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कक्षा 12 · इतिहास

संविधान का निर्माण

अध्याय 12

भरत चौधरी और वनिता कुमारी ने बनाया · marushala.com

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अध्याय 12 • संविधान का निर्माण • कक्षा XII

कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-3)

सोचिए…

उस कमरे की तीन साल की बहस से निकला — दुनिया का सबसे लंबा संविधान। यह अध्याय उसी कमरे के भीतर ले चलता है।

तीन साल की महाबहस

165 दिन

11 सत्रों में बैठकों के कुल दिन — दिसंबर 1946 से नवंबर 1949; बहसों का मुद्रित रिकॉर्ड 11 भारी-भरकम खंड। लागू: 26 जनवरी 1950।

सबसे लंबा संविधान — क्यों?

  • स्वतंत्रता के समय भारत विशाल + विविध + गहरे तौर पर बिखरा देश
  • इसलिए ज़रूरी था — विस्तृत, गहन विचार-विमर्श पर आधारित, सावधानी से सूत्रबद्ध संविधान
  • दोहरा काम: अतीत-वर्तमान के घावों पर मरहम; ऊँच-नीच की संस्कृति में लोकतांत्रिक संस्थाएँ विकसित करना
  • सत्रों के बीच समितियाँ-उपसमितियाँ मसविदा सुधारती थीं

आकार-विविधता का उत्तर = लंबाई

1 | उथल-पुथल का दौर | 1942-47 : आग के बीच रचना

पृष्ठभूमि: आशा और मोहभंग

  • स्मृति में जीवित: 1942 भारत छोड़ो (सबसे व्यापक जनांदोलन); बोस का सशस्त्र प्रयास
  • 1946 वसंत: बम्बई में रॉयल इंडियन नेवी का विद्रोह; मज़दूर-किसान आंदोलन
  • इन सबकी पहचान — व्यापक हिंदू-मुस्लिम एकता; पर कांग्रेस-लीग सुलह में नाकाम
  • अगस्त 1946 कलकत्ता से साल भर का हिंसा-सिलसिला → विभाजन; करोड़ों शरणार्थी
  • रियासतें: उपमहाद्वीप का एक-तिहाई — अंग्रेज़ों के जाते ही ‘अजीब स्थिति’; कुछ महाराजा “स्वतंत्र सत्ता का सपना” देखते

सभा की बैठकें — इसी पृष्ठभूमि में

बहुत समय पहले हमने नियति से साक्षात्कार किया था… अर्धरात्रि के इस क्षण में जब दुनिया सो रही है, भारत जीवन और स्वतंत्रता की ओर जाग रहा है।

जवाहरलाल नेहरू — संविधान सभा, 14 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि

सभा का गठन

  • चुनाव सार्वभौमिक मताधिकार से नहीं — 1945-46 के प्रांतीय चुनाव → प्रांतीय विधायिकाओं ने सदस्य चुने
  • लीग का बहिष्कार (अलग संविधान; पाकिस्तान-माँग); समाजवादी भी शुरू में दूर (‘अंग्रेज़ों की बनाई संस्था’)
  • परिणाम: 82% सदस्य कांग्रेस के — पर एकमत नहीं: समाजवादी ↔ ज़मींदार-हिमायती; साम्प्रदायिक-निकट ↔ पक्के धर्मनिरपेक्ष
  • जनमत का दबाव: बहसें अख़बारों में; सार्वजनिक चर्चा; जनता से सुझाव आमंत्रित

300 सदस्य — जिनमें 15 महिलाएँ

मुख्य आवाज़ें

कांग्रेस-त्रिगुट

  • नेहरू — उद्देश्य प्रस्ताव; झंडा-प्रस्ताव
  • पटेल — परदे के पीछे; विरोधी विचारों में सहमति
  • प्रसाद — अध्यक्ष; चर्चा को रचनात्मक दिशा

विधि-मस्तिष्क

  • अम्बेडकर — गाँधी की सलाह पर विधि मंत्री; प्रारूप समिति अध्यक्ष
  • मुंशी + अय्यर — प्रारूप पर सुझाव
  • बी.एन. राव (सलाहकार) + एस.एन. मुखर्जी (मुख्य योजनाकार)

अम्बेडकर की ज़िम्मेदारी — प्रारूप को सभा में पारित कराना: 3 वर्ष

2 | संविधान की दृष्टि | उद्देश्य प्रस्ताव और वैधता की बहस

उद्देश्य प्रस्ताव — 13 दिसंबर 1946

  • भारत = “स्वतंत्र सम्प्रभु गणराज्य”
  • नागरिकों को न्याय, समानता, स्वतंत्रता का आश्वासन
  • वचन: अल्पसंख्यकों, पिछड़े-जनजातीय क्षेत्रों, दमित वर्गों के लिए “पर्याप्त रक्षात्मक प्रावधान”
  • नेहरू ने भारतीय प्रयोग को विश्व-इतिहास में रखा — अमेरिकी संविधान, फ्रांसीसी क्रांति (‘टेनिस कोर्ट की शपथ’), रूसी क्रांति

“सफलताओं से सीखना, विफलताओं से बचना”

हम सिर्फ नकल करने वाले नहीं हैं। हो सकता है कि हम उससे बेहतर कुछ रच दें… हम यहाँ जैसी चाहे सरकार बनाएँ — वह हमारे लोगों के स्वभाव के अनुरूप और उनको स्वीकार्य होनी चाहिए।

जवाहरलाल नेहरू — 13 दिसंबर 1946 (स्रोत 1)

‘लोकतांत्रिक’ शब्द क्यों नहीं?

  • मित्रों का सवाल — प्रस्ताव में ‘लोकतांत्रिक’ क्यों नहीं लिखा?
  • नेहरू: ‘गणराज्य’ में निहित है; अनावश्यक शब्द नहीं चाहिए; “हमारा लक्ष्य लोकतंत्र है — लोकतंत्र से कम कुछ भी नहीं”
  • ज़ोर शब्दों पर नहीं, अंतर्वस्तु पर — “बल्कि आर्थिक लोकतंत्र की अंतर्वस्तु”
  • समाजवाद पर: “मैं समर्थक हूँ… एक दिन पूरी दुनिया को इसी मार्ग पर चलना होगा”
  • मीमांसा: क्रांतियाँ समकक्षता के लिए — ब्लूप्रिंट नहीं; लक्ष्य = उदारवादी लोकतंत्र + समाजवादी आर्थिक न्याय की भारतीय व्याख्या

शब्द कम — भरोसा बड़ा

लाहिड़ी की चुनौती (स्रोत 2)

  • सोमनाथ लाहिड़ी (कम्युनिस्ट): सभा पर “ब्रिटिश साम्राज्यवाद का स्याह साया”
  • “यह सभा ब्रिटिश बंदूकों, सेना, आर्थिक-वित्तीय शिकंजे के साये में है” — सत्ता अब भी अंग्रेज़ों के हाथ
  • छोटे मतभेद पर भी एटली के दरवाज़े दस्तक देनी होगी
  • सुझाव: “यहाँ और अभी स्वतंत्रता की घोषणा” — असली शत्रु से मिलकर लड़ो
  • संदर्भ: 1946-47 के जाड़े — अंतरिम सरकार वायसराय+लंदन की देखरेख में

“साहसिक शब्द, उदात्त शब्द — परंतु…”

सरकारें सरकारी कागजों से नहीं बनतीं। सरकार जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति होती है… हम उतनी दूर तक ही जाएँगे जितनी दूर तक लोग हमें ले जाना चाहेंगे।

जवाहरलाल नेहरू — लाहिड़ी को उत्तर

जड़ें: उन्नीसवीं सदी से

  • सभा = स्वतंत्रता-आंदोलनों में भाग लेने वालों की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति
  • बाल-विवाह विरोध, विधवा-विवाह समर्थन → सामाजिक न्याय की अलख
  • विवेकानंद — धर्मों को अधिक न्यायसंगत बनाना; ज्योतिबा फुले — दमित जातियों की पीड़ा
  • कम्युनिस्ट-सोशलिस्ट — मज़दूर-किसान = आर्थिक-सामाजिक न्याय
  • दमनकारी राज के विरुद्ध आंदोलन = लोकतंत्र-न्याय-अधिकार-समानता का भी संघर्ष

संविधान की दृष्टि आंदोलन से निकली

1909-1935 बनाम 1946-49 — एक शृंखला नहीं

| आधार | औपनिवेशिक सुधार (1909/1919/1935) | संविधान सभा (1946-49) | | निर्माता | औपनिवेशिक सरकार ने थोपे | भारतीय प्रतिनिधि | | भारतीय हिस्सेदारी | क़ानून बनाने में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं | पूरी प्रक्रिया भारतीय हाथों में | | मताधिकार | 1935 में भी वयस्कों का 10-15% | सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की कल्पना | | उत्तरदायित्व | अंग्रेज़-नियुक्त गवर्नर के प्रति | जनता की इच्छा के प्रति | | लक्ष्य | प्रतिनिधित्व की माँग को साधना | स्वतंत्र सम्प्रभु गणराज्य |

3 | अधिकारों का निर्धारण | अल्पसंख्यक कौन? अधिकार कैसे?

पृथक निर्वाचिका — पक्ष (बहादुर)

  • 27 अगस्त 1947 — बी. पोकर बहादुर (मद्रास): पृथक निर्वाचिका बनाए रखने का प्रभावशाली भाषण
  • अल्पसंख्यक सब जगह होते हैं — “चाह कर भी नहीं हटा सकते”
  • चाहिए ऐसा ढाँचा जिसमें अल्पसंख्यक सद्भाव से जिएँ, मतभेद कम-से-कम हों
  • तर्क: ग़ैर-मुसलमान मुसलमानों की ज़रूरतें नहीं समझ सकते; न सही प्रतिनिधि चुन सकते

प्रश्न — प्रतिनिधित्व की गारंटी कैसे?

पृथक निर्वाचिका — विपक्ष

  • धुलेकर: “अंग्रेज़ों ने संरक्षण के नाम पर खेल खेला… अब कोई बहकाने वाला नहीं”
  • पटेल: यह “विष है” — समुदाय भिड़े, राष्ट्र के टुकड़े, रक्तपात, विभाजन का कारण; “शांति चाहते हो तो फौरन छोड़ दो”
  • स्रोत 3: “अंग्रेज़ तो चले गए, मगर जाते-जाते शरारत का बीज बो गए”; “एक भी स्वतंत्र देश दिखाओ जहाँ पृथक निर्वाचिका हो”
  • पंत (स्रोत 4): अल्पसंख्यकों के लिए ही “आत्मघाती” — स्थायी अलगाव; निराशा अपंग बना देगी; “हवाबंद कमरा जहाँ हवा के लिए भी औरों पर निर्भर”

विभाजन की छाया में बहस

हमें याद रखना चाहिए कि महत्त्व केवल नागरिक का होता है। सामाजिक पिरामिड का आधार भी नागरिक है और उसकी चोटी भी नागरिक ही होता है।

गोविंद वल्लभ पंत — “खंडित निष्ठा के लिए कोई जगह नहीं” (स्रोत 5)

समाधान की दिशा — नागरिक-केंद्रित राष्ट्र

  • चिंता: एकीकृत राज्य — हर व्यक्ति ‘राज्य के नागरिक के साँचे’ में
  • सूत्र: समुदाय = सांस्कृतिक इकाइयाँ (सांस्कृतिक अधिकार हाँ) — पर राजनीति में सब राज्य के सामान्य सदस्य
  • बेगम ऐज़ाज़ रसूल: पृथक निर्वाचिका आत्मघाती — बहुसंख्यकों से काट देगी
  • 1949 तक ज़्यादातर मुस्लिम सदस्य सहमत — बेहतर है लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका

खंडित निष्ठा नहीं — साझी नागरिकता

‘अल्पसंख्यक’ की चार परिभाषाएँ

कौन कहता है

  • बहादुर — धार्मिक अल्पसंख्यक
  • रंगा — आर्थिक कसौटी
  • नागप्पा-वेलायुधन — हरिजन (20-25%; सात करोड़)
  • जयपाल सिंह — आदिवासी

क्या माँगता है

  • पृथक निर्वाचिका से प्रतिनिधित्व
  • “असली अल्पसंख्यक = जनता”; परिस्थितियाँ + सीढ़ी
  • अल्पसंख्यक नहीं — सामाजिक अपंगताओं का खात्मा + आरक्षण
  • संख्या नहीं, संरक्षण; सीट-आरक्षण + मेलजोल

एक शब्द — चार बहसें; यही इस खंड की कुंजी है

रंगा और जयपाल सिंह

  • रंगा (किसान-नेता): आदिवासियों की ज़मीन ‘मुक्त बाज़ार’ के नाम पर छीनते व्यापारी; गाँवों में सूदखोर-ज़मींदार-मालगुजार; “जनता खुद सभा तक नहीं पहुँच पा रही… हम उनके ट्रस्टी हैं”
  • जयपाल सिंह: “मेरे लोगों को 6,000 साल से अपमानित किया जा रहा है” — फिर भी नेहरू पर विश्वास: “नया अध्याय… अवसरों की समानता”
  • बेदखली — जंगल-चरागाह छिने; समाज की हिकारत; “आपको हमारे साथ घुलना-मिलना चाहिए”
  • माँग: पृथक निर्वाचिका नहीं — विधायिका में सीटों का आरक्षण

हाशिए की आवाज़ें — सदन के केंद्र में

दमित जातियाँ: कष्ट से अधिकार तक

  • नागप्पा: “अब और कष्ट उठाने को तैयार नहीं… हमें मालूम है अपनी बात कैसे मनवानी है”
  • खाण्डेलकर: “हमें हज़ारों साल तक दबाया गया… हृदय भावशून्य हो चुका है”
  • वेलायुधन (स्रोत 7): सात करोड़ हरिजन अल्पसंख्यक नहीं — “सामाजिक अपंगताओं का फौरन खात्मा”
  • विभाजन-हिंसा के बाद अम्बेडकर ने भी पृथक निर्वाचिका-माँग छोड़ी
  • समाधान: अस्पृश्यता-उन्मूलन + मंदिर सब जातियों को + विधायिका-नौकरियों में आरक्षण
  • चेतावनी: “सामाजिक भेदभाव केवल कानून से खत्म नहीं — समाज की सोच बदलनी होगी”

संरक्षण नहीं — क्षतिपूर्ति और सामर्थ्य

हमने विशेषाधिकार कभी नहीं माँगे। हमने सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय और राजनीतिक न्याय की माँग की है… उस बराबरी की जिसके बिना पुरुष और महिला के बीच वास्तविक सहयोग संभव नहीं।

हंसा मेहता (बम्बई) — स्रोत 8

4 | राज्य की शक्तियाँ | केंद्र कितना बलवान?

ढाँचा: केंद्र की ओर झुका संघ

  • नेहरू-पत्र: विभाजन के बाद “दुर्बल केंद्रीय शासन… हानिकारक” — शांति, समन्वय, अंतरराष्ट्रीय आवाज़
  • तीन सूचियाँ: केंद्रीय | राज्य | समवर्ती — अन्य संघों से कहीं ज़्यादा विषय केंद्र के; खनिज-प्रमुख उद्योग भी
  • अनुच्छेद 356: गवर्नर की सिफारिश पर राज्य-शासन केंद्र के हाथ
  • राजकोषीय संघवाद: सीमा शुल्क-कंपनी कर → केंद्र; आय कर-आबकारी → साझा; ज़मीन-संपत्ति-ब्रिकी-शराब कर → राज्य

सिद्धांत से नहीं — इतिहास से निकला संघवाद

“केंद्र बिखर जाएगा” — प्रांतों का पक्ष

  • के. सन्तनम (मद्रास): “तमाम शक्तियाँ केंद्र को सौंपने से वह मजबूत होगा — यह दलील ज़िद-सी बन गई है”
  • अति-बोझ से केंद्र अप्रभावी; कुछ दायित्व राज्यों को देने से केंद्र ज़्यादा मजबूत
  • राजकोषीय प्रावधान प्रांतों को खोखला कर देंगे — “पैसा ही नहीं तो विकास परियोजनाएँ कैसे?”
  • व्यंग्य: इकाई केंद्र से ‘खैरात’ माँगे — इससे तो एकल व्यवस्था ही बेहतर; वरना प्रांत “केंद्र के विरुद्ध” उठ खड़े होंगे
  • मुदालियार (स्रोत 9): शक्तिशाली-केंद्र समर्थक “ज़्यादा बड़े देशभक्त” नहीं

चेतावनी — उड़ीसा-सदस्य: “केंद्र बिखर जाएगा”

“आज हमें शक्तिशाली सरकार चाहिए” — केंद्र का पक्ष

  • अम्बेडकर: “शक्तिशाली और एकीकृत केंद्र — 1935 के एक्ट से भी ज़्यादा शक्तिशाली” (सुनिए, सुनिए)
  • सड़कों की हिंसा → साम्प्रदायिक हिंसा रोकने को केंद्र-शक्ति में भारी इज़ाफा
  • गोपालस्वामी अय्यर: “ज़्यादा से ज़्यादा मजबूत”; बालकृष्ण शर्मा: योजना-संसाधन-शासन-रक्षा
  • मोड़: विभाजन-पूर्व स्वायत्तता का वादा = लीग को भरोसा; विभाजन के बाद वह दबाव समाप्त → “केंद्र के अधिकारों की ओर स्पष्ट झुकाव”

विभाजन ने तराजू झुका दिया

5 | राष्ट्र की भाषा | हिंदुस्तानी से राजभाषा तक

गाँधी की हिंदुस्तानी

  • तीस के दशक तक कांग्रेस: हिंदुस्तानी = राष्ट्रीय भाषा का दर्जा
  • हिंदी+उर्दू का मेल; संस्कृतियों के आदान-प्रदान से समृद्ध साझी भाषा — हिंदू-मुसलमान, उत्तर-दक्षिण का सेतु
  • पर 19वीं सदी के अंत से: हिंदी संस्कृतनिष्ठ, उर्दू फ़ारसीनिष्ठ → “भाषा भी धार्मिक पहचान की राजनीति का हिस्सा”
  • स्रोत 10 (हरिजन सेवक, 12-10-1947): “दोनों का सुंदर मिश्रण… खुद को हिंदी या उर्दू से बाँध लेना देशभक्ति… के विरुद्ध अपराध”

गाँधी की आस्था अंत तक अडिग

धुलेकर बनाम दुर्गाबाई

  • धुलेकर (प्रसंग 1): “हिंदुस्तानी नहीं जानते वे सदस्यता के पात्र नहीं” → हंगामा; नेहरू का हस्तक्षेप; (प्रसंग 2, 13-9-1949): राजभाषा नहीं — राष्ट्रभाषा घोषित हो; “रियायत नहीं — ऐतिहासिक प्रक्रिया की परिणति”
  • दुर्गाबाई (मद्रास): दक्षिण में विरोध — प्रचार ‘प्रांतीय भाषाओं की जड़ें खोदने का प्रयास’ लगता; स्वयं दक्षिण में हिंदी-प्रचारक — अब आक्रामकता देख “सकते में हूँ”; हिंदुस्तानी से उर्दू-क्षेत्रीय शब्द निकाले जा रहे
  • समायोजन-स्वर: देव — संदेह मत जगाओ; चेट्टियार — एहतियात; वरना “गहरी कड़वाहट”; “थोपने का सवाल नहीं”

‘वर्चस्व का भय’ बनाम ‘हिंदी-गौरव’

भाषा समिति का फार्मूला

| तत्त्व | व्यवस्था | | भाषा | देवनागरी लिपि में हिंदी | | दर्जा | राजकीय भाषा (राजभाषा) — ‘राष्ट्रभाषा’ नहीं | | संक्रमण | पहले 15 वर्ष सरकारी कामों में अंग्रेज़ी जारी | | प्रांत | प्रत्येक प्रांत अपने लिए एक क्षेत्रीय भाषा चुन सकेगा | | उद्देश्य | धीरे-धीरे आगे बढ़ना; भावनाओं को शांत करना; सर्वस्वीकृत हल |

6 | निष्कर्ष | लेन-देन से निकला भरोसा

दो केंद्रीय अभिलक्षण

  • सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार: हर वयस्क को वोट — “ख़ास किस्म का भरोसा”; विदेशों में पूर्वोदाहरण नहीं (अमेरिका-ब्रिटेन: संपत्तिवान पुरुष → शिक्षित → श्रमिक-किसान → महिलाएँ सबसे बाद) — भारत की एक छलाँग
  • धर्मनिरपेक्षता: मूल अधिकारों से — धार्मिक स्वतंत्रता (अनु. 25-28), सांस्कृतिक-शैक्षिक (29-30), समानता (14, 16, 17); अनिवार्य धार्मिक शिक्षा पर रोक; रोज़गार-भेदभाव अवैध; पर सुधार-हस्तक्षेप की गुंजाइश (अस्पृश्यता-रोक; पारिवारिक कानून)

“पूर्ण विच्छेद नहीं — विवेकपूर्ण फासला”

संविधान-यात्रा एक नज़र में

  1. 194526 जुलाई — लेबर-सरकार; दिसंबर से आम चुनाव
  2. 194616 मई — कैबिनेट मिशन; 16 अगस्त — प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस
  3. 19462 सितंबर — अंतरिम सरकार; 9 दिसंबर — सभा का पहला अधिवेशन
  4. 194613 दिसंबर — उद्देश्य प्रस्ताव
  5. 194714-15 अगस्त — स्वतंत्रता; सभा अब संप्रभु
  6. 194727 अगस्त — पृथक निर्वाचिका-महाबहस
  7. 194913 सितंबर — भाषा-बहस का चरम
  8. 1949दिसंबर — संविधान पर हस्ताक्षर (अंगीकरण: 26 नवंबर)
  9. 195026 जनवरी — संविधान लागू

समग्र दृष्टि — पाँच सूत्र

  • प्रक्रिया: 11 सत्र-165 दिन-11 खंड; जनमत-सुझाव; बदलते विचार — लोकतंत्र बनने से पहले लोकतांत्रिक विधि
  • वैधता: क़ानूनी स्रोत ब्रिटिश योजना — नैतिक स्रोत जनता की इच्छा (लाहिड़ी-नेहरू बहस)
  • समावेश: सांस्कृतिक अधिकार + आरक्षण हाँ; पृथक निर्वाचिका नहीं — नागरिक-केंद्रित राष्ट्र
  • ढाँचा: विभाजन-हिंसा-नियोजन → केंद्र-झुकाव; प्रांतों की चेतावनियाँ दर्ज
  • समझौता-कला: ‘गणराज्य’-‘राजभाषा’-‘विवेकपूर्ण फासला’ — शब्दों में गुँथे समझौते

असहमति का दमन नहीं — प्रबंधन

अभ्यास की तैयारी

  • उद्धरण कंठस्थ: “नकल करने वाले नहीं”, “जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति”, “विष”, “हवाबंद कमरा”, “सीढ़ी”, “विवेकपूर्ण फासला”
  • तिथियाँ: 9/13 दिसंबर 1946 • 27 अगस्त 1947 • 13 सितंबर 1949 • 26 नवंबर 1949 • 26 जनवरी 1950
  • आँकड़े: 11 सत्र-165 दिन • 82% • 300/15 • 10-15% • 15 वर्ष • एक-तिहाई
  • निबंध-क्षेत्र: ऐतिहासिक ताकतें; दमित-समूह दावे; मजबूत केंद्र; भाषा-समाधान

तीन पुस्तकों की यात्रा सम्पूर्ण — हड़प्पा से संविधान तक

जो पढ़ाते हैं, वही लिखते और जाँचते हैं

इसे बनाने वाले

  • भरत चौधरीभरत चौधरीव्याख्यातारा.उ.मा.वि. जेठान्तरी · ब्लॉक समदड़ी, जिला बालोतरा
  • वनिता कुमारीवनिता कुमारीव्याख्यातारा.उ.मा.वि. रामसीन मूंगड़ा · ब्लॉक एवं जिला बालोतरा

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