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कक्षा 12 · राजनीति विज्ञान

क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

स्वतंत्र भारत में राजनीति · अध्याय 7

भरत चौधरी और वनिता कुमारी ने बनाया · marushala.com

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क्षेत्रीय आकांक्षाएँ · कक्षा 12 राजनीति विज्ञान · अध्याय 7

कक्षा — 12 · विषय — राजनीति विज्ञान (स्वतंत्र भारत में राजनीति)

एक पोस्टर। सात भाषाएँ। एक ही माँग।

और वह सवाल जो पूरा अध्याय पूछता है — क्या क्षेत्र से प्यार करना राष्ट्र से बेवफ़ाई है?

एक पोस्टर से शुरुआत

  • पहले पन्ने पर उत्तराखंड आंदोलन का पोस्टर है
  • उस पर एक ही माँग सात भाषाओं में लिखी है
  • हिंदी · अंग्रेज़ी · उर्दू · बांग्ला · तमिल · तेलुगु · गुजराती
  • सवाल: माँग तो सिर्फ़ उत्तराखंड की थी — फिर तमिल और बांग्ला में क्यों?

क्योंकि आंदोलन पूरे देश से बात कर रहा था, देश के खिलाफ़ नहीं।

क्षेत्रीय आकांक्षाओं का राष्ट्रीय भावनाओं से कोई बुनियादी टकराव नहीं है।

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 112

1 | क्षेत्र और राष्ट्र | 1980 का दशक और उसकी चुनौती

इस अध्याय में हम पूछेंगे

  • क्षेत्रीय आकांक्षाओं से लोकतंत्र का क्या रिश्ता है?
  • जम्मू-कश्मीर का मसला इतना जटिल क्यों है?
  • पंजाब में उग्रवाद कैसे उभरा और कैसे थमा?
  • पूर्वोत्तर की तीन अलग-अलग समस्याएँ क्या हैं?

चार क्षेत्र, चार अलग कहानियाँ — और एक साझा निष्कर्ष।

1980 का दशक — तनाव का चक्र

  • असम, पंजाब, मिज़ोरम और जम्मू-कश्मीर — चारों जगह क्षेत्रीय आकांक्षाओं ने सर उठाया
  • कहीं-कहीं मामला हथियारबंद विद्रोह तक पहुँचा
  • सरकार की जवाबी कार्रवाई से सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया अवरुद्ध हुई
  • अंत में हर जगह वापसी बातचीत और समझौते पर हुई

यही चक्र चारों कहानियों में दोहराया जाता है।

संविधान के दायरे में

लक्ष्य यह रहा कि विवाद के मुद्दों को संविधान के दायरे में रहकर निपटा लिया जाए

भारत सरकार का नज़रिया — चार बातें

  • ★राष्ट्र का मतलब यह नहीं कि क्षेत्र को नकार दिया जाए
  • क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग हैं
  • क्षेत्रीय मुद्दों और माँगों का उठना लोकतांत्रिक प्रक्रिया की स्वाभाविक परिणति है
  • इन्हें दबाने के बजाय लोकतांत्रिक बातचीत से सुलझाना बेहतर है

यह पूरे अध्याय की कुंजी है।

भारत का नज़रिया यूरोप के कई देशों से अलग रहा, जहाँ सांस्कृतिक विभिन्नता को राष्ट्र की एकता के लिए खतरे के रूप में देखा गया।

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 113

तनाव के दायरे — कहाँ-कहाँ?

  • कश्मीर का मसला — आज़ादी के समय से
  • नगालैंड और मिज़ोरम — पूर्वोत्तर में अलगाव के आंदोलन
  • द्रविड़ आंदोलन — दक्षिण में, पर बिल्कुल अलग रास्ते पर
  • भाषा के आधार पर राज्य — 1966 में पंजाब और हरियाणा अलग हुए

बाद में छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड भी बने।

विविधता की चुनौती से निपटने के लिए देश की अंदरूनी सीमा रेखाओं का पुनर्निर्धारण किया गया।

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 114

एक कार्टून, एक सवाल

  • कार्टून में तीन तख्तियाँ हैं — साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद — तीनों मुर्दाबाद
  • तीनों एक जैसी दिखती हैं
  • पर क्या तीनों एक जैसी बुराइयाँ हैं?
  • अध्याय का पूरा तर्क कहता है — नहीं

क्षेत्रवाद अपने आप में बीमारी नहीं; उसे दबाना बीमारी बन जाता है।

2 | तमिलनाडु | वह आंदोलन जो अलगाववाद तक नहीं गया

द्रविड़ आंदोलन — सबसे ताकतवर

  • यह भारत के क्षेत्रीय आंदोलनों में सबसे ताकतवर आंदोलन था
  • क्षेत्रीयतावादी भावनाओं की सर्वप्रथम और सबसे प्रबल अभिव्यक्ति
  • नारा था — ‘उत्तर हर दिन बढ़ता जाए, दक्षिण दिन-दिन घटता जाए’
  • शिकायत: उत्तर भारत का राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक वर्चस्व

और फिर भी — यह आंदोलन हथियार तक कभी नहीं गया।

हालाँकि आंदोलन के नेतृवर्ग के एक हिस्से की आकांक्षा एक स्वतंत्र द्रविड़ राष्ट्र बनाने की थी, पर आंदोलन ने कभी सशस्त्र संघर्ष की राह नहीं अपनायी। नेतृत्व ने सार्वजनिक बहसों और चुनावी मंच का ही इस्तेमाल किया।

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 116 — इस अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य

पेरियार ई. वी. रामास्वामी नायकर

  • आत्मसम्मान आंदोलन (1925) के प्रवर्तक
  • पहले कांग्रेस में, फिर अलग हुए
  • जस्टिस पार्टी से जुड़े, बाद में द्रविड़ कड़गम बनाया
  • ब्राह्मणवाद, हिंदी थोपे जाने और उत्तर भारतीय वर्चस्व — तीनों का विरोध

द्रविड़ राजनीति की वैचारिक नींव यहीं पड़ी।

डीएमके की तीन-सूत्री माँगें

  • कल्लाकुडी का नाम बदलकर डालमियापुरम रखने का विरोध
  • तमिल संस्कृति के इतिहास को पाठ्यक्रम में स्थान
  • शिल्पकर्म शिक्षा कार्यक्रम को हटाने की माँग

1953–54 के इन आंदोलनों से डीएमके जन-आंदोलन बनी।

1965 — हिंदी विरोधी आंदोलन

  • हिंदी को राजभाषा बनाए जाने के विरोध में बड़ा आंदोलन
  • आंदोलन ने डीएमके को व्यापक जन-समर्थन दिलाया
  • 1967 के चुनाव में डीएमके सत्ता में आई
  • तब से तमिलनाडु में सत्ता द्रविड़ दलों के पास ही रही है

कांग्रेस उसके बाद तमिलनाडु में कभी अपने बल पर नहीं जीती।

द्रविड़ दलों का विस्तार

  • अन्नादुरै की मृत्यु के बाद डीएमके दोफाड़ हुई
  • बना आल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK)
  • 1990 के दशक में और बँटवारे — एमडीएमके, पीएमके, डीएमडीके
  • ★1996 से केंद्र के हर सत्तारूढ़ गठबंधन में इनमें से कोई एक दल रहा है

क्षेत्रीय दल अब राष्ट्रीय सरकार का हिस्सा हैं।

सहकारिता

तमिलनाडु की राजनीति क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद के बीच सहकारिता की भावना का अच्छा उदाहरण पेश करती है

3 | जम्मू और कश्मीर | तीन क्षेत्र, एक जटिल कहानी

पहले एक ज़रूरी बातध्यान

  • यह अध्याय 5 अगस्त 2019 तक अद्यतन है
  • अनुच्छेद 370 की चर्चा अब भूतकाल में है
  • पाठ्यपुस्तक का मानचित्र कहता है — “केंद्र शासित प्रदेश : जम्मू एवं कश्मीर तथा लद्दाख”
  • स्रोत: pib.gov.in

पुरानी गाइड इस अध्याय के लिए भ्रामक होंगी।

तीन क्षेत्र — एक ही राज्य नहीं

क्षेत्रसामाजिक बुनावट
जम्मूहिंदू, मुसलमान और सिख — मिली-जुली आबादी; अलग-अलग भाषाएँ
कश्मीरकश्मीरी बोलने वाले मुसलमानों का बहुमत; एक छोटी हिंदू आबादी
लद्दाखपहाड़ी इलाक़ा; बहुत कम आबादी; बौद्ध और मुसलमान बराबर-बराबर

समस्या की जड़ें — 1947

  • रियासत के महाराजा हरि सिंह भारत या पाकिस्तान — किसी में नहीं मिलना चाहते थे
  • वे स्वतंत्र दर्जा चाहते थे
  • पाकिस्तान ने दावा किया कि मुस्लिम-बहुल होने के नाते कश्मीर उसका है
  • लेकिन कश्मीर के लोगों का नज़रिया अलग था

और यहीं से ‘कश्मीरियत’ शब्द आता है।

उन्होंने सोचा कि सबसे पहले वे कश्मीरी हैं। क्षेत्रीय अभिलाषा का यह मुद्दा ‘कश्मीरियत’ कहलाता है।

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 118

अक्तूबर 1947 — विलय

  • पाकिस्तान की शह पर कबायली घुसपैठ हुई
  • महाराजा ने भारत से सैनिक मदद माँगी
  • भारत ने मदद दी — साथ ही विलय प्रपत्र पर हस्ताक्षर हुए
  • शर्त यह भी थी कि लोगों की राय ली जाएगी

और मामला संयुक्त राष्ट्र पहुँचा।

21 अप्रैल 1948 — यूएन का तीन-चरणीय प्रस्ताव

  • पहला: पाकिस्तान अपने नागरिकों को वापस बुलाए
  • दूसरा: भारत अपनी फ़ौज न्यूनतम स्तर तक घटाए
  • तीसरा: जनमत संग्रह कराया जाए
  • ! इस प्रस्ताव के अंतर्गत कोई प्रगति न हो सकी

पहला चरण ही कभी पूरा नहीं हुआ।

शेख अब्दुल्ला और अनुच्छेद 370

  • मार्च 1948 — शेख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री बने
  • वे नेशनल कांफ्रेंस के नेता और लोकप्रिय जन-नेता थे
  • भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 के ज़रिए राज्य को विशेष दर्जा मिला
  • इस पर दो बिल्कुल विपरीत प्रतिक्रियाएँ हुईं

और यही आज तक की बहस की जड़ है।

दो विपरीत प्रतिक्रियाएँ

कौनक्या कहा
भारत के बाकी हिस्सों का एक वर्गविशेष दर्जा राज्य के पूर्ण एकीकरण में बाधा है; अनुच्छेद 370 हटना चाहिए
अधिकांश कश्मीरी370 पर्याप्त नहीं है; इसने वह स्वायत्तता नहीं दी जिसका वादा था

कश्मीरियों की तीन शिकायतें

  • जनमत संग्रह का वादा कभी पूरा नहीं हुआ
  • अनुच्छेद 370 के तहत मिली स्वायत्तता व्यवहार में घटती चली गई
  • लोकतंत्र वैसा नहीं फल-फूल सका जैसा देश के बाकी हिस्सों में

तीनों शिकायतें अलग-अलग हैं — इन्हें मिलाइए मत।

  1. 1953! शेख अब्दुल्ला पद से हटाए गए और गिरफ़्तार किए गए
  2. 1965‘प्रधानमंत्री’ और ‘सदर-ए-रियासत’ पदनाम बदले;गुलाम मोहम्मद सादिक पहले मुख्यमंत्री
  3. 1974इंदिरा गाँधी–शेख अब्दुल्ला समझौता; शेख फिर मुख्यमंत्री बने
  4. 1982शेख अब्दुल्ला का निधन;फ़ारूक़ अब्दुल्ला उत्तराधिकारी
  5. 1986नेशनल कांफ्रेंस काकांग्रेस से गठबंधन

  1. 1987!! चुनाव में बड़े पैमाने पर धाँधली के आरोप — निर्णायक मोड़
  2. 1989उग्रवाद की शुरुआत; राज्य लंबे समय तक अशांत रहा
  3. 1996चुनाव हुए;फ़ारूक़ अब्दुल्ला की सरकार, स्वायत्तता का प्रस्ताव
  4. 2002निष्पक्ष चुनाव; नेशनल कांफ्रेंस हारी;पीडीपी–कांग्रेस सरकार

2002 के बाद

  • मुफ़्ती मोहम्मद सईद मुख्यमंत्री, फिर गुलामनबी आज़ाद
  • 2008 — राष्ट्रपति शासन; फिर चुनाव में उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री (2009)
  • 2014 — रिकॉर्ड मतदान; पीडीपी–भाजपा की साझा सरकार
  • अप्रैल 2016 — महबूबा मुफ़्ती राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री

जून 2018 में गठबंधन टूटा और राष्ट्रपति शासन लगा।

5 अगस्त 2019

जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 — अनुच्छेद 370 समाप्त; राज्य दो केंद्र शासित प्रदेशों में बँटा

दो केंद्र शासित प्रदेश

  • जम्मू एवं कश्मीर — विधानसभा सहित
  • लद्दाख — बिना विधानसभा के
  • यह पुनर्गठन 31 अक्तूबर 2019 से प्रभावी हुआ
  • पाठ्यपुस्तक का मानचित्र यही स्थिति दिखाता है

पाठ्यपुस्तक यहीं रुक जाती है — आगे की बात संवर्धन में।

🎬 रोज़ा (1992)

  • मणिरत्नम् की फ़िल्म; संगीत ए. आर. रहमान
  • कश्मीर में उग्रवाद के दौर की पृष्ठभूमि
  • दिखाती है कि आम आदमी राजनीतिक संघर्ष के बीच कैसे पिसता है
  • कक्षा में चर्चा के लिए उपयोगी संदर्भ

पाठ्यपुस्तक इसे स्वयं सुझाती है।

4 | पंजाब | माँग से हिंसा तक, और वापस बातचीत तक

पृष्ठभूमि

  • विभाजन ने पंजाब को गहरी चोट दी
  • 1966 में पंजाब से हरियाणा अलग हुआ; पहाड़ी इलाक़े हिमाचल को गए
  • बचा हुआ पंजाब पंजाबी-भाषी प्रांत बना
  • अकाली दल — 1920 के दशक में बना, ‘पंजाबी सूबा’ आंदोलन का नेतृत्व किया

भाषायी राज्य की माँग यहाँ धार्मिक पहचान से जुड़ी हुई थी।

अकालियों की तीन कठिनाइयाँ

  • सरकार बनाने पर भी वह समय से पहले बर्खास्त कर दी गई
  • राज्य के हिंदुओं में समर्थन नहीं जुटा पाए
  • ★सिख समुदाय भी जाति और वर्ग के धरातल पर बँटा हुआ था — दलितों में कांग्रेस को ज़्यादा समर्थन

तीसरा कारण सबसे कम याद रखा जाता है — और सबसे ज़रूरी है।

आनंदपुर साहिब प्रस्ताव, 1973

  • क्षेत्रीय स्वायत्तता की माँग
  • केंद्र-राज्य संबंधों की पुनर्परिभाषा
  • सिख ‘कौम’ की आकांक्षाओं और ‘बोलबाला’ की बात
  • ★यह प्रस्ताव भारत में संघवाद को मजबूत करने की अपील करता है

यही प्रस्ताव बाद में सबसे विवादास्पद बना।

प्रस्ताव विवादास्पद क्यों?

  • सरकार ने इसे अलगाववादी दस्तावेज़ के रूप में पढ़ा
  • कुछ लोगों ने इसे पृथक सिख राष्ट्र की माँग बताया
  • पर पाठ का कहना है कि यह संघवाद को मजबूत करने की अपील थी
  • ! इसकी सीमित लोकप्रियता ही एक कारण थी कि इसे अलग-अलग तरीक़ों से पढ़ा गया

एक ही दस्तावेज़ — दो बिल्कुल अलग व्याख्याएँ।

हिंसा का चक्र

  • नेतृत्व नरमपंथियों के हाथ से निकलकर चरमपंथियों के हाथ में चला गया
  • माँग धीरे-धीरे अलग देश की माँग में बदलती दिखी
  • स्वर्णमंदिर को हथियारबंद लोगों ने अपना मुख्यालय बना लिया
  • जून 1984 — ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’

सरकार की इस कार्रवाई ने सिख भावनाओं को गहरी ठेस पहुँचाई।

31 अक्तूबर 1984 और उसके बाद

  • इंदिरा गाँधी की उनके अंगरक्षकों द्वारा हत्या
  • इसके बाद उत्तर भारत के कई हिस्सों में सिख-विरोधी हिंसा
  • दिल्ली में दो हज़ार से ज़्यादा सिख मारे गए
  • हिंसा हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में भी हुई

यह अध्याय का सबसे भारी पन्ना है।

भले ही अपराधियों को सज़ा दिलाने में देरी हुई हो, अब समय आ गया है कि हम इन दुखद घटनाओं के अध्याय को बंद करें।

नानावती आयोग की रिपोर्ट, 2005

मैं सिख समुदाय से ही नहीं, पूरे भारतीय राष्ट्र से माफ़ी माँगता हूँ, क्योंकि 1984 में जो कुछ हुआ वह राष्ट्रीयता की उस अवधारणा का निषेध था जो हमारे संविधान में दर्ज है।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, लोकसभा, 11 अगस्त 2005

राजीव गाँधी–लोंगोवाल समझौता, जुलाई 1985

  • चंडीगढ़ पंजाब को सौंपा जाएगा
  • हिंदी-भाषी क्षेत्रों के निर्धारण के लिए एक अलग आयोग
  • नदी-जल विवाद के लिए न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल)
  • हिंसा के पीड़ितों को मुआवज़ा और पुनर्वास
  • अलगाववादियों से निपटने के लिए विशेष प्रावधान

पर समझौते के बाद भी अमन आसानी से नहीं आया।

शांति की लंबी वापसी

  • हिंसा और उग्रवाद कई वर्षों तक जारी रहे
  • राज्य लंबे समय राष्ट्रपति शासन में रहा
  • ! 1992 के चुनाव में सिर्फ़ 24 फ़ीसदी मतदान हुआ
  • 1997 — अकाली दल (बादल) और भाजपा के गठबंधन की जीत

तब जाकर सामान्य राजनीति लौटी।

5 | पूर्वोत्तर | सात बहनें और एक भाई

भूगोल ही पहली समस्या है

  • आठ राज्य — असम, अरुणाचल, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नगालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम
  • देश की मात्र 4 फ़ीसदी आबादी, पर बहुत बड़ा क्षेत्रफल
  • शेष भारत से जुड़ाव केवल 22 किलोमीटर की एक राहदारी से
  • भारत के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश-द्वार

चारों ओर विदेशी सीमाएँ — यही इसकी संवेदनशीलता है।

दिल्ली के लोग यूरोप के नक्शे के बारे में ज्यादा जानते हैं और अपने देश के पूर्वोत्तर के हिस्से के बारे में कम।

पाठ्यपुस्तक, हाशिये का प्रश्न, पृष्ठ 125

राज्यों का पुनर्गठन — कालक्रम

वर्षक्या हुआ
1963नगालैंड राज्य बना
1972मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय राज्य बने
1987मिज़ोरम और अरुणाचल प्रदेश राज्य बने

तीन मुद्दे

स्वायत्तता की माँग · अलगाव के आंदोलन · ‘बाहरी’ लोगों का विरोध

1 · स्वायत्तता की माँग

  • आज़ादी के बाद पूरा क्षेत्र असम के अधीन था
  • ईस्टर्न इंडिया ट्राइबल यूनियन से शुरुआत
  • 1960 — ऑल पार्टी हिल्स लीडर्स कांफ्रेंस; अलग राज्यों की माँग
  • अंततः कई जनजातीय राज्य बने

पर माँगें यहीं नहीं रुकीं।

स्वायत्तता — छोटे स्तर पर

  • असम में करबी और दिमसा को स्वायत्त जिला परिषद् मिलीं
  • बोडो को अलग स्वायत्त परिषद् मिली
  • ★छोटे-छोटे और निरंतर लघुतर होते राज्य बनाते चले जाना संभव नहीं था
  • इसलिए राज्य के भीतर स्वायत्तता का रास्ता चुना गया

संविधान की छठी अनुसूची यही लचीलापन देती है।

2 · अलगाव के आंदोलन — दो कहानियाँ

मिज़ोरमनगालैंड
शुरुआत1959 का अकाल, असम सरकार की उदासीनता1951 में फ़िजो के नेतृत्व में स्वतंत्रता की घोषणा
रास्ता1966 से दो दशक का सशस्त्र संघर्षसशस्त्र संघर्ष; बातचीत के प्रस्ताव ठुकराए गए
नतीजा1986 का समझौता → पूर्ण राज्य → शांति! समाधान होना अब भी बाकी है

मिज़ोरम — भारत की सबसे सफल शांति कहानी

  • 1959 के अकाल में असम सरकार की उदासीनता से नाराज़गी
  • मिज़ो नेशनल फ्रंट बना, नेता लालडेंगा
  • 1966 से सशस्त्र अभियान; दो दशक तक संघर्ष
  • 1986 — राजीव गाँधी और लालडेंगा के बीच शांति समझौता

मिज़ोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला; लालडेंगा मुख्यमंत्री बने।

सबसे शांतिपूर्ण

आज मिज़ोरम पूर्वोत्तर का सबसे शांतिपूर्ण राज्य है — और विकास में भी अग्रणी

नगालैंड — अनसुलझा प्रश्न

  • 1951 में अंगामी ज़ापू फ़िजो के नेतृत्व में स्वतंत्रता की घोषणा
  • 1963 में नगालैंड राज्य बना, पर संघर्ष जारी रहा
  • ! फ़िजो ने बातचीत के कई प्रस्ताव ठुकरा दिए
  • कुछ समझौते हुए, पर समाधान होना अब भी बाक़ी है

मिज़ोरम और नगालैंड — एक ही क्षेत्र, दो अलग नतीजे। फ़र्क़ बातचीत का है।

3 · ‘बाहरी’ लोगों का विरोध — असम आंदोलन

  • 1979 से 1985 — छह साल का आंदोलन
  • नेतृत्व आसू (AASU) के हाथ में — एक छात्र संगठन
  • माँग: 1951 के बाद आए विदेशी नागरिकों की पहचान और निष्कासन
  • ! यह आंदोलन पूरी तरह अहिंसक नहीं रह पाया

पर इसके पीछे सिर्फ़ आप्रवास नहीं था।

असम आंदोलन के दो चेहरे

सांस्कृतिक चिंताआर्थिक शिकायत
असमिया पहचान और भाषा पर संकट का भयतेल, चाय और कोयला — फिर भी राज्य ग़रीब
बाहरी लोगों से जनसंख्या-संतुलन बदलने का डरसंसाधन बाहर जाते हैं, लाभ नहीं मिलता
मताधिकार और भूमि पर असर की आशंकाबेरोज़गारी और पिछड़ापन

असम समझौता, 1985

  • 1951 से 1961 के बीच आए लोगों को पूर्ण नागरिकता और मताधिकार
  • 1961 से 1971 के बीच आए लोगों को नागरिकता, पर मताधिकार नहीं
  • 1971 के बाद आए लोगों को वापस भेजा जाएगा
  • आसू ने असम गण परिषद् बनाई; 1985 में सत्ता में आई

नारा था — ‘स्वर्णिम असम’।

पर समस्या हल नहीं हुईध्यान

  • आप्रवास की समस्या का समाधान नहीं हो पाया
  • यह मुद्दा आज भी असम की राजनीति के केंद्र में है
  • पाठ्यपुस्तक का हाशिया-प्रश्न इसे और गहरा करता है

और वह प्रश्न बहुत तीखा है।

कोई आदमी कहीं पहले चला गया हो तो वही दूसरों को ‘बाहरी’ समझने लगता है।

पाठ्यपुस्तक, हाशिये का प्रश्न, पृष्ठ 129

6 | सिक्किम और गोवा | दो अलग रास्ते

सिक्किम का विलय

  • सिक्किम भारत का ‘शरणागत’ (protectorate) था
  • रक्षा और विदेश-नीति भारत के पास; आंतरिक शासन चोग्याल के हाथ
  • आबादी में नेपाली मूल के लोग बहुसंख्यक, पर सत्ता चोग्याल के पास
  • 1974 के पहले चुनाव में सिक्किम कांग्रेस की भारी जीत

और फिर विधानसभा ने खुद रास्ता तय किया।

1975 — 22वाँ राज्य

  • अप्रैल 1975 — विधानसभा ने भारत में विलय का प्रस्ताव पारित किया
  • जनमत-संग्रह में लोगों ने इसका समर्थन किया
  • भारतीय संसद ने प्रस्ताव स्वीकार किया
  • सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य बना

चोग्याल की सत्ता समाप्त हुई।

विलय को स्थानीय जनता का समर्थन हासिल था। इस कारण यह मामला सिक्किम की राजनीति में कोई विभेदकारी मुद्दा न बन सका!

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 130

गोवा की मुक्ति

  • पुर्तगाली शासन भारत की आज़ादी के बाद भी जारी रहा
  • गोवा, दमन और दीव — तीनों पुर्तगाल के अधीन
  • दिसंबर 1961 — भारतीय सेना की दो दिन की कार्रवाई
  • तीनों क्षेत्र भारत में शामिल; केंद्र शासित प्रदेश बने

पर असली सवाल इसके बाद उठा।

गोवा — महाराष्ट्र में मिलें या नहीं?

  • महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी महाराष्ट्र में विलय चाहती थी
  • यूनाइटेड गोवन्स पार्टी अलग गोवानी पहचान बनाए रखना चाहती थी
  • ★जनवरी 1967 — भारत सरकार ने जनमत सर्वेक्षण कराया
  • लोगों ने अलग बने रहने का फ़ैसला दिया

यह भारत का एक दुर्लभ जनमत-सर्वेक्षण था।

और फिर राज्य का दर्जा

  • गोवा केंद्र शासित प्रदेश बना रहा
  • 1987 में गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला
  • दमन और दीव अलग केंद्र शासित प्रदेश रहे
  • ★मुद्दा हथियार से नहीं, मतपत्र से हल हुआ

सिक्किम और गोवा — दोनों में जनता की राय ने फ़ैसला किया।

7 | पाँच सबक | अध्याय का निचोड़

सबक 1 — यह वैश्विक परिघटना है

  • क्षेत्रीय आकांक्षाएँ सिर्फ़ भारत की समस्या नहीं हैं
  • ब्रिटेन — स्कॉटलैंड और वेल्स
  • स्पेन — बास्क क्षेत्र
  • श्रीलंका — तमिल प्रश्न

लोकतंत्र में विविधता की माँग उठना स्वाभाविक है।

सबक 2 — दमन नहीं, बातचीत

  • ★क्षेत्रीय आकांक्षाओं को बलपूर्वक दबाना समाधान नहीं है
  • दमन से आंदोलन और तीखे होते हैं
  • मिज़ोरम इसका सबसे अच्छा उदाहरण है
  • दो दशक के संघर्ष के बाद एक समझौते ने सब बदल दिया

बातचीत ही लोकतांत्रिक रास्ता है।

सबक 3 — सत्ता की साझेदारी

  • क्षेत्रों को सत्ता में हिस्सेदारी मिलनी चाहिए
  • केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर
  • ★क्षेत्रों को मिलाकर ही पूरा देश बनता है
  • गठबंधन की राजनीति ने यह हिस्सेदारी बढ़ाई है

1996 के बाद यह और स्पष्ट हुआ।

सबक 4 — आर्थिक असमानता को गंभीरता से लीजिए

  • क्षेत्रीय असंतुलन क्षेत्रीय असंतोष को जन्म देता है
  • असम का उदाहरण — संसाधन होते हुए भी पिछड़ापन
  • पूर्वोत्तर की शिकायत भी यही रही है
  • विकास में हिस्सेदारी राजनीतिक स्थिरता की शर्त है

असंतोष हमेशा सांस्कृतिक नहीं होता — अक्सर आर्थिक होता है।

सबक 5 — संविधान का लचीलापन

  • संविधान ने विशेष प्रावधानों की गुंजाइश रखी
  • छठी अनुसूची — जनजातीय क्षेत्रों के लिए स्वायत्त परिषदें
  • अनुच्छेद 371 — कई राज्यों के लिए विशेष प्रावधान
  • ! अनुच्छेद 370 अगस्त 2019 में निरस्त कर दिया गया

लचीलापन ही ताक़त रहा है — और वह बहस अब भी चलती है।

अभिन्न अंग

क्षेत्रीय आकांक्षाओं को यहाँ अलगाववाद की राह पर जाने का मौका नहीं मिला। भारत की राजनीति ने यह स्वीकार किया है कि क्षेत्रीयता लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग है।

राजीव गाँधी और तीन समझौते

समझौताकबनतीजा
पंजाब समझौताजुलाई 1985लोंगोवाल के साथ; पर शांति में वर्षों लगे
असम समझौता1985आसू के साथ; असम गण परिषद् सत्ता में आई
मिज़ोरम समझौता1986लालडेंगा के साथ; सबसे सफल

सात बहनें — यानी वे एक ही माँ की सात बेटियाँ हैं।

संजीब बरुआ — पूर्वोत्तर की एकता और भिन्नता पर

वृत्त पूरा हुआ

  • हमने शुरुआत की थी सात भाषाओं वाले एक पोस्टर से
  • और पहुँचे हैं इस निष्कर्ष पर कि क्षेत्र और राष्ट्र विरोधी नहीं हैं
  • तमिलनाडु ने दिखाया कि आंदोलन हथियार के बिना भी जीत सकता है
  • मिज़ोरम ने दिखाया कि हथियार उठने के बाद भी वापसी संभव है

यही इस अध्याय का सार है।

परीक्षा के लिए पाँच अनिवार्य

  • ★★“आंदोलन ने कभी सशस्त्र संघर्ष की राह नहीं अपनायी” — द्रविड़ आंदोलन
  • ★★तीन क्षेत्रों की सामाजिक बुनावट — जम्मू, कश्मीर, लद्दाख
  • ★★आनंदपुर साहिब प्रस्ताव की चार बातें
  • ★★पूर्वोत्तर के तीन मुद्दे
  • ★★पाँचों सबक

इन पाँच को याद रखा तो अध्याय आपका है।

जो पढ़ाते हैं, वही लिखते और जाँचते हैं

इसे बनाने वाले

  • भरत चौधरीभरत चौधरीव्याख्यातारा.उ.मा.वि. जेठान्तरी · ब्लॉक समदड़ी, जिला बालोतरा
  • वनिता कुमारीवनिता कुमारीव्याख्यातारा.उ.मा.वि. रामसीन मूंगड़ा · ब्लॉक एवं जिला बालोतरा

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