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ग्रहण: छाया, विज्ञान और कहानियाँ

दिन में अचानक अँधेरा छा जाए, या पूरा चाँद तांबे जैसा लाल हो जाए, तो डर लगना स्वाभाविक है। इसीलिए हर देश के लोगों ने ग्रहण की कहानियाँ गढ़ीं, और फिर धीरे-धीरे उसका हिसाब भी निकाल लिया। असल में ग्रहण छाया का खेल है, जो सूरज, पृथ्वी और चाँद के एक सीध में आने पर होता है। यहाँ आप चाँद को ख़ुद खिसकाकर देखिए कि ग्रहण कब पूरा होता है और कब अधूरा, दुनिया भर की कहानियाँ पढ़िए, और जानिए कि भारत में अगले ग्रहण कब दिखेंगे और उन्हें सुरक्षित कैसे देखें।

इसके बाद आप समझा पाएँगे

  1. सूरज और चाँद किस दिशा से उगते हैं, और चाँद रोज़ देर से क्यों उगता है।
  2. चाँद की छाया के दो हिस्से कौन-से हैं, और कोई ग्रहण पूरा तो कोई अधूरा क्यों होता है।
  3. सूर्य-ग्रहण के दौरान आसमान में एक-एक करके क्या बदलता है।
  4. पूरे चंद्र-ग्रहण में चाँद लाल क्यों दिखता है।
  5. हर अमावस को सूर्य-ग्रहण और हर पूर्णिमा को चंद्र-ग्रहण क्यों नहीं होता।
  6. राहु की कहानी क्या है, और आर्यभट ने ग्रहण को कैसे समझाया।
  7. ग्रहण को सुरक्षित कैसे देखें, और भारत में अगले ग्रहण कब हैं।

आपकी प्रगति सिर्फ़ इसी ब्राउज़र में रहती है। कहीं भेजी नहीं जाती।

1उगना और डूबना: सूरज और चाँद की दिशा

ग्रहण को समझने से पहले यह जानना काम आता है कि सूरज और चाँद आसमान में कैसे चलते दिखते हैं। पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है, इसलिए हमें सूरज, चाँद और तारे पूर्व में उगते और पश्चिम में डूबते दिखते हैं। पर सूरज हर दिन ठीक पूर्व से नहीं उगता। ठीक पूर्व से वह बस 21 मार्च और 23 सितंबर के आसपास, यानी विषुव (Equinox) के दिनों में उगता है। जून में उसके उगने की जगह पूर्व से उत्तर की ओर खिसक जाती है, और दिसंबर में दक्षिण की ओर। डूबने की जगह भी उसी तरह पश्चिम से उत्तर या दक्षिण की ओर खिसकती है।

चाँद भी पूर्व में उगता है और पश्चिम में डूबता है, पर रोज़ एक ही समय पर नहीं। अपनी कक्षा में चलते हुए चाँद हर दिन सूरज के मुक़ाबले लगभग 12° पूर्व की ओर बढ़ जाता है। उसे फिर से क्षितिज पर लाने के लिए पृथ्वी को रोज़ लगभग 12° ज़्यादा घूमना पड़ता है, और 1° घूमने में 4 मिनट लगते हैं। इसीलिए चाँद औसतन रोज़ लगभग 50 मिनट देर से उगता है। यह देरी हर दिन बराबर नहीं होती: मौसम और चाँद के रास्ते के झुकाव के हिसाब से यह लगभग आधे घंटे से लेकर एक घंटे से ज़्यादा तक हो सकती है।

सूरज से चाँद की यही दूरी तय करती है कि उसका कितना चमकता हिस्सा हमें दिखेगा, यानी उसकी कला (Phase)। अमावस्या (New moon) से पूर्णिमा (Full moon) तक चाँद रोज़ बढ़ता है; यह शुक्ल पक्ष (Waxing) है। फिर पूर्णिमा से अमावस्या तक वह घटता है; यह कृष्ण पक्ष (Waning) है।

पूर्व से पश्चिम: एक दिन का आसमान

मान लीजिए आप जयपुर में दक्षिण की ओर मुँह करके खड़े हैं। तब आपके बाईं ओर पूर्व है और दाईं ओर पश्चिम। समय की पट्टी खिसकाइए, या चलाइए दबाइए: सूरज और चाँद बाईं ओर उगते हैं और दाईं ओर डूबते हैं। ऊपर से तारीख़ चुनिए और देखिए कि सूरज के उगने की जगह कैसे खिसकती है। दूसरी पट्टी से चाँद की उम्र बदलिए, यानी अमावस्या के बाद कितने दिन बीते। फीके गोले बताते हैं कि अगले दिनों में ठीक इसी समय चाँद कहाँ होगा: हर दिन थोड़ा और पूर्व की ओर।

तारीख़

सूर्योदय
सूर्यास्त
चंद्रोदय
चंद्रास्त
चाँद की कला
अगले दिन

समय स्थानीय सौर समय में है, जिसमें दोपहर के 12 बजे सूरज ठीक दक्षिण में होता है। जयपुर में घड़ी का भारतीय मानक समय इससे लगभग आधा घंटा आगे चलता है, और यह फ़र्क़ महीने के हिसाब से थोड़ा घटता-बढ़ता है। चित्र चाँद की कक्षा के 5° झुकाव को और महीने भर में सूरज के खिसकने को छोड़ देता है, इसलिए सारे समय लगभग हैं।

चाँद की कला और उगने का समय

अमावस्या को चाँद सूरज के साथ ही उगता और डूबता है, और उसका अँधेरा हिस्सा हमारी ओर होता है, इसलिए दिखता ही नहीं। शुक्ल पक्ष की अष्टमी के आसपास आधा चाँद लगभग दोपहर में उगता है और शाम को दक्षिण में ऊँचा चमकता है। पूर्णिमा का चाँद लगभग सूर्यास्त के समय पूर्व में उगता है और रात भर आसमान में रहता है। कृष्ण पक्ष की अष्टमी का आधा चाँद लगभग आधी रात को उगता है और सुबह तक दिखता है। ये औसत समय हैं; जगह और मौसम के साथ थोड़े बदलते हैं।

इसीलिए ग्रहण का समय तय है

सूर्य-ग्रहण तभी हो सकता है जब चाँद ठीक सूरज के आगे आए, यानी अमावस्या को, और तब चाँद दिन में सूरज के साथ आसमान में होता है। इसलिए सूर्य-ग्रहण हमेशा दिन में दिखता है। चंद्र-ग्रहण पूर्णिमा को होता है, जब चाँद सूरज के ठीक सामने होता है: सूरज डूबता है तो चाँद उगता है। इसलिए चंद्र-ग्रहण रात में दिखता है, और जहाँ भी उस समय रात है और चाँद ऊपर है, वहाँ से एक साथ दिखता है।

पश्चिम वाला किनारा पहले

सूरज और चाँद दोनों रोज़ पूर्व से पश्चिम जाते दिखते हैं, पर चाँद थोड़ा पीछे छूटता जाता है, क्योंकि वह अपनी कक्षा में पूर्व की ओर बढ़ रहा है। इसलिए सूर्य-ग्रहण में चाँद पश्चिम की ओर से आकर सूरज के आगे से निकलता है और पहले सूरज का पश्चिम वाला किनारा ढकता है। भारत से दोपहर में दक्षिण की ओर देखें, तो पश्चिम दाईं ओर है; आगे सूर्य-ग्रहण वाले हिस्से के चित्र में चाँद इसीलिए दाईं ओर से आता है। चंद्र-ग्रहण में भी चाँद पूर्व की ओर बढ़ते हुए पृथ्वी की छाया में घुसता है, इसलिए उसका पूर्व वाला किनारा पहले काला पड़ता है।

जाँच पड़ाव

  1. 1जून में जयपुर से सूरज किधर से उगता दिखता है?

  2. 2पूर्णिमा का चाँद लगभग कब उगता है?

  3. 3चाँद रोज़ औसतन लगभग 50 मिनट देर से क्यों उगता है?

2छाया का खेल: ग्रहण बनता कैसे है

टॉर्च के सामने हाथ रखिए, दीवार पर हाथ की छाया बन जाती है। आसमान में भी यही होता है। सूरज अपनी रोशनी से चमकता है, जबकि पृथ्वी और चाँद उसी रोशनी को लौटाकर चमकते हैं, और दोनों के पीछे हमेशा एक लंबी छाया पड़ती रहती है।

जब चाँद ठीक सूरज और पृथ्वी के बीच आ जाता है, तो उसकी छाया पृथ्वी पर पड़ती है। जहाँ यह छाया पड़ती है, वहाँ के लोगों को सूरज ढका हुआ दिखता है। यह सूर्य-ग्रहण है। जब पृथ्वी सूरज और चाँद के बीच आ जाती है, तो पृथ्वी की छाया चाँद पर पड़ती है। यह चंद्र-ग्रहण है।

चाँद को आगे-पीछे और ऊपर-नीचे कीजिए

पहली पट्टी से चाँद की दूरी बदलिए। चाँद की कक्षा पूरी गोल नहीं, थोड़ी अंडाकार है, इसलिए वह कभी लगभग 3,57,000 किलोमीटर पास आ जाता है और कभी 4,07,000 किलोमीटर दूर चला जाता है। दूसरी पट्टी से चाँद को सूरज-पृथ्वी की सीधी रेखा से ऊपर उठाइए। नीचे का छोटा चित्र दिखाता है कि छाया के सबसे बीच वाली जगह से आसमान कैसा दिखेगा।

धरती पर ग्रहण
आसमान में चाँद ÷ सूरज का आकार
गहरी छाया की नोक

छाया के दो हिस्से

चाँद के पीछे बीच में एक गहरी छाया होती है, जहाँ से सूरज पूरा ढका दिखता है। इसे प्रच्छाया (Umbra) कहते हैं। उसके चारों ओर हल्की छाया, यानी उपच्छाया (Penumbra) होती है, जहाँ से सूरज का बस कुछ हिस्सा ढका दिखता है। गहरी छाया पीछे जाते-जाते पतली होती जाती है और चाँद से लगभग 3,74,000 किलोमीटर दूर एक नोक पर ख़त्म हो जाती है। हल्की छाया फैलती ही जाती है।

एक अनोखा संयोग

सूरज चाँद से लगभग 400 गुना चौड़ा है, पर हमसे लगभग 400 गुना दूर भी है। इसलिए आसमान में दोनों लगभग बराबर दिखते हैं, और चाँद सूरज को ठीक-ठीक ढक पाता है। चाँद हर साल लगभग 3.8 सेंटीमीटर दूर खिसक रहा है। दसियों करोड़ साल बाद वह सूरज को पूरा ढक नहीं पाएगा, और पूर्ण सूर्य-ग्रहण होने बंद हो जाएँगे।

पूर्ण, कंगन जैसा, आंशिक

चाँद की दूरी बदलती रहती है, और सूरज की भी: जनवरी में सूरज जुलाई से लगभग 3.4 प्रतिशत बड़ा दिखता है। अगर गहरी छाया की नोक धरती तक पहुँच जाए, तो वहाँ पूर्ण सूर्य-ग्रहण (Total solar eclipse) होता है। अगर चाँद दूर हो और नोक धरती से पहले ही ख़त्म हो जाए, तो चाँद सूरज से छोटा दिखता है और चारों ओर रोशनी का एक कंगन बचा रहता है। इसे वलयाकार ग्रहण (Annular eclipse) कहते हैं। जो लोग हल्की छाया में होते हैं, उन्हें आंशिक ग्रहण (Partial eclipse) दिखता है। कभी-कभी एक ही ग्रहण कहीं पूर्ण और कहीं कंगन जैसा दिखता है; इसे संकर ग्रहण (Hybrid eclipse) कहते हैं।

छोटी गहरी छाया, बड़ी हल्की छाया

धरती पर गहरी छाया की पट्टी ज़्यादा से ज़्यादा कुछ सौ किलोमीटर चौड़ी होती है, जबकि हल्की छाया हज़ारों किलोमीटर में फैलती है। इसलिए आंशिक सूर्य-ग्रहण तो बहुत लोग देखते हैं, पर पूर्ण ग्रहण गिनी-चुनी जगहों से दिखता है। चाँद के चलने और पृथ्वी के घूमने से यह पट्टी तेज़ी से खिसकती है, इसलिए किसी एक जगह पूर्ण ग्रहण बस कुछ मिनट रहता है।

जाँच पड़ाव

  1. 1सूर्य-ग्रहण के समय तीनों किस क्रम में होते हैं?

  2. 2चाँद पृथ्वी से सबसे दूर हो और ठीक सीध में आ जाए, तो कैसा सूर्य-ग्रहण दिखेगा?

  3. 3छोटा-सा चाँद इतने बड़े सूरज को कैसे ढक लेता है?

3सूर्य-ग्रहण

सूर्य-ग्रहण हमेशा अमावस्या को होता है, क्योंकि तभी चाँद सूरज की ओर होता है। चाँद सूरज के एक किनारे को छूता है और धीरे-धीरे उसके आर-पार निकल जाता है। आंशिक हिस्सा एक घंटे से भी ज़्यादा चल सकता है, पर पूर्ण अवस्था कुछ ही मिनट की होती है।

आसमान में सूर्य-ग्रहण

ऊपर से ग्रहण की क़िस्म चुनिए और समय की पट्टी खिसकाइए, या चलाइए दबाइए। चाँद का गहरा गोला दाईं ओर से आकर सूरज के आगे से बाईं ओर निकलता है। नीचे के बटन सीधे किसी स्पर्श के पल पर ले जाते हैं।

ग्रहण की क़िस्म

सीधे जाइए

अभी क्या दिख रहा है
सूरज कितना ढका
नंगी आँख से?

चार स्पर्श

जिस पल चाँद सूरज के किनारे को पहली बार छूता है, वह पहला स्पर्श (First contact) है। पूरा सूरज ढक जाने का पल (कंगन वाले ग्रहण में कंगन बनने का पल) दूसरा स्पर्श है, और रोशनी लौटने का पल तीसरा। चाँद जब सूरज को छोड़कर पूरी तरह हट जाता है, तो चौथा स्पर्श होता है और ग्रहण ख़त्म। आंशिक ग्रहण में सूरज कभी पूरा ढकता ही नहीं, इसलिए उसमें बस पहला और चौथा स्पर्श होता है। पंचांग और ग्रहण की सूचनाओं में ग्रहण के शुरू होने को आमतौर पर स्पर्श और ख़त्म होने को मोक्ष कहा जाता है।

मोतियों की माला और हीरे की अँगूठी

चाँद का किनारा चिकना नहीं है; उस पर पहाड़ और घाटियाँ हैं। पूर्ण ग्रहण से ठीक पहले सूरज की आख़िरी रोशनी इन घाटियों से छनकर चमकते दानों की तरह दिखती है। इन्हें बेली के मोती (Baily's beads) कहते हैं, अंग्रेज़ खगोलविद फ़्रांसिस बेली के नाम पर। जब एक ही दाना बचता है, तो धुँधले घेरे के साथ वह हीरे की अँगूठी (Diamond ring) जैसा चमकता है।

सूरज का मुकुट

पूरा सूरज ढकते ही उसके चारों ओर दूधिया सफ़ेद रोशनी फैल जाती है। यह कॉरोना (Corona) है, सूरज का बाहरी वायुमंडल, जो आम दिनों में सूरज की तेज़ चमक में छिपा रहता है। किनारे पर गुलाबी-लाल लपटें भी दिख सकती हैं। आसमान इतना काला हो जाता है कि चमकीले तारे और ग्रह दिखने लगते हैं, हवा थोड़ी ठंडी लगती है, और कई जगह चिड़ियाँ ऐसे चुप हो जाती हैं जैसे शाम हो गई हो।

कितनी देर?

किसी एक जगह पूर्ण अवस्था साढ़े सात मिनट से ज़्यादा कभी नहीं रहती। ईसा पूर्व 2000 से सन् 3000 तक के सारे ग्रहणों में सबसे लंबा पूर्ण ग्रहण 16 जुलाई 2186 को होगा, लगभग 7 मिनट 29 सेकंड का। कंगन वाला ग्रहण इससे लंबा चल सकता है, कभी-कभी 12 मिनट से भी ज़्यादा।

ग्रहण ने विज्ञान को क्या दिया

1868: सूरज में एक नया तत्व

18 अगस्त 1868 का पूर्ण सूर्य-ग्रहण भारत से दिखा था, और उसे देखने कई देशों के खगोलविद यहाँ आए। उस दिन सूरज की लपटों के प्रकाश में एक पीली रेखा दिखी, जो किसी जाने-पहचाने तत्व की नहीं थी। फ़्रांस के ज़ूल ज़ाँसें ने गुंटूर से इन लपटों को परखा। बाद में इंग्लैंड के नॉर्मन लॉकयर ने उस पीली रेखा को एक नए तत्व की निशानी माना और उसका नाम रखा हीलियम, सूरज के यूनानी नाम हेलियोस से। धरती पर हीलियम 1895 में मिली।

1919: मुड़ती हुई रोशनी

29 मई 1919 के पूर्ण ग्रहण में, जब आसमान काला हुआ, खगोलविदों ने सूरज के पास दिखे तारों की तस्वीरें लीं। तारे अपनी जगह से थोड़े खिसके हुए निकले, लगभग उतने ही जितना आइंस्टीन के सिद्धांत ने बताया था: सूरज का गुरुत्व पास से गुज़रती रोशनी को मोड़ देता है।

जाँच पड़ाव

  1. 1सूर्य-ग्रहण किस दिन हो सकता है?

  2. 2सूरज का कॉरोना कब दिखता है?

  3. 3आंशिक सूर्य-ग्रहण में कितने स्पर्श होते हैं?

4चंद्र-ग्रहण

चंद्र-ग्रहण हमेशा पूर्णिमा को होता है, जब पृथ्वी सूरज और चाँद के बीच होती है। पृथ्वी चाँद से साढ़े तीन गुना से भी ज़्यादा चौड़ी है, इसलिए उसकी छाया भी बड़ी है और चाँद उसमें घंटों रहता है। रात वाले पूरे आधे हिस्से से, जहाँ भी चाँद आसमान में हो, ग्रहण एक साथ दिखता है। और इसे देखने में कोई ख़तरा नहीं: नंगी आँख, दूरबीन, कैमरा, जैसे चाहें देखिए।

पृथ्वी की छाया से गुज़रता चाँद

पहली पट्टी तय करती है कि चाँद छाया के बीच से कितना हटकर गुज़रेगा। फिर समय की पट्टी खिसकाइए, या चलाइए दबाइए। बीच का गहरा घेरा गहरी छाया है, और बाहर का हल्का घेरा हल्की छाया।

इस रास्ते पर ग्रहण
अभी
हल्की छाया छूने के बाद

चाँद लाल क्यों होता है?

पूरे ग्रहण में भी चाँद ग़ायब नहीं होता। सूरज की कुछ रोशनी पृथ्वी के वायुमंडल से गुज़रते हुए मुड़कर छाया के अंदर पहुँच जाती है। रास्ते में हवा नीली रोशनी को बिखेर देती है और लाल-नारंगी रोशनी आगे निकल जाती है, ठीक वैसे ही जैसे उगता और डूबता सूरज लाल दिखता है। यानी उस पल चाँद पर पृथ्वी के सारे सूर्योदयों और सूर्यास्तों की रोशनी पड़ रही होती है।

हर बार अलग रंग

चाँद कितना लाल या कितना काला दिखेगा, यह पृथ्वी की हवा पर निर्भर करता है। बादल और धूल ज़्यादा हों, या किसी बड़े ज्वालामुखी के फटने से धूल और गंधक की बूँदें ऊपर तक फैली हों, तो चाँद बहुत गहरा, लगभग काला दिख सकता है। साफ़ हवा में वह चमकीला तांबई रहता है।

हल्की छाया वाला ग्रहण

कई बार चाँद गहरी छाया को छूता ही नहीं, बस हल्की छाया से निकल जाता है। तब वह थोड़ा मटमैला हो जाता है, इतना कम कि ध्यान से देखने पर ही पता चलता है। ग्रहण की सूचियों में इसे भी गिना जाता है, इसलिए कैलेंडर में ग्रहण का नाम देखें तो पहले उसकी क़िस्म भी देख लीजिए।

कितनी देर?

चाँद छाया के मुक़ाबले लगभग 3,400 किलोमीटर प्रति घंटा की चाल से खिसकता है। चाँद की दूरी पर पृथ्वी की गहरी छाया लगभग 9,200 किलोमीटर चौड़ी है, यानी ढाई चाँद से भी ज़्यादा। इसलिए पूर्ण अवस्था एक घंटे से भी ज़्यादा चल सकती है। 31 दिसंबर 2028 को भारत में पूर्ण अवस्था लगभग 71 मिनट रहेगी, और हल्की छाया छूने से छोड़ने तक पूरा ग्रहण साढ़े पाँच घंटे से ज़्यादा चलेगा।

जाँच पड़ाव

  1. 1चंद्र-ग्रहण किस दिन होता है?

  2. 2पूरे ढके चाँद पर लाल रोशनी कहाँ से आती है?

  3. 3चंद्र-ग्रहण देखने के लिए क्या चाहिए?

5हर अमावस को ग्रहण क्यों नहीं?

चाँद हर महीने पृथ्वी का एक चक्कर लगाता है, तो हर अमावस को सूर्य-ग्रहण और हर पूर्णिमा को चंद्र-ग्रहण क्यों नहीं होता? क्योंकि चाँद की कक्षा पृथ्वी की कक्षा के तल से लगभग 5° झुकी हुई है। ज़्यादातर अमावस-पूर्णिमा पर चाँद सूरज-पृथ्वी की सीध से थोड़ा ऊपर या थोड़ा नीचे से निकल जाता है, और छाया किसी पर नहीं पड़ती।

दोनों कक्षाएँ दो बिंदुओं पर एक-दूसरे को काटती हैं। इन्हें पात (Node) कहते हैं। जहाँ चाँद नीचे से ऊपर चढ़ता है, वह आरोही पात (Ascending node) है, और जहाँ ऊपर से नीचे उतरता है, वह अवरोही पात (Descending node)। ग्रहण तभी होता है जब अमावस या पूर्णिमा किसी पात के पास पड़े।

झुकी हुई कक्षा और ग्रहण के मौसम

समय की पट्टी खिसकाइए, या चलाइए दबाइए। ऊपर का चित्र सूरज के चारों ओर पृथ्वी को, और पृथ्वी के चारों ओर चाँद की झुकी कक्षा को दिखाता है। नीचे की पट्टी उस साल की हर अमावस (भरा बिंदु) और पूर्णिमा (खुला बिंदु) पर चाँद की ऊँचाई दिखाती है; घेरे वाले बिंदु ग्रहण हैं।

तारीख़
सूरज की नज़दीकी पात से दूरी
ग्रहण का मौसम?

ग्रहण का मौसम

साल में दो बार सूरज किसी पात के पास से गुज़रता है। उसके आसपास का 31 से 37 दिन का समय, औसतन लगभग साढ़े 34 दिन, ग्रहण का मौसम (Eclipse season) है। अमावस से अमावस तक का महीना इससे छोटा है, इसलिए हर मौसम में कम से कम एक सूर्य-ग्रहण ज़रूर होता है, और अक्सर दो हफ़्ते आगे-पीछे एक चंद्र-ग्रहण भी। इसी से साल में कम से कम दो सूर्य-ग्रहण होते हैं, और ज़्यादा से ज़्यादा पाँच।

पात भी खिसकते हैं

पात एक जगह टिके नहीं रहते। वे हर साल लगभग 19° उलटी दिशा में खिसक जाते हैं और लगभग 18.6 साल में पूरा चक्कर लगाते हैं। इसलिए दो मौसमों के बीच साल का आधा नहीं, लगभग 173 दिन होते हैं, और ग्रहण के मौसम हर साल लगभग 19 दिन पहले आ जाते हैं। ऊपर के चित्र को चलाकर यह साल-दर-साल देखिए।

सारोस (Saros): 18 साल का चक्र

बाबुल के खगोलविद जानते थे कि ग्रहण लगभग 18 साल बाद लौटते हैं। इतने समय में चाँद 223 बार अमावस से अमावस तक जाता है, 242 बार एक ही पात पर लौटता है, और 239 बार पृथ्वी के सबसे पास आता है। तीनों गिनतियाँ लगभग एक साथ पूरी होती हैं, लगभग 18 साल 11 दिन 8 घंटे में। तब सूरज, चाँद और पात फिर लगभग वैसे ही जमते हैं, और लगभग वैसा ही ग्रहण होता है। उन 8 घंटों में पृथ्वी एक-तिहाई चक्कर घूम जाती है, इसलिए नया ग्रहण लगभग 120° पश्चिम में दिखता है। तीन सारोस बाद, यानी लगभग 54 साल एक महीने में, ग्रहण फिर लगभग उसी इलाक़े में लौट आता है।

जाँच पड़ाव

  1. 1हर अमावस को सूर्य-ग्रहण क्यों नहीं होता?

  2. 2साल में कम से कम कितने सूर्य-ग्रहण होते हैं?

  3. 3सारोस चक्र कितना लंबा है?

6दुनिया भर की कहानियाँ

जब ग्रहण का हिसाब किसी को नहीं आता था, तब लोगों ने उसे कहानियों से समझा। कहीं कोई राक्षस सूरज को निगलता है, कहीं ड्रैगन, मेंढक या भेड़िया। कहीं सूरज और चाँद आपस में झगड़ते हैं। लोग ढोल बजाकर उसे भगाते थे, या अपने झगड़े सुलझाते थे। दिलचस्प बात यह है कि इन्हीं में से कई सभ्यताओं ने आगे चलकर ग्रहण का पहले से अनुमान लगाना भी सीख लिया।

नक़्शे पर कोई जगह चुनिए

नक़्शे के किसी निशान को, या नीचे किसी नाम को दबाइए। उस जगह की कहानी नीचे खुल जाएगी।

1 · भारत

राहु: अमृत की एक घूँट

महाभारत के आदि पर्व में कथा है कि देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मथा और उसमें से अमृत निकला। देवता जब अमृत पी रहे थे, तब राहु नाम का एक दानव देवता का रूप धरकर उनके बीच बैठ गया और अमृत पीने लगा। अमृत अभी उसके गले तक ही पहुँचा था कि सूर्य और चंद्र ने उसे पहचानकर बता दिया। नारायण ने चक्र से उसका सिर काट दिया। तब से राहु के सिर और सूर्य-चंद्र में पुराना बैर चला आ रहा है, और वह आज तक उन्हें निगलता है।

भागवत पुराण में भी यही कथा है; वहाँ विष्णु मोहिनी का रूप लेकर अमृत बाँटते हैं। भागवत कहता है कि राहु पूर्णिमा और अमावस्या को चंद्र और सूर्य पर झपटता है। बाद की परंपरा में कटे सिर को राहु और धड़ को केतु कहा गया, और दोनों को छाया ग्रह माना गया।

विज्ञान की नज़र से

कहानी में भी एक सच छिपा है: ग्रहण सचमुच सिर्फ़ पूर्णिमा और अमावस्या को होता है। आगे चलकर भारत के खगोलविदों ने राहु और केतु को चाँद की कक्षा के दो पातों से जोड़ा, यानी ठीक उन बिंदुओं से जिनके पास ग्रहण होते हैं।

2 · अरब (मदीना)

किसी की मौत पर ग्रहण नहीं

पैग़ंबर मुहम्मद के बेटे इब्राहीम की मौत के दिन सूर्य-ग्रहण हुआ। लोग कहने लगे कि यह उसी शोक में हुआ है। सहीह बुख़ारी की हदीस के अनुसार पैग़ंबर ने कहा कि सूरज और चाँद किसी की मौत या ज़िंदगी के कारण ग्रहण में नहीं आते; जब ग्रहण देखो, तो नमाज़ पढ़ो और दुआ करो।

विज्ञान की नज़र से

ग्रहण किसी इंसान की ज़िंदगी या मौत से नहीं जुड़ा। वह सूरज, चाँद और पृथ्वी की चाल से होता है, और उसका समय सैकड़ों साल पहले से निकाला जा सकता है।

3 · बाबुल (आज का इराक़)

कुछ दिन का नकली राजा

प्राचीन मेसोपोटामिया में कुछ ग्रहणों को राजा के लिए अपशकुन माना जाता था। ख़तरा टालने के लिए कुछ समय के लिए एक नकली राजा गद्दी पर बिठाया जाता था, और असली राजा छिपकर रहता था। ख़तरे का समय बीत जाने पर अक्सर नकली राजा को मार दिया जाता था, ताकि अपशकुन उसी के साथ ख़त्म हो जाए।

विज्ञान की नज़र से

इसी कारण बाबुल के लोग आसमान पर कड़ी नज़र रखते थे और ग्रहण लिखते रहते थे। सदियों के इन लेखों से वे ग्रहणों का दोहराव पहचानने लगे और उनका अनुमान लगाने लगे।

4 · यूनान और लीडिया (आज का तुर्किये)

जिस ग्रहण ने युद्ध रुकवाया

यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस लिखते हैं कि लीडिया के लोगों और मेदियों के बीच पाँच साल से युद्ध चल रहा था। छठे साल लड़ाई के बीच अचानक दिन रात में बदल गया। दोनों सेनाएँ डर गईं, लड़ना छोड़ दिया और शांति कर ली। हेरोडोटस के अनुसार मिलेतुस के थेल्स ने इस ग्रहण की पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी।

विज्ञान की नज़र से

इस ग्रहण को आमतौर पर 28 मई 585 ईसा पूर्व का माना जाता है। थेल्स ने सचमुच भविष्यवाणी की थी या नहीं, इस पर कई इतिहासकारों को शक है।

5 · स्कैंडिनेविया

सूरज के पीछे भेड़िया

उत्तर यूरोप की नॉर्स कथाओं में स्कोल नाम का भेड़िया आसमान में सूरज का पीछा करता है, और हाटी नाम का भेड़िया चाँद का। इसीलिए सूरज और चाँद कभी रुकते नहीं, भागते रहते हैं। पुरानी कथा कहती है कि दुनिया के अंत के समय भेड़िये उन्हें पकड़ लेंगे; उसमें ग्रहण की बात नहीं है। ग्रहण को भेड़िये से जोड़ना आज की कई कहानियों में मिलता है: भेड़िया अपने शिकार तक पहुँच गया है।

विज्ञान की नज़र से

सूरज और चाँद सचमुच कभी नहीं रुकते। पृथ्वी के घूमने से दोनों रोज़ पूरब से पश्चिम जाते दिखते हैं, और चाँद तारों के बीच हर घंटे लगभग अपनी चौड़ाई जितना पूरब की ओर खिसकता है।

6 · चीन

सूरज को खाता ड्रैगन

पुराने चीन में माना जाता था कि आसमान का एक ड्रैगन सूरज को खा रहा है। लोग ढोल-नगाड़े और बर्तन बजाकर शोर मचाते, ताकि ड्रैगन डरकर सूरज को छोड़ दे। और हर बार सूरज लौट भी आता था।

विज्ञान की नज़र से

चीन के राजदरबार में ग्रहण बहुत गंभीर बात थी, इसलिए वहाँ के खगोलविद सदियों तक ग्रहण दर्ज करते रहे। ऐसे पुराने रिकॉर्ड आज भी वैज्ञानिकों के काम आते हैं, जैसे यह नापने में कि पृथ्वी का घूमना कितना धीमा हुआ है।

7 · वियतनाम

सूरज निगलता मेंढक

वियतनाम की एक लोककथा में एक बहुत बड़ा मेंढक सूरज को निगल लेता है। बस उसका मालिक ही मेंढक से सूरज वापस उगलवा सकता है, और तब दिन लौट आता है।

विज्ञान की नज़र से

चाँद का गहरा गोला सूरज को एक तरफ़ से काटता हुआ आगे बढ़ता है, इसलिए आंशिक ग्रहण सचमुच ऐसा लगता है जैसे किसी ने सूरज में से एक कौर खा लिया हो।

8 · टोगो और बेनिन (पश्चिम अफ़्रीका)

झगड़ा ख़त्म, सूरज वापस

उत्तरी टोगो और बेनिन के बटामालिबा लोगों की कथा में ग्रहण तब होता है जब सूरज और चाँद आपस में लड़ते हैं। उन्हें शांत करने के लिए लोग ख़ुद अपने पुराने झगड़े सुलझाते हैं और मेल-मिलाप करते हैं।

विज्ञान की नज़र से

सूरज और चाँद लड़ते नहीं, बस एक सीध में आ जाते हैं। पर कहानी की सीख आज भी काम की है: ग्रहण पूरे गाँव-शहर को एक साथ आसमान की ओर देखने का मौक़ा देता है।

9 · ग्रीनलैंड (इनुइट)

सूरज के पीछे भागता चाँद

इनुइट कथा में सूरज-देवी मलिना और चाँद-देवता अनिंगन के बीच झगड़ा हुआ। मलिना ने अनिंगन के चेहरे पर कालिख मल दी और भाग गई। तब से अनिंगन आसमान में उसका पीछा कर रहा है। कभी-कभार वह उसे पकड़ लेता है, और तब सूर्य-ग्रहण होता है।

विज्ञान की नज़र से

चाँद आसमान में सूरज से तेज़ चलता है और हर महीने उसके पास से गुज़रता है। पर उसकी कक्षा झुकी हुई है, इसलिए वह सूरज को कभी-कभार ही ढक पाता है।

भारत के खगोलविदों ने क्या कहा

आर्यभट (सन् 499)

आर्यभटीय में आर्यभट ने लिखा कि सूर्य-ग्रहण में चाँद सूरज को ढक लेता है, और चंद्र-ग्रहण में पृथ्वी की बड़ी छाया चाँद को ढक लेती है। ग्रहण समझाने के लिए उन्हें राहु की ज़रूरत ही नहीं पड़ी।

वराहमिहिर (छठी सदी)

बृहत्संहिता में वराहमिहिर राहु की कथा पर सीधा सवाल उठाते हैं: अगर राहु का शरीर है, या वह बस एक सिर है जो एक तय रास्ते पर चलता है, तो वह सूरज और चाँद को तब कैसे ढक लेता है जब वे उससे 180° दूर होते हैं? फिर वे साफ़ लिखते हैं कि चंद्र-ग्रहण में चाँद पृथ्वी की छाया में जाता है, और सूर्य-ग्रहण में चाँद पश्चिम से आकर बादल की तरह सूरज को नीचे से ढक लेता है।

ब्रह्मगुप्त (सन् 628)

ब्रह्मगुप्त गणित से ग्रहण का समय निकालना जानते थे, फिर भी उन्होंने आर्यभट की इस बात के लिए आलोचना की कि वे ग्रहण को राहु का किया हुआ नहीं मानते। यानी उस दौर में विज्ञान और परंपरा की बहस खुलकर चलती थी।

ग्रहण और हमारे रीति-रिवाज

भारत में कई परिवार ग्रहण के समय सूतक मानते हैं: उस दौरान खाना नहीं बनाते-खाते, कई मंदिरों के पट बंद रहते हैं, और ग्रहण के बाद नहाते हैं, दान करते हैं। ये आस्था और परंपरा की बातें हैं, और हर परिवार इन्हें अपने ढंग से मानता है। विज्ञान की नज़र से ग्रहण की रोशनी में कुछ ज़हरीला नहीं होता। असली ख़तरा बस एक है, सूरज की ओर सीधे देखना, और उससे बचने का तरीक़ा अगले हिस्से में है।

जाँच पड़ाव

  1. 1आर्यभट ने चंद्र-ग्रहण का क्या कारण बताया?

  2. 2राहु की कथा की कौन-सी बात विज्ञान से मेल खाती है?

7सुरक्षित देखिए: भारत में अगले ग्रहण

सूरज को सीधे देखना हमेशा ख़तरनाक है, ग्रहण के दिन भी। आंशिक ग्रहण में सूरज का बचा हुआ हिस्सा भी आँख के पर्दे (रेटिना) को जला सकता है। इसमें दर्द नहीं होता, इसलिए पता भी नहीं चलता, और नुक़सान हमेशा के लिए हो सकता है। चंद्र-ग्रहण की बात अलग है: उसे बेफ़िक्र होकर देखिए।

सुरक्षित या ख़तरनाक?

हर तरीक़े को सही खाने में रखिए।

घर पर पिनहोल बनाइए

एक कार्डबोर्ड या मोटे काग़ज़ में सुई या पेन की नोक से एक छोटा, गोल छेद कीजिए। सूरज की ओर पीठ करके खड़े होइए और कार्ड को कंधे के ऊपर ऐसे पकड़िए कि रोशनी छेद से होकर आधा मीटर या उससे ज़्यादा दूर रखे सफ़ेद काग़ज़ पर पड़े। काग़ज़ पर सूरज की एक छोटी, उलटी परछाईं बनेगी; दूरी जितनी ज़्यादा, परछाईं उतनी बड़ी। ग्रहण में उसमें से कटा हुआ हिस्सा साफ़ दिखेगा।

छलनी, उँगलियों की जाली, या पेड़ की पत्तियों के बीच की जगहें भी यही काम करती हैं। ग्रहण के समय पेड़ के नीचे ज़मीन पर सैकड़ों छोटे-छोटे कटे हुए सूरज दिख जाते हैं।

भारत में अगले ग्रहण, 2034 तक

इस सूची में सिर्फ़ वे ग्रहण हैं जो भारत में कहीं से दिखेंगे। समय भारतीय मानक समय में और लगभग हैं; आपके शहर में कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकते हैं।

सूर्य-ग्रहण
तारीख़भारत में क्या दिखेगाकहाँ और कब
2 अगस्त 2027आंशिकलगभग पूरे देश में, दोपहर बाद। दक्षिण में सूरज ज़्यादा ढकेगा और उत्तर में कम; दिल्ली में लगभग 15:54 से 17:03 तक थोड़ा-सा। पूर्ण ग्रहण की पट्टी स्पेन, उत्तर अफ़्रीका और अरब से गुज़रेगी, भारत से नहीं।
1 जून 2030आंशिकउत्तर और उत्तर-पूर्व भारत में, दोपहर से पहले; दिल्ली में लगभग 10:18 से 12:53 तक, सूरज का छोटा हिस्सा। मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु से नहीं दिखेगा।
21 मई 2031कंगन जैसा, दक्षिण भारत मेंकेरल और तमिलनाडु की एक पट्टी में, जैसे कोच्चि, मदुरै और रामेश्वरम, दोपहर लगभग 13:00 से 13:16 के बीच लगभग 5 मिनट का कंगन। तिरुवनंतपुरम और कन्याकुमारी इस पट्टी से बाहर हैं। बाक़ी पूरे देश में आंशिक।
3 नवंबर 2032आंशिकउत्तर और उत्तर-पूर्व भारत में थोड़ा-सा, सुबह; दिल्ली में लगभग 9:36 से 10:52 तक।
20 मार्च 2034पूर्ण, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख मेंश्रीनगर और लेह के आसपास शाम लगभग 17:22 से 17:25 के बीच लगभग 2 मिनट की पूर्ण अवस्था, सूरज क्षितिज के पास नीचा। बाक़ी देश में शाम को आंशिक; दिल्ली में सूरज का बड़ा हिस्सा ढकेगा।
चंद्र-ग्रहण
तारीख़भारत में क्या दिखेगाकहाँ और कब
21 फ़रवरी 2027हल्की छाया वालाभोर में, लगभग 2:42 से 6:43 तक; चाँद बस थोड़ा मटमैला होगा। पूर्व में चाँद इससे पहले डूब जाएगा।
6–7 जुलाई 2028आंशिकपूरे देश में; गहरी छाया लगभग 22:38 से 1:00 तक चाँद का कुछ हिस्सा ढकेगी।
31 दिसंबर 2028पूर्णपूरे देश में, शुरू से आख़िर तक। पूर्ण अवस्था लगभग 21:46 से 22:57 तक: साल की आख़िरी रात लाल चाँद।
21 दिसंबर 2029पूर्णभोर में; पूर्ण अवस्था लगभग 3:45 से 4:38 तक। पूर्वोत्तर में आख़िरी हिस्सा चाँद डूबने से कट जाएगा।
15–16 जून 2030आंशिकपूरे देश में; आधी रात के आसपास (लगभग 0:03 पर) लगभग आधा चाँद गहरी छाया में।
10 दिसंबर 2030हल्की छाया वालापूरे देश में, रात लगभग 1:37 से सुबह 6:17 तक; बीच में चाँद का एक किनारा साफ़ मटमैला दिखेगा।
25 अप्रैल 2032पूर्णपूरे देश में। चाँद निकलते समय बस हल्की छाया वाला हिस्सा चल रहा होगा; गहरी छाया लगभग 18:58 पर, चाँद निकलने के आसपास, शुरू होगी। पूर्ण अवस्था लगभग 20:10 से 21:16 तक।
18–19 अक्टूबर 2032पूर्णपूरे देश में, शुरू से आख़िर तक; पूर्ण अवस्था आधी रात के बाद, लगभग 0:08 से 0:55 तक।
14–15 अप्रैल 2033पूर्णपूरे देश में, शुरू से आख़िर तक; पूर्ण अवस्था लगभग 0:17 से 1:07 तक।
8 अक्टूबर 2033पूर्णचाँद ग्रहण के बीच निकलेगा। पूर्ण अवस्था लगभग 15:46 से 17:04 तक है, इसलिए उसका आख़िरी हिस्सा बस सुदूर पूर्वोत्तर (अरुणाचल, नागालैंड, मणिपुर, ऊपरी असम) में चाँद निकलते ही दिखेगा। जहाँ चाँद लगभग 18:06 से पहले निकलेगा, वहाँ आख़िरी आंशिक हिस्सा दिखेगा; मुंबई जैसी पश्चिमी जगहों पर चाँद इसके बाद निकलेगा और बस हल्की छाया दिखेगी।
3–4 अप्रैल 2034हल्की छाया वालापूरे देश में, रात लगभग 22:22 से 2:48 तक।

भारत में पिछला पूर्ण सूर्य-ग्रहण 22 जुलाई 2009 को दिखा था, और पिछला कंगन जैसा 21 जून 2020 को, जब उसकी पट्टी राजस्थान में सूरतगढ़ से होकर गुज़री थी।

जाँच पड़ाव

  1. 1ग्रहण वाले सूरज को देखने का सुरक्षित तरीक़ा कौन-सा है?

  2. 2भारत में अगला पूर्ण सूर्य-ग्रहण कब और कहाँ दिखेगा?

8अपनी जाँच

जाँच पड़ाव

  1. 1धरती पर पूर्ण सूर्य-ग्रहण की पट्टी इतनी पतली क्यों होती है?

  2. 2चाँद की दूरी पर पृथ्वी की गहरी छाया लगभग कितनी चौड़ी होती है?

  3. 3भारत के खगोलविदों ने राहु और केतु को आकाश के किन बिंदुओं से जोड़ा?

  4. 4ग्रहण का मौसम पिछले साल के मुक़ाबले कब आता है?

  5. 5बेली के मोती कब दिखते हैं?

  6. 621 मई 2031 को दक्षिण भारत की एक पट्टी में कैसा ग्रहण दिखेगा?

शब्दकोश

चाँद की कला (Phase)
चाँद का जितना चमकता हिस्सा हमें दिखता है, उसका रूप: हँसिया, आधा, बढ़ता या पूरा। यह इस पर टिका है कि आसमान में चाँद सूरज से कितना दूर है।
शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष (Waxing and waning)
अमावस्या से पूर्णिमा तक के लगभग 15 दिन, जब चाँद रोज़ बढ़ता है, शुक्ल पक्ष हैं। पूर्णिमा से अमावस्या तक के, जब वह घटता है, कृष्ण पक्ष।
सूर्य-ग्रहण (Solar eclipse)
जब चाँद सूरज और पृथ्वी के बीच आकर सूरज को पूरा या थोड़ा ढक ले। यह हमेशा अमावस्या को होता है।
चंद्र-ग्रहण (Lunar eclipse)
जब पृथ्वी सूरज और चाँद के बीच आ जाए और उसकी छाया चाँद पर पड़े। यह हमेशा पूर्णिमा को होता है।
प्रच्छाया, गहरी छाया (Umbra)
छाया का बीच वाला गहरा हिस्सा, जहाँ से रोशनी देने वाला गोला पूरा ढका दिखता है।
उपच्छाया, हल्की छाया (Penumbra)
गहरी छाया के चारों ओर का हल्का हिस्सा, जहाँ से रोशनी देने वाला गोला थोड़ा ही ढका दिखता है।
पूर्ण और आंशिक ग्रहण (Total and partial eclipse)
पूर्ण में सूरज या चाँद पूरा ढक जाता है, आंशिक में बस एक हिस्सा।
वलयाकार या कंगन जैसा ग्रहण (Annular eclipse)
जब दूर होने से चाँद सूरज से छोटा दिखे और सूरज का चमकता किनारा एक कंगन की तरह बचा रहे।
संकर ग्रहण (Hybrid eclipse)
ऐसा सूर्य-ग्रहण जो अपनी पट्टी की कुछ जगहों से पूर्ण और कुछ से कंगन जैसा दिखे।
हल्की छाया वाला चंद्र-ग्रहण (Penumbral lunar eclipse)
जब चाँद सिर्फ़ पृथ्वी की हल्की छाया से गुज़रे और बस थोड़ा मटमैला हो।
स्पर्श (Contact) और मोक्ष
ग्रहण का शुरू होना और ख़त्म होना। विज्ञान में चार स्पर्श गिने जाते हैं: पहला, दूसरा, तीसरा और चौथा।
आभासी आमाप (Apparent size)
कोई चीज़ आसमान में कितनी बड़ी दिखती है। दूर की बड़ी चीज़ और पास की छोटी चीज़ बराबर दिख सकती हैं, जैसे सूरज और चाँद।
कॉरोना (Corona)
सूरज का बाहरी वायुमंडल, जो सिर्फ़ पूर्ण सूर्य-ग्रहण में दिखता है।
बेली के मोती, हीरे की अँगूठी (Baily's beads, Diamond ring)
पूर्ण अवस्था से ठीक पहले और ठीक बाद चाँद की घाटियों से छनकर चमकती सूरज की आख़िरी रोशनी।
पात: आरोही और अवरोही (Node: ascending, descending)
वे दो बिंदु जहाँ चाँद की झुकी कक्षा पृथ्वी की कक्षा के तल को काटती है। आरोही पात पर चाँद नीचे से ऊपर जाता है, अवरोही पात पर ऊपर से नीचे।
ग्रहण का मौसम (Eclipse season)
साल में दो बार आने वाला 31 से 37 दिन का समय, जब सूरज किसी पात के पास होता है और ग्रहण हो सकते हैं।
सारोस (Saros)
लगभग 18 साल 11 दिन 8 घंटे का चक्र, जिसके बाद लगभग वैसा ही ग्रहण लौटता है।
पारगमन (Transit)
जब कोई छोटा पिंड, जैसे बुध या शुक्र, सूरज के आगे से एक छोटे काले बिंदु की तरह गुज़रे।