई नहीं पढ़ सकाध्यान

पृ. 99

लिपि की पहेली

पृ. 99

  • “इस लेखन प्रणाली और पशुओं के चित्रों के प्रतीकों के अर्थ को अभी समझा जाना बाकी है,
  • पर यह निश्चित है कि ये किसी प्रकार के व्यापार की गतिविधियों से संबंधित हैं।”
  • चित्र 6.13 — एकशृंगी पशु, बैल, और सींग वाले बाघ की मुहरें।

सभ्यता की विशेषता #5 थी ‘लेखन का कोई रूप’। हड़प्पा में लेखन है — पर हम उसे पढ़ नहीं सकते।

9 | प्राचीन जीवन | उनकी वस्तुएँ

दैनिक उपयोग की वस्तुएँ

पृ. 100

  • कांस्य दर्पण · पकी मिट्टी (टेराकोटा) का पात्र — दोनों धौलावीरा से
  • भार तौलने के पत्थर · कांस्य छैनी — दोनों धौलावीरा से
  • 25 सेमी. के पत्थर पर उकेरा गया खेल-बोर्ड — धौलावीरा से
  • लगभग 4 सेमी. लंबी मिट्टी की सीटी — करनपुरा, राजस्थान से

“हड़प्पावासियों ने वयस्कों और बच्चों, दोनों के मनोरंजन के लिए अनेक खेल तैयार किए!”

सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक वस्तुएँ

पृ. 101

  • एक छोटी मूर्ति जिसे प्राय: ‘पुरोहित राजा’ कहा जाता है
  • स्वास्तिक दर्शाती हुई मुहर
  • शक्तिशाली पशुओं से घिरे ऊँचे स्थान पर बैठे त्रिमुखी देवता को दर्शाती मुहर
  • मोहनजो-दड़ो की ‘नर्तकी’ — 10.8 सेमी. ऊँची कांस्य प्रतिमा
  • नमस्ते की मुद्रा में बैठी टेराकोटा की मूर्ति
  • लोथल से प्राप्त पात्र पर प्यासे कौए की कहानी का चित्रण

पर ‘पुरोहित राजा’ के नाम पर मत जाइए★

पृ. 101

नाम प्रमाण नहीं होता

पृ. 101

  • मूर्ति को प्राय: ‘पुरोहित राजा’ कहा जाता है —
  • पर पुस्तक तुरंत जोड़ती है: “यद्यपि यह मालूम नहीं है कि यह प्रतिमा किसकी है।”

यह तीसरी बार है जब पुस्तक ने यही अनुशासन दिखाया — (1) ‘सिंधु घाटी’ कहना छोड़ा · (2) महास्नानागार की पहली व्याख्या छोड़ी · (3) ‘पुरोहित राजा’ पर संदेह जताया।

चूड़ियों का सूत्र★

पृ. 102

  • ‘नर्तकी’ की पूरी बाँह ढँकने वाली चूड़ियों को ध्यान से देखिए —
  • जो गुजरात और राजस्थान के क्षेत्रों में अभी भी महिलाएँ पहनती हैं।
  • इस अध्याय में आपने और कहाँ इस तरह चूड़ियाँ पहनने को चिह्नित किया है?
उत्तर देखिए

उत्तर: शंख की चूड़ियाँ, पृ. 97। निष्कर्ष: यह परंपरा चार हज़ार वर्ष से चली आ रही है।

10 | अंत अथवा नई शुरुआत? | पतन

पतन का विवरण

पृ. 102

  • 1900 सा.सं.पू. के आस-पास इस सभ्यता की सभी उपलब्धियों के बावजूद उसका ह्रास हो गया।
  • इसके नगर एक के बाद एक खाली होते गए।
  • जो रहे भी, उन्होंने परिवर्तित वातावरण में ग्रामीण जीवन-शैली को अपनाया।
  • “ऐसा प्रतीत होता है कि पूर्ववर्ती सरकार या प्रशासन अब विद्यमान नहीं रहा।”
  • हड़प्पावासी सैकड़ों छोटी-छोटी बस्तियों के रूप में बिखर गए।

पहले वह कारण, जो ख़ारिज हो गयाध्यान

पृ. 102

युद्ध क्यों नहीं

पृ. 102

  • “बहुत समय पहले यह सोचा गया कि युद्ध या आक्रमण ने इन नगरों का विध्वंस किया होगा,
  • लेकिन युद्ध या आक्रमण के कोई निशान नहीं मिलते।
  • जहाँ तक प्रमाणों की बात है, हड़प्पावासियों ने वास्तव में कभी भी कोई सेना या युद्ध के हथियार नहीं रखे।
  • यह अपेक्षाकृत एक शांतिपूर्ण सभ्यता प्रतीत होती है।”

अब वे दो कारण, जिन पर सहमति है★

#कारणविवरण
1जलवायु परिवर्तन2200 सा.सं.पू. से वर्षा में कमी और शुष्कता → कृषि कठिन → नगरों को खाद्य आपूर्ति में कमी
2सरस्वती का सूखनामध्य बेसिन सूख गया; कालीबंगा और बनावली अचानक छोड़ दिए गए

पुस्तक की अपनी स्वीकारोक्ति

पृ. 103

  • “इसमें अन्य कारण भी रहे होंगे,
  • लेकिन ये दो कारण हमें याद दिलाते हैं कि हम अपने कल्याण के लिए अपनी जलवायु और पर्यावरण पर कितने निर्भर हैं।”

! 2200 और 1900 को मत मिलाइए — 2200 = जलवायु परिवर्तन का आरंभ, 1900 = सभ्यता का ह्रास।

पर यह अंत नहीं था★

पृ. 103

शीर्षक का उत्तर

पृ. 103

  • “यद्यपि नगर लुप्त हो गए,
  • लेकिन हड़प्पा की संस्कृति एवं प्रौद्योगिकी अधिकांशत: बची रही
  • और यह भारतीय सभ्यता के अगले चरण में पहुँच गई,
  • जिसके बारे में हम अगले अध्याय में पता करेंगे।”

इसीलिए अध्याय का शीर्षक है ‘अंत अथवा नई शुरुआत?’ — और उत्तर है: नई शुरुआत।

सभ्यता की सात विशेषताएँ — हड़प्पा में

  • 1 · शासन — विशाल जलाशय, 700 कुएँ, नगर-योजना
  • 2 · नगरीकरण — सुनियोजित नगर, नालियाँ, किलेबंदी
  • 3 · शिल्प — कार्नेलियन, शंख की चूड़ियाँ, कांस्य
  • 4 · व्यापार — सूसा (ईरान), ओमान, लोथल का बेसिन
  • 5 · लेखन — ! है, पर पढ़ी नहीं जा सकी
  • 6 · सांस्कृतिक विचार — ‘नर्तकी’, मुहरें, प्यासा कौआ
  • 7 · कृषि — जौ, गेहूँ, कपास, हल, गाँवों की उपज

आगे बढ़ने से पहले — पुस्तक का अपना सार

पृ. 103

  • सिंधु, हड़प्पा या सिंधु-सरस्वती सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। हड़प्पावासियों ने कुशल जल प्रबंधन, विविध शिल्पों और सक्रिय व्यापार के साथ सुनियोजित नगरों का निर्माण किया।
  • उपजाऊ कृषि से नगरों को विभिन्न प्रकार की फसलें प्राप्त हुईं।
  • इस सभ्यता का जलवायु संबंधी और पर्यावरणीय परिवर्तनों के कारण अंतत: ह्रास हो गया; लोग ग्रामीण जीवन-शैली की ओर लौट गए।

नगर उजड़ गए — पर चूड़ियाँ, नमस्ते, हल और हल्दी बचे रहे

जो पढ़ाते हैं, वही लिखते और जाँचते हैं

इसे बनाने वाले

  • भरत चौधरीभरत चौधरीव्याख्यातारा.उ.मा.वि. जेठान्तरी · ब्लॉक समदड़ी, जिला बालोतरा
  • वनिता कुमारीवनिता कुमारीव्याख्यातारा.उ.मा.वि. रामसीन मूंगड़ा · ब्लॉक एवं जिला बालोतरा

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