कक्षा 6 • सामाजिक विज्ञान • समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे • अध्याय 7 — भारत की सांस्कृतिक जड़ें
कक्षा — 6 · विषय — सामाजिक विज्ञान (समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे) · पृष्ठ — 105 से 124
सोचिए — कोई ग्रंथ बिना लिखे 200 पीढ़ियों तक कैसे बचा रह सकता है?
वेद हजारों वर्षों तक लिखे नहीं गए — केवल याद किए गए और बोले गए और यही इस अध्याय की पहली चौंकाने वाली बात है
अध्याय का आरंभ — सुभाषित (नीतिशतक)
वह जिसे चुराया नहीं जा सकता; जिसे कोई शासक छीन नहीं सकता; …जो बोझ नहीं है क्योंकि इसका अपना कोई भार नहीं है; जिसका उपयोग करने से हर दिन इसमें वृद्धि ही होती है — यह सबसे बड़ी संपत्ति है, सच्चे ज्ञान की संपत्ति।
पृ. 105
अध्याय के तीन महत्वपूर्ण प्रश्न
पृ. 105
- वेद क्या हैं? इनका संदेश क्या है?
- प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. में भारत में कौन-कौन से नए दर्शन/मत उभरे? इनके मूल सिद्धांत क्या हैं?
- लोक और जनजातीय परंपराओं का भारतीय संस्कृति में क्या योगदान रहा है?
आवरण पर तीन चित्र हैं — एक ऋषि (हम्पी, कर्नाटक) · बुद्ध (भूटान) · महावीर (बिहार)। यही तीनों इस अध्याय का नक़्शा हैं।
1 | वृक्ष का रूपक | जड़ें, तना, शाखाएँ
भारतीय संस्कृति एक प्राचीन वृक्ष की तरह है
पृ. 106
वृक्ष कैसे बना है
पृ. 106
- किसी प्राचीन वृक्ष के समान इसमें अनेक जड़ें और अनेक शाखाएँ हैं।
- जड़ें एक सामान्य तने को पोषण देती हैं।
- इस तने से अनेक शाखाएँ निकलती हैं, जो भारतीय संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती हैं —
- हालाँकि ये सब एक ही सामान्य तने से जुड़ी हुई हैं।
शाखाएँ: कला · साहित्य · विज्ञान · चिकित्सा · धर्म · शासन पद्धति · मार्शल आर्ट्स — और कुछ दर्शन भी।
जड़ें कहाँ तक जाती हैं
पृ. 106
- अनेक पुरातत्व विज्ञानियों तथा विद्वानों ने बताया है कि भारतीय संस्कृति की कुछ जड़ें सिंधु या हड़प्पा अथवा सिंधु-सरस्वती सभ्यता की ओर जाती हैं (अध्याय 6)।
- आगे चलकर समय बीतने के साथ भारत में सैकड़ों प्रकार के जीवन दर्शन उभरे।
- इन्हें तथा इनकी जड़ों को समझकर ही हम ‘इंडिया अर्थात भारत’ को भलीभाँति समझ सकेंगे।
आध्यात्मिक = आत्मा से संबंधित। साधक = वह व्यक्ति जो इस दुनिया के सत्य को जानना चाहता है — ऋषि, संत, योगी, दार्शनिक।
2 | वेद और वैदिक संस्कृति | चार वेद; मौखिक परंपरा
वेद क्या हैं
पृ. 106
- ‘वेद’ शब्द विद् से आया है, जिसका अर्थ है ‘ज्ञान’ — जैसे विद्या।
- वास्तव में चार वेद हैं — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।
- ये भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं और वस्तुत: विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथों में से एक हैं।
- वेदों में हजारों ऋचाएँ हैं — कविताओं और गीतों के रूप में प्रार्थनाएँ।
! ध्यान दीजिए — “विश्व के प्राचीनतम ग्रंथों में से एक”, न कि “सबसे प्राचीन ग्रंथ”।
और ये लिखे नहीं गए थे★
पृ. 106
मौखिक परंपरा
पृ. 106
- ये ऋचाएँ लिखित रूप में नहीं थीं, अपितु इनका मौखिक पाठ किया जाता था।
- ये सप्तसिंधु क्षेत्र में रची गईं (अध्याय 5)।
- यह कहना कठिन है कि ऋग्वेद की रचना कब हुई — विशेषज्ञों ने पाँचवीं से दूसरी सहस्राब्दी सा.सं.पू. के बीच का प्रस्ताव किया है।
- ★“यह ग्रंथ 100 से 200 पीढ़ियों तक गहन प्रशिक्षण के माध्यम से स्मृतिबद्ध किए गए एवं मौखिक रूप से बिना किसी विशेष परिवर्तन के आगे संप्रेषित किए गए।”
ध्यान रखें — यूनेस्को की मान्यता★
पृ. 107
- हजारों वर्षों से किए गए वैदिक पाठशैली के इस सुव्यवस्थित संप्रेषण को 2008 में यूनेस्को ने
- ‘मानवीयता के मौखिक और अमूर्त विरासत की अनुपम कोटि’ के रूप में मान्यता दी।
यूनेस्को = संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन।
ऋचाओं की रचना किसने की
पृ. 107
- वैदिक ऋचाओं की रचना ऋषियों (कवि) और ऋषिकाओं (कवियत्रियाँ) द्वारा संस्कृत के एक प्रारंभिक रूप में की गई थी।
- ये ऋचाएँ अनेक देवों को संबोधित करती थीं — इंद्र, अग्नि, वरुण, मित्र, सरस्वती, उषा और अन्य।
- इन दृष्टाओं के साथ मिलकर देवों ने मानव जीवन और ब्रह्मांड में ऋत या सत्य और क्रम को बनाए रखा।
ऋषिका = कवियत्री। रचनाकारों में स्त्रियाँ भी थीं — यह याद रखिए, गार्गी आगे आएँगी।
एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति★
पृ. 107
अर्थ, और उसका आशय
पृ. 107
- अर्थात, परम सत्य एक ही है, किंतु मनीषी इसे अनेक नाम देते हैं।
- आद्य ऋषियों और ऋषिकाओं ने देवताओं और देवियों को अलग नहीं, बल्कि एक ही माना।
- इस वैश्विक दर्शन में कुछ मान्यताएँ महत्वपूर्ण थीं, जो ‘सत्य’ से आरंभ हुईं — जो ईश्वर का दूसरा नाम था।
! इसका अर्थ है ‘परम सत्य की एकता’ — न कि ‘ब्रह्मांड की शक्तियों की एकता’। अभ्यास का प्रश्न 3 यहीं फँसाता है।
ऋग्वेद के अंतिम मंत्रों में एकता का आह्वान
साथ मिलकर चलें, साथ मिलकर बोलें, एक हो हमारा मन, हमारे विचार मिलें… एक हो हमारा उद्देश्य, एक हो हमारा हृदय… हमारे विचार एक हों, अत: सभी सहमत हों।
पृ. 108
3 | वैदिक समाज | जन, सभा, समिति
‘जन’ क्या था★
पृ. 108
- प्रारंभिक वैदिक समाज विभिन्न जनों (अर्थात, लोगों का बड़ा समूह) में संगठित था।
- ऋग्वेद में ही ऐसे 30 से अधिक जनों की सूची दी गई है — उदाहरणार्थ भरत, पुरु, कुरु, यदु, तुर्वश।
- प्रत्येक जन उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भाग के एक विशेष क्षेत्र के साथ जुड़ा था।
★‘भरत’ — यही वह जन है जिससे अध्याय 5 में ‘भारत’ नाम बना था। वहाँ पढ़ा था: भरत कोई राजा नहीं, एक जन-समूह था।
समय-रेखा — चित्र (पृ. 108)
| क्या | कब |
|---|---|
| समय-रेखा पर अंकित | 1500 सा.सं.पू. · 1000 सा.सं.पू. · 500 सा.सं.पू. · 1 सा.सं. · 500 सा.सं. |
| बुद्ध और महावीर का जन्म | 1000 और 500 सा.सं.पू. के बीच, 500 के अधिक निकट |
| उपनिषद् | लगभग 1500 से 500 सा.सं.पू. तक फैली पट्टी |
| वैदिक दर्शन | लगभग 700 सा.सं.पू. से आगे |
बिंदुदार सिरों का अर्थ★
पृ. 108
- समय-रेखा पर उपनिषद् और वैदिक दर्शन की पट्टियों के सिरे बिंदुदार हैं।
- इसका अर्थ है — तिथि अनिश्चित है।
- यह पुस्तक की ईमानदारी है।
इन पट्टियों की सटीक तिथियाँ याद करने की आवश्यकता नहीं है।
शासन के संकेत, और व्यवसाय
पृ. 109
- इसके बारे में बहुत अधिक ज्ञात नहीं है कि ये जन अपने समाज का शासन कैसे चलाते थे।
- वेदों में राजा, सभा और समिति जैसे कुछ शब्दों से ही संकेत मिलते हैं।
- ★“सभा और समिति दोनों शब्द सामूहिकता को इंगित करते हैं।”
- व्यवसाय: किसान · बुनकर · कुम्हार · शिल्पकार · बढ़ई · आरोग्यकर्ता · नर्तक-नर्तकी · नाई · पुजारी
आरोग्यकर्ता = पारंपरिक प्रथाओं से राहत देने या रोग ठीक करने वाला व्यक्ति।
4 | वैदिक दर्शन | उपनिषद्, वेदांत, योग
अनुष्ठान से उपनिषद् तक
पृ. 109
- वैदिक संस्कृति में अनेक अनुष्ठान (यज्ञ आदि) विकसित हुए।
- दैनिक अनुष्ठान प्रार्थनाओं तथा अग्नि देव को आहुति के रूप में होते थे — पर ये समय के साथ और अधिक जटिल होते चले गए।
- ‘उपनिषद्’ वैदिक संकल्पनाओं के आधार पर रचित हैं, और इनमें कुछ नई संकल्पनाएँ मिलती हैं।
उपनिषदों की दो नई संकल्पनाएँ
| संकल्पना | अर्थ |
|---|---|
| पुनर्जन्म | बार-बार जन्म लेना |
| कर्म | हमारे कर्म और कर्म-फल |
वेदांत और ब्रह्म★
पृ. 109
- एक दर्शन, जिसे सामान्यत: ‘वेदांत’ कहा जाता है, के अनुसार —
- सब कुछ — मानव जीवन, प्रकृति और ब्रह्मांड — एक दैवी तत्व है,
- जिसे ‘ब्रह्म’ अथवा कभी-कभी केवल ‘तत्’ कहा जाता है।
!! पुस्तक स्वयं कोष्ठक में लिखती है — ब्रह्म ब्रह्मा देव से भिन्न है। यह सबसे आम ग़लती है।
अहम् ब्रह्मास्मि — “मैं ब्रह्म हूँ”
पृ. 109
दो प्रसिद्ध मंत्र
पृ. 109
- अहम् ब्रह्मास्मि — “मैं ब्रह्म हूँ” (अर्थात, मैं दिव्य हूँ)
- तत् त्वम् असि… — “वह ब्रह्म आप ही हैं”
पुस्तक कहती है कि इन दो मंत्रों में इसे “सरलता, किंतु गहराई से” व्यक्त किया गया है।
आत्मन् — और सबके सुख की कामना
पृ. 110
- उपनिषदों में आत्मन् या स्व की संकल्पना की गई है, जो प्रत्येक जीव में निवास करता है, परंतु ब्रह्म का ही स्वरूप होता है।
- इसके अनुसार इस दुनिया में सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है और परस्पर निर्भर है।
- इसमें एक महत्वपूर्ण प्रार्थना है — सर्वे भवन्तु सुखिन: — “सभी जीव सुखी रहें”,
- और यह सबके लिए रोग तथा दुख से मुक्ति की कामना करती है।
योग, और ‘हिंदू दर्शन’
पृ. 110
- प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. के आरंभ में वेदों से कुछ अन्य दर्शनों का विकास हुआ।
- इनमें से एक था — योग, जिसने किसी व्यक्ति की चेतना में ब्रह्म का आत्म-बोध प्राप्त करने की अनेक विधियाँ विकसित कीं।
- ★इन सभी दर्शनों से मिलकर कुछ आधारभूत विचार बने, जिन्हें हम आज ‘हिंदू दर्शन’ कहते हैं।
चेतना = जागृत होने का गुण या अवस्था।
5 | उपनिषदों की तीन कथाएँ | प्रश्न पूछने का महत्व
इन तीनों कथाओं का विषय एक ही है★
पृ. 111
पुस्तक की अपनी घोषणा
पृ. 111
- “उपनिषदों की कई कथाओं से हमें प्रश्न पूछने के महत्व का पता चलता है।
- फिर चाहे ये प्रश्न किसी महिला, पुरुष या बच्चे ने पूछे हों।”
अब तीन कहानियाँ सुनिए — और अंत में सोचिए कि तीनों में क्या समान है।
श्वेतकेतु और यथार्थबोध का बीज★
पृ. 111 • छांदोग्य उपनिषद्
- ऋषि उद्दालक आरुणि ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को वेदों के अध्ययन के लिए गुरुकुल भेजा।
- 12 वर्ष बाद वह लौटा, तो पिता ने अनुभव किया कि वह अपने ज्ञान के कारण बहुत अहंकारी हो गया है।
- उद्दालक ने ब्रह्म के स्वरूप पर प्रश्न पूछे, जिनका उत्तर श्वेतकेतु नहीं दे सका।
उद्दालक के दो उदाहरण
पृ. 111
- बरगद के फल का बीज खोलने पर रिक्त (खाली) दिखाई देता है, किंतु इसमें बरगद के वृक्ष का भावी रूप निहित होता है।
- एक ही प्रकार की मिट्टी से अलग-अलग प्रकार के बर्तन बनाए जा सकते हैं — उसी प्रकार हमारे चारों ओर जो कुछ भी है, एक ही तत्व — ब्रह्म — से उसका उद्भव हुआ है।
- समापन: “सभी में यही सूक्ष्म तत्व व्याप्त है… तुम वही हो, श्वेतकेतु।”
★यह तत् त्वम् असि का ही कथा-रूप है। मंत्र और कहानी — एक ही बात।
नचिकेता और उसकी ज्ञान पिपासा★
पृ. 111–112 • कठोपनिषद्
- एक व्यक्ति यज्ञ के समय अपनी समस्त संपत्ति का दान दे रहे थे।
- उनके पुत्र नचिकेता ने पूछा — “आप मुझे किस देवता को अर्पित करेंगे?”
- बार-बार यही प्रश्न पूछने पर पिता क्रोध में आ गए और बोले — “मैं तुम्हें यम अर्थात मृत्यु के देवता को अर्पित करता हूँ।”
- नचिकेता यमलोक की ओर निकल पड़े।
यम का उत्तर
पृ. 112
- नचिकेता का प्रश्न था — “शरीर की मृत्यु के बाद क्या होता है?”
- यम ने पहले तो बालक के प्रश्न का उत्तर टालने का प्रयास किया —
- किंतु नचिकेता के निरंतर आग्रह करते रहने पर अंतत: यम देव ने प्रसन्न होकर उन्हें आत्मा के बारे में समझाया, जो सभी जीवों में निहित है।
- ★“इसका न तो जन्म होता है और न ही मृत्यु होती है; यह अमर है।”
इस कथा का असली पाठ ‘निरंतर आग्रह’ है — नचिकेता ने पीछा नहीं छोड़ा।
गार्गी और याज्ञवल्क्य का शास्त्रार्थ★★
पृ. 112 • बृहदारण्यक उपनिषद्
- विद्वान राजा जनक ने एक दार्शनिक शास्त्रार्थ के विजेता को पुरस्कार देने की घोषणा की।
- याज्ञवल्क्य नामक सुप्रसिद्ध ऋषि आए और गार्गी (एक ऋषिका) के प्रश्न पूछने से पहले तक अनेक विद्वानों को पराजित किया।
- गार्गी ने विश्व के स्वरूप पर अनेक प्रश्न पूछे, और अंत में ब्रह्म के स्वरूप पर भी।
तब याज्ञवल्क्य ने उन्हें आगे प्रश्न पूछने से मना किया★
पृ. 112
और गार्गी ने फिर भी पूछा
पृ. 112
- “हालाँकि कुछ समय बाद गार्गी ने पुन: प्रश्न पूछा,
- तब याज्ञवल्क्य ने समझाया कि कैसे ब्रह्म ही संसार, ऋतुओं, नदियों तथा अन्य सभी चीजों का निर्माण करता है।”
और तभी उत्तर मिला। यही वह ‘प्रश्न पूछने का महत्व’ है जिसकी घोषणा पुस्तक ने आरंभ में की थी।
तीनों कथाओं में क्या समान है
- तीनों में कोई प्रश्न पूछ रहा है
- और तीनों में वह कोई बड़ा विद्वान नहीं है
- श्वेतकेतु — एक बच्चा
- नचिकेता — एक बच्चा
- गार्गी — एक स्त्री, एक ऋषिका
- दो बच्चे और एक स्त्री
6 | बौद्ध मत | सिद्धार्थ से बुद्ध तक
एक नई शाखा
पृ. 110
- “कुछ अन्य दर्शनों का भी अविर्भाव हुआ, जिन्होंने वेदों की प्रभुता को नहीं स्वीकार किया
- और अपनी स्वयं की पद्धति विकसित की। उनमें से एक बौद्ध मत है।”
यहीं से शाखा अलग होती है — पर आगे हम देखेंगे कि तना फिर भी साझा रहा।
जन्म — और पुस्तक की ईमानदारी★
पृ. 110
- लगभग ढाई सहस्राब्दी पूर्व राजकुमार सिद्धार्थ गौतम ने लुंबिनी (वर्तमान नेपाल में) में जन्म लिया।
- “उनके जन्म के समय के विषय में विद्वानों में सर्वसम्मति नहीं है।
- अध्याय 4 में हमने 560 सा.सं.पू. को उनका अनुमानित जन्म वर्ष माना है।
- इससे हमारी यह कहानी आगे किसी भी प्रकार प्रभावित नहीं होगी।”
★यह वाक्य ध्यान से पढ़िए — पुस्तक स्वयं कह रही है कि तिथि पक्की नहीं है। यही अध्याय 4 की सीख है।
चार दृश्य★
पृ. 110
- सिद्धार्थ गौतम राजमहल में एक सुरक्षित वातावरण में बड़े हुए।
- एक दिन, 29 वर्ष की आयु में उन्होंने रथ पर बैठकर नगर में घूमने की इच्छा प्रकट की।
- और उस समय उन्होंने अपने जीवन में पहली बार देखा — एक वृद्ध, एक रोगी, और एक शव।
- उन्होंने एक संन्यासी को भी देखा, जो प्रसन्न और शांत लग रहा था।
संन्यासी = वह व्यक्ति जो चेतना का उच्चतर स्तर प्राप्त करने के लिए कठोर अनुशासन में रहता है।
गृह-त्याग और ज्ञान
पृ. 110
- इन सबका अनुभव करने के बाद उन्होंने अपने राजसी जीवन, अपनी पत्नी और बेटे को त्यागने का विचार किया।
- एक संन्यासी की तरह पैदल चलते हुए और अन्य संन्यासियों तथा विद्वानों से मिलते हुए उन्होंने मानव जीवन में दुखों के मूल कारण को खोजा।
- ★बोधगया (वर्तमान बिहार में) में एक पीपल के वृक्ष के नीचे कई दिनों तक ध्यानरत रहने के बाद उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ।
खोज — और नाम★
पृ. 113
- उन्होंने अनुभव किया कि ‘अविद्या’ और ‘मोह’ मानवीय कष्ट के स्रोत हैं, और इन्हें दूर करने की विधि संकल्पित की।
- इसके बाद सिद्धार्थ ‘बुद्ध’ के नाम से जाने गए, जिसका अर्थ है — ‘ज्ञानी’ या ‘जागृत’ व्यक्ति।
- उनके उपदेशों में ‘अहिंसा’ का विचार निहित है, जिसका मूल अर्थ है — चोट नहीं पहुँचाना या नुकसान नहीं पहुँचाना।
- उन्होंने निष्ठापूर्वक आंतरिक अनुशासन पर भी बल दिया।
मोह = किसी व्यक्ति या वस्तु के साथ संबंध की स्थिति, सामान्य रूप से भावना या आदत के माध्यम से।
संघ
पृ. 113
- बुद्ध ने संघ की स्थापना की, जो भिक्षुओं (आगे चलकर भिक्षुणियों) का एक समुदाय है,
- जिन्होंने स्वयं को बुद्ध के उपदेशों के पालन और प्रसार के लिए समर्पित कर दिया।
- भारत और पूरे एशिया पर उनका गहरा प्रभाव था। यह प्रभाव आज भी अनुभव किया जा सकता है।
भिक्षु = सामान्य जीवन त्यागकर व्रत लेने वाला व्यक्ति। भिक्षुणी = महिला भिक्षु।
बुद्ध का पहला कथन
“जल से व्यक्ति शुद्ध नहीं हो सकता, जबकि कई लोग यहाँ (पवित्र नदी में) स्नान करते हैं। परंतु वह व्यक्ति शुद्ध है जिसमें सत्य और धर्म निवास करते हैं।”
पृ. 113
बुद्ध का दूसरा कथन
“युद्ध के मैदान में हजारों व्यक्तियों पर हजारों बार विजय पाने की तुलना में स्वयं पर विजय पाना अधिक बड़ी उपलब्धि है।”
पृ. 113
7 | जैन मत | अहिंसा, अनेकांतवाद, अपरिग्रह
महावीर
पृ. 114
- जैन मत एक अन्य महत्वपूर्ण दर्शन है जो उसी समय काफी लोकप्रिय हुआ, यद्यपि इस मत को अधिक प्राचीन माना जाता है।
- राजकुमार वर्धमान का जन्म छठी शताब्दी सा.सं.पू. के आरंभ में वैशाली (वर्तमान बिहार में) नगर के समीप हुआ था।
- उन्होंने 30 वर्ष की आयु में अपना घर त्यागने और आध्यात्मिक ज्ञान की खोज का निर्णय लिया।
- 12 वर्ष बाद उन्हें ‘अनंत’ ज्ञान या सर्वोपरि विवेक प्राप्त हुआ, और वे ‘महावीर’ या ‘महानायक’ कहलाए।
बुद्ध और महावीर — मत मिलाइएध्यान
| बुद्ध | महावीर | |
|---|---|---|
| जन्म | लुंबिनी (वर्तमान नेपाल) | वैशाली के समीप (वर्तमान बिहार) |
| आयु | 29 वर्ष — नगर-भ्रमण, चार दृश्य | 30 वर्ष — गृह-त्याग |
| ज्ञान | बोधगया, पीपल के वृक्ष के नीचे | 12 वर्ष के अनुशासन के बाद |
| अर्थ | ‘ज्ञानी’ या ‘जागृत’ | ‘महानायक’ |
ध्यान रखें — ‘जैन’ शब्द★
पृ. 115
- ‘जैन’ शब्द जिन से आया है, जिसका अर्थ है ‘विजेता’।
- इसका अर्थ किसी क्षेत्र या शत्रुओं पर विजय पाने से नहीं है,
- बल्कि अविद्या और मोह पर विजय पाने से है, ताकि ज्ञान प्राप्त किया जा सके।
★‘अविद्या और मोह’ — ठीक वही दो शब्द जो बुद्ध के लिए आए थे। यह संयोग नहीं है।
अहिंसा पर महावीर का कथन
“सभी सांस लेने वाले, उपस्थित, जीवित, संवेदनशील जीवों को मारा न जाए, न ही उनके साथ हिंसा की जाए, न दुर्व्यवहार किया जाए, न ही सताया जाए तथा न ही दूर हटाया जाए।”
पृ. 115
जैन मत के तीन विचार★
| विचार | अर्थ |
|---|---|
| अहिंसा | किसी भी जीव को मारा, सताया या दुर्व्यवहार न किया जाए |
| अनेकांतवाद | ‘केवल एक’ पक्ष या दृष्टिकोण नहीं — सत्य के अनेक पक्ष हैं, और इसे केवल एक कथन द्वारा पूरी तरह समझाया नहीं जा सकता |
| अपरिग्रह | ‘असंग्रह’ — पार्थिव वस्तुओं से दूर, और केवल अनिवार्य वस्तुओं तक सीमित रहना |
सब कुछ आपस में जुड़ा है★
पृ. 115
- जैन मत में सभी जीवों, मानवों से लेकर अदृश्य जीवों तक, आपसी संबद्धता और आपसी निर्भरता पर भी बल दिया गया है,
- क्योंकि ये सभी एक-दूसरे के पूरक हैं और एक-दूसरे के बिना जीवित नहीं रह सकते हैं।
- “प्रकृति, जीवों और वनस्पतियों का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने इस गहन सत्य की बार-बार पुष्टि की है।”
★याद कीजिए — उपनिषदों में भी यही आया था: “इस दुनिया में सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है और परस्पर निर्भर है।” दो अलग दर्शन, लगभग एक ही वाक्य।
8 | दो कथाएँ | जातक और जैन
जातक कथाएँ
पृ. 116
- “जातक कथाएँ पीढ़ियों से भारतीय बच्चों और वयस्कों को समान रूप से आह्लादित करती रही हैं।
- ये बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियाँ हैं
- और बड़े ही सरल तरीके से बौद्ध आदर्शों को व्यक्त करती हैं।”
वानर-राज की कथा★
पृ. 116
- बुद्ध वानरों के एक बड़े समूह के राजा थे, जो एक विशालकाय फलदार वृक्ष के समीप रहते थे।
- एक पका फल नदी में गिरा, बहकर राजमहल पहुँचा; राजा उसके स्वाद से सम्मोहित हुए और वृक्ष खोजने का आदेश दिया।
- वृक्ष मिला, और सैनिकों ने वानरों पर हमला किया।
- ★वानर-राज ने नदी के दूसरे किनारे पर एक पेड़ को पकड़ा और उन्हें नदी पार कराने के लिए अपने शरीर को मानो एक पुल बना दिया।
- इस प्रक्रिया में उनका शरीर घायल हो गया और अंत में उनकी मृत्यु हो गई।
- राजा वानर-राज के इस नि:स्वार्थ बलिदान से बहुत प्रभावित हुआ और प्रजा के साथ अपनी भूमिका पर सोच-विचार करने लगा।
एक जैन कथा — रोहिनेय
पृ. 116–117
- रोहिनेय एक बहुत कुशल चोर था, जो पकड़े जाने के सभी प्रयासों को विफल कर देता था।
- एक बार रास्ते में उसने अकस्मात महावीर के उपदेश के कुछ वाक्य सुन लिए।
- नगर में पहचाना गया और गिरफ्तार हुआ; उसने स्वयं को साधारण कृषक बताया।
- ★एक मंत्री ने चतुराई से जाल बिछाया — किंतु महावीर के शब्दों को याद रखते हुए रोहिनेय योजना समझ गया और बच निकला।
रोहिनेय का पछतावा
पृ. 117
- बाद में रोहिनेय को बहुत पछतावा हुआ। वह महावीर के पास गया और अपने अपराधों को स्वीकार किया।
- उसने चुराया हुआ धन वापस किया एवं अपने अपराधों के लिए क्षमा माँगी।
- वह भिक्षु बन गया और उसने आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया।
- ★“यह कहानी सम्यक कर्म और सम्यक विचारों के महत्व को दर्शाती है और यह भी बताती है कि हर व्यक्ति को जीवन में दूसरा अवसर मिलना चाहिए।”
अहिंसा का असली विस्तार★
पृ. 117
विचारों की हिंसा
पृ. 117
- “बौद्ध मत और जैन मत दोनों में ही अहिंसा का अर्थ व्यक्ति या जीव के प्रति शारीरिक हिंसा न करने से भी कहीं अधिक है।
- इसमें विचारों की हिंसा से भी संयम रखने के लिए कहा गया है, जैसे कि किसी के बारे में बुरी भावना नहीं रखना।
- यदि हम अपने आप को ध्यान से देखें तो हमें ऐसे नकारात्मक विचार स्वयं में अनुभव होते हैं और हमें इन्हें सकारात्मक विचारों में बदलना सीखना चाहिए।
- कभी-कभार ये नकारात्मक विचार स्वयं हमारी ओर भी निर्देशित होते हैं।”
★इसे बुद्ध के दूसरे कथन से जोड़िए — “स्वयं पर विजय पाना अधिक बड़ी उपलब्धि है।”
9 | साझा तना | विविधता और साझी संकल्पनाएँ
एलोरा — एक ही पहाड़, तीनों परंपराएँ
पृ. 118
- बौद्ध एलोरा (महाराष्ट्र) में छठवीं और दसवीं शताब्दी सा.सं. के बीच पहाड़ों में काटकर गुफाएँ बनाई गईं।
- ★इनमें से कुछ गुफाएँ हिंदू दर्शन से हैं, जबकि अन्य बौद्ध और जैन मतों से संबंधित हैं।
- भिक्षुओं और भिक्षुणियों ने देश के सुदूर स्थानों की यात्राएँ कीं और उपदेशों का प्रचार-प्रसार किया।
- ★“कई स्थानों पर पत्थर की गुफाओं में उन भिक्षुओं के नाम भी मिले हैं जो यहाँ रहते थे और पत्थरों के बिस्तर पर सोए थे।”
पुस्तक ‘धर्म’ शब्द का प्रयोग क्यों नहीं करतीध्यान
पृ. 118
पुस्तक अपनी शब्दावली समझाती है
पृ. 118
- “अंग्रेजी भाषा में हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख मतों को ‘धर्म’ का नाम दिया जाता है। हमने इन शब्दों का प्रयोग नहीं किया है,
- यहाँ इन्हें ‘दर्शन’ या ‘मत’ और ‘विश्वास’ कहा गया है।
- इसका कारण यह है कि इन मतों और दर्शनों के अनेक आयाम हैं — दार्शनिक, आध्यात्मिक, नैतिक, सामाजिक, धार्मिक।
- अनेक विद्वान मानते हैं कि अंग्रेजी का शब्द ‘रिलिजन’ भारतीय सभ्यता के संदर्भ में बहुत सीमित है।”
चार्वाक — और वह क्यों बताया गया
पृ. 118–119
- उस समय अन्य अनेक मत भी प्रचलित थे — उनमें से एक ‘चार्वाक’ दर्शन है, जिसे कभी-कभी ‘लोकायत’ भी कहा जाता है।
- इसके अनुसार यह भौतिक जगत ही एकमात्र सत्य है और इसलिए मृत्यु के पश्चात जीवन का होना असंभव है।
- “ऐसा प्रतीत होता है कि इस दर्शन को अधिक लोकप्रियता नहीं मिली और समय के साथ यह विलुप्त हो गया।”
- ★“हमने इसका उल्लेख यहाँ इसलिए किया ताकि यह दर्शाया जा सके कि यहाँ बौद्धिक या आध्यात्मिक विश्वास प्रथाओं में व्यापक विविधता थी और लोग अपने अनुसार इन्हें चुनने के लिए स्वतंत्र थे।”
और अब वृक्ष का तना★
पृ. 119
साझी संकल्पनाएँ
पृ. 119
- “यद्यपि वैदिक, बौद्ध और जैन दर्शनों में महत्वपूर्ण भिन्नताएँ थीं, तथापि उनमें कुछ समान संकल्पनाएँ भी थीं, जैसे —
- धर्म, कर्म, पुनर्जन्म, दुखों और अज्ञानता के अंत की खोज एवं अनेक अन्य महत्वपूर्ण मूल्य आदि।
- वास्तव में यह उस वृक्ष का तना या मूल भाग है जिसके उदाहरण के साथ हमने इस अध्याय की शुरुआत की थी।”
10 | लोक और जनजातीय जड़ें | दोनों दिशाओं में आदान-प्रदान
मौखिक परंपराएँ
पृ. 119
- अब तक जिन सांस्कृतिक जड़ों को देखा, उन्हें कई शास्त्रों में वर्णित किया गया है। भारत में समृद्ध मौखिक परंपराएँ भी रही हैं।
- इसका अर्थ है — उन उपदेशों और प्रथाओं के बारे में ज्ञान जो नित्य अभ्यास के द्वारा आगे संचारित हुआ, न कि लिखित शास्त्रों के द्वारा।
- ★“वेदों के संदर्भ में यह लागू होता है।”
- लोक प्रथाएँ आम लोगों द्वारा प्रसारित होती हैं, और जनजातीय परंपराएँ जनजातियों द्वारा।
जनजाति क्या है
पृ. 119
- मानव वैज्ञानिक जनजाति को उन परिवारों या वंशों का समूह मानते हैं, जो —
- एक सामान्य उत्पत्ति, संस्कृति और भाषा साझा करते हैं;
- आपस में निकट संबंध बनाए रखते हुए समुदाय में रहते हैं; जिसके एक मुखिया होते हैं;
- और उनके पास अपनी कोई निजी संपत्ति नहीं होती है।
प्राचीन भारत में ‘जनजाति’ के लिए कोई शब्द नहीं था★
पृ. 119
वे भी ‘जन’ ही थीं
पृ. 119
- “जनजातियाँ केवल अलग-अलग जन थीं जो एक विशेष परिवेश में रहती थीं, जैसे कि वन या पहाड़।”
- भारत के संविधान में अंग्रेजी में ‘ट्राइब’ और हिंदी में ‘जनजाति’ शब्द का उपयोग किया गया है।
- आँकड़े: वर्ष 2011 में भारत के अधिकांश राज्यों में 705 जनजातियाँ निवास करती थीं, जिनकी संख्या लगभग 104 मिलियन थी।
- “यह ऑस्ट्रेलिया और युनाइटेड किंगडम की कुल जनसंख्या से अधिक है।”
★‘जन’ शब्द तीसरी बार आया — अध्याय 5 में भरत, इस अध्याय में वैदिक जन, और अब यहाँ।
एक पुरानी, पक्षपाती दृष्टि — जिसे नकारा गयाध्यान
पृ. 119
- “19वीं शताब्दी में जनजातियों का अध्ययन करने वाले मानव वैज्ञानिकों ने उन्हें प्राय: सभ्य मानवों की तुलना में ‘आदिम’ या ‘हीन’ बताया है।
- जनजातीय समुदायों तथा उनकी समृद्ध एवं जटिल संस्कृतियों के गहन अध्ययन के बाद इस प्रकार के पक्षपातपूर्ण विचारों को अधिकांशत: नकार दिया गया है।”
आदान-प्रदान — दोनों दिशाओं में★★
| दिशा | उदाहरण |
|---|---|
| जनजातीय → प्रमुख परंपरा | परंपरा के अनुसार पुरी (ओडिशा) के भगवान जगन्नाथ मूल रूप से जनजाति देवता थे; और देवी माताओं के विभिन्न रूप |
| प्रमुख परंपरा → जनजातीय | कुछ जनजातियों में हिंदू देवों को काफी समय पहले ही अपना लिया गया; और महाभारत तथा रामायण के उनके अपने रूप हैं — पूर्वोत्तर से तमिलनाडु तक |
यह संपर्क इतनी सहजता से क्यों हुआ
पृ. 120
- “ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि लोक, जनजातियों और हिंदू विश्वास में अनेक समान प्रकार की संकल्पनाएँ थीं।”
- तीनों में प्राकृतिक तत्वों — पर्वतों, नदियों, पेड़ों, पौधों और जंतुओं तथा कुछ पत्थरों — को भी पवित्र माना गया,
- क्योंकि इन सबमें चेतना है।
चार जनजातीय उदाहरण
| जनजाति / क्षेत्र | विवरण |
|---|---|
| टोडा (नीलगिरि, तमिलनाडु) | पर्वत के 30 से अधिक शिखर देवी-देवताओं के निवास; इतने पवित्र कि लोग अंगुली से संकेत भी नहीं करते |
| अरुणाचल प्रदेश | डोनीपोलो — सूर्य और चंद्रमा के मिले-जुले रूप, आगे चलकर परमात्मा माने गए |
| मध्य भारत | खंडोबा भगवान |
| पूर्वी भारत — मुंडा और संथाल | सिंगबोंगा, “जिन्हें वे परमेश्वर कहते हैं और जिन्होंने यह संपूर्ण विश्व बनाया है” |
और यहाँ अध्याय अपने आरंभ से मिल जाता है★
पृ. 120–121
- “देवताओं में इतनी बहुलता के पश्चात, हिंदू धर्म के समान अनेक जनजातियों में भी उच्चतर देवत्व या परमात्मा की संकल्पना है।”
★★याद कीजिए — एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति। अनेक नाम, एक सत्य। वही बात, यहाँ फिर।
भारतीय समाजशास्त्री आंद्रे बेते
“भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाली हजारों जातियाँ और जनजातियाँ इतिहास के आरंभिक समय तथा उससे भी पहले से आपस में एक-दूसरे की धार्मिक आस्थाओं और प्रथाओं को प्रभावित करती रही हैं। जनजातीय धर्मों पर हुए हिंदू दर्शन के प्रभाव को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है, किंतु यह भी सत्य है कि न केवल इसके निर्माण के चरण में, बल्कि इसके पूरे विकास-क्रम में हिंदू दर्शन जनजातीय आस्थाओं से प्रभावित हुआ है।”
पृ. 121
बेते के कथन का असली भार
पृ. 121
- पहली दिशा (हिंदू दर्शन → जनजातीय धर्म) को “व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है।”
- ★बेते दूसरी दिशा पर ज़ोर देते हैं — हिंदू दर्शन भी जनजातीय आस्थाओं से प्रभावित हुआ।
- और वह भी “न केवल निर्माण के चरण में, बल्कि पूरे विकास-क्रम में।”
- “स्पष्ट रूप से, इस लंबे समय के परस्पर संपर्क का परिणाम आपसी समृद्धि रही है।”
11 | आगे बढ़ने से पहले | सार
पुस्तक का अपना सार
पृ. 121
- भारत के प्राचीनतम ग्रंथ, वेदों ने अनेक दर्शनों को जन्म दिया। वेदांत और योग इनमें प्रमुख हैं।
- बौद्ध और जैन मत वेदों के प्राधिकार क्षेत्र से परे गए और उन्होंने कुछ विशिष्ट मूल्यों एवं प्रथाओं पर बल दिया।
- यद्यपि इन मतों के सिद्धांत और विधियाँ भिन्न थे, फिर भी इनमें कुछ महत्वपूर्ण संकल्पनाएँ समान थीं। ये दुख के कारण और अज्ञान के निवारण के साधनों का पता लगाने का सतत प्रयास करते रहे।
- हजारों वर्षों से जनजातीय विश्वास, प्रथाओं तथा कलाओं का हिंदू दर्शन के साथ मेल-जोल होता रहा है। इनके बीच दोनों ओर से अबाधित आदान-प्रदान चलता रहा है।
और अंत में — वटवृक्ष★
पृ. 123
वटवृक्ष क्यों चुना गया
पृ. 123
- “वटवृक्ष, अध्याय 7 और 8 की विषयवस्तुओं के लिए एक उपयुक्त दृष्टांत तथा भारतीय सभ्यता का उत्कृष्ट प्रतीक है।
- अपनी गहरी जड़ों, विशाल तने और सभी दिशाओं में फैली शाखाओं के साथ यह व्यापक क्षेत्र में फैलता है और अनेक शताब्दियों तक बना रहता है।
- यह अनेक प्रकार की वनस्पतियों और जीवों को आश्रय देता है
- और अपनी उन शाखाओं को, जो तने से जुड़ी होती हैं, को नई जड़ें बनाने के लिए प्रोत्साहित करता है।”
वटवृक्ष की शाखाएँ नीचे आकर स्वयं जड़ें बन जाती हैं
यही पूरे अध्याय का तर्क है
- शाखा और जड़ का भेद मिट जाता है।
- दर्शन एक-दूसरे से निकले भी — और एक-दूसरे को पोसते भी रहे।
- “निस्संदेह हिंदू दर्शन और बौद्ध व जैन मतों में इस वृक्ष को पवित्र माना जाता है।”
और इस अध्याय में हर बड़ा विचार किसी के प्रश्न पूछने से आया — और उन प्रश्न पूछने वालों में एक स्त्री थी और दो बच्चे।

