अध्याय 2 — भारत में राष्ट्रवाद · भारत और समकालीन विश्व-2 · कक्षा 10
कक्षा — 10 · विषय — इतिहास (भारत और समकालीन विश्व–2) · पृष्ठ — 29 से 50
सब अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ थे — पर सबका कारण अलग था
किसान लगान से परेशान था · मज़दूर चारदीवारी से व्यापारी पाबंदी से · विद्यार्थी अपमान से तो ‘स्वराज’ का मतलब सबके लिए एक ही था?
अध्याय की सबसे ज़रूरी बात
सभी ने स्वराज के आह्वान को स्वीकार तो किया लेकिन उनके लिए उसके अर्थ अलग-अलग थे।
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 34
यह वाक्य पूरे अध्याय में बार-बार लौटता है — इसे याद कर लीजिए
यूरोप से भारत तक
पृष्ठ 29 — अध्याय का प्रवेश
- “दूसरे उपनिवेशों की तरह भारत में भी आधुनिक राष्ट्रवाद के उदय की परिघटना उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन के साथ गहरे तौर पर जुड़ी हुई थी”
- “उत्पीड़न और दमन के साझा भाव ने विभिन्न समूहों को एक-दूसरे से बाँध दिया था”
- पर हर वर्ग पर उपनिवेशवाद का असर एक जैसा नहीं था
- उनके अनुभव भी अलग थे और स्वतंत्रता के मायने भी भिन्न थे
- कांग्रेस ने इन समूहों को जोड़कर एक विशाल आंदोलन खड़ा किया
“परंतु इस एकता में टकराव के बिंदु भी निहित थे”
1 | युद्ध, महामारी और एक नया नेता | 1914–1919
पहले विश्वयुद्ध ने क्या किया
पृष्ठ 30
| युद्ध का असर | उससे क्या हुआ |
|---|---|
| रक्षा व्यय में भारी इज़ाफ़ा | क़र्ज़ लिए गए और करों में वृद्धि की गई |
| सीमा शुल्क बढ़ा, आयकर शुरू | आम आदमी की जेब पर सीधा बोझ |
| 1913 से 1918 के बीच क़ीमतें दोगुनी | आम लोगों की मुश्किलें बढ़ गईं |
| गाँवों में जबरन भर्ती | ग्रामीण इलाक़ों में व्यापक ग़ुस्सा |
| 1918–19 और 1920–21 में फ़सल ख़राब | खाद्य पदार्थों का भारी अभाव |
| फ़्लू की महामारी | — |
1921 की जनगणना के मुताबिक़ दुर्भिक्ष और महामारी से 120–130 लाख लोग मारे गए
और उम्मीद भी टूट गई
लोगों को उम्मीद थी कि युद्ध ख़त्म होने के बाद उनकी मुसीबतें कम हो जाएँगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
“इसी समय एक नया नेता सामने आया और उसने संघर्ष का एक नया ढंग, एक नया तरीक़ा पेश किया”
सत्याग्रह का विचार
पृष्ठ 30–31
- महात्मा गांधी जनवरी 1915 में भारत लौटे; इससे पहले वे दक्षिण अफ़्रीका में थे
- वहाँ उन्होंने नस्लभेदी सरकार से सफलतापूर्वक लोहा लिया था
- सत्याग्रह में सत्य की शक्ति पर आग्रह और सत्य की खोज पर ज़ोर दिया जाता है
- अगर उद्देश्य सच्चा है और संघर्ष अन्याय के ख़िलाफ़ है, तो किसी शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं
- प्रतिशोध या आक्रामकता के बिना, केवल अहिंसा के सहारे भी सफलता मिल सकती है
- इसके लिए दमनकारी शत्रु की चेतना को झिंझोड़ना चाहिए
गांधीजी का विश्वास था कि अहिंसा का यह धर्म सभी भारतीयों को एकता के सूत्र में बाँध सकता है
सत्याग्रह कमज़ोरी नहीं, ताक़त है
कहा जाता है कि “निष्क्रिय प्रतिरोध” दुर्बलों का हथियार है। लेकिन इस लेख में जिस शक्ति की बात की गई है उसे केवल ताक़तवर ही इस्तेमाल कर सकते हैं। …सत्याग्रह तो शुद्ध आत्मबल है।
महात्मा गांधी — स्रोत-क, पृष्ठ 31
“सत्याग्रही अपने शत्रु को कष्ट नहीं पहुँचाता; वह अपने शत्रु का विनाश नहीं चाहता”
भारत में पहले तीन सत्याग्रह
मानचित्र के लिए बहुत ज़रूरी — ‘च-ख-अ’
- 1917चंपारण (बिहार) — दमनकारी बागान व्यवस्था के ख़िलाफ़ किसानों को प्रेरित किया
- 1917खेड़ा (गुजरात) — फ़सल ख़राबी और प्लेग के कारण किसान लगान चुकाने की हालत में नहीं थे
- 1918अहमदाबाद (गुजरात) — सूती कपड़ा कारख़ानों के मज़दूरों के बीच सत्याग्रह
तीनों अलग-अलग तबक़ों के लिए थे — गांधीजी शुरू से ही अलग-अलग वर्गों को जोड़ रहे थे
2 | रॉलट एक्ट और जलियाँवाला बाग़ | 1919
रॉलट एक्ट — विरोध के तीन कारण
पृष्ठ 31
- भारतीय सदस्यों के भारी विरोध के बावजूद इसे बहुत जल्दबाज़ी में पारित कर दिया गया
- इससे सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को कुचलने का अधिकार मिल गया
- सरकार राजनीतिक क़ैदियों को दो साल तक बिना मुक़दमा चलाए जेल में बंद रख सकती थी
- गांधीजी अहिंसक ढंग से नागरिक अवज्ञा चाहते थे; 6 अप्रैल को हड़ताल से शुरुआत
- 10 अप्रैल को पुलिस ने अमृतसर में एक शांतिपूर्ण जुलूस पर गोली चला दी
- मार्शल लॉ लागू हुआ और जनरल डायर ने कमान सँभाल ली
रैलियाँ, हड़तालें, बंद दुकानें — अंग्रेज़ों ने दमन शुरू कर दिया
13 अप्रैल 1919 — जलियाँवाला बाग़
पृष्ठ 32
- 1गाँव वालेसालाना वैसाखी मेले में शिरकत करने जमा हुए थे
- 2काफ़ी लोगदमनकारी क़ानून का विरोध प्रकट करने आए थे
- 3यह मैदान चारों तरफ़ से बंद था
- 4शहर से बाहर होने के कारण उन्हेंमार्शल लॉ का पता नहीं था
- 5जनरल डायर ने मैदान से बाहर निकलने के सारे रास्ते बंद कर दिए
- 6सिपाहियों ने भीड़ पर अंधाधुंध गोलियाँ चला दीं — सैकड़ों लोग मारे गए
डायर ने बाद में कहा कि वह दहशत और विस्मय पैदा करके “एक नैतिक प्रभाव” उत्पन्न करना चाहता था
दमन का असली मक़सद
पृष्ठ 32 — गोली के आगे भी
- सरकार लोगों को अपमानित और आतंकित करना चाहती थी
- सत्याग्रहियों को ज़मीन पर नाक रगड़ने के लिए मजबूर किया गया
- सड़क पर घिसट कर चलने और सारे साहिबों को सलाम मारने के लिए मजबूर किया गया
- लोगों को कोड़े मारे गए
- गाँवों (गुजराँवाला, पंजाब) पर बम बरसाए गए
- हिंसा फैलते देख महात्मा गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया
दमन का उद्देश्य केवल शरीर नहीं — आत्म-सम्मान तोड़ना भी था
3 | ख़िलाफ़त और असहयोग | 1920–1922
ख़िलाफ़त का मुद्दा क्यों उठाया गया
पृष्ठ 32
- रॉलट सत्याग्रह मुख्य रूप से शहरों और क़स्बों तक ही सीमित था
- गांधीजी और भी ज़्यादा जनाधार वाला आंदोलन चाहते थे
- पर उनका मानना था कि हिंदू-मुसलमानों को एक-दूसरे के नज़दीक लाए बिना ऐसा कोई आंदोलन नहीं चलाया जा सकता
- पहले विश्वयुद्ध में ऑटोमन तुर्की की हार हो चुकी थी
- अफ़वाहें थीं कि ख़लीफ़ा पर एक बहुत सख़्त शांति संधि थोपी जाएगी
- मार्च 1919 में बंबई में ख़िलाफ़त समिति का गठन; नेता मोहम्मद अली और शौकत अली
सितंबर 1920, कलकत्ता अधिवेशन — ख़िलाफ़त के समर्थन और स्वराज के लिए असहयोग का प्रस्ताव
असहयोग ही क्यों? — ‘हिंद स्वराज’ का तर्क
भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही स्थापित हुआ था और यह शासन इसी सहयोग के कारण चल पा रहा है। अगर भारत के लोग अपना सहयोग वापस ले लें तो साल भर के भीतर ब्रिटिश शासन ढह जाएगा और स्वराज की स्थापना हो जाएगी।
महात्मा गांधी, ‘हिंद स्वराज’ (1909)
अगर क्लर्क दफ़्तर न जाए, वकील अदालत न जाए, विद्यार्थी स्कूल न जाए — तो सरकार कैसे चलेगी?
असहयोग का चरणबद्ध कार्यक्रम
पृष्ठ 33
- सबसे पहले सरकार द्वारा दी गई पदवियाँ लौटा देना
- सरकारी नौकरियों, सेना, पुलिस, अदालतों, विधायी परिषदों, स्कूलों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार
- अगर सरकार दमन का रास्ता अपनाए तो व्यापक सविनय अवज्ञा अभियान
- कांग्रेस में भारी खींचतान चली — बहुत लोग चुनावों का बहिष्कार करने में हिचकिचा रहे थे
- दिसंबर 1920, नागपुर अधिवेशन — समझौता हुआ और कार्यक्रम पर स्वीकृति की मोहर लगी
- आंदोलन जनवरी 1921 में शुरू हुआ
बहिष्कार = किसी के साथ जुड़ने से, या चीज़ों की ख़रीद और इस्तेमाल से इनकार करना
4 | आंदोलन के भीतर अलग-अलग धाराएँ | हर समूह का अपना स्वराज
शहरों में आंदोलन
पृष्ठ 34
- हज़ारों विद्यार्थियों ने स्कूल-कॉलेज छोड़ दिए; शिक्षकों ने इस्तीफ़े दिए; वकीलों ने मुक़दमे लड़ना बंद किया
- मद्रास के अलावा ज़्यादातर प्रांतों में परिषद् चुनावों का बहिष्कार हुआ
- मद्रास की जस्टिस पार्टी ने बहिष्कार नहीं किया — उसे लगता था कि काउंसिल में प्रवेश से ग़ैर-ब्राह्मणों को वे अधिकार मिलेंगे जो सामान्यतः केवल ब्राह्मणों को मिलते थे
- विदेशी सामानों का बहिष्कार, शराब की दुकानों की पिकेटिंग, विदेशी कपड़ों की होली
- भारतीय कपड़ा मिलों और हथकरघों का उत्पादन बढ़ने लगा
1921–22 में विदेशी कपड़ों का आयात आधा रह गया — क़ीमत 102 करोड़ से घटकर 57 करोड़
पर शहरों में आंदोलन धीमा क्यों पड़ा
पृष्ठ 34
समस्या
- खादी मिलों के कपड़े से महँगी थी
- ग़रीब उसे नहीं ख़रीद सकते थे
- ब्रिटिश संस्थानों के बहिष्कार से समस्या पैदा हो गई
कारण
- आंदोलन की कामयाबी के लिए वैकल्पिक भारतीय संस्थान ज़रूरी थे
- पर उनकी स्थापना बहुत धीमी थी
- फलस्वरूप विद्यार्थी, शिक्षक और वकील वापस लौटने लगे
बहिष्कार करना आसान है — विकल्प बनाना कठिन है
अवध के किसान — बाबा रामचंद्र
पृष्ठ 35
- संन्यासी बाबा रामचंद्र किसानों का नेतृत्व कर रहे थे; वे पहले फिजी में गिरमिटिया मज़दूर रह चुके थे
- आंदोलन तालुक़दारों और ज़मींदारों के ख़िलाफ़ था
- किसानों को बेगार करनी पड़ती थी; पट्टे निश्चित नहीं होते थे
- माँगें: लगान कम हो · बेगार ख़त्म हो · दमनकारी ज़मींदारों का सामाजिक बहिष्कार हो
- पंचायतों ने ज़मींदारों के लिए ‘नाई-धोबी बंद’ का फ़ैसला लिया
- जून 1920 में नेहरू का दौरा; अक्तूबर तक अवध किसान सभा; महीने भर में 300 से ज़्यादा शाखाएँ
लोग महात्मा का नाम लेकर अपनी सारी कार्रवाइयाँ सही ठहरा रहे थे — जबकि गांधीजी ने वैसा कहा नहीं था
नेहरू का सबसे ईमानदार वाक्य
एक पल के लिए मेरा भी ख़ून खौल उठा था, अहिंसा तो न जाने कहाँ छूट गई थी — लेकिन सिर्फ़ एक पल के लिए… मैंने पूरी विनम्रता के साथ अहिंसा पर उनसे बात की — यह सबक़ उनसे ज़्यादा मुझे सीखना था।
जवाहरलाल नेहरू, रायबरेली, 6 जनवरी 1921 — स्रोत-ख
किसानों का आचरण “बहादुर, शांत और निश्चिंत लोगों जैसा” था
अल्लूरी सीताराम राजू — आदिवासी विद्रोह
पृष्ठ 36 — आंध्र प्रदेश की गूडेम पहाड़ियाँ
- सरकार ने जंगलों में लोगों के दाख़िल होने पर पाबंदी लगा दी थी
- वे न मवेशी चरा सकते थे, न जलावन की लकड़ी और फल बीन सकते थे
- जब सरकार ने सड़कों के निर्माण के लिए बेगार करने पर मजबूर किया तो लोगों ने बग़ावत कर दी
- राजू का दावा था कि गोलियाँ भी उन्हें नहीं मार सकतीं
- वे गांधीजी की महानता के गुण गाते थे और खादी तथा शराब-निषेध का प्रचार करते थे
- पर उन्होंने यह भी दावा किया कि भारत केवल बलप्रयोग से ही आज़ाद हो सकता है
- 1924 में राजू को फाँसी दे दी गई; वे लोकनायक बन चुके थे
लोगों ने गांधीजी के संदेश का वही हिस्सा लिया जो उनकी परिस्थिति में ठीक बैठता था
बाग़ान मज़दूरों के लिए आज़ादी का मतलब
वे उन चारदीवारियों से जब चाहे आ-जा सकें जिनमें उन्हें बंद करके रखा गया था, और अपने गाँवों से संपर्क रख पाएँ — क्योंकि 1859 के इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट के तहत बिना इजाज़त बाहर जाने की छूट नहीं थी
उन्हें लगा “अब गांधी राज आ रहा है” — पर वे रास्ते में ही फँस गए, पुलिस ने पकड़ा और पीटा
और फिर आंदोलन रुक गया
गोरखपुर स्थित चौरी-चौरा में बाज़ार से गुज़र रहा एक शांतिपूर्ण जुलूस पुलिस के साथ हिंसक टकराव में बदल गया। इस घटना के बारे में सुनते ही महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन रोकने का आह्वान किया।
फ़रवरी 1922 — पृष्ठ 37
उनको लगता था कि आंदोलन हिंसक होता जा रहा है और सत्याग्रहियों को व्यापक प्रशिक्षण की ज़रूरत है
5 | सविनय अवज्ञा की ओर | 1929–1934
दो नए कारक
पृष्ठ 38
- कांग्रेस में दो धाराएँ — सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने स्वराज पार्टी बनाई; नेहरू और बोस उग्र जनांदोलन चाहते थे
- पहला कारक — महामंदी: 1926 से कृषि उत्पादों की क़ीमतें गिरने लगीं और 1930 के बाद धराशायी हो गईं
- किसानों को अपनी उपज बेचना और लगान चुकाना भारी पड़ने लगा
- दूसरा कारक — साइमन कमीशन: उसे भारत की संवैधानिक व्यवस्था का अध्ययन करना था
- इस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था, सारे अंग्रेज़ थे
- 1928 में उसका स्वागत ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ के नारों से किया गया
इसी प्रदर्शन में पुलिस के हमले से मिले ज़ख़्मों के कारण लाला लाजपत राय ने दम तोड़ दिया
लाहौर, दिसंबर 1929 — पूर्ण स्वराज
यदि कोई भी सरकार अपनी जनता को इन अधिकारों से वंचित रखती है और दबाती है तो जनता को भी सरकार को बदलने या उसे समूल समाप्त करने का अधिकार है।
स्वतंत्रता दिवस की शपथ, 26 जनवरी 1930 — स्रोत-ग
जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में ‘पूर्ण स्वराज’ की माँग औपचारिक रूप से मान ली गई
नमक ही क्यों?
पृष्ठ 39
- नमक का अमीर-ग़रीब, सभी इस्तेमाल करते थे
- यह भोजन का एक अभिन्न हिस्सा था
- इसीलिए नमक पर कर और उसके उत्पादन पर सरकारी इजारेदारी को गांधीजी ने ब्रिटिश शासन का सबसे दमनकारी पहलू बताया
- 31 जनवरी 1930 — इरविन को 11 माँगों वाला ख़त; सबसे महत्त्वपूर्ण माँग नमक कर ख़त्म करने की
- यह पत्र एक अल्टीमेटम की तरह था — 11 मार्च तक माँगें न मानी गईं तो सविनय अवज्ञा
- इरविन झुकने को तैयार नहीं थे
नमक वह अकेली चीज़ थी जिसका सवाल किसान, मज़दूर, व्यापारी और मध्यवर्ग — सबको एक जैसा छूता था
नमक यात्रा
पृष्ठ 39–40
- 12 मार्च 1930गांधीजी ने अपने78 विश्वस्त वॉलंटियरों के साथ यात्रा शुरू की
- —साबरमती आश्रम से दांडी तक — 24 दिन, हर रोज़ लगभग 10 मील
- —गांधीजी जहाँ भी रुकतेहज़ारों लोग उन्हें सुनने आते
- —उन्होंनेस्वराज का अर्थ स्पष्ट किया और शांतिपूर्ण अवज्ञा का आह्वान किया
- 6 अप्रैल 1930दांडी पहुँचकर समुद्र का पानी उबालकर नमक बनाया — यह क़ानून का उल्लंघन था
इस बार लोगों को न केवल सहयोग न करने बल्कि औपनिवेशिक क़ानूनों का उल्लंघन करने के लिए कहा गया
आंदोलन कैसे फैला — और दमन
पृष्ठ 40
- हज़ारों लोगों ने नमक क़ानून तोड़ा और सरकारी नमक कारख़ानों के सामने प्रदर्शन किए
- विदेशी कपड़ों का बहिष्कार; शराब की दुकानों की पिकेटिंग
- किसानों ने लगान और चौकीदारी कर चुकाने से इनकार कर दिया
- गाँवों में तैनात कर्मचारी इस्तीफ़े देने लगे
- लोग वन क़ानूनों का उल्लंघन करके आरक्षित वनों में घुसने लगे
- अप्रैल 1930 — अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान की गिरफ़्तारी; शोलापुर में मज़दूरों के उग्र हमले
शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर हमले हुए, औरतों-बच्चों को मारा-पीटा गया और लगभग एक लाख लोग गिरफ़्तार किए गए
6 | किसने क्यों हिस्सा लिया | हर समूह का अपना कारण
पाँच समूह, पाँच कारण
पृष्ठ 41–43 — यह सीधे 4 अंक का प्रश्न है
| समूह | क्यों जुड़े | उनका ‘स्वराज’ |
|---|---|---|
| संपन्न किसान (पटीदार, जाट) | नक़द आय ख़त्म; सरकारी लगान चुकाना नामुमकिन | भारी लगान के ख़िलाफ़ लड़ाई |
| ग़रीब किसान | ज़मींदारों को ज़मीन का किराया चुकाना मुश्किल | भाड़ा माफ़ हो |
| व्यवसायी वर्ग | औपनिवेशिक नीतियों से कारोबार में रुकावट | कारोबार पर पाबंदियाँ न हों |
| औद्योगिक मज़दूर | कम वेतन और ख़राब कार्यस्थितियाँ | बेहतर वेतन और स्थितियाँ |
| औरतें | राष्ट्र की सेवा पवित्र दायित्व लगने लगी | राष्ट्र की सेवा |
संपन्न किसान की लड़ाई सरकार से थी, ग़रीब किसान की ज़मींदार से — इसीलिए कांग्रेस पहले का साथ दे सकी, दूसरे का नहीं
औरतों की भागीदारी — और उसकी सीमा
पृष्ठ 43
- गांधीजी के नमक सत्याग्रह के दौरान हज़ारों औरतें उनकी बात सुनने घर से बाहर आ जाती थीं
- उन्होंने जुलूसों में हिस्सा लिया, नमक बनाया
- विदेशी कपड़ों व शराब की दुकानों की पिकेटिंग की
- बहुत सारी महिलाएँ जेल भी गईं
- शहरों में ऊँची जातियों की महिलाएँ, गाँवों में संपन्न किसान परिवारों की महिलाएँ सक्रिय थीं
- पर सार्वजनिक भूमिका बढ़ने का मतलब यह नहीं था कि औरतों की स्थिति में कोई भारी बदलाव आने वाला था
“कांग्रेस को उनकी प्रतीकात्मक उपस्थिति में ही दिलचस्पी थी”
दलितों का प्रश्न — दो रास्ते
पृष्ठ 43–44
गांधीजी का रास्ता
- अस्पृश्यता ख़त्म किए बिना सौ साल तक भी स्वराज नहीं
- ‘अछूतों’ को हरिजन यानी ईश्वर की संतान कहा
- मंदिरों, तालाबों, सड़कों और कुओं पर समान अधिकार के लिए सत्याग्रह
- ख़ुद शौचालय साफ़ करने लगे
दलित नेताओं का रास्ता
- अपने समुदाय की समस्याओं का अलग राजनीतिक हल
- शिक्षा संस्थानों में आरक्षण
- अलग निर्वाचन क्षेत्र
- “सामाजिक अपंगता केवल राजनीतिक सशक्तीकरण से ही दूर हो सकती है”
1930 — अंबेडकर ने दमित वर्ग एसोसिएशन बनाई; सितंबर 1932 — पूना पैक्ट, जिससे आरक्षित सीटें मिलीं
7 | सामूहिक अपनेपन का भाव | राष्ट्र की कल्पना कैसे बनी
राष्ट्र लोगों के मन में कैसे बनता है?
सामूहिक अपनेपन की यह भावना आंशिक रूप से संयुक्त संघर्षों के चलते पैदा हुई थी। इनके अलावा बहुत सारी सांस्कृतिक प्रक्रियाएँ भी थीं… इतिहास व साहित्य, लोक कथाएँ व गीत, चित्र व प्रतीक, सभी ने राष्ट्रवाद को साकार करने में अपना योगदान दिया था।
पृष्ठ 46
यही बात अध्याय 1 में यूरोप के बारे में कही गई थी — दोनों अध्याय एक ही तर्क के दो उदाहरण हैं
भारत माता की छवि
पृष्ठ 47
- छवि-निर्माण का आरंभ बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने किया
- 1870 के दशक में उन्होंने मातृभूमि की स्तुति के रूप में ‘वन्दे मातरम्’ गीत लिखा
- बाद में इसे उन्होंने अपने उपन्यास आनन्दमठ में शामिल किया
- यह गीत बंगाल में स्वदेशी आन्दोलन में ख़ूब गाया गया
- 1905 में अबनीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत माता की विख्यात छवि चित्रित की
- उसमें भारत माता एक संन्यासिनी के रूप में — शांत, गंभीर, दैवी और अध्यात्मिक दिखाई देती हैं
- चित्र 14 में वही छवि बदल जाती है — हाथों में त्रिशूल, हाथी और शेर के बीच
इस मातृ छवि के प्रति श्रद्धा को राष्ट्रवाद में आस्था का प्रतीक माना जाने लगा
दो झंडे
पृष्ठ 48
| झंडा | रंग | उसमें क्या था |
|---|---|---|
| स्वदेशी आंदोलन (बंगाल) | हरा, पीला, लाल | आठ प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते कमल के आठ फूल और हिंदू-मुस्लिम एकता का अर्धचंद्र |
| स्वराज झंडा, 1921 | सफ़ेद, हरा, लाल | बीच में चरखा — स्वावलंबन का प्रतीक |
जुलूसों में यह झंडा थामे चलना शासन के प्रति अवज्ञा का संकेत था
लोक कथाएँ और इतिहास
पृष्ठ 47–48
- उन्नीसवीं सदी के आख़िर में राष्ट्रवादियों ने भाटों व चारणों की लोक कथाओं को दर्ज करना शुरू किया
- वे लोक गीतों व जनश्रुतियों को इकट्ठा करने के लिए गाँव-गाँव घूमने लगे
- रबीन्द्रनाथ टैगोर ने बंगाल में लोक-गाथा गीत, बाल गीत और मिथक इकट्ठे किए
- नटेसा शास्त्री ने मद्रास में तमिल लोक कथाओं का चार खंडों में संकलन प्रकाशित किया
- भारतीय अपनी महान उपलब्धियों की खोज में अतीत की ओर देखने लगे
पर एक समस्या भी थी — “जिस अतीत का गौरवगान किया जा रहा था वह हिंदुओं का अतीत था”
8 | भारत छोड़ो और निष्कर्ष | 1942
भारत छोड़ो आंदोलन
पृष्ठ 49
- —क्रिप्स मिशन की असफलता और द्वितीय विश्व युद्ध ने व्यापक असंतोष को जन्म दिया
- 14 जुलाई 1942वर्धा में कांग्रेस कार्य समिति ने ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित किया
- 8 अगस्त 1942बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने समर्थन किया
- —गांधीजी ने प्रसिद्ध ‘करो या मरो’ भाषण दिया
- —छात्र, मज़दूर और किसान जैसे हज़ारों साधारण लोगों ने हिस्सा लिया
- —अंग्रेज़ों को इसे दबाने में एक वर्ष से अधिक समय लग गया
महिला नेता — मातांगिनी हाजरा (बंगाल), कनकलता बरुआ (असम), रमा देवी (उड़ीसा)
और अंत में — अध्याय का सबसे कीमती वाक्य
संक्षेप में, जो राष्ट्र उभर रहा था वह औपनिवेशिक शासन से मुक्ति की चाह रखने वाली बहुत सारी आवाज़ों का पुंज था।
पाठ्यपुस्तक का निष्कर्ष, पृष्ठ 49
कांग्रेस ने कोशिश की कि “एक समूह की माँगों के कारण कोई दूसरा समूह दूर न चला जाए” — यही वजह है कि आंदोलन के भीतर अकसर बिखराव आ जाता था
मानचित्र के लिए — गुजरात से शुरू कीजिए
अकेले गुजरात में पाँच स्थान हैं — खेड़ा · अहमदाबाद · साबरमती · दांडी · बारदोली। एक राज्य पक्का हो जाए तो बाक़ी आसान हो जाता है
बाक़ी ज़रूरी स्थान — चंपारण (बिहार) · अमृतसर और लाहौर (पंजाब) · चौरी-चौरा और अवध (उ.प्र.) · कलकत्ता · नागपुर · वर्धा · शोलापुर · मद्रास · गूडेम पहाड़ियाँ (आंध्र)
और चार तारीख़ें — बस इतना पक्का कर लीजिए
1919 जलियाँवाला बाग़ · 1921 असहयोग शुरू · 1930 नमक यात्रा · 1942 भारत छोड़ो
और दो शब्द — असहयोग = “साथ मत दो” · सविनय अवज्ञा = “क़ानून तोड़ो”

