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कक्षा 10 · राजनीति विज्ञान

जाति, धर्म और लैंगिक मसले

अध्याय 3

भरत चौधरी और वनिता कुमारी ने बनाया · marushala.com

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अध्याय 3 — जाति, धर्म और लैंगिक मसले · लोकतांत्रिक राजनीति · कक्षा 10

कक्षा — 10 · विषय — राजनीति विज्ञान (लोकतांत्रिक राजनीति) · पृष्ठ — 29 से 45

सबसे पहले — इस अध्याय का नियमध्यान

!

हम इस अध्याय में किसी धर्म, किसी जाति या किसी व्यक्ति के बारे में बात नहीं करेंगे। हम तीन आदतों के बारे में बात करेंगे — भेदभाव · सांप्रदायिकता · जातिवाद

★और किताब की आलोचना भी किसी समुदाय की नहीं, इन्हीं आदतों की है।

अध्याय का पहला ही वाक्य

“सामाजिक विविधता लोकतंत्र के लिए कोई खतरा नहीं होती। राजनीति में सामाजिक असमानताओं की अभिव्यक्ति कोई असंभव बात नहीं है। कई बार तो यह अभिव्यक्ति लोकतंत्र के लिए लाभकर भी होती है।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 29

तीन विभाजन, और तीन अलग-अलग नतीजे★

यह ढाँचा पूरे अध्याय का नक्शा है

विभाजनकिताब का फ़ैसला
लिंग★सकारात्मक — इसे राजनीतिक बनाना ज़रूरी था
धर्म! नकारात्मक — जब धर्म को राष्ट्र का आधार बना दिया जाए
जाति★! दोनों — आवाज़ भी दी, नुकसान भी किया

1 | लैंगिक मसले और राजनीति

श्रम का लैंगिक विभाजन★

⚖

“काम के बँटवारे का वह तरीका जिसमें घर के अंदर के सारे काम परिवार की औरतें करती हैं या अपनी देखरेख में घरेलू नौकरों/नौकरानियों से कराती हैं।”

यह मान्यता बचपन से बैठा दी जाती है कि “औरतों की मुख्य ज़िम्मेवारी गृहस्थी चलाने और बच्चों का पालन-पोषण करने की है।”

और यहीं किताब सबसे तीखा सवाल पूछती है★★

“ऐसा नहीं है कि मर्द ये सारे काम नहीं कर सकते। दरअसल वे सोचते हैं कि ऐसे कामों को करना औरतों के ज़िम्मे है। पर जब सिलाई-कटाई से लेकर इन्हीं सारे कामों के लिए पैसे मिलते हैं तो मर्द ख़ुशी-ख़ुशी यही काम घर के बाहर करते हैं। अधिकांश दर्जी या होटल के रसोइए पुरुष होते हैं।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 30

घर में रसोइया औरत — होटल में रसोइया पुरुष। तो सवाल काम का है या पैसे का?

समय का उपयोग — छह राज्यों का सर्वेक्षण★

पृष्ठ 32 · दैनिक (घंटे : मिनट)

गतिविधिपुरुषमहिला
आमदनी वाले काम6:002:40
★घर के काम0:305:00
गप्पबाजी1:251:20
बिना काम के/फ़ुरसत3:403:50
सोना, साफ़-सफ़ाई, पढ़ना12:2511:10

कुल — औरत साढ़े सात घंटे से ज़्यादा, मर्द साढ़े छह घंटे

फिर औरत का काम दिखता क्यों नहीं?

?

“फिर भी पुरुषों द्वारा किया गया काम ही ज़्यादा दीख पड़ता है क्योंकि उससे आमदनी होती है… इसके लिए उन्हें पैसे नहीं मिलते इसलिए औरतों का काम दिखाई नहीं देता।”

★किताब की एक बच्ची का सवाल — “अगर वह जो करती है उसे काम नहीं कहते तो फिर काम किसे कहते हैं?”

और यही अध्याय की पहली बड़ी परिभाषा है★★

✦

“लैंगिक असमानता का आधार स्त्री और पुरुष की जैविक बनावट नहीं बल्कि इन दोनों के बारे में प्रचलित रूढ़ छवियाँ और तयशुदा सामाजिक भूमिकाएँ हैं।”

एक वाक्य में — “फ़र्क़ शरीर का नहीं, समाज के बनाए नियमों का है।”

नारीवादी आंदोलन

क्या माँगा

  • वोट का अधिकार — पहले “सिर्फ़ पुरुषों को… वोट देने या… चुनाव लड़ने की अनुमति थी”
  • राजनीतिक और वैधानिक दर्जा ऊँचा उठाना
  • शिक्षा तथा रोज़गार के अवसर
  • ★और मूलगामी माँग — “व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में भी बराबरी”

क्या मिला

  • “आज हम वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक, कॉलेज और विश्वविद्यालयी शिक्षक जैसे पेशों में बहुत-सी औरतों को पाते हैं”
  • ”…जबकि पहले इन कामों को महिलाओं के लायक नहीं माना जाता था”
  • ★सबसे आगे — स्वीडन, नॉर्वे और फिनलैंड
  • नारीवादी = “समान अधिकारों और अवसरों में विश्वास करने वाली महिला या पुरुष”

भारत में भेदभाव के पाँच रूप★★

पृष्ठ 33-34

#रूपआँकड़ा
★1साक्षरतामहिलाएँ 54% · पुरुष 76%
2उच्च शिक्षा“लड़कियों ने बाजी मार ली है… लेकिन आगे की पढ़ाई के दरवाज़े उनके लिए बंद हो जाते हैं”
3मज़दूरीसमान मज़दूरी अधिनियम के बावजूद “कम मज़दूरी मिलती है, भले ही दोनों ने समान काम किया हो”
! 4लिंग अनुपात919; कहीं 850, कहीं-कहीं 800 से भी नीचे
! 5हिंसा“वे अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं”

पितृ-प्रधान = “महिलाओं की तुलना में पुरुषों को ज़्यादा महत्व, ज़्यादा शक्ति देने वाली व्यवस्था”

राष्ट्रीय संसदों में महिलाएँ (%)★

अक्टूबर 2018

क्षेत्रप्रतिशत
नॉर्डिक देश42.3
अमरीका29.5
यूरोप26.4
★विश्व का औसत24
एशिया19.8
अरब मुल्क15.6
! भारत11.8

भारत में महिलाओं का प्रतिनिधित्व★

! ऊपर के स्तर पर

  • लोकसभा — 14.36%, “पहली बार 2019 में ही”
  • विधान सभाएँ — 5 फ़ीसदी से भी कम
  • “मंत्रिमंडलों में पुरुषों का ही वर्चस्व रहा है”
  • “भारत… अफ्रीका और लातिन अमरीका के कई विकासशील देशों से भी पीछे है”

★नीचे के स्तर पर

  • पंचायतों और नगरपालिकाओं में एक तिहाई पद आरक्षित
  • “निर्वाचित महिलाओं की संख्या 10 लाख से ज़्यादा है”
  • ★सोचिए — ऊपर 5%, नीचे एक तिहाई। ऐसा क्यों?
  • → क्योंकि नीचे आरक्षण है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023★★

33%

“2023 में, नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण अधिनियम 2023) पारित किया गया है जिससे लोकसभा, विधानसभा और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों का आरक्षण दिया जायेगा।”

यह विधेयक कई दशकों से लंबित था

और इस भाग का निष्कर्ष★

“लैंगिक विभाजन इस बात की एक मिसाल है कि कुछ खास किस्म के सामाजिक विभाजनों को राजनीतिक रूप देने की ज़रूरत है। इससे यह भी पता चलता है कि जब सामाजिक विभाजन एक राजनीतिक मुद्दा बन जाता है तो वंचित समूहों को किस तरह लाभ होता है।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 35

2 | धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति

पहले वह जो ग़लत नहीं है★

पृष्ठ 36

#बात
★1गांधी जी — “धर्म को कभी भी राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता” ! पर — “धर्म से उनका मतलब हिंदू या इस्लाम जैसे धर्म से न होकर नैतिक मूल्यों से था जो सभी धर्मों से जुड़े हैं”
2मानवाधिकार समूह — “सांप्रदायिक दंगों को रोकने और धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए विशेष कदम”
3महिला-आंदोलन — “सभी धर्मों में वर्णित पारिवारिक कानून महिलाओं से भेदभाव करते हैं”; इन्हें समतामूलक बनाया जाए

पारिवारिक कानून = “विवाह, तलाक, गोद लेना और उत्तराधिकार जैसे परिवार से जुड़े मसलों से संबंधित कानून”

तो कसौटी क्या है?★★

⚖

“अगर शासन सभी धर्मों के साथ समान बरताव करता है तो उसके ऐसे कामों में कोई बुराई नहीं है।”

★यानी — कसौटी चुप्पी नहीं है; कसौटी समान बरताव है।

अब देखिए — समस्या कहाँ से शुरू होती हैध्यान

  1. पहला क़दम“समस्या तब शुरू होती है जब धर्म को राष्ट्र का आधार मान लिया जाता है”
  2. दूसरा क़दमजब “एक धर्म के विचारों को दूसरे से श्रेष्ठ माना जाने लगता है”
  3. तीसरा क़दमजब कोई समूह “अपनी माँगों को दूसरे समूह के विरोध में खड़ा करने लगता है”
  4. !चौथा क़दम“जब राज्य अपनी सत्ता का इस्तेमाल किसी एक धर्म के पक्ष में करने लगता है”
  5. ★परिभाषा“राजनीति में धर्म को इस तरह जोड़ना ही सांप्रदायिकता है”

सांप्रदायिक सोच किस मान्यता पर टिकी है

पृष्ठ 36-37

  • “धर्म ही सामाजिक समुदाय का निर्माण करता है”
  • एक धर्म के लोगों के “मौलिक हित एक जैसे”; उनके “आपसी मतभेद… कोई अहमियत नहीं रखते”
  • “किसी अलग धर्म को मानने वाले लोग दूसरे सामाजिक समुदाय का हिस्सा नहीं हो सकते”
  • और अंतत: — “दूसरे धर्मों के अनुयायी एक ही राष्ट्र में समान नागरिक के तौर पर नहीं रह सकते”

और किताब का खंडन — यही अध्याय की आत्मा है★★

✦

“यह मान्यता बुनियादी रूप से गलत है… हर व्यक्ति कई तरह की भूमिका निभाता है। उसकी हैसियत और पहचान अलग-अलग होती है। हर समुदाय में तरह-तरह के विचार के लोग होते हैं।”

”…इसलिए एक धर्म से जुड़े सभी लोगों को किसी गैर-धार्मिक संदर्भ में एक करके देखना उस समुदाय की विभिन्न आवाज़ों को दबाना है।”

“तुम कौन हो?” — जितने जवाब हैं, सब लिखो। फिर एक को छोड़कर बाक़ी मिटा दो। क्या अब भी तुम पूरे हो?

सांप्रदायिकता के चार रूप★

सूत्र — “रोज़ · प्रभुत्व · गोलबंदी · हिंसा”

#रूपविवरण
★1दैनंदिन जीवनधार्मिक पूर्वाग्रह · बनी बनाई धारणाएँ · एक धर्म को श्रेष्ठ मानना; ! “ये हमारे अंदर ही बैठी होती हैं”
2राजनीतिक प्रभुत्वबहुसंख्यक में बहुसंख्यकवाद; अल्पसंख्यक में अलग राजनीतिक इकाई की इच्छा
3सांप्रदायिक गोलबंदीपवित्र प्रतीक · धर्मगुरु · भावनात्मक अपील · अपने ही लोगों के मन में डर बैठाना
! 4हिंसा, दंगा, नरसंहार“विभाजन के समय… भयावह सांप्रदायिक दंगे हुए थे”

“मैं दूसरे धर्म के लोगों के बारे में चुटकुले सुनाता हूँ। क्या इससे मैं भी सांप्रदायिक बन जाता हूँ?”

धर्मनिरपेक्ष शासन — चार प्रावधान★★

पृष्ठ 37-38

#प्रावधान
★1“भारतीय राज्य ने किसी भी धर्म को राजकीय धर्म के रूप में अंगीकार नहीं किया है” (तुलना — श्रीलंका: बौद्ध · पाकिस्तान: इस्लाम · इंग्लैंड: ईसाई)
2“सभी नागरिकों और समुदायों को किसी भी धर्म का पालन करने और प्रचार करने की आज़ादी”
3“धर्म के आधार पर किए जाने वाले किसी तरह के भेदभाव को अवैधानिक घोषित करता है”
★4समानता के लिए “शासन को धार्मिक मामलों में दखल देने का अधिकार” — “यह छुआछूत की इजाज़त नहीं देता”

और अध्याय की सबसे बड़ी पंक्ति★★

❤

“धर्मनिरपेक्षता कुछ पार्टियों या व्यक्तियों की एक विचारधारा भर नहीं है। यह विचार हमारे संविधान की बुनियाद है।”

“सांप्रदायिकता… यह भारत की बुनियादी अवधारणा के लिए एक चुनौती है, एक खतरा है।” और — “अकेले इसी के बूते सांप्रदायिकता का मुकाबला नहीं किया जा सकता।”

भारत की धार्मिक विविधता (2011)

पृष्ठ 40

समुदायप्रतिशत
हिंदू79.8
मुसलमान14.2
ईसाई2.3
सिख1.7
अन्य2 (बौद्ध 0.7 · जैन 0.4 · अन्य 0.7 · कोई धर्म नहीं 0.2)

और यहाँ किताब एक अफ़वाह तोड़ती है★★

3-4%

“एक आम लेकिन भ्रांत धारणा यह है कि देश की आबादी में मुसलमानों का प्रतिशत इतना बढ़ जाएगा कि दूसरे धार्मिक समुदाय उससे पीछे हो जाएँगे।”

★सच्चर समिति के आकलन से स्पष्ट है कि “अगले पचास सालों में भी यह बढ़कर 3–4 प्रतिशत तक ही रहेगी… विभिन्न धार्मिक समुदायों के अनुपात में कोई बड़ा उलट-फेर नहीं होने वाला।” — अफ़वाह का जवाब बहस नहीं, आँकड़ा है।

3 | जाति और राजनीति

जाति का अनोखापन★

1

“लिंग और धर्म पर आधारित विभाजन तो दुनिया भर में हैं पर जाति पर आधारित विभाजन सिर्फ़ भारतीय समाज में ही देखने को मिलता है।”

“अधिकतर समाजों में पेशा पीढ़ी-दर-पीढ़ी जाता है — लेकिन जाति व्यवस्था इसका एक अतिवादी और स्थायी रूप है।”

जाति व्यवस्था और वर्ण-व्यवस्था

पृष्ठ 38

  • “इसमें पेशे के वंशानुगत विभाजन को रीति-रिवाजों की मान्यता प्राप्त है”
  • “उनमें आपस में ही बेटी-रोटी अर्थात शादी और खानपान का संबंध रहता है”
  • वर्ण-व्यवस्था = “जाति समूहों का पदानुक्रम जिसमें एक जाति के लोग हर हाल में सामाजिक पायदान में सबसे ऊपर रहेंगे”
  • इसमें “‘अंत्यज’ जातियों के साथ छुआछूत का व्यवहार किया जाता था”

★चार समाज सुधारक — ज्योतिबा फुले · महात्मा गांधी · डॉ. आंबेडकर · पेरियार रामास्वामी नायकर

क्या बदला और क्या नहीं★★

★बदला

  • आर्थिक विकास · शहरीकरण · साक्षरता और शिक्षा
  • पेशा चुनने की आज़ादी · ज़मींदारी का कमज़ोर पड़ना
  • “शहरी इलाकों में… कोई हिसाब नहीं रखा जाता कि ट्रेन या बस में आपके साथ कौन बैठा है”
  • “संविधान में किसी भी तरह के जातिगत भेदभाव का निषेध किया गया है”

! नहीं बदला

  • “अभी भी ज़्यादातर लोग अपनी जाति या कबीले में ही शादी करते हैं”
  • ! “छुआछूत की प्रथा अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है”
  • ★“जिन जातियों को पहले शिक्षा से वंचित रखा जाता था उनके सदस्य अभी भी… पिछड़े हुए हैं”
  • “जाति और आर्थिक हैसियत में काफ़ी निकट का संबंध है”

गरीबी रेखा के नीचे — तीन निष्कर्ष★

पृष्ठ 42 · तालिका नहीं, ये तीन बातें याद रखिए

#निष्कर्ष
1औसत आर्थिक हैसियत “अभी भी वर्णव्यवस्था के साथ गहरा संबंध दर्शाती है” — “दलित तथा आदिवासियों की आर्थिक स्थिति सबसे खराब”
2“हर जाति में गरीब लोग हैं”, पर भारी दरिद्रता में “ज़्यादा बड़ी संख्या सबसे निचली जातियों के लोगों की”
3“आज सभी जातियों में अमीर लोग हैं पर… ऊँची जाति वालों का अनुपात बहुत ज़्यादा”

आबादी — अ.जा. 16.6% · अ.ज.जा. 8.6% · अन्य पिछड़ी जातियाँ करीब 41%

जातिवाद — और वही खंडन जो सांप्रदायिकता का था★★

=

“सांप्रदायिकता की तरह जातिवाद भी इस मान्यता पर आधारित है कि जाति ही सामाजिक समुदाय के गठन का एकमात्र आधार है।”

★खंडन — “जाति हमारे जीवन का एक पहलू ज़रूर है लेकिन यही एकमात्र या सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण पहलू नहीं है।” — वही ग़लती, नया नाम।

राजनीति में जाति के तीन रूप

पृष्ठ 39

  • उम्मीदवार तय करते समय “मतदाताओं की जातियों का हिसाब”; सरकार बनाते समय सबको उचित जगह
  • पार्टियाँ “जातिगत भावनाओं को उकसाते” हैं
  • ★और सबसे ज़रूरी — सार्वभौम वयस्क मताधिकार से “उन जातियों के लोगों में नयी चेतना पैदा हुई जिन्हें अभी तक छोटा और नीच माना जाता था।”

“चुनाव जातियों का खेल है” — यह सच नहीं★★

पृष्ठ 41 · चार कारण

#कारण
★1“किसी भी एक संसदीय चुनाव क्षेत्र में किसी एक जाति के लोगों का बहुमत नहीं है”
2“कोई भी पार्टी किसी एक जाति… के सभी लोगों का वोट हासिल नहीं कर सकती” — वोट बैंक = “ज़्यादातर लोग”
3एक ही जाति के कई उम्मीदवार हो सकते हैं; कुछ जातियों का एक भी नहीं
★★4“सत्तारूढ़ दल, वर्तमान सांसदों और विधायकों को अक्सर हार का सामना करना पड़ता है। अगर जातियों और समुदायों की राजनीतिक पसंद एक ही होती तो ऐसा संभव नहीं हो पाता।”

अगर वोट सिर्फ़ जाति से पड़ते, तो कोई विधायक कभी हारता ही नहीं। पर वे हारते हैं। तो?

और उल्टा भी होता है★

⇄

“सिर्फ़ राजनीति ही जातिग्रस्त नहीं होती जाति भी राजनीतिग्रस्त हो जाती है।”

  1. हर जाति ख़ुद को बड़ा बनाना चाहती है · 2. अकेले सत्ता नहीं मिलती, इसलिए दूसरी जातियों से मोल-तोल · 3. नई गोलबंदी — ‘अगड़ा’ और ‘पिछड़ा’

अंतिम फ़ैसला — दोनों पक्ष★★

★लाभ

  • “जातिगत राजनीति ने दलित और पिछड़ी जातियों के लोगों के लिए सत्ता तक पहुँचने… की स्थिति भी पैदा की है”
  • संगठनों ने भेदभाव समाप्त करने, सम्मानजनक व्यवहार, ज़मीन-जायदाद और अवसर की माँग की
  • वंचित समूहों को “सत्ता में अपनी हिस्सेदारी माँगने की गुंजाइश” मिली

! हानि

  • “सिर्फ़ जातिगत पहचान पर आधारित राजनीति लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं होती”
  • “गरीबी, विकास, भ्रष्टाचार जैसे ज़्यादा बड़े मुद्दों से लोगों का ध्यान भी भटकता है”
  • “कई बार जातिवाद तनाव, टकराव और हिंसा को भी बढ़ावा देता है”

4 | दोहराइए

तीन विभाजन, तीन फ़ैसले★

यही पूरा अध्याय है

विभाजनफ़ैसलाकारण
लिंग★राजनीतिक बनाना ज़रूरी थातभी आरक्षण, अधिकार और आवाज़ मिली
धर्म! राष्ट्र का आधार बनाना ख़तरनाक“भारत की बुनियादी अवधारणा के लिए… ख़तरा”
जाति★! दोनोंआवाज़ भी दी, पर अकेली पहचान बनकर नुकसान भी

रटने के लिए केवल यह

परीक्षा से पहले

क्याकितना
साक्षरतामहिला 54% · पुरुष 76%
लिंग अनुपात919
समयऔरत 7:30 · मर्द 6:30; घर के काम 5:00 बनाम 0:30
लोकसभा / विधानसभा14.36% (2019) / 5% से कम
भारत / विश्व / नॉर्डिक11.8 / 24 / 42.3
स्थानीय निकायएक तिहाई · 10 लाख महिलाएँ
नारी शक्ति वंदन अधिनियम2023 · 33%
धार्मिक आबादी79.8 · 14.2 · 2.3 · 1.7
जाति समूहअ.जा. 16.6 · अ.ज.जा. 8.6 · अ.पि.जा. ~41

जहाँ बच्चे मार खाते हैंध्यान

इन्हें पहले से ठीक कर लीजिए

ग़लतीसही बात
लैंगिक विभाजन = जैविक अंतरग़लत — “रूढ़ छवियाँ और तयशुदा सामाजिक भूमिकाएँ”
आरक्षण = लोकसभाअभ्यास का उत्तर — पंचायती राज की संस्थाएँ
“धर्म की बात करना ही सांप्रदायिकता”ग़लत — कसौटी है “सभी धर्मों के साथ समान बरताव”
सांप्रदायिकता = सिर्फ़ दंगासबसे आम रूप दैनंदिन जीवन में है
जाति-राजनीति में एक पक्षदोनों पक्ष अनिवार्य
“चुनाव तो जाति से ही होते हैं”चार कारण — ख़ासकर “मौजूदा विधायक हारते हैं”

और अंत में — दोनों का एक ही जवाब★★

✦

सांप्रदायिकता कहती है — “धर्म ही समुदाय का आधार है।”

जातिवाद कहता है — “जाति ही समुदाय का आधार है।”

★★और किताब दोनों को एक ही वाक्य से काटती है — “हर व्यक्ति कई तरह की भूमिका निभाता है। उसकी हैसियत और पहचान अलग-अलग होती है।”

अध्याय की आख़िरी सीख

“पहचान एक नहीं होती। और जो किसी को सिर्फ़ एक पहचान में क़ैद कर दे — वही सांप्रदायिकता है, वही जातिवाद है।”

इसलिए जब भी कोई कहे “वे सब ऐसे ही होते हैं” — रुककर पूछना: “सब? और बाक़ी?”

जो पढ़ाते हैं, वही लिखते और जाँचते हैं

इसे बनाने वाले

  • भरत चौधरीभरत चौधरीव्याख्यातारा.उ.मा.वि. जेठान्तरी · ब्लॉक समदड़ी, जिला बालोतरा
  • वनिता कुमारीवनिता कुमारीव्याख्यातारा.उ.मा.वि. रामसीन मूंगड़ा · ब्लॉक एवं जिला बालोतरा

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