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कक्षा 12 · इतिहास

बंधुत्व, जाति तथा वर्ग

अध्याय 3

भरत चौधरी और वनिता कुमारी ने बनाया · marushala.com

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कक्षा XII • इतिहास भाग-1 • अध्याय 3 — बंधुत्व, जाति तथा वर्ग

कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग-1)

यदि कोई ग्रंथ कहता है “ऐसा होना चाहिए” — तो क्या हम मान लें कि सचमुच ऐसा ही होता था?

यही इस पूरे अध्याय का केंद्रीय प्रश्न है। संकेत: उत्तर सातवाहन अभिलेखों और मातंग जातक में छिपा है।

आर्थिक परिवर्तन → सामाजिक प्रभाव

अध्याय 2 से जोड़

  • लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी के आर्थिक-राजनीतिक परिवर्तनों ने समाज पर प्रभाव छोड़ा
  • वन क्षेत्रों में कृषि का विस्तार → वहाँ रहने वालों की जीवनशैली में परिवर्तन
  • शिल्प विशेषज्ञों के एक विशिष्ट सामाजिक समूह का उदय
  • संपत्ति के असमान वितरण ने सामाजिक विषमताओं को अधिक प्रखर बनाया

अध्याय 2 का ‘किसान और नगर’ यहाँ ‘बंधुत्व, जाति और वर्ग’ बन जाता है

अध्याय की केंद्रीय सावधानी★

इतिहासकार की पद्धति

  • इतिहासकार प्रायः साहित्यिक परंपराओं का उपयोग करते हैं
  • ग्रंथों के तीन प्रकार —
    • कुछ सामाजिक व्यवहार के मानदंड तय करते थे
    • अन्य समाज का चित्रण करते थे
    • कुछ रिवाज़ों पर टिप्पणी प्रस्तुत करते थे
  • प्रत्येक ग्रंथ (और अभिलेख) किसी समुदाय विशेष के दृष्टिकोण से लिखा जाता था
  • अतः पूछना अनिवार्य: किसने लिखा • क्या लिखा • किनके लिए लिखा • किस भाषा में

“यदि हम इन ग्रंथों का प्रयोग सावधानी से करें तो आचार-व्यवहार का इतिहास लिखा जा सकता है”

महाभारत — इस अध्याय का केंद्रीय ग्रंथ

  • उपमहाद्वीप के सबसे समृद्ध ग्रंथों में से एक; एक लाख से अधिक श्लोक
  • रचना-काल: एक हज़ार वर्ष तक (लगभग 500 ई.पू. से); कुछ कथाएँ इससे भी पहले प्रचलित
  • मुख्य कथा: दो परिवारों के बीच हुए युद्ध का चित्रण
  • कुछ भाग विभिन्न सामाजिक समुदायों के आचार-व्यवहार के मानदंड तय करते हैं
  • ★यदा-कदा (किंतु हमेशा नहीं) मुख्य पात्र इन मानदंडों का अनुसरण करते दिखाई पड़ते हैं

मानदंडों का अनुसरण व उनकी अवहेलना — दोनों क्या इंगित करती हैं?

1 | समालोचनात्मक संस्करण | सुकथांकर की परियोजना ; दो निष्कर्ष ; इतिहास-लेखन की सीख

एक ग्रंथ, सैंतालीस वर्ष

§1 — 1919 में आरंभ

13,000 पृष्ठ

वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में अनेक विद्वानों ने देश के विभिन्न भागों से विभिन्न लिपियों में लिखी संस्कृत पांडुलिपियाँ एकत्रित कीं, श्लोकों की तुलना का तरीका ढूँढ़ा, और उन श्लोकों का चयन किया जो लगभग सभी पांडुलिपियों में पाए गए।

इस परियोजना को पूरा करने में सैंतालीस वर्ष लगे

परियोजना के दो प्रमुख निष्कर्ष

अत्यंत महत्त्वपूर्ण

पहला — व्यापक समानता

  • संस्कृत के कई पाठों के अनेक अंशों में समानता थी
  • उत्तर में कश्मीर और नेपाल से लेकर
  • दक्षिण में केरल और तमिलनाडु तक
  • सभी पांडुलिपियों में यह समानता देखने में आई

दूसरा — क्षेत्रीय प्रभेद

  • कुछ शताब्दियों के प्रेषण में अनेक क्षेत्रीय प्रभेद उभरे
  • संकलन पादटिप्पणियों और परिशिष्टों के रूप में
  • 13,000 पृष्ठों में से आधे से भी अधिक इन्हीं प्रभेदों का ब्योरा देते हैं
  • अर्थात् विविधता, समानता से भी बड़ी थी

ये प्रभेद प्रभावशाली परंपराओं और लचीले स्थानीय आचरण के बीच संवाद के द्योतक हैं — जो द्वंद्व और मतैक्य दोनों चित्रित करते हैं

इतिहास-लेखन की एक बड़ी सीखध्यान

§1 का अंतिम अनुच्छेद

  • हमारी समझ मुख्यतः उन ग्रंथों पर आधारित है जो संस्कृत में ब्राह्मणों द्वारा उन्हीं के लिए लिखे गए
  • 19वीं और 20वीं शताब्दी में इतिहासकारों ने इन ग्रंथों को सतही तौर पर समझा
    • उनका विश्वास था कि जो लिखा गया वास्तव में उसी तरह व्यवहार में लाया जाता होगा
  • कालांतर में विद्वानों ने पालि, प्राकृत और तमिल ग्रंथों से अन्य परंपराओं का अध्ययन किया
  • ★निष्कर्ष: आदर्शमूलक संस्कृत ग्रंथ आधिकारिक माने जाते थे, किंतु इन आदर्शों को प्रश्नवाचक दृष्टि से भी देखा जाता था और यदा-कदा इनकी अवहेलना भी की जाती थी

यह वाक्य पूरे अध्याय की कुंजी है — इसे रेखांकित कीजिए

2 | बंधुता एवं विवाह | पितृवंशिकता ; विवाह के नियम ; गोत्र ; सातवाहन

परिवार, बंधुता और इतिहासकार की समस्या

§2.1

  • सभी परिवार एक जैसे नहीं होते — जनों की गिनती, रिश्ते व क्रियाकलापों में भिन्नता
  • परिवार एक बड़े समूह का हिस्सा — संबंधी; तकनीकी भाषा में जाति समूह
  • ★पारिवारिक रिश्ते ‘नैसर्गिक’ और रक्त संबद्ध माने जाते हैं — किंतु इन संबंधों की परिभाषा अलग-अलग तरीके से की जाती है
  • इतिहासकार की समस्या: विशिष्ट परिवारों की जानकारी आसान, सामान्य लोगों के पारिवारिक संबंधों को पुनर्निर्मित करना मुश्किल
  • इतिहासकार विचारों का भी विश्लेषण करते हैं — क्योंकि विचारों ने क्रियाकलापों को प्रभावित किया होगा, और व्यवहार ने विचारों पर असर डाला होगा

शब्दावली: कुल = परिवार • जाति = बांधवों का बड़ा समूह • वंश = पीढ़ी-दर-पीढ़ी पूर्वज

पितृवंशिकता — आदर्श और उसकी विभिन्नता

§2.2

आदर्श

  • पिता → पुत्र → पौत्र → प्रपौत्र से चलने वाली वंश परंपरा
  • पुत्र पिता की मृत्यु के बाद संसाधनों (व सिंहासन) पर अधिकार जमाते
  • महाभारत की मुख्य कथा ने इस आदर्श को और सुदृढ़ किया
  • अधिकतर राजवंश (लगभग छठी श. ई.पू. से) इसका अनुसरण करते थे

! व्यवहार में विभिन्नता

  • कभी पुत्र न होने पर भाई उत्तराधिकारी बन जाता
  • कभी बंधु-बांधव सिंहासन पर अधिकार जमाते
  • कुछ परिस्थितियों में स्त्रियाँ — जैसे प्रभावती गुप्त — सत्ता का उपभोग करतीं
  • पितृवंशिकता महाकाव्य की रचना से पहले भी मौजूद थी

मातृवंशिकता = वंश परंपरा माँ से जुड़ी हो — दोनों शब्दों का भेद स्पष्ट रखें

विवाह के नियम और ब्राह्मणीय आचार संहिताएँ

§2.3

  • पुत्रियों को अलग तरह से देखा जाता था — गोत्र से बाहर विवाह अपेक्षित = बहिर्विवाह पद्धति
  • प्रभाव: कन्यादान को पिता का महत्त्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया
  • ★नगरों का प्रभाव (अध्याय 2 से जोड़): नए नगरों से सामाजिक जीवन अधिक जटिल हुआ; दूर-दूर से लोग मिलते; विचारों का आदान-प्रदान होता
    • संभवतः इसी वजह से आरंभिक विश्वासों और व्यवहारों पर प्रश्नचिह्न लगे
  • इस चुनौती के जवाब में ब्राह्मणों ने विस्तृत आचार संहिताएँ तैयार कीं
  • लगभग 500 ई.पू. से संकलन: धर्मसूत्र व धर्मशास्त्र; सबसे महत्त्वपूर्ण मनुस्मृति (लगभग 200 ई.पू.–200 ईसवी)

! सीमा: ब्राह्मण लेखक अपना दृष्टिकोण ‘सार्वभौमिक’ मानते थे — किंतु वास्तविक सामाजिक संबंध कहीं अधिक जटिल थे; क्षेत्रीय विभिन्नता व संचार-बाधाओं से प्रभाव सार्वभौमिक कदापि नहीं था

विवाह के प्रकार — शब्दावली

बॉक्स, पृ. 57

धर्मसूत्र-धर्मशास्त्र विवाह के आठ प्रकारों को स्वीकृति देते हैं — पहले चार ‘उत्तम’, बाकी निंदित; संभव है ये उन लोगों में प्रचलित थीं जो ब्राह्मणीय नियम अस्वीकार करते थे

गोत्र के दो नियम

§2.4

  • लगभग 1000 ई.पू. के बाद से प्रचलन में आई ब्राह्मणीय पद्धति
  • लोगों (खासतौर से ब्राह्मणों) को गोत्रों में वर्गीकृत करना
  • प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर; सदस्य ऋषि के वंशज माने जाते
  • ★दो महत्त्वपूर्ण नियम:
    • (1) विवाह के पश्चात स्त्रियों को पिता के स्थान पर पति का गोत्र माना जाता था
    • (2) एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह संबंध नहीं रख सकते थे

अगला प्रश्न: क्या इन नियमों का सामान्यतः अनुसरण होता था? — उत्तर सातवाहन अभिलेखों में

सातवाहन-परीक्षण: नियम बनाम व्यवहार★

§2.4 — अध्याय का सर्वोत्तम केस-स्टडी

यह अंतर्विवाह पद्धति (बंधुओं में विवाह) को दर्शाता है — जिसका प्रचलन दक्षिण भारत के कई समुदायों में आज भी है; इससे एक सुगठित समुदाय उभर पाता था

क्या माताएँ महत्त्वपूर्ण थीं?

§2.5 — एक सूक्ष्म पर निर्णायक भेद

जो संकेत मिलता है

  • सातवाहन राजाओं को मातृनाम से चिह्नित किया जाता था
  • गोतमी-पुत्त = ‘गोतमी का पुत्र’; वसिथि-पुत्त
  • बृहदारण्यक उपनिषद में भी आचार्यों की सूची में मातृनाम
  • इससे प्रतीत होता है कि माताएँ महत्त्वपूर्ण थीं

! किंतु सावधानी

  • “किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले हमें बहुत सावधानी बरतनी होगी”
  • सातवाहनों में सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक होता था
  • अर्थात् मातृनाम का प्रयोग ≠ मातृवंशिकता
  • नाम में सम्मान, उत्तराधिकार में नहीं

यह भेद परीक्षा में पूछा जाता है — कक्षा में स्पष्ट कीजिए

3 | सामाजिक विषमताएँ | उचित जीविका ; अक्षत्रिय राजा ; जाति ; एकीकरण व संघर्ष

‘उचित’ जीविका — धर्मसूत्र-धर्मशास्त्र के नियम

§3.1

★वैकल्पिक दृष्टिकोण: श्रीमद्भगवद् गीता संकेत करती है कि यह व्यवस्था गुण और कर्म पर आधारित थी, न कि जन्म से निर्धारित कोई कठोर सामाजिक व्यवस्था; ऐसे उल्लेख बौद्ध परंपराओं में भी

स्रोत 6 — सामाजिक व्यवस्था में लचीलापन

ऋग्वेद का साक्ष्य

  • प्रारम्भिक वैदिक समाज में व्यवसायों के संदर्भ में लचीलापन और गतिशीलता विद्यमान प्रतीत होती है
  • ऋग्वेद के सूक्तों में सामाजिक भूमिकाओं में इस लचीलेपन का प्रमाण
  • ★एक सूक्त में वक्ता अपने ही परिवार में व्यवसायों की विविधता बताते हैं:
    • वह स्वयं एक कवि हैं
    • उनके पिता वैद्य हैं
    • उनकी माता अन्न पीसने का कार्य करती हैं

एक ही परिवार, तीन अलग व्यवसाय — यह ‘जन्म से निर्धारित’ धारणा को चुनौती देता है

स्रोत 7 — एकलव्य की कथा

तब द्रोण ने गुरु दक्षिणा के रूप में एकलव्य से उसके दाहिने हाथ का अँगूठा माँग लिया। एकलव्य ने फ़ौरन गुरु को अपना अँगूठा काट कर दे दिया।

महाभारत, आदिपर्वन् — एकलव्य एक वनवासी निषाद (शिकारी समुदाय) था जिसे द्रोण ने शिष्य मानने से मना कर दिया था

तीन प्रश्न: निषादों को कौन-सा संदेश दिया जा रहा था? क्षत्रियों को क्या संदेश मिला होगा? क्या द्रोण धर्मसूत्र का अनुसरण कर रहे थे जब वे धनुर्विद्या की शिक्षा दे रहे थे?

अक्षत्रिय राजा — शास्त्र बनाम इतिहास★

§3.2

  • शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय ही राजा हो सकते थे — किंतु:
    • मौर्य वंश: बौद्ध ग्रंथ क्षत्रिय कहते हैं; ब्राह्मणीय शास्त्र ‘निम्न’ कुल का मानते हैं
    • शुंग और कण्व (मौर्यों के उत्तराधिकारी) — ब्राह्मण थे
    • शक — म्लेच्छ, बर्बर माने गए; पर रुद्रदामन का संस्कृत अभिलेख (सुदर्शन सरोवर) दिखाता है कि शक्तिशाली म्लेच्छ संस्कृतीय परिपाटी से अवगत थे
  • ★NCERT का निर्णायक वाक्य:
    • “राजनीतिक सत्ता का उपभोग हर वह व्यक्ति कर सकता था जो समर्थन और संसाधन जुटा सके।”
    • “राजत्व क्षत्रिय कुल में जन्म लेने पर शायद ही निर्भर करता था।”

यह वाक्य NCERT अभ्यास प्रश्न 2 का सीधा उत्तर है

गोतमी-पुत्त सिरि-सातकनि का विरोधाभास

जाति-प्रथा में आत्मसात होने की जटिलता

  • उसने स्वयं को ‘अनूठा ब्राह्मण’ और साथ ही ‘क्षत्रियों के दर्प का हनन करने वाला’ बताया
  • दावा किया कि चार वर्णों के बीच विवाह संबंध होने पर उसने रोक लगाई
  • किंतु फिर भी रुद्रदामन के परिवार से उसने विवाह संबंध स्थापित किए
  • ★NCERT का विश्लेषण:
    • सातवाहन स्वयं को ब्राह्मण वर्ण का बताते थे — जबकि शास्त्र के अनुसार राजा को क्षत्रिय होना चाहिए
    • चतुर्वर्णी व्यवस्था की मर्यादा बनाए रखने का दावा — किंतु वर्ण-व्यवस्था से बाहर के लोगों से वैवाहिक संबंध
    • अंतर्विवाह का पालन — न कि बहिर्विवाह का जो ब्राह्मणीय ग्रंथों में प्रस्तावित है

“जाति प्रथा के भीतर आत्मसात होना बहुधा एक जटिल सामाजिक प्रक्रिया थी”

वर्ण और जाति — मूल भेद

§3.3

वर्ण

  • संख्या मात्र चार — निश्चित
  • धर्मसूत्र-धर्मशास्त्र में परिभाषित
  • सैद्धांतिक/आदर्शमूलक ढाँचा
  • योग्यता, कार्य व व्यवसाय के आधार पर निर्धारित

जाति

  • कोई निश्चित संख्या नहीं
  • नए सामाजिक समूहों व नए व्यवसायों से संख्या निरंतर बढ़ती रही
  • एक ही जीविका वाली जातियाँ कभी-कभी श्रेणियों में संगठित
  • व्यावहारिक/गतिशील वास्तविकता

इन समुदायों के इतिहास का लेखा-जोखा कम मिलता है — मंदसौर अभिलेख एक बहुमूल्य अपवाद है

मंदसौर अभिलेख — रेशम बुनकरों की कहानी★

लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी

  • रेशम के बुनकरों की एक श्रेणी मूलतः लाट (गुजरात) प्रदेश की निवासी थी
  • वे वहाँ से मंदसौर (मध्य प्रदेश) चले गए, जिसे तब दशपुर कहा जाता था
  • यह कठिन यात्रा उन्होंने अपने बच्चों और बांधवों के साथ संपन्न की
  • कारण: उन्होंने वहाँ के राजा की महानता के बारे में सुना था
  • ★अभिलेख से मिलने वाली अंतर्दृष्टियाँ:
    • श्रेणी की सदस्यता शिल्प में विशेषज्ञता पर निर्भर थी
    • कुछ सदस्य अन्य जीविका भी अपना लेते थे
    • सदस्य एक व्यवसाय के अतिरिक्त और चीज़ों में भी सहभागी होते थे
    • सामूहिक रूप से शिल्पकर्म से अर्जित धन को सूर्य देवता के मंदिर पर खर्च किया

स्रोत 8 बताता है — कुछ को संगीत से प्रेम, कुछ जीवनी-लेखन में, कुछ धार्मिक व्याख्या में, कुछ खगोल शास्त्र में पारंगत, अन्य युद्ध में शूरवीर

वणिकों की स्थिति — एक और जटिलता

बॉक्स, पृ. 64

  • संस्कृत ग्रंथों व अभिलेखों में व्यापारियों के लिए वणिक शब्द
  • शास्त्रों में व्यापार को वैश्यों की जीविका बताया जाता है
  • किंतु अन्य स्रोतों में अधिक जटिल परिस्थिति:
    • शूद्रक के नाटक मृच्छकटिकम् (लगभग चौथी श. ई.) में नायक चारुदत्त को ब्राह्मण-वणिक बताया गया
    • पाँचवीं श. ई. के एक अभिलेख में दो भाइयों को क्षत्रिय-वणिक कहा गया, जिन्होंने मंदिर-निर्माण हेतु धन दिया

‘ब्राह्मण-वणिक’ और ‘क्षत्रिय-वणिक’ — ये संयुक्त शब्द ही शास्त्रीय ढाँचे की सीमा दिखा देते हैं

चार वर्णों के परे : एकीकरण

§3.4

  • उपमहाद्वीप में हमेशा से ऐसे समुदाय रहे हैं जिन पर ब्राह्मणीय विचारों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा
  • ! संस्कृत साहित्य में ऐसे समुदायों को कई बार विचित्र, असभ्य और पशुवत चित्रित किया जाता है
  • उदाहरण —
    • वन प्रांतर के लोग, जिनके लिए शिकार और कंद-मूल संग्रह जीवन-निर्वाह का साधन था; निषाद वर्ग (एकलव्य)
    • यायावर पशुपालक — शंका की दृष्टि से देखे जाते क्योंकि उन्हें बसे हुए कृषिकर्मियों के साँचे में नहीं ढाला जा सकता था
    • असंस्कृत भाषी — म्लेच्छ कहकर हेय दृष्टि से देखे जाते
  • ★किंतु इन लोगों के बीच विचारों और मतों का आदान-प्रदान होता था

उनके संबंधों के स्वरूप के बारे में हमें महाभारत की कथाओं से ज्ञात होता है — जैसे हिडिम्बा की कथा (स्रोत 9)

चार वर्णों के परे : अधीनता और संघर्ष

§3.5 — अस्पृश्यता

  • कुछ लोगों को वर्ण व्यवस्था के बाहर माना गया → कुछ वर्गों को ‘अस्पृश्य’ के रूप में वर्गीकृत किया गया
  • तर्क: अनुष्ठानों से जुड़े कर्म पुनीत और ‘पवित्र’; इसके विपरीत कुछ कार्य ‘दूषित’
  • चाण्डाल: शवों की अंत्येष्टि और मृत पशुओं को छूने वाले; वर्ण-व्यवस्था वाले समाज में सबसे निम्न कोटि
    • उनका स्पर्श, यहाँ तक कि उन्हें देखना भी, अपवित्रकारी माना जाता था
  • मनुस्मृति में चाण्डालों के ‘कर्तव्य’: गाँव के बाहर रहना • फेंके हुए बर्तनों का इस्तेमाल • मृतकों के वस्त्र व लोहे के आभूषण • रात्रि में गाँव-नगर में चल-फिर नहीं सकते • संबंधी-विहीन मृतकों की अंत्येष्टि • वधिक के रूप में कार्य
  • चीनी यात्रियों का साक्ष्य: फ़ा-शिएन (5वीं श. ई.) — सड़क पर करताल बजाकर सूचना देनी पड़ती थी; श्वैन-त्सांग (7वीं श. ई.) — वधिक व सफ़ाईकर्मियों को नगर से बाहर रहना पड़ता था

इतिहासकारों का प्रश्न: क्या चाण्डालों ने शास्त्रों में निर्धारित अपने हीन जीवन को स्वीकार कर लिया था?

स्रोत 10 — मातंग जातक का प्रतिरोध

जिन्हें अपने जन्म पर गर्व है पर अज्ञानी हैं वे भेंट के पात्र नहीं हैं। इसके विपरीत जो लोग दोषमुक्त हैं वे भेंट के योग्य हैं।

मातंग (एक चाण्डाल के रूप में जन्मे बोधिसत्त) का अपने ब्राह्मण-पुत्र माण्डव्य को उत्तर — पालि ‘मातंग जातक’ से

यह ‘भिन्न सामाजिक वास्तविकता’ का संकेत है — प्रतिरोध की आवाज़ अब्राह्मणीय ग्रंथों में सुरक्षित रही

4 | जन्म के परे | स्त्री-पुरुष के अधिकार ; वर्ण व संपत्ति ; वैकल्पिक रूपरेखा

संपत्ति पर स्त्री और पुरुष के भिन्न अधिकार

§4.1

  • द्यूत-क्रीड़ा: युधिष्ठिर ने स्वर्ण, हस्ति, रथ, दास, सेना, कोष, राज्य, प्रजा की संपत्ति, अनुजों और फिर स्वयं को दाँव पर लगाकर गँवाया — इसके उपरांत द्रौपदी को भी
  • स्मृति परंपरा: माता-पिता की मृत्यु के बाद पैतृक संपत्ति संतानों में समान रूप से विभाजित; ज्येष्ठ पुत्र विशेष भाग का अधिकारी
  • ★स्त्रीधन: विवाह के समय मिले उपहारों पर स्त्रियों का स्वामित्व
    • इसे उनकी संतान विरासत के रूप में प्राप्त कर सकती थी
    • इस पर उनके पति का कोई अधिकार नहीं होता था
  • ! किंतु मनुस्मृति स्त्रियों को पति की आज्ञा के विरुद्ध पारिवारिक संपत्ति अथवा बहुमूल्य धन के गुप्त संचय के विरुद्ध चेतावनी देती है

NCERT का संतुलित निष्कर्ष: उच्च वर्ग की महिलाएँ संसाधनों पर पैठ रखती थीं, पर सामान्यतः भूमि, पशु और धन पर पुरुषों का ही नियंत्रण था

स्रोत 12 — धन अर्जन के तरीके

मनुस्मृति के अनुसार

पुरुषों के लिए — सात तरीके

  • विरासत
  • खोज
  • खरीद
  • विजित करके
  • निवेश
  • कार्य द्वारा
  • सज्जनों द्वारा दी गई भेंट स्वीकार करके

स्त्रियों के लिए — छह तरीके

  • वैवाहिक अग्नि के सामने मिली भेंट
  • वधूगमन के समय मिली भेंट
  • स्नेह के प्रतीक के रूप में मिली भेंट
  • भ्राता, माता और पिता द्वारा दिए गए उपहार
  • परवर्ती काल में मिली भेंट
  • वह सब कुछ जो “अनुरागी” पति से उसे प्राप्त हो

★मूल अंतर: पुरुषों के तरीके स्वतंत्र आर्थिक क्रियाओं (खरीद, निवेश, कार्य, विजय) से जुड़े हैं; स्त्रियों के तरीके लगभग सभी भेंट/उपहार पर आधारित हैं

वर्ण और संपत्ति के अधिकार — तथा बौद्ध आलोचना

§4.2

  • ब्राह्मणीय ग्रंथों के अनुसार संपत्ति का एक और आधार (लैंगिक के अतिरिक्त) — वर्ण
  • शूद्रों के लिए एकमात्र ‘जीविका’ ऐसी सेवा थी जिसमें हमेशा उनकी इच्छा शामिल नहीं होती थी
  • यदि ये विधान वास्तव में कार्यान्वित होते तो ब्राह्मण और क्षत्रिय सबसे धनी होते — यह कुछ हद तक सामाजिक वास्तविकता से मेल खाता था
    • राजा अधिकतर धनी चित्रित; पुरोहित भी सामान्यतः धनी — हालाँकि यदा-कदा निर्धन ब्राह्मण का भी चित्रण मिलता है
  • ★बौद्ध आलोचना (लगभग छठी श. ई.पू. से):
    • बौद्धों ने अंगीकार किया कि समाज में विषमता मौजूद थी
    • किंतु यह भेद न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी
    • बौद्धों ने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया

स्रोत 13 (मज्झिमनिकाय): यदि शूद्र धनी हो तो क्षत्रिय-ब्राह्मण-वैश्य भी उसके आज्ञावाही सेवक बन सकते थे → “तो क्या फिर यह चारों वर्ण एकदम समान नहीं हैं?”

एक वैकल्पिक सामाजिक रूपरेखा : संपत्ति में भागीदारी

§4.3 — प्राचीन तमिलकम्

  • अब तक हमने देखा कि लोग अपनी संपत्ति के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा का दावा करते थे
  • ★किंतु समाज में अन्य संभावनाएँ भी थीं:
    • वह स्थिति जहाँ दानशील आदमी का सम्मान किया जाता था
    • तथा कृपण व्यक्ति — या वह जो स्वयं अपने लिए संपत्ति संग्रह करता था — घृणा का पात्र होता था
  • प्राचीन तमिलकम् एक ऐसा ही क्षेत्र था; यहाँ 2000 वर्ष पहले अनेक सरदारियाँ थीं
  • सरदार अपनी प्रशंसा गाने वाले चारण और कवियों के आश्रयदाता होते थे
  • तमिल संगम साहित्य में सामाजिक-आर्थिक संबंधों का अच्छा चित्रण

निष्कर्ष: धनी-निर्धन के बीच विषमताएँ थीं, पर जिनका संसाधनों पर नियंत्रण था उनसे अपेक्षा थी कि वे मिल-बाँट कर उपयोग करेंगे

स्रोत 14 — निर्धन दानी सरदार

उसके पास हर रोज़ दूसरों पर खर्चा करने के लिए धन नहीं है। किंतु वह इतना ओछा भी नहीं है कि यह कहकर, कि मेरे पास कुछ नहीं है, दान देने से मना कर दे!

पुरनानुरू — तमिल संगम साहित्य की एक पद्यावली (लगभग प्रथम शताब्दी ईसवी); एक चारण अपने आश्रयदाता का चित्रण कर रहा है

★मुख्य प्रश्न: धन अर्जित करने के लिए सरदार को क्या करना होता था? (उत्तर: वह लोहार से भाला बनवाता है — अर्थात् युद्ध)

5 | सामाजिक अनुबंध | सुत्तपिटक का मिथक ; चार निष्कर्ष

महासम्मत — ‘सब लोगों द्वारा चुना गया’

§5 — सुत्तपिटक का मिथक

सामाजिक अनुबंध

प्रारंभ में मानव पूर्णतया विकसित नहीं थे; सभी जीव शांति के निर्बाध लोक में रहते और प्रकृति से उतना ही ग्रहण करते जितनी एक समय के भोजन की आवश्यकता होती। किंतु यह व्यवस्था क्रमशः पतनशील हुई — मनुष्य लालची, प्रतिहिंसक और कपटी हो गए।

तब उन्होंने एक ऐसे मनुष्य के चयन का विचार किया “जो उचित बात पर क्रोधित हो” — बदले में उसे चावल का अंश देंगे; सब लोगों द्वारा चुने जाने के कारण उसे महासम्मत की उपाधि प्राप्त होगी

मिथक के चार निष्कर्ष

§5 — अत्यंत महत्त्वपूर्ण

  • (1) राजा का पद लोगों द्वारा चुने जाने पर निर्भर करता था
  • (2) ‘कर’ वह मूल्य था जो लोग राजा की इस सेवा के बदले उसे देते थे
  • (3) आर्थिक और सामाजिक संबंधों को बनाने में मानवीय कर्म का बड़ा हाथ था
  • (4) ★यदि मनुष्य स्वयं एक प्रणाली को बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार थे तो भविष्य में उसमें परिवर्तन भी ला सकते थे

तुलना कीजिए: यह ‘पुरुषसूक्त’ वाले ब्राह्मणीय दृष्टिकोण से कैसे भिन्न है? (दैविक/नैसर्गिक बनाम मानव-निर्मित/परिवर्तनीय) — यही NCERT अभ्यास प्रश्न 4 है

6 | साहित्यिक स्रोतों का इस्तेमाल | पाँच कसौटियाँ ; भाषा ; लेखक ; पुरातत्त्व से मिलान

इतिहासकार की पाँच कसौटियाँ

§6 — किसी भी ग्रंथ के परीक्षण की विधि

  • (1) भाषा: पालि, प्राकृत अथवा तमिल — जो आम लोगों द्वारा बोली जाती थी; अथवा संस्कृत — जो पुरोहितों और खास वर्ग द्वारा प्रयुक्त थी
  • (2) ग्रंथ का प्रकार: क्या ये ‘मंत्र’ थे जो अनुष्ठानकर्ताओं द्वारा पढ़े और उच्चरित किए जाते थे — अथवा ‘कथा’ ग्रंथ जिन्हें लोग पढ़ और सुन सकते थे?
  • (3) लेखक(कों) के बारे में — जिनके दृष्टिकोण और विचारों ने ग्रंथों को रूप दिया
  • (4) श्रोता — क्योंकि लेखकों ने रचना करते समय श्रोताओं की अभिरुचि पर ध्यान दिया होगा
  • (5) संकलन/रचना काल और उसकी रचनाभूमि

“इन सब मुद्दों का जायज़ा लेने के बाद ही इतिहासकार किसी ग्रंथ की विषयवस्तु का इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए इस्तेमाल करते हैं”

भाषा एवं विषयवस्तु

§6.1

  • महाभारत का पाठ संस्कृत में है (यद्यपि अन्य भाषाओं में भी संस्करण मिलते हैं)
  • ★किंतु महाभारत की संस्कृत वेदों अथवा प्रशस्तियों की संस्कृत से कहीं अधिक सरल है
    • अतः यह संभव है कि इस ग्रंथ को व्यापक स्तर पर समझा जाता था
  • विषयवस्तु के दो शीर्षक: आख्यान = कहानियों का संग्रह | उपदेशात्मक = सामाजिक आचार-विचार के मानदंडों का चित्रण
    • ! यह विभाजन एकांगी नहीं — उपदेशात्मक अंशों में भी कहानियाँ, और आख्यानों में समाज के लिए सबक निहित
  • अधिकतर इतिहासकार एकमत: महाभारत वस्तुतः एक भाग में नाटकीय कथानक था जिसमें उपदेशात्मक अंश बाद में जोड़े गए

आरम्भिक संस्कृत परंपरा में महाभारत ‘इतिहास’ की श्रेणी में — अर्थ: ‘ऐसा ही था’

महाभारत की रचना — चार चरण

§6.2 — लेखक (एक या कई?)

  1. मूलरचयिताभाट सारथी ‘सूत’ — क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्धक्षेत्र में जाते; प्रेषण मौखिक
  2. 5वीं श. ई.पू. सेब्राह्मणों ने कथा परंपरा पर अधिकार कर इसे लिखा; कुरु-पांचाल सरदारी से राजतंत्र बन रहे थे
  3. 200 ई.पू.–200 ई.विष्णु-आराधना प्रभावी; श्रीकृष्ण को विष्णु का रूप बताया जा रहा था
  4. 200–400 ई.मनुस्मृति से मिलते-जुलते बृहत उपदेशात्मक प्रकरण जोड़े गए
  5. परिणामप्रारंभिक रूप में संभवतः10,000 से कम श्लोक → बढ़कर एक लाख श्लोक

साहित्यिक परंपरा में रचयिता ऋषि व्यास माने जाते हैं; परंपरा के अनुसार उन्होंने यह ग्रंथ श्रीगणेश को लिखवाया

सदृशता की खोज — हस्तिनापुर का उत्खनन

§6.3 — 1951-52, बी.बी. लाल, मेरठ ज़िला (उ.प्र.)

दूसरा स्तर (12वीं–7वीं श. ई.पू.)

  • आवास गृहों की कोई निश्चित परियोजना नहीं मिलती
  • मिट्टी की बनी दीवारें और कच्ची मिट्टी की ईंटें अवश्य मिलती हैं
  • सरकंडे की छाप वाले मिट्टी के पलस्तर की खोज
  • अर्थात् कुछ घरों की दीवारें सरकंडों की, मिट्टी के पलस्तर सहित

तीसरा स्तर (6वीं–3री श. ई.पू.)

  • घर कच्ची और कुछ पक्की ईंटों के बने
  • शोषक-घट और ईंटों के नाले — गंदे पानी के निकास हेतु
  • वलय-कूपों का इस्तेमाल — कुओं व मल-निकासी वाले गर्तों, दोनों रूपों में
  • अर्थात् अपेक्षाकृत विकसित बस्ती

★किंतु स्रोत 15 में महाभारत का हस्तिनापुर: “समुद्र की भाँति भरा… सैकड़ों प्रासादों से संकुलित… इंद्र की नगरी के समान शोभायमान” — क्या दोनों में समानता है?

पुरातत्त्व और महाकाव्य — NCERT का खुला प्रश्नध्यान

  • लाल की खोज: मिट्टी की दीवारें, सरकंडे, कच्ची ईंटें
  • महाकाव्य का वर्णन: सैकड़ों प्रासाद, सिंहद्वार, तोरण, कंगूरे
  • ★NCERT दो संभावनाएँ रखती है:
    • क्या नगर का यह चित्रण मुख्य कथानक में बाद में (छठी श. ई.पू. के पश्चात) जोड़ दिया गया जब इस क्षेत्र में नगरों का विकास हुआ?
    • अथवा यह मात्र कवियों की कल्पना की उड़ान थी जिसकी अन्य साक्ष्य से तुलना कर उसे प्रमाणित नहीं किया जा सकता?
  • नामों की समानता मात्र एक संयोग हो सकती है — किंतु गंगा के ऊपरी दोआब में स्थिति इंगित करती है कि यह कुरुओं की राजधानी हो सकती थी

साहित्य और पुरातत्त्व का मिलान सदैव सरल नहीं होता — यही इस खंड की शिक्षा है

द्रौपदी का विवाह — तीन स्पष्टीकरण★

स्रोत 16 — सबसे चुनौतीपूर्ण उपकथा

  • द्रुपद ने स्वयंवर आयोजित किया; अर्जुन ने प्रतियोगिता जीती
  • पांडव उसे लेकर कुंती के पास गए, जिन्होंने बिना देखे ही लाई गई वस्तु आपस में बाँट लेने को कहा
  • लेखक(कों) द्वारा दिए गए तीन स्पष्टीकरण:
    • (1) कुंती की आज्ञा की अवहेलना नहीं की जा सकती थी
    • (2) व्यास: पांडव वास्तव में इंद्र के अवतार थे और उनकी पत्नी ने ही द्रौपदी के रूप में जन्म लिया — नियति ने साथ निश्चित किया
    • (3) व्यास: एक युवा स्त्री ने शिव की आराधना कर उत्साह के अतिरेक में पाँच बार पति प्राप्ति का वर माँग लिया
  • इन कहानियों से संतुष्ट होकर द्रुपद ने सहमति दी

प्रश्न: लेखक(कों) ने एक ही प्रकरण के लिए तीन स्पष्टीकरण क्यों प्रस्तुत किए?

बहुपति प्रथा — इतिहासकारों के मत

व्याख्या की बहुलता

  • वर्तमान इतिहासकारों का सुझाव: इसका चित्रण इंगित करता है कि संभवतः यह प्रथा शासकों के विशिष्ट वर्ग में मौजूद थी
  • किंतु तीन स्पष्टीकरण यह भी व्यंजित करते हैं कि समय के साथ बहुपति प्रथा धीरे-धीरे लोगों के बीच अमान्य होती चली गई
  • कुछ इतिहासकार: यद्यपि ब्राह्मणों की दृष्टि में यह अमान्य और अवांछित थी, यह हिमालय क्षेत्र में प्रचलन में थी (और आज भी है)
  • यह भी कहा जाता है कि युद्ध के समय स्त्रियों की कमी के कारण इसे अपनाया गया — अर्थात् संकट की स्थिति में
  • कुछ आरंभिक स्रोत पुष्टि करते हैं कि यह न तो एकमात्र विवाह पद्धति थी और न ही सबसे अधिक प्रचलित

★NCERT का निष्कर्ष: “सृजनात्मक साहित्य की अपनी कथा संबंधी ज़रूरतें होती हैं जो हमेशा समाज में मौजूद वास्तविकताओं को नहीं दर्शातीं।”

7 | एक गतिशील ग्रंथ | पाठान्तर ; पुनर्व्याख्याएँ ; महाश्वेता देवी

महाभारत आज भी गतिशील है

§7

  • महाभारत का विकास संस्कृत के पाठ के साथ ही समाप्त नहीं हो गया
  • शताब्दियों से अनेक पाठान्तर भिन्न-भिन्न भाषाओं में लिखे गए
  • ये सब उस संवाद को दर्शाते थे जो इनके लेखकों, अन्य लोगों और समुदायों के बीच कायम हुए
  • अनेक कहानियाँ जिनका उद्भव एक क्षेत्र विशेष में हुआ, वे सब इस महाकाव्य में समाहित कर ली गईं
  • मुख्य कथा की अनेक पुनर्व्याख्याएँ की गईं
  • प्रसंगों को मूर्तिकला और चित्रों में दर्शाया गया; नाटकों और नृत्य कलाओं के लिए भी विषय-वस्तु

इसीलिए महाभारत को एक ‘बंद’ ग्रंथ नहीं, एक चालू संवाद समझना चाहिए

महाश्वेता देवी — “कुंती ओ निषादी”★

एक समकालीन पुनर्व्याख्या

  • महाश्वेता देवी — समसामयिक बांग्ला लेखिका, शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए प्रसिद्ध
  • मूल प्रसंग (लाक्षागृह): पांडव सुरंग से भाग निकलते हैं; कुंती के भोज में एक निषादी अपने पाँच पुत्रों के साथ आती है; वे गहरी नींद में सो जाते हैं और आग में भस्म हो जाते हैं — लोग समझते हैं पांडव मर गए
  • महाश्वेता देवी की कथा वहीं से आरंभ होती है जहाँ महाभारत का यह प्रसंग समाप्त होता है
  • वन में कुंती पृथ्वी से बातें करते हुए अपनी त्रुटियों को अंगीकार करती हैं
  • एक निषादी पूछती है — क्या उन्हें लाक्षागृह की याद है? “कुंती सकपका गईं। उन्हें याद था।”
  • निषादी: “अपने अतीत पर विचार करते समय तुम्हें एक बार भी उन छः निर्दोष प्राणों की याद नहीं आई?”
  • आग की लपटें करीब आईं — निषादी अपने प्राण बचाकर निकल गई किन्तु कुंती वहीं रह गई

★लेखिका ने “उन प्रश्नों की ओर ध्यान खींचा है जिन पर संस्कृत पाठ पूर्णतया मूक है” — यह अध्याय की केंद्रीय शिक्षा का सर्वोत्तम उदाहरण है

कालरेखा 1 — प्रमुख साहित्यिक परंपराएँ

वस्तुनिष्ठ प्रश्नों की खान

  1. 500 ई.पू.पाणिनि की अष्टाध्यायी, संस्कृत व्याकरण
  2. 500-200 ई.पू.प्रमुखधर्मसूत्र (संस्कृत में)
  3. 500-100 ई.पू.आरंभिक बौद्ध ग्रंथत्रिपिटक सहित (पालि में)
  4. 500 ई.पू.-400 ई.रामायण और महाभारत (संस्कृत में)
  5. 200 ई.पू.-200 ई.मनुस्मृति; तमिल संगम साहित्य की रचना व संकलन
  6. 100 ई.चरक और सुश्रुत संहिता — आयुर्वेद के ग्रंथ
  7. 200 ई. सेपुराणों का संकलन (संस्कृत में)
  8. 300 ई.भरतमुनि का नाट्यशास्त्र
  9. 300-600 ई.अन्यधर्मशास्त्र (संस्कृत में)
  10. 400-500 ई.कालिदास का साहित्य; आर्यभट्ट व वराहमिहिर के ग्रंथ; जैन ग्रंथों का संग्रहण (प्राकृत में)

कालरेखा 2 — महाभारत के अध्ययन में कीर्तिमान

बीसवीं शताब्दी

दोनों कालरेखाएँ अलग-अलग रखिए: कालरेखा 1 = ग्रंथ कब लिखे गए • कालरेखा 2 = उनका अध्ययन कब हुआ

+ | NCERT से आगे | ज्ञान-विस्तार (वेब-सत्यापित) — ये तथ्य पाठ्यपुस्तक से अतिरिक्त हैं

🔍 ज्ञान-विस्तार: नाम और तथ्य जो उत्तर चमकाते हैं

[अतिरिक्त — NCERT से बाहर]

  • समालोचनात्मक संस्करण कहाँ बना? भांडारकर प्राच्यविद्या शोध संस्थान (BORI), पुणे — NCERT संस्था का नाम नहीं देती
  • कितनी पांडुलिपियाँ? लगभग 1,259 पांडुलिपियों का परामर्श; 19 खंड (22 भागों में); प्रकाशन 22 सितंबर 1966 को
  • वी.एस. सुकथांकर — इस संस्करण के प्रधान संपादक (General Editor)
  • बी.बी. लाल — हस्तिनापुर उत्खनन से उन्होंने ‘चित्रित धूसर मृद्भाण्ड (PGW) संस्कृति’ की पहचान स्थापित की
    • उन्होंने प्राचीन ग्रंथों में वर्णित अन्य स्थलों — मथुरा, कुरुक्षेत्र, इंद्रप्रस्थ — का भी अन्वेषण किया
  • PGW की पहचान: धूसर पृष्ठभूमि पर प्रायः काले रंग से चित्रकारी; कभी चॉकलेटी या लाल-भूरे रंग से

🧭 अध्याय 2 से जोड़: PGW NBPW से पहले की शैली है — क्रम याद रखिए: PGW → NBPW

सारांश: एक नज़र में

पुनरावृत्ति

  • स्रोत: महाभारत + धर्मसूत्र-धर्मशास्त्र + अभिलेख + पालि/प्राकृत/तमिल ग्रंथ
  • बंधुत्व: पितृवंशिकता (आदर्श) बनाम भाई/बंधु/स्त्री का उत्तराधिकार (व्यवहार)
  • विवाह: बहिर्विवाह व गोत्र के नियम बनाम सातवाहन रानियों का अंतर्विवाह
  • वर्ण: शास्त्रीय जीविका बनाम अक्षत्रिय राजा, ब्राह्मण-वणिक, रेशम बुनकर
  • जाति: चार वर्ण बनाम असंख्य जातियाँ व श्रेणियाँ
  • वर्ग: स्त्रीधन व संपत्ति के भिन्न अधिकार; बौद्ध सामाजिक अनुबंध बनाम पुरुषसूक्त
उत्तर देखिए

उत्तर वही था: ग्रंथ कहता है “ऐसा होना चाहिए” — इतिहासकार पूछता है “क्या सचमुच ऐसा होता था?” और उत्तर प्रायः नहीं होता

जो पढ़ाते हैं, वही लिखते और जाँचते हैं

इसे बनाने वाले

  • भरत चौधरीभरत चौधरीव्याख्यातारा.उ.मा.वि. जेठान्तरी · ब्लॉक समदड़ी, जिला बालोतरा
  • वनिता कुमारीवनिता कुमारीव्याख्यातारा.उ.मा.वि. रामसीन मूंगड़ा · ब्लॉक एवं जिला बालोतरा

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